Wednesday, January 10, 2018

रोजगार की समस्या

रोजगार की समस्या

जंगली गेंहू उगाएं 

जंगली गेंहू आठ गुना अधिक कीमत में माँगा जा रहा है। 

न दिनों ओधोगिक मंदी की समस्या जोरों पर है। कल कारखानों से कामगारों को हटाया जा रहा है।काम नही है इसलिए रोजगार नही हैं। किन्तु अब जब से जंगली खेती का  चलन शुरू हुआ है तब से खेतों में सोना पैदा होने लगा है। उदाहरण ठीक आपकी आँखों के सामने है। एक और जहां जुताई आधारित गेंहू जिसमे अनेक प्रकार के रसायन ,खाद और दवाओं का इस्तमाल हो रहा है। बेसुवाद और बीमारियां पैदा करने वाले हो गए हैं जिन्हे ग्राहक पसंद नहीं कर रहे हैं। विदेशों में इन उत्पादों को भेजने पर रोक लग गई है।

यही कारण  है की अनेक लोग विदेशों से नौकरी छोड़ कर अपने गांवों में वापस आ रहे हैं और जंगली खेती अपना रहे हैं।  जहां जुताई आधारित खेती करना बहुत कठिन और नुकसान दायक है वहीँ जंगली खेती सरल और बहुत लाभप्रद बन गई है जिसे कोई भी आसानी से कर सकता है।
जंगली गेंहू की फसल 
जुताई करने से खेत की कुदरती ताकत एक बार में आधी ख़तम हो जाती है जो हर बार कम होती जाती  है। दूसरा जुताई करने से बरसात का पानी खेतों में नहीं सोखा जाताहै वह तेजी से बहता है अपने साथ कुदरती खादों को भी बहा  कर ले जाता है।  कारण खेत भूखे और प्यासे हो जाते हैं उनमे भूखी फसले पैदा होती हैं। भूखी फसले अनेक बिमारियों का कारण  बन रहीं है। जिनमे कैंसर प्रमुख है।

जंगली फसलों को पैदा करना बहुत आसान है जुताई करे बिना बीजों को सीधा फेंक दिया जाता है जरूरत पड़ने पर बीजों को क्ले मिटटी से कोटिंग कर फेंक देते हैं और ये अपने आप बरसात में अनेक खरपतवारों की तरह उनके साथ उग आते हैं। बेमौसम थोड़ी बहुत सिंचाई की जा सकती है।

जंगली फसलों में जुताई नहीं करने के कारण और खरपतवारोंकी  मौजूदगी में असंख्य जीवजंतु कीड़े मकोड़े ,केंचुए ,चींटी और असंख्य आँखों से न दिखाई देने वाले सूक्ष्म जीवाणु पैदा हो जाते हैं जो खेत को कुदरती खाद से भर देते हैं जिसके कारण फसले भी पोषक  तत्वों से भरी पैदा होती हैं। जो अनेक बिमारियों   लिए दवाई का काम करती हैं।  जंगली गेंहू की लकड़ी के चूल्हे  पर बनी रोटी कैंसर की बीमारी को भी ठीक कर  देती है। यही कारण  है की यह गेंहू बहुत ऊँची कीमत में माँगा जा रहा है और इसने रोजगार के नए  दरवाजे खोल दिए हैं।





Tuesday, January 9, 2018

कर्ज के चक्रव्यूह में फंसे किसान




जंगली खेती ने खोले द्वार 

हरित क्रांति का विकल्प 
ह सही है की हरित क्रांति के आने के बाद किसानो में एक आशा की किरण का जन्म हुआ था किन्तु गहरी जुताई ,मशीनों और रसायनों के भारी  भरकम उपयोग के कारण इसका असर हमारे पर्यावरण पर बहुत अधिक पड़ा है जिसके कारण  खेत अब मरुस्थल में तब्दील हो गए हैंऔर किसान कर्जों में फंस गए हैं।

सरकार ने इन किसानो की आमदनी बढ़ाने के लिए तीन फसली कार्यक्रम बनाया है जिसके कारण  कर्ज अब तीन गुना रफ्तार से बढ़ने लगा है। एक फसल का कर्ज चुकता नहीं  है की दूसरी और तीसरी फसल का कर्ज लद  जाता है। यह एक चक्रव्यूह है।  बेचारा किसान एक कोल्हू के बैल  की तरह कर्ज के चक्रव्यूह से बाहर  निकलने के लिए तड़फ रहा है किन्तु घूम घूम कर वह अपने को जहां का तहाँ खड़ा पाता  है।

