Wednesday, March 5, 2014

वैज्ञानिक खेती के बढ़ते दुष्प्रभाव

वैज्ञानिक खेती के बढ़ते दुष्प्रभाव


अनुवांशिक बीज (Genetically modified seeds)

सन्दर्भ :      poison on plate


अभी हम खेती में उपयोग किए जा रहे जहरीले रसायनो के दुष्प्रभावों से मुक्त हो ही  नहीं पाये हैं कि भारत सरकार ने अनुवांशिक तरीके से बिगाड़े  गए बीजों के उपयोग की अनुमती दे दी है.

यह  बहुत ही खतरनाक है।


कुदरती खेती के महान वैज्ञानिक  फुकुओकाजी का कहना है कि
 " वैज्ञानिकों को अनुसंधान करने से पहले अच्छा इंसान बनना चाहिए " उन्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि" मानव जीवन का लक्ष्य क्या है ?"
"मानवता के कल्याण के लिए किस चीज की जरुरत है. " वैज्ञानिकों को यह जानना जरूरी है कि वह कौन सी जरूरी चीज है जिस पर मानव जाती जीवित रह सकती है।

फुकुओकाजी ने अपने पूरे जीवन काल में कुदरती खेती के सिद्धांतों का पालन करते हुए फसलों को पैदा करने के अनेक तरीके अमल में लाये किन्तु उनका उदेश्य कुदरत को नुक्सान पहुंचाए बगैर फसलोत्पादन करना था. उन्होंने उन सब गैरजरूरी गेर कुदरती उपायों को त्याग दिया जिस से कुदरत की हिंसा होती थी. यही उनकी सफलता का राज है.

आज के  खेती के वैज्ञानिकों के पास "कुदरती दर्शन" की भारी कमी है. खेती का अनुसंधान कार्य दिशा हीन  हो गया है. खेती के वैज्ञानिको को असीमित कुदरती तत्वों में से केवल एक छोटा सा अंश दिखाई देता है वे उस के इर्द गिर्द भटकते रहते हैं जबकि सच्चाई  ये है कि हर मौसम हर साल जगह जगह पर ये कारक बदलते रहते हैं.
आधुनिक विज्ञानं कुदरत को छोटे छोटे टुकड़ों में बाँट कर उसका अध्यन करती है. इस से कुदरती सत्य ,असत्य में बदल जाता है. परिणामो को वैज्ञानिकों की सुविधा के अनुसार तोडा और मरोड़ा जाता है इसका खेती किसानी से कोई मतलब नहीं रहता है.
दलहन और गैर दलहन फसलों का समन्वय (ऋषि खेती )
मौजूदा "हरित क्रांती "  सुधारे गए कमजोर बीजों पर आश्रित है. जिसमे किसानो को जहरीले रसायनो का इस्तमाल करना जरूरी हो जाता है. जिस से जमीन की जैविकता नस्ट हो जाती है. मिट्टी बे जान हो जाती है. फसलें जहरीले रसायनो की गुलाम हो जाती हैं. अब हर बार बेजान और कमजोर खेतों में फसलोत्पादन के लिए नए नए वैज्ञानिक तरीके खोजे जाते हैं जिस से कभी खेतों की जान  वापस नहीं आती खेत मरुस्थल में तब्दील हो जाते हैं.  GM भी इसी भयानक मानवीय त्रासदी का परिणाम है. ये कहाँ का नियम है कि पहले विनाश करो फिर विकास के नाम पर और विनाश करो.
फसलोत्पादन के लिए की जा रही जमीन की जुताई इस मानव निर्मित त्रासदी की पहली कड़ी है जुताई नहीं करने से खेत की जैविकता का संवर्धन होता है खेत ताकतवर बन जाते हैं जिनमे ताकतवर फसलें पैदा होती है
दलहन जाती की फसलों को पैदा करने से और खेती के अवशेषों को जहाँ का तहां डालने से खेतों के पोषक तत्व बढ़ते जाते हैं. जिस से अपने आप कुदरती बीजों में सुधार आता जाता है.

शालिनी एवं राजू टाइटस
ऋषि खेती के किसान
होशंगाबाद
461001. rajuktitus@gmail.com . mob-09179738049







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