Tuesday, March 27, 2018

हरित क्रांति बनाम जंगली खेती

हरित क्रांति बनाम जंगली खेती 

मारे देश में आज़ादी  के बाद जब देश आज़ाद  गया था तब देश के सामने स्थाई विकास का बड़ा मसला था। उन दिनों अधिकतर लोग गांव में रहते थे जो खेती किसानी पर आश्रित थे। इसलिए सरकार ने खेती किसानी को विकास का प्रमुख मुद्दा बना कर उस पर काम करना शुरू किया था।

हमेशा से हमारे देश में  विकास ,विकसित देशों की नकल से होता रहा है इसी आधार पर खेती की तकनीक भी विदेशों से भारत में लाई गई तकनीक जो ट्रैक्टर से होने वाली गहरी जुताई , बड़े बांधों से की जाने वाली भारी  सिंचाई ,यूरिया और हाइब्रिड बीजों पर आधारित है। जिसे हरित क्रांति नाम दिया गया।


हम भी सत्तर के दशक में इस सरकारी खेती के जाल में फंस गए थे। हमने कुआ खुदवाया ,लम्बी  बिजली की लाइन लाकर मोटर पम्प लगाकर हरित क्रांति का अभ्यास शुरू किया।

उन दिनों भी हमे गांव के किसानो से विरोध का समना करना पड़ता था। क्यों की किसान आसानी से बेलों से खेत बखर कर अनाज की खेती कर संतुस्ट थे। वे अपने खेतों अनाज , दालें ,तिलहन ,चारा सब आसानी से पैदा कर लेते थे। बरसात आधारित खेती होती थी। हमने भी अपने खेतों में हरित क्रांति के पूर्व परम्परगत देशी खेती का करीब ५ साल अभ्यास किया था। कोई कमी नहीं थी।


जब हमने हरित क्रांति का अभ्यास शुरू किया पहले साल फसलों को देखने गांव के लोग इकट्ठे हो गए थे। हमारे गांव में हमने इस खेती की शुरुवाद  की थी। पहले किसान इसका विरोध करते थे बाद में धीरे धीरे सभी सरकारी मदद से इसके चंगुल  में फंसते चले गए।

हरितक्रांति में हमने यह पाया  की इसमें खर्च अधिक  और लाभ कम था। इस से हमारी लागत में यदि हम अपनी महनत ,खेत की लागत को जोड़ दें और पर्यावरणीय हानि को घटा देते हैं तो हमे  पहले साल से घाटा  दिखाई देता है। पहले साल उत्पादन अधिक दिखाई देता है किन्तु कुल मिलकार घाटा ही रहता है।

हमने १५ साल बड़ी लगन और महनत के साथ हरित क्रांति की खेती में ताकत लगाई किन्तु हार गए। हमारे खेत कांस से भर गए थे। लागत बढ़ती जा रही थी हमारी हालत एक जुआरी  और शराबी के माफिक हो गयी थी। हमारे सामने खेती छोड़ने के आलावा कोई उपाय नहीं बचा था। ऐसे में में हमे The one straw revolution  पढ़ने को मिली।


यह किताब जापान के जाने माने कृषि वैज्ञानिक श्री मासानोबू फुकुओकाजी के अनुभवों पर आधारित है। यह कुदरती खेती (जंगली खेती ) पर आधारित है।  इसने हमे अपनी गलतियां जो हमने हरित क्रांति में की  थी का अहसास दिला दिया हमने तुरंत हरित क्रांति को छोड़ दिया। इस किताब से हमे पता चला की जुताई करने से बरसात का पानी खेत में नहीं जाता है  वह बह  जाता है अपने साथ खेत की मिटटी (जैविक खाद ) को भी  बहा  कर ले जाता है। इससे एक बार की जुताई से खेत की आधा ताकत बह जाती है। इसलिए उत्पादन घटता जाता है  लागत बढ़ती जाती है और घाटा बढ़ता जाता है।

हरित क्रांति से हमारे उथले कुए सूख गए थे खेत रेगिस्तान बन गए थे। हमे बहुतआर्थिक हानि  हुई थी हमारी कीमती जमीन (शहरी प्लाट ) बिक चुकी थी। किन्तु जैसे ही हमने  जंगली खेती का अभ्यास शुरू किया हमे सुकून मिल गया.