सुबबूल के पेड़ों के साथ गेंहू की बंपर फसल 
किंतु अफ़सोस  की बात है की  सरकार  और कृषि योजनाकारों के पास  इस समस्या से निपटने का कोई भी उपाय नहीं है। सरकार अपनी तरफ से भले बिना ब्याज का कर्ज ,अनुदान और मुआवजा दे रही है किन्तु इस समस्या का कोई अंत नजर नहीं आ रहा है


अनेक कमीशन बने किन्तु सब बेकार ही सिद्ध हुए हैं ,अनेक किसान आंदोलन हो रहे हैं पर कोई उपाय निकलता नजर नहीं आ रहा है। एक कर्ज माफ़ी ही उपाय बचा है किन्तुउसके बाद भी किसान कर्ज मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। सरकारें भी अब इस चक्रव्यूह में फंस रही हैं। बेरोजगारी और मंदीबाड़ा बढ़ता जा रहा है।


असल में समस्या के पीछे रोटी  का सवाल है रोटी सब को चाहिए और रोटी हमारे पर्यावरण की समृद्धि के बिना अब पैदा करना कठिन हो गया है। हरित क्रांति का आधार भारी  सिंचाई  है किन्तु हरियाली की कमी के कारण  हमारे जल के स्रोत भी सूखने लगे हैं। इसलिए यह समस्या अब विकराल रूप  धारण करने लगी है। किसानो के सामने आगे खाई है तो पीछे समुन्द्र है।


असल में हमे रोटी के लिए यूरिया की जरूरत है जो जमीन में अपने आप द्विदल  पौधों से मिलती है किन्तु जुताई करने से यह गैस बन कर उड़ जाती  है। हम जितना जुताई करते हैं उतनी यूरिया की मांग बढ़ती जाती है जिसकी आपूर्ति पेट्रोल से बनी गैरकुदरती यूरिया से की जाती है। जिसकी भी एक सीमा है दूसरा खेत जो एक जीवित अंश है पेट्रोल की यूरिया को पसंद नहीं है इसलिए खेत इस यूरिया की उलटी कर देते हैं जिस से खेत के पेट का सब खाना बहार निकल जाता है। खेत भूखे के भूखे रहते हैं। भूखे  खेतों से भूखी  फसले पैदा हो रही हैं जो अनेक प्रकार की बीमारियां पैदा कर रही हैं जिनमे  कैंसर प्रमुख है।

इसलिए हमे अब एक ऐसी खेती करने की जरूरत है जो हमारी इन तमाम खेती किसानी से जुडी समस्याओं का अंत कर  दे। हम पिछले अनेक सालो से अपने पारिवारिक खेतों पर हरित क्रांति के विकल्प की खोज में लगे हैं। जैसा की विदित है हरित क्रांति गेंहू और चावल पर आधारित है और ये अनाज की फसलें  यूरिया पर आधारित हैं। यूरिया नहीं तो ये फसले नहीं। हमने पाया है की द्विदल पौधे या पेड़ अपनी छाया के छेत्र में लगातार कुदरती यूरिया बनाने का का काम करते हैं। जुताई नहीं करने से ये यूरिया गैस बन कर उड़ता नहीं है।

अधिकतर यह यूरिया खेतों में अपने आप पैदा होने वाली वनस्पतियों से मिलता है किन्तु जुताई करने से और इन वनस्पतियों को मार  देने से हमे पेट्रोल से बनी यूरिया की जरूरत होती है। इस से किसान के ऊपर जुताई ,यूरिया ,निंदाई ,सिंचाई ,कीट और नींदा मार  उपायों का बहुत अधिक खर्च बढ़ते क्रम में बढ़ रहा है जिसकी आपूर्ति के लिए उसे कर्ज लेना पड़  रहा है। जिसे  चुकाने में अब असमर्थ हो रहा है।

