Saturday, June 24, 2017

राजेश भाई नमस्कार ,

राजेश भाई नमस्कार ,

इस खेत में जुताई और खादों का इस्तमाल हुआ होगा। इसमें बिना जुताई की कुदरती खेती आसानी से शुरू की जा सकती है। टमाटर के पौधे और वनस्पतियां इसमें भूमि ढकाव का काम करेंगी असंख्य जीव जंतु कीड़े मकोड़े जीव जंतु सूक्ष्मजीवाणु इसमें पनप जायेंगे।  बिना मिटाये सीधे या सीड बाल बनाकर जो भी आप बोना चाहते है बो सकते हैं। यदि आप इसमें टमाटर ,बेंगन या मिर्च लगाना चाहते हैं तो रोप बना कर लगते जाएँ ये कवर खरपतवार नियंत्रण ,नमिके संरक्षण और बीमारियों की रोक थाम में मदद करेगा जो स्वत्: सड़ कर खाद में तब्दील हो जायेगा। साथ में मुंग के बीज भी छिड़कने जरूरत है मुंग घासों और को रोकेगा और कुदरती यूरिया बनाएगा। 

 

 

Wednesday, June 21, 2017

आदिवासी समूह तेजश्वनी के साथ दो दिवसीय कार्यशाला 1 8 -1 9 जून 2017 


यह कार्य शाला डिंडोरी जिले के आदिवासी विभाग के द्वारा जैविक खेती को समझने के लिए हमारे फार्म पर आयोजित की गयी थी। इसमें ९महिलायें और १० पुरुष थे।  इन सभों पर अपने अपने छेत्र में जैविक खेती के प्रचार प्रसार का भार है। इन लोगों को असली जैविक खेती की जानकारी हेतु हमारे फार्म पर लाया गया था। चूंकि हमारा फार्म  पिछले ३० सालो से बिना जुताई की कुदरती खेती(असली जैविक खेती ) का अभ्यास कर रहा है। जिसे हम ऋषि खेती कहते हैं।

ऋषि खेती से तात्पर्य यह है की हमारे ऋषि जन जंगलों में रहते थे अपने पर्यावरण को बिना बिगाड़े अपना जीवन यापन करते थे। किन्तु जब से हमारे देश में "गेंहूं क्रांति " आयी है।  हमारा पर्यावरण नस्ट हो गया है। इसलिए हम अब कुदरती हवा ,पानी और आहार की कमी में जी रहे हैं। इस बात को अब सरकार भी समझने लगी है इसलिए जैविक खेती के नाम से एक सुधार योजना लाई गयी है जिसका हम स्वागत करते हैं।

जैविक का मतलब है" कुदरत " यानि हमारा पर्यावरण जिसे हमे पुन: जीवित करना है। खेती माध्यम है जिस रास्ते  से हमने अपने पर्यावरण को बिगाड़ा है हमे उसी रास्ते से इसे ठीक करना है। हमने यह पाया है फसलोत्पादन के लिए की जा रही जुताई का इसमें बहुत बड़ा हाथ है। किसान पेड़ों को काटकर खेत बना रहे हैं और जुताई कर खेतों को मरुस्थल कर छोड़ते जा रहे हैं।

हरियाली की कमी के कारण बरसात कम हो जाती है जुताई करने से बरसात का  पानी जमीन में सोखा नहीं जाता है। भूमिगत जल की कमी हो जाती है जिसका सीधा प्रभाव खेती और आजीविका पर पड़ता है। डिंडोरी का आदिवासी छेत्र इसके उदाहरण है।  अब जुताई को छोड़कर हरियाली को बढ़ाने पर जोर देने के सिवाय कोई उपाय नहीं है। इस काम  को करने में ऋषि खेती तकनीक सर्वोत्तम है।

ऋषि खेती तकनीक खरपतवारों और पेड़ों को बचाते  हुए उनके समनवय से सम्पन्न होती है। इसके लिए हम सभी प्रकार के बीजों को जिसमे जंगली ,अर्ध जंगली फलदार पेड़ ,आनाज सब्जी चारे आदि के बीजों को मिला कर क्ले मिट्टी से सीड बाल बनाकर बिखराते जाते हैं। साथ में जुताई ,मानव निर्मित खाद और दवाइयों को पूरी तरह बंद कर देते हैं।
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हमने पाया है की एक बरसात में में हमारे खेत हरियाली से भर जाते हैं। दुसरे साल इसमें अपने आप अनेक झाड़ियां और पेड़ पनपने लगते हैं जिस से हमे फसल हमारे पशुओं के लिए चारा मिलने लगता है। मरुस्थली खेत हरियाली में परिवर्तित हो जाते हैं। भूमिगत जल का स्तर उठने लगता है। बरसात भी ठीक से होने लगती है।