जुताई ,खाद ,सिंचाई ,कीट और खरपतवार नाशकों का खर्च खत्म हो गया केवल बीज फेंकने और फसल काटने का ही खर्च बच गया था। जब हम जंगली खेती के तीसरे साल में थे जापान से फुकुओका जी हमारे खेतों पर आये थे। उन्हें भारत के भूतपूर्व प्र्धान मंत्री स्व राजीव गांधीजी ने देशिकोत्तम से सम्मानित किया था। उन्होंने हमे दुनिया भर में जंगली खेती के चल रहे कामों में न. वन दिया था।


जंगली खेती करने से सबसे बड़ा फायदा पानी का होता है हमारे सूखे गए देशी कुए पानी से भर गए दूसरा फायदा खेत हरियाली से भर जाते हैं जिसेसे  चारा ,हवा ,जलाऊ ईंधन मिलने लगता है तीसरा हमे जंगली रोटी मिलने लगती है जो अनेक बिमारियों को ठीक करने की ताकत रखती है।

जंगली खेती करना बहुत आसान है एक बार बरसात से पूर्व अनेक बीजों को मिलकर उन्हें क्ले (कीचड ) से बीज गोलिया बना कर खेतों में बिखेर दिया जाता है। फिर एक के बाद एक  फसल को पकने के बाद काट लिया जाता है और कृषि अवशेषों को वापस खेतों में फेंक दिया जाता है। अनेक बीजों में जंगली ,अर्ध जंगली फलों ,सब्जियों अनाजों ,दालों ,चारे के सभी बीज सम्मलित रहते हैं।

हरित क्रांति बहुत बड़ा धोखा है इस से एक और जहां सूखा बाढ़  मुसीबत बने हैं नदियां सूख रही हैं। वहीं किसानो की आत्म हत्याएं रुकने का नाम नहीं ले रही है। जुताई के कारण  खेत खोखले हो गए हैं उनमे खोखली फसले पैदा हो रही हैं जिस से नवजात बच्चों की मौत ,कुपोषण ,मोटापा ,मधुमेह ,कैंसर आम होते जा रहा है।
असल में हरित क्रांति का अनाज खाद्य समस्या को कम नहीं वरन बढ़ा रहा है यह खोखला है। इसमें पोषण नहीं है। जबकि जंगली अनाज इसके विपरीत स्वास्थवर्धक ,स्वादिस्ट ,रोग निरोग शक्ति देने वाला है।

जंगली खेती का उत्पादन ,उत्पादकता और गुणवत्ता का मुकाबला कोई भी जुताई से होने वाली खेती नहीं कर सकती है। यह सरल ,सूंदर और टिकाऊ है।

Friday, February 2, 2018


Better India




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Wednesday, January 10, 2018

रोजगार की समस्या

रोजगार की समस्या

जंगली गेंहू उगाएं 

जंगली गेंहू आठ गुना अधिक कीमत में माँगा जा रहा है। 

न दिनों ओधोगिक मंदी की समस्या जोरों पर है। कल कारखानों से कामगारों को हटाया जा रहा है।काम नही है इसलिए रोजगार नही हैं। किन्तु अब जब से जंगली खेती का  चलन शुरू हुआ है तब से खेतों में सोना पैदा होने लगा है। उदाहरण ठीक आपकी आँखों के सामने है। एक और जहां जुताई आधारित गेंहू जिसमे अनेक प्रकार के रसायन ,खाद और दवाओं का इस्तमाल हो रहा है। बेसुवाद और बीमारियां पैदा करने वाले हो गए हैं जिन्हे ग्राहक पसंद नहीं कर रहे हैं। विदेशों में इन उत्पादों को भेजने पर रोक लग गई है।

यही कारण  है की अनेक लोग विदेशों से नौकरी छोड़ कर अपने गांवों में वापस आ रहे हैं और जंगली खेती अपना रहे हैं।  जहां जुताई आधारित खेती करना बहुत कठिन और नुकसान दायक है वहीँ जंगली खेती सरल और बहुत लाभप्रद बन गई है जिसे कोई भी आसानी से कर सकता है।
जंगली गेंहू की फसल 
जुताई करने से खेत की कुदरती ताकत एक बार में आधी ख़तम हो जाती है जो हर बार कम होती जाती  है। दूसरा जुताई करने से बरसात का पानी खेतों में नहीं सोखा जाताहै वह तेजी से बहता है अपने साथ कुदरती खादों को भी बहा  कर ले जाता है।  कारण खेत भूखे और प्यासे हो जाते हैं उनमे भूखी फसले पैदा होती हैं। भूखी फसले अनेक बिमारियों का कारण  बन रहीं है। जिनमे कैंसर प्रमुख है।