हमने यह पाया की सुबबूल के पेड़ जो द्विदल  के रहते है जबरदस्त खेत में कुदरती यूरिया प्रदान करते हैं जुताई नहीं करने से इनकी छाया का असर नहीं होता बल्कि फायदा होता है जिसमे गेंहू और चावल का उत्पादन पेट्रोल वाली यूरिया से अधिक मिलता है और उत्पादकता /गुणवत्ता भी बहुत अधिक रहती है। इसलिए हम बिना जुताई करे सीधे बीजों को फेंक कर सुबबूल  के पेड़ों के नीचे गेंहू और चावल पैदा कर  रहे हैं। इसमें एक ओर जहां पेट्रोल की जरूरत नहीं है वही मानवीय श्रम की भी बचत है सुबबूल  के कारण जलप्रबंधन और बिमारियों का नियंत्रण भी अपने आप हो जाता है।

इसलिए फसलों के उत्पादन के लिए  किसी भी प्रकार के कर्ज ,अनुदान और मुआवजे की जरूरत नहीं रहती है। अनाजों की कीमत भी जंगली होने के कारण  बहुत ऊँची कीमत में माँगा जाता है किसी भी सरकारी सहायता की जरूरत नहीं है। जंगली खेती हरित क्रांति का विकल्प बन गयी है। इसका उपयोग कर किसान आसानी से कर्ज मुक्त हो कर आत्मनिर्भर होने  लगे है।





Monday, January 8, 2018

जलवायु परिवर्तन और जंगली खेती

जलवायु परिवर्तन और जंगली खेती 


मित्रो आज  केवल हमारे देश में ही नहीं वरन पूरी दुनिया में  मौसम में बड़ी तेजी से बदलाव देखा जा रहा है। एक ओर  जहां धरती गरम हो रही है वहीँ ठण्ड भी बहुत बढ़ रही है और बरसात में भी अनेक परिवर्तन देखे जा रहे हैं। बाढ़  और सूखा दोनों मुसीबत बने हुए हैं। इसी प्रकार समुद्री ज्वारभाटों  की संख्या भी बढ़ती जा रही है। भू स्खलन और भूकम्पों में भी बढ़ोतरी हुई है।


जैसा कि  हम सभी जानते हैं की यह समस्या धरती पर निरन्तर घट रही हरियाली के कारण  है। हरियाली दूषित हवा को सोखकर उसे जैविक खाद में बदलती है जिस से हरयाली के साथ साथ अन्य जैव विवधताओं का पालन पोषण होता है।

इसलिए यह जरुरी हो गया है की हम देखें की आखिर हरियाली का तेजी से क्यों हनन हो रहा है तब हम पाएंगे की यह हनन सर्वाधिक हमारी रोटी के कारण  हो रहा है। समान्यत: रोटी के लिए हरियाली को नस्ट किया जाता है। यह माना  जाता है की हरियाली चाहे वह  पेड़ों ,झाड़ियों  या खरपतवारों के रूप में रहती है वह हमारी फसलों का खाना खा लेती है.दूसरा किसानो को इस बात का डर रहता है की पेड़ों की छाया के कारण फसले ठीक नहीं होती हैं। इसलिए खरपतवारों ,झाड़ियों और पेड़ों को लगातार काटा जा रहा है।

हम पिछले 50 सालो से अपने पारिवारिक खेतों में स्थाई टिकाऊ खेती के लिए प्रयास रत हैं। शुरू में हमने 5  साल परम्परागत देशी खेती किसानी का अभ्यास किया उसके बाद करीब 15  साल हरित क्रांति में गवाएं इसके बाद के 30 सालों से हम अब बिना जुताई की क़ुदरती खेती जिसे जंगली खेती भी कहते हैं का अभ्यास  कर रहे हैं। इस खेती में हम खरपतवारों और पेड़ों को बचाते  हुए खेती करते हैं।

इसमें जुताई ,खाद और दवाइयों की जरूरत नहीं रहती है और फसले इनके साथ अच्छी पनपती हैं। हमने  पाया है की जुताई नहीं करने से एक और जहां हमारे  खेत साल भर हरियाली से भरे रहते हैं वहीं हमारे देशी उथले कुए भी साल भर भरे रहते हैं। हरियाली एक और जहां बरसात को आकर्षित करती है वहीं वह पानी के अवशोषण में भी सहायता करती है। फसलों में कुदरती संतुलन के कारण बीमारियां नहीं लगती है। जुताई नहीं करने के कारण  खेत मे नत्रजन की कमी नहीं होती है। दलहन जाती के वृक्ष और सहयोगी  फसलों के  कारण फसलों को लगातार नत्रजन और तमाम जैविक खाद बढ़ते क्रम में मिलती है जिस से उत्पादन और उत्पादकता और गुणवत्ता भी बढ़ते  क्रम में रहती है।