इस पूरी कार्य शाला में इस बात को समझाने की कोशिश की गयी है जिसे प्रतिभागियों ने बड़े ध्यान से समझा है उन्होंने सीड बॉल बनाये हैं उन्हें खेत में बिखराया है। इसलिए हमे उम्मीद है की यह "जैविक खेती का मिशन " यदि चलता है तो मात्र कुछ सालो  में डिंडोरी आदिवासी अंचल पूरे देश में चल रही खेत और किसानो की समस्या को हल करने वाला गुरु हो जायेगा।

यह काम आप जैसे आमआदमी ही कर सकते हैं इसमें हम अपना पूरा सहयोग करने का वायदा करते हैं।

धन्यवाद

राजू टाइटस
होशंगाबाद


 

Friday, June 9, 2017

खरपतवारें बहुत उपयोगी हैं !

खरपतवारें  बहुत उपयोगी हैं !

रपतवारों को मारते समय  इन महत्वपूर्ण बिंदुओं को याद रखना उचित होगा।
जैसे ही भूमि की जुताई करना बंद कर दिया जाता है, खरपतवार की मात्रा बहुत घट जाती हैं कहीं तो वो बहुत कम हो जाती हैं।
पिछली फसल को काटने के पूर्व ही यदि नई फसल के बीज बो दिए जायेंगे तो इस फसल के बीज खरपतवार के पहले अंकुरित हो जाएंगे।
 रबी  की खरपतवारों  के बीज खरीफ की चावल की फसल के काटने  के बाद ही अंकुरित होते हैं , लेकिन तब तक रबी  की गेंहूँ /सरसों  काफी बढ़ जाती है।
इसी प्रकार गर्मी की  खरपतवार गेंहूँ  और सरसों की फसले कटने के बाद अंकुरित होती  है, लेकिन उस समय तक अगली  फसल काफी  बढ़ चुकी होती है । बीजों की बोनी इस ढंग से करें कि दोनों फसलों के बीच के अंतर न रहे। इससे अनाज के बीजों को खरपतवार से पहले ही अंकुरित हो, बढ़ने का मौका मिल जाता है।
फसल कटनी के तुरंत बाद खेतों में पुआल/नरवाई आदि को फैला देने से खरपतवार का अंकुरण बीच में ही रुक जाता है। अनाज के साथ ही भूमि आवरण के रूप में सफेद क्लोवर  भी बो देने से खरपतवार को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।
खरपतवार की समस्या से निपटने का प्रचलित तरीका मिट्टी को जोतने। खोदने  का है, लेकिन जब हम ऐसा करते हैं तो मिट्टी के भीतर  गहरे बैठे हुए, वे बीज, जो वैसे अंकुरित नहीं हुए होते, सजग होकर अंकुरित हो उठते हैं। साथ ही तेजी से बढ़ने वाली किस्मों का इन परिस्थितियों में बढ़ने का बेहतर मौका मिल जाता है। अतः आप कह सकते हैं कि जो किसान जमीन की गहरी जुताई  करके खरपतवार को काबू में लाने का प्रयत्न करता है, वह वास्तव में अपनी मुसीबत के  बीज बो रहा होता है।
जहरीले कीटनाशकों का उपयोग
मेरे ख्याल में अब भी कुछ लोग ऐसे होंगे जो सोचते हैं कि यदि उन्होंने रसायनों का उपयोग नहीं किया तो उनके फल वृक्ष तथा फसलें,  देखते-देखते मर  जाएगी। जब कि सच्चाई यह है कि इन रसायनों का ‘उपयोग करके ही’ वे ऐसी परिस्थितियां निर्मित कर लेते हैं  कि उनका  भय साकार हो जाता है।
हाल ही में जापान में लाल देवदार वृक्षों की छाल को घुन लगने से भारी क्षति पहुंची रही हैै। वन अधिकारी  इन्हें काबू में लाने के लिए हेलिकाप्टरों के जरिए दवाओं का छिड़काव कर रहे हैं। मैं यह नहीं कहता कि अल्प समय के  लिए इसका सकारात्मक असर नहीं होगा। मगर मैं जानता हूं कि इस समस्या से निपटने के लिए एक और भी तरीका है।