जंगली फसलों को पैदा करना बहुत आसान है जुताई करे बिना बीजों को सीधा फेंक दिया जाता है जरूरत पड़ने पर बीजों को क्ले मिटटी से कोटिंग कर फेंक देते हैं और ये अपने आप बरसात में अनेक खरपतवारों की तरह उनके साथ उग आते हैं। बेमौसम थोड़ी बहुत सिंचाई की जा सकती है।

जंगली फसलों में जुताई नहीं करने के कारण और खरपतवारोंकी  मौजूदगी में असंख्य जीवजंतु कीड़े मकोड़े ,केंचुए ,चींटी और असंख्य आँखों से न दिखाई देने वाले सूक्ष्म जीवाणु पैदा हो जाते हैं जो खेत को कुदरती खाद से भर देते हैं जिसके कारण फसले भी पोषक  तत्वों से भरी पैदा होती हैं। जो अनेक बिमारियों   लिए दवाई का काम करती हैं।  जंगली गेंहू की लकड़ी के चूल्हे  पर बनी रोटी कैंसर की बीमारी को भी ठीक कर  देती है। यही कारण  है की यह गेंहू बहुत ऊँची कीमत में माँगा जा रहा है और इसने रोजगार के नए  दरवाजे खोल दिए हैं।





Tuesday, January 9, 2018

कर्ज के चक्रव्यूह में फंसे किसान




जंगली खेती ने खोले द्वार 

हरित क्रांति का विकल्प 
ह सही है की हरित क्रांति के आने के बाद किसानो में एक आशा की किरण का जन्म हुआ था किन्तु गहरी जुताई ,मशीनों और रसायनों के भारी  भरकम उपयोग के कारण इसका असर हमारे पर्यावरण पर बहुत अधिक पड़ा है जिसके कारण  खेत अब मरुस्थल में तब्दील हो गए हैंऔर किसान कर्जों में फंस गए हैं।

सरकार ने इन किसानो की आमदनी बढ़ाने के लिए तीन फसली कार्यक्रम बनाया है जिसके कारण  कर्ज अब तीन गुना रफ्तार से बढ़ने लगा है। एक फसल का कर्ज चुकता नहीं  है की दूसरी और तीसरी फसल का कर्ज लद  जाता है। यह एक चक्रव्यूह है।  बेचारा किसान एक कोल्हू के बैल  की तरह कर्ज के चक्रव्यूह से बाहर  निकलने के लिए तड़फ रहा है किन्तु घूम घूम कर वह अपने को जहां का तहाँ खड़ा पाता  है।

सुबबूल के पेड़ों के साथ गेंहू की बंपर फसल 
किंतु अफ़सोस  की बात है की  सरकार  और कृषि योजनाकारों के पास  इस समस्या से निपटने का कोई भी उपाय नहीं है। सरकार अपनी तरफ से भले बिना ब्याज का कर्ज ,अनुदान और मुआवजा दे रही है किन्तु इस समस्या का कोई अंत नजर नहीं आ रहा है


अनेक कमीशन बने किन्तु सब बेकार ही सिद्ध हुए हैं ,अनेक किसान आंदोलन हो रहे हैं पर कोई उपाय निकलता नजर नहीं आ रहा है। एक कर्ज माफ़ी ही उपाय बचा है किन्तुउसके बाद भी किसान कर्ज मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। सरकारें भी अब इस चक्रव्यूह में फंस रही हैं। बेरोजगारी और मंदीबाड़ा बढ़ता जा रहा है।


असल में समस्या के पीछे रोटी  का सवाल है रोटी सब को चाहिए और रोटी हमारे पर्यावरण की समृद्धि के बिना अब पैदा करना कठिन हो गया है। हरित क्रांति का आधार भारी  सिंचाई  है किन्तु हरियाली की कमी के कारण  हमारे जल के स्रोत भी सूखने लगे हैं। इसलिए यह समस्या अब विकराल रूप  धारण करने लगी है। किसानो के सामने आगे खाई है तो पीछे समुन्द्र है।