इसलिए हमारा मानना है की यदि हमे  जलवायु परिवर्तन की समस्या से निजात पाना है और पर्यावरण प्रदुषण के संकट से उबरना है तो हमे हर हाल में बिना जुताई की जंगली खेती को अपनाना होगा इसमें कोई विशेष तकनीकी ज्ञान और पैसे की जरूरत नहीं है जरूरत है तो केवल जाग्रति की है।
धन्यवाद
 राजू टाइटस (9179738049)



  


Wednesday, December 27, 2017

खेती किसानी में क्रांति सुबबूल के पेड़ों के साथ गेंहूं की खेती

खेती किसानी में क्रांति 

सुबबूल के पेड़ों के साथ गेंहूं की खेती 

जल ,जैव-विवधताओं ,भूमि छरण और रासायनिक जहरों से मुक्ति 

किसानो की आत्महत्या को रोकने और कईगुना अधिक आमदनी का फार्मूला 

राजू टाइटस  

होशंगाबाद के ऋषि खेती फार्म में पिछले 30 सालों से बिना जुताई ,बिना खाद बिना रसायनों से खेती  की जा रही है। इसी कड़ी में  इस फार्म में पशु पालन के लिए चारे के  सुबबूल के पेड़ लगाए हैं।  सुबबूल की पत्तियां  एक ओर  जहां हाई प्रोटीन चारे के लिए होती हैं   वही पेड़  अपनी छाया  के छेत्र में लगातार नत्रजन सप्लाय करने का काम करता है। बरसात को आकर्षित करता है और  पानी को खेत में सोखने में सहायता करता है। जलाऊ लकड़ी देता है।  फसलों  की बीमारियों से  रोकता है। खरपतवारों का नियंत्रण करता है।  इसके नीचे अनाजों  की बंपर फसल होती है।
जुताई नहीं करने ,खाद उर्वरकों ,कीट और खरपतनाशकों के उपयोग नहीं करने के कारण गेंहूं की उत्पादकता और गुणवत्ता सबसे अधिक रहती है। इन खेतों में पैदा होने वाला गेंहू जंगली बन जाता है। 
एक और जहाँ जुताई आधारित खेती से पैदा होने वाला गेंहू मधु मेह ,कुपोषण ,कैंसर अदि का कारण  बन रहा है वहीँ यह कुदरती जंगली गेंहू इन बीमारियों के इलाज के लिए मुंह मांगी कीमत पर माँगा जा रहा है।  
इसके आलावा बिना जुताई  पेड़ों और खरपतवारों के संग की जाने वाली खेती से खाद और जल का छरण पूर्णत: रुक जाता है। जिस से फार्म के कुए साल भर लबालब रहते हैं। भूमिगत जल के कारण  खेत के भीतर नीचे तालाब बन जाते हैं जो नर्मदा नदी को जल सप्लाय करते रहते हैं। 
बिना जुताई की खेती में मशीनों का उपयोग नहीं होता है इसलिए यह  अन्य खेती की तरह आयातित तेल ,कर्ज ,मुआवजे और अनुदान से पूरीतरह मुक्त है। 
 खेती किसानी में चल रहे संकट  जैसे आत्महत्या ,पलायन ,बेरोजगारी को थामने में यह खेती बहुत उपयोगी है.
पेड़ों के साथ की जाने वाली बिना जुताई की खेती से  जल वायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की समस्या को कम करने में भी मदद मिलती है।  

Wednesday, October 18, 2017

एक तिनके से आई क्रांति गेंहू ,चावल औऱ सरसो की कुदरति खेती



एक तिनके से आई क्रांति  गेंहू ,चावल औऱ सरसो की कुदरति खेती

जुताई नहीं, यूरिया नहीं ,जैविक खाद नहीं ,जीवाणु खाद नहीं ,कल्चर और जहर नहीं ,निंदाई नहीं ,पानी भरना नहीं ,रोपा लगाना नहीं 