आधुनिक शोध  के मुताबिक घुन का संक्रमण प्रत्यक्ष न होकर मध्यवर्ती गोल-कृमियों के बाद ही होता है। गोलकृमि तने में पैदा होकर, पोषक तत्वों व पानी के बहाव को रोकते हैं, और उसीसे देवदार मुरझा कर सूख जाता है। बेशक, इसका असली कारण अब तक अज्ञात है।
गोल कृमियों का पोषण वृक्ष के तने के भीतर लगी फफूंद से होता है। आखिर पेड़ के भीतर यह फफूंद इतनी ज्यादा कैसे फैल गई? क्या इस फफूंद का बढ़ना, गोल कृमियों के वहां आने के बाद शुरू हुआ? या गोल कृमि वहां इसलिए आए कि वहां फफूंद पहले से थी? यानी असली ससवाल  घूम-पिफरकर यहीं आकर ठहरता है कि पहले क्या आया? गोल कृमि या फफूंद?
एक और भी ऐसा सूक्ष्म जीवाणु है, जिसके बारे में हम बहुत कम जानकारी रखते हैं, और जो हमेशा फफूंद के साथ ही आता है, और वह फफूंद के लिए जहर का काम भी करता है। हर कोण से प्रभावों
और गलत प्रभावों का अध्ययन करने के बाद निश्चयपूर्वक केवल एक यही बात कही जा सकती है कि देवदार के वृक्ष असाधरण संख्या में सूखते जा रहे हैं।
लोग न तो यह जान सकते हैं कि देवदार की इस बीमारी का असली कारण क्या है, और न उन्हें यह पता है कि उनके ‘इलाज’ के अंतिम परिणाम क्या होंगे। यदि आप बिना सोचे-समझे प्रणाली से छेड़-छाड़ करेंगे तो आप भविष्य की किसी अन्य विपदा के बीज बो रहे होंगे।
  मुझे अपने इस ज्ञान से कोई खुशी नहीं होगी कि गोल कृमियों से होनेवाली तात्कालिक हानि को रासायनिक छिड़काव के जरिए कम कर दिया गया है। इस तरह की समस्याओं को, कृषि रसायनों का उपयोग करते हुए हल करने का यह तरीका बहुत ही गलत  हैं इससे भविष्य में समस्याएं और भी विकट रूप ले लेेंगी।
प्राकृतिक कृषि के ये चार सिद्धांत जुताई नहीं ,निंदाई नहीं, कोई रासायनिक उर्वरक या तैयार की हुई खाद नहीं, रसीनो का कोई उपयोग नहीं  प्रकृति के आदेशों का पालन करते हैं तथा कुदरती सम्पदाओं की रक्षा करते हैं।मेरी कुदरती खेती का यही मूल मन्त्र है । अनाज, सब्जियों और फलों की खेती  सार यही है।

खरपतवारों के संग  गेंहूँ /सरसों /चावल और फलों की खेती 
इन खेतों में अनाज और क्लोवर   के साथ कई विभिन्न प्रकार के खरपतवार भी उग रहे हैं। खेतों में जो धान  का पुआल पिछली पतझड़ के मौसम में बिछाया गया था, वह सड़कर अब बढि़या जैविक खाद  में बदल गया है। पैदावार प्रति चैथाई एकड़ एक टन (एक किलो / वर्ग मीटर ) होने की संभावना है।
घास के  विशेषज्ञ प्रोफेसर कावासे तथा प्राचीन पौध  पर शोध् कर रहे प्रोफेसर  ने कल जब मेरे खेतों में गेंहूँ  और हरे खाद की महीन चादर बिछी देखी तो उसे उन्होंने कलाकारी का एक खूबसूरत नमूना कहा। एक स्थानीय किसान, जिसने मेरे खेतों में खूब सारी खरपतवार देखने की उम्मीद की थी, उसे यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ कि कई अन्य तरह के पौधें के बीच गेंहूँ  और सरसों  खूब तेजी के साथ बढ़ रही है