असल में हमे रोटी के लिए यूरिया की जरूरत है जो जमीन में अपने आप द्विदल  पौधों से मिलती है किन्तु जुताई करने से यह गैस बन कर उड़ जाती  है। हम जितना जुताई करते हैं उतनी यूरिया की मांग बढ़ती जाती है जिसकी आपूर्ति पेट्रोल से बनी गैरकुदरती यूरिया से की जाती है। जिसकी भी एक सीमा है दूसरा खेत जो एक जीवित अंश है पेट्रोल की यूरिया को पसंद नहीं है इसलिए खेत इस यूरिया की उलटी कर देते हैं जिस से खेत के पेट का सब खाना बहार निकल जाता है। खेत भूखे के भूखे रहते हैं। भूखे  खेतों से भूखी  फसले पैदा हो रही हैं जो अनेक प्रकार की बीमारियां पैदा कर रही हैं जिनमे  कैंसर प्रमुख है।

इसलिए हमे अब एक ऐसी खेती करने की जरूरत है जो हमारी इन तमाम खेती किसानी से जुडी समस्याओं का अंत कर  दे। हम पिछले अनेक सालो से अपने पारिवारिक खेतों पर हरित क्रांति के विकल्प की खोज में लगे हैं। जैसा की विदित है हरित क्रांति गेंहू और चावल पर आधारित है और ये अनाज की फसलें  यूरिया पर आधारित हैं। यूरिया नहीं तो ये फसले नहीं। हमने पाया है की द्विदल पौधे या पेड़ अपनी छाया के छेत्र में लगातार कुदरती यूरिया बनाने का का काम करते हैं। जुताई नहीं करने से ये यूरिया गैस बन कर उड़ता नहीं है।

अधिकतर यह यूरिया खेतों में अपने आप पैदा होने वाली वनस्पतियों से मिलता है किन्तु जुताई करने से और इन वनस्पतियों को मार  देने से हमे पेट्रोल से बनी यूरिया की जरूरत होती है। इस से किसान के ऊपर जुताई ,यूरिया ,निंदाई ,सिंचाई ,कीट और नींदा मार  उपायों का बहुत अधिक खर्च बढ़ते क्रम में बढ़ रहा है जिसकी आपूर्ति के लिए उसे कर्ज लेना पड़  रहा है। जिसे  चुकाने में अब असमर्थ हो रहा है।

हमने यह पाया की सुबबूल के पेड़ जो द्विदल  के रहते है जबरदस्त खेत में कुदरती यूरिया प्रदान करते हैं जुताई नहीं करने से इनकी छाया का असर नहीं होता बल्कि फायदा होता है जिसमे गेंहू और चावल का उत्पादन पेट्रोल वाली यूरिया से अधिक मिलता है और उत्पादकता /गुणवत्ता भी बहुत अधिक रहती है। इसलिए हम बिना जुताई करे सीधे बीजों को फेंक कर सुबबूल  के पेड़ों के नीचे गेंहू और चावल पैदा कर  रहे हैं। इसमें एक ओर जहां पेट्रोल की जरूरत नहीं है वही मानवीय श्रम की भी बचत है सुबबूल  के कारण जलप्रबंधन और बिमारियों का नियंत्रण भी अपने आप हो जाता है।

इसलिए फसलों के उत्पादन के लिए  किसी भी प्रकार के कर्ज ,अनुदान और मुआवजे की जरूरत नहीं रहती है। अनाजों की कीमत भी जंगली होने के कारण  बहुत ऊँची कीमत में माँगा जाता है किसी भी सरकारी सहायता की जरूरत नहीं है। जंगली खेती हरित क्रांति का विकल्प बन गयी है। इसका उपयोग कर किसान आसानी से कर्ज मुक्त हो कर आत्मनिर्भर होने  लगे है।





Monday, January 8, 2018

जलवायु परिवर्तन और जंगली खेती

जलवायु परिवर्तन और जंगली खेती 


मित्रो आज  केवल हमारे देश में ही नहीं वरन पूरी दुनिया में  मौसम में बड़ी तेजी से बदलाव देखा जा रहा है। एक ओर  जहां धरती गरम हो रही है वहीँ ठण्ड भी बहुत बढ़ रही है और बरसात में भी अनेक परिवर्तन देखे जा रहे हैं। बाढ़  और सूखा दोनों मुसीबत बने हुए हैं। इसी प्रकार समुद्री ज्वारभाटों  की संख्या भी बढ़ती जा रही है। भू स्खलन और भूकम्पों में भी बढ़ोतरी हुई है।