धान की खड़ी फसल के ऊपर गेंहू के  बीज फेंके जा रहे हैं 

फुकुओका जी गेंहू की खड़ी फसल में धान की

बीज गोलियों को फेक रहे हैं 

धान की गोलियों से धान के रोपे निकल आये है

ऊपर सरसों और गेंहू की नरवाई फेंकी गई है  


धानके पुआल से  झांकते गेंहूँ के नन्हे पौधे

गेंहू की खड़ी फसल में धान की गोलियां डाली गई थीं 

धान  की कटाई के बाद पुआल को फैला दिया गया है 

धान के पुआल में से निकलते सरसों के नन्हे पौधे 

सरसों के बीजों को बिखरा कर धान की पुआल

 को फैला दिया गया है 

सरसों के बढ़ते पौधे पुआल नीचे बैठ रहा है  

धान की गोलियों में से रोपे गेंहू की नरवाई में से 

बाहर निकल रहे हैं बिना पानी वाला खेत फुकुओकाजी का है 

धान की तैयार फसल 

लाल धान की फसल 

धान की तैयार फसल 

गेहू के नन्हे पौधों के ऊपर पुआल फैला दिया गया है 

धान की खेती में पानी नहीं भरा जाता है वरन पानी की

 निकासी की जाती है इसके लिए नाली बनाई जाती है।   

गेंहू के नन्हे पौधे पुआल सब नीचे बैठ गया है 

गेंहू की फसल 

गेंहू की तैयार फसल इसमें धान की गोलियां डाली गई हैं 

सरसों की फसल 

वन स्ट्रॉ रिवोल्यूशन के अनुवादक श्री लेरी  कॉर्न

और फुकुओकाजी गेंहू की फसल के बीच में  

क्ले से बनी बीज गोलियां गले लटका कर फेंकी जा रही है 

धान बढ़ रही है साथ में खरपतवारें भी बढ़ रही है

 यहां वो नुक्सान नहीं करती है वरन  फायदा पहुंचाती हैं

नमि का प्रबंध ,खरपतवारों का नियंत्रण ,बीमारी की रोकथाम 

पनपते गेंहू के ऊपर से धान को कटाई की जा रही है

गेंहू के नन्हे पौधे पांव से कुचल कर फिर सीधे हो जाते हैं 



 

गेंहू के रोपों के ऊपर धान की पुआल डाली जा रही है 



Tuesday, October 17, 2017

सुबबूल के पेड़ों के साथ गेंहू की खेती और पशु पालन

 जुताई ,यूरिया ,गोबर ,कीट और खरपतवार मारक जहर नहीं 

सुबबूल  एक दलहन जाती का पेड़ होता है।

जो अपनी छाया  के छेत्र में लगातार कुदरती यूरिया (नत्रजन ) सप्लाई करने का काम करता है।

इसकी लकड़ी पेपर बनाने ,फर्नीचर बनाने और जलाऊ के काम आती है। इसका चारा बहुत पोस्टिक होता है।

इसके साथ गेंहू की बिना जुताई ,बिना खाद की खेती आसानी से हो जाती है। गेंहू और चावल की उत्पादकता और गुणवत्ता सबसे अधिक मिलती है। 

 यह पेड़ जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की समस्या को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह सूखा और बाढ़ का भी नियंत्रण करता है। 

इसकी पत्तियों का हरा रस बीमारियों में दवाई के काम आता है। पत्तियों को बकरियां बड़े शौक से खाती हैं। एक एकड़ से फसलों के आलावा लकड़ियों और पशु पालन से अतिरिक्त आमदनी मिलती

जलाऊ लकड़ियों का यह भण्डार है जितना काटो उतना तेजी से बढ़ता है। आज कल जलाऊ लकड़ी की गंभीर समस्या चल रही है। जिसका सबसे अधिक असर गरीब परिवारों पर पड़ रहा हम इसे बाजार  कीमत पर बेचते हैं। जिस से यह काम समाज सेवा
बन जाता है। 

हमने पाया है पशु पालन में बकरी पालन सबसे अधिक फायदे का है सुबबूल के सहारे हमारा बकरी पालन एक लाभप्रद ढांडा बन गया है। यह एटीएम जैसा है। 

 

 


 

Saturday, September 9, 2017

एक कचरा क्रांति

एक कचरा क्रांति 

ऋषि खेती 

बिना जुताई ,बिना खाद , बिना निंदाई ,बिना दवाई ,बिना मशीन की कुदरती खेती 

फुकुओका जी का गेंहू और धान  का फसल चक्र   



  खड़ी धान की फसल में गेंहू के बीजों को बिखेरा जा रहा है 
 धाकी पुआल और गेंहू की नरवाई जिसे कचरा समझ कर किसान जला देते हैं ने एक बड़ी क्रांति को जन्म दिया है। जिसे हम कचरा क्रांति कहते हैं। 
यह कचरा भले किसानो को बेकार दिखता है किन्तु यह उनकी मुसीबत को दूर करने के लिए अब सोना बन गया है । 
 शायद ही किसी को विश्वास होगा कि वह किसी
क्रांति  की शुरआत कर सकता है। लेकिन हमे  इस कचरे  के वजन और क्षमता का अहसास हो चुका
है। यह क्रांति असली क्रांति है। फुकुओका जी कहते हैं। 
जरा सरसों  और गेंहू  के इन खेतों को देखिए।