जैसा कि  हम सभी जानते हैं की यह समस्या धरती पर निरन्तर घट रही हरियाली के कारण  है। हरियाली दूषित हवा को सोखकर उसे जैविक खाद में बदलती है जिस से हरयाली के साथ साथ अन्य जैव विवधताओं का पालन पोषण होता है।

इसलिए यह जरुरी हो गया है की हम देखें की आखिर हरियाली का तेजी से क्यों हनन हो रहा है तब हम पाएंगे की यह हनन सर्वाधिक हमारी रोटी के कारण  हो रहा है। समान्यत: रोटी के लिए हरियाली को नस्ट किया जाता है। यह माना  जाता है की हरियाली चाहे वह  पेड़ों ,झाड़ियों  या खरपतवारों के रूप में रहती है वह हमारी फसलों का खाना खा लेती है.दूसरा किसानो को इस बात का डर रहता है की पेड़ों की छाया के कारण फसले ठीक नहीं होती हैं। इसलिए खरपतवारों ,झाड़ियों और पेड़ों को लगातार काटा जा रहा है।

हम पिछले 50 सालो से अपने पारिवारिक खेतों में स्थाई टिकाऊ खेती के लिए प्रयास रत हैं। शुरू में हमने 5  साल परम्परागत देशी खेती किसानी का अभ्यास किया उसके बाद करीब 15  साल हरित क्रांति में गवाएं इसके बाद के 30 सालों से हम अब बिना जुताई की क़ुदरती खेती जिसे जंगली खेती भी कहते हैं का अभ्यास  कर रहे हैं। इस खेती में हम खरपतवारों और पेड़ों को बचाते  हुए खेती करते हैं।

इसमें जुताई ,खाद और दवाइयों की जरूरत नहीं रहती है और फसले इनके साथ अच्छी पनपती हैं। हमने  पाया है की जुताई नहीं करने से एक और जहां हमारे  खेत साल भर हरियाली से भरे रहते हैं वहीं हमारे देशी उथले कुए भी साल भर भरे रहते हैं। हरियाली एक और जहां बरसात को आकर्षित करती है वहीं वह पानी के अवशोषण में भी सहायता करती है। फसलों में कुदरती संतुलन के कारण बीमारियां नहीं लगती है। जुताई नहीं करने के कारण  खेत मे नत्रजन की कमी नहीं होती है। दलहन जाती के वृक्ष और सहयोगी  फसलों के  कारण फसलों को लगातार नत्रजन और तमाम जैविक खाद बढ़ते क्रम में मिलती है जिस से उत्पादन और उत्पादकता और गुणवत्ता भी बढ़ते  क्रम में रहती है।

इसलिए हमारा मानना है की यदि हमे  जलवायु परिवर्तन की समस्या से निजात पाना है और पर्यावरण प्रदुषण के संकट से उबरना है तो हमे हर हाल में बिना जुताई की जंगली खेती को अपनाना होगा इसमें कोई विशेष तकनीकी ज्ञान और पैसे की जरूरत नहीं है जरूरत है तो केवल जाग्रति की है।
धन्यवाद
 राजू टाइटस (9179738049)



  


Wednesday, December 27, 2017

खेती किसानी में क्रांति सुबबूल के पेड़ों के साथ गेंहूं की खेती

खेती किसानी में क्रांति 

सुबबूल के पेड़ों के साथ गेंहूं की खेती 

जल ,जैव-विवधताओं ,भूमि छरण और रासायनिक जहरों से मुक्ति 

किसानो की आत्महत्या को रोकने और कईगुना अधिक आमदनी का फार्मूला 

राजू टाइटस  

होशंगाबाद के ऋषि खेती फार्म में पिछले 30 सालों से बिना जुताई ,बिना खाद बिना रसायनों से खेती  की जा रही है। इसी कड़ी में  इस फार्म में पशु पालन के लिए चारे के  सुबबूल के पेड़ लगाए हैं।  सुबबूल की पत्तियां  एक ओर  जहां हाई प्रोटीन चारे के लिए होती हैं   वही पेड़  अपनी छाया  के छेत्र में लगातार नत्रजन सप्लाय करने का काम करता है। बरसात को आकर्षित करता है और  पानी को खेत में सोखने में सहायता करता है। जलाऊ लकड़ी देता है।  फसलों  की बीमारियों से  रोकता है। खरपतवारों का नियंत्रण करता है।  इसके नीचे अनाजों  की बंपर फसल होती है।
जुताई नहीं करने ,खाद उर्वरकों ,कीट और खरपतनाशकों के उपयोग नहीं करने के कारण गेंहूं की उत्पादकता और गुणवत्ता सबसे अधिक रहती है। इन खेतों में पैदा होने वाला गेंहू जंगली बन जाता है। 
एक और जहाँ जुताई आधारित खेती से पैदा होने वाला गेंहू मधु मेह ,कुपोषण ,कैंसर अदि का कारण  बन रहा है वहीँ यह कुदरती जंगली गेंहू इन बीमारियों के इलाज के लिए मुंह मांगी कीमत पर माँगा जा रहा है।  
इसके आलावा बिना जुताई  पेड़ों और खरपतवारों के संग की जाने वाली खेती से खाद और जल का छरण पूर्णत: रुक जाता है। जिस से फार्म के कुए साल भर लबालब रहते हैं। भूमिगत जल के कारण  खेत के भीतर नीचे तालाब बन जाते हैं जो नर्मदा नदी को जल सप्लाय करते रहते हैं। 
बिना जुताई की खेती में मशीनों का उपयोग नहीं होता है इसलिए यह  अन्य खेती की तरह आयातित तेल ,कर्ज ,मुआवजे और अनुदान से पूरीतरह मुक्त है। 
 खेती किसानी में चल रहे संकट  जैसे आत्महत्या ,पलायन ,बेरोजगारी को थामने में यह खेती बहुत उपयोगी है.
पेड़ों के साथ की जाने वाली बिना जुताई की खेती से  जल वायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की समस्या को कम करने में भी मदद मिलती है।  

Wednesday, October 18, 2017

एक तिनके से आई क्रांति गेंहू ,चावल औऱ सरसो की कुदरति खेती



एक तिनके से आई क्रांति  गेंहू ,चावल औऱ सरसो की कुदरति खेती

जुताई नहीं, यूरिया नहीं ,जैविक खाद नहीं ,जीवाणु खाद नहीं ,कल्चर और जहर नहीं ,निंदाई नहीं ,पानी भरना नहीं ,रोपा लगाना नहीं 




धान की खड़ी फसल के ऊपर गेंहू के  बीज फेंके जा रहे हैं 

फुकुओका जी गेंहू की खड़ी फसल में धान की

बीज गोलियों को फेक रहे हैं 

धान की गोलियों से धान के रोपे निकल आये है

ऊपर सरसों और गेंहू की नरवाई फेंकी गई है  


धानके पुआल से  झांकते गेंहूँ के नन्हे पौधे

गेंहू की खड़ी फसल में धान की गोलियां डाली गई थीं 

धान  की कटाई के बाद पुआल को फैला दिया गया है 

धान के पुआल में से निकलते सरसों के नन्हे पौधे 

सरसों के बीजों को बिखरा कर धान की पुआल

 को फैला दिया गया है 

सरसों के बढ़ते पौधे पुआल नीचे बैठ रहा है  

धान की गोलियों में से रोपे गेंहू की नरवाई में से 

बाहर निकल रहे हैं बिना पानी वाला खेत फुकुओकाजी का है 

धान की तैयार फसल 

लाल धान की फसल 

धान की तैयार फसल 

गेहू के नन्हे पौधों के ऊपर पुआल फैला दिया गया है 

धान की खेती में पानी नहीं भरा जाता है वरन पानी की

 निकासी की जाती है इसके लिए नाली बनाई जाती है।   

गेंहू के नन्हे पौधे पुआल सब नीचे बैठ गया है 

गेंहू की फसल 

गेंहू की तैयार फसल इसमें धान की गोलियां डाली गई हैं 

सरसों की फसल 

वन स्ट्रॉ रिवोल्यूशन के अनुवादक श्री लेरी  कॉर्न

और फुकुओकाजी गेंहू की फसल के बीच में  

क्ले से बनी बीज गोलियां गले लटका कर फेंकी जा रही है 

धान बढ़ रही है साथ में खरपतवारें भी बढ़ रही है

 यहां वो नुक्सान नहीं करती है वरन  फायदा पहुंचाती हैं

नमि का प्रबंध ,खरपतवारों का नियंत्रण ,बीमारी की रोकथाम 

पनपते गेंहू के ऊपर से धान को कटाई की जा रही है

गेंहू के नन्हे पौधे पांव से कुचल कर फिर सीधे हो जाते हैं 



 

गेंहू के रोपों के ऊपर धान की पुआल डाली जा रही है