धान का पुआल गेंहू के नन्हे पौधों पर फेंका जा रहा है 


इस पक रही फसल से प्रति चैथाई एकड़ में लगभग
एक टन  पैदावार ली जा सकेगी (एक किलो प्रति वर्ग मीटर )
 मेरे ख्याल से यह जापान
के रासायनिक खेती के सबसे अधिक उत्पादन देने वाले  इलाकों  की पैदावार के बराबर या उस से भी अधिक है। 
 इन खेतों को पिछले कई दशकों  से जोता नहीं गया है न ही इसमें खाद ,दवाई ,निंदाई की गई है। 
 बुआई के नाम पर मैं सिर्फ गेंहू  और सरसों  के बीजों को सितम्बर /ओक्टूबर  के मौसम में, जबकि धान  की फसल खेतों में खड़ी होती है बिखेर देता हूं।




पुआल से गेंहू ढक गया है 

कुछ हफ्तों  बाद मैं धान  की फसल काट लेता हूं और धान  का पुआल सारे खेत में फैला देता हूं।




यही तरीका धान  की बुआई के लिए भी अपनाया जाता है।
ठण्ड  की फसल  की कटाई तथा गहाई हो जाने के बाद मैं इसकी  नरवाई  भी खेतों में बिखेर देता हूं।




 

गेंहू की फसल में धान  की बीज गोलियां डाल रहे हैं 
धान ,गेंहू और सरसों की फसलों की बुआई के लिए यह तरीका सर्वोत्तम है। 




लेकिन एक तरीका इससे भी आसान है। 
 धान को यहां ठण्ड की फसल के साथ क्ले की सीड बॉल से बोया गया था। यानि गेंहू और धान की बुआई का सारा काम जनवरी  के पहले हफ्ते  तक निपटा लिया गया है। धान के बीज अपने मौसम में ही उगते हैं। ठण्ड में ये सुप्त अवस्था में रहते हैं। 


गेंहू और सरसों की नरवाई वापस डाली गई है 





खरपतवार उगने की मैं परवाह नहीं करता क्योंकि उनके बीज अपने आप आसानी से झड़ते


और उगते



धन की फसल में खरपतवार भी है 
रहते हैं। धान के साथ पनपते  बरसाती कचरे नमि संरक्षण ,पोषक तत्वों की आपूर्ति ,बीमारियों से बचाव का काम करते हैं। 
अतः इन खेतों में बुआई का क्रम इस प्रकार रहता हैः अक्तूबर  के प्रारंभ में रिजका या बरसीम  धान  खड़ी फसल  बीच बिखेरी
जाती है ।   नवम्बर की शुरआत में

धान का एक पौधा 
धान  काट लिया जाता है और उसके बाद अगले वर्ष के लिए धान  के  और सारे खेत में पुआल फैला दिया जाता है।





सरसों की फसल 
 आपको यहां जो सरसों  और गेंहू  दिखलाई दे रही है, उसे इसी ढंग से उगाया गया है।
चैथाई एकड़ में खेत में ठण्ड  की फसलों और धान  की खेती का सारा काम केवल एक-दो व्यक्ति
ही कुछ ही दिनों में निपटा लेते हैं। मेरे ख्याल से धान ,गेंहू और सरसों को उगाने का इससे ज्यादा आसान, सहज तरीका
कोई अन्य नहीं हो सकता।

खेती का यह तरीका रासायनिक  कृषि की तकनीकों के सर्वथा विपरीत है। यह जैविक कृषि ,जीरो बजट खेती और परंपरागत देशी खेती की तकनीकों को बेकार सिद्ध कर देता है। खेती के इस तरीके, जिसमें कोई मशीनों द्वारा निर्मित खादों तथा रसायनों का उपयोग नहीं होता, के द्वारा भी औसत जापानी खेतों के बराबर या कई बार उससे भी ज्यादा पैदावार हासिल करना संभव है। इसका प्रमाण यहां आपकी आंखों के सामने

गेंहू के बीज छिड़क कर पुआल दाल दिया है 
है।


सिंचाई के साथ (टाइटस फार्म )



पुआल से गेंहू निकल रहा है 
गेंहू की फसल नरेंद्र पटेल के साथ 

धान को काटने के पश्चात् हम बरसीम + गेंहू या सरसों +गेंहू के बीजों को बिखेर कर ऊपर से पुआल आड़ा तिरछा इस प्रकार फैला देते हैं जिस से सूर्य रौशनी नीचे तक आती रहे फिर सिंचाई कर देते हैं। इसमें पैदावार बीजों की छमता के अनुसार बढ़ते क्रम में मिलती है। इसमें किसी भी प्रकार की मानव निर्मित खाद और कल्चर को नहीं डाला जाता है। 

 

 

सुबबूल के पेड़ों के साथ गेंहू की खेती और पशु पालन 

सुबबूल  एक दलहन जाती का पेड़ होता है।

जो अपनी छाया  के छेत्र में लगातार कुदरती यूरिया (नत्रजन ) सप्लाई करने का काम करता है।

इसकी लकड़ी पेपर बनाने ,फर्नीचर बनाने और जलाऊ के काम आती है। इसका चारा बहुत पोस्टिक होता है।

इसके साथ गेंहू की बिना जुताई ,बिना खाद की खेती आसानी से हो जाती है। गेंहू और चावल की उत्पादकता और गुणवत्ता सबसे अधिक मिलती है। 

 यह पेड़ जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की समस्या को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह सूखा और बाढ़ का भी नियंत्रण करता है। 

इसकी पत्तियों का हरा रस बीमारियों में दवाई के काम आता है। पत्तियों को बकरियां बड़े शौक से खाती हैं। एक एकड़ से फसलों के आलावा लकड़ियों और पशु पालन से अतिरिक्त
आमदनी मिलती है। 

 

 

 
 

 

 


 सुबबूल के पेड़ों के साथ बिना जुताई बिना खाद गेंहू की कुदरती खेती करने का यह  जग प्रसिद्ध टाइटस फार्म का प्रयोग है। इसमें गेंहू चावल के साथ  चारा और जलाऊ ईंधन भी मिलता है। आमदनी डबल हो जाती है। पेड़ों से पेड़ की

 

 

दूरी करीब १० फ़ीट  जाती है। जिस से भरपूर कुदरती यूरिया जो पेड़ बनाते हैं मिलता है। तथा यह जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग को थमने का भी काम करती है। सुबबूल की लकड़ियां पेपर बनाने  काम आती है। बीज नीचे गिरते रहते हैं अपने आप उग आते हैं। पत्तियां बकरियां बड़े शोक से खाती हैं जो एटीएम के जैसे रहती हैं। सुबबूल फसलों को बीमारियों से बचाते हैं। 

बरसाती कचरे में बरसाती और ठण्ड की फसलों की बुआई

पहले हम बरसाती कचरों को बड़ा होने देते है जिस से उसमे असंख्य जीव जंतु  कीड़े मकोड़े काम करने लगते हैं।

बरसाती कचरा 
 

  

जैव विविधता के कारण खेतों में बखरनी हो जाती है ,खेत जैविक खाद से भर जाते हैं ,बरसात का पानी जमीन में समां जाता है ,फिर फसलों के अनुसार काट कर या बिना काटे अनेक बीजों को क्ले और हरे ताजे  पशु गोबर से कोटिंग करके बिखरा देते हैं। इसे हम बिना जुताई की बारह  अनाजी खेती कहते हैं। मिश्रित फसलों के कारण कभी किसान को घाटा नहीं होता है।

कचरे की कटाई 

कचरो में मिश्रित अनाजों के बीजों को क्ले + ताजे हरे पशु गोबर से कोटिंग कर फेंक देते हैं। बाद में बड़े बड़े कचरो को तलवार या हासिए  की सहायता से काट दिया जाता है। कटे हुए कचरों से बीज ढँक जाते हैं। जो ऊग कर बाहर आ जाते हैं। 



बीज कचरे से ढक गए है 

कचरो की घकावान  बाद में सूख कर जैविक खाद में तब्दील हो जाती है। इस से नमि भी संरक्षित रहती है हरी धकावन जैवविबिधताओं को सुरक्षित रखती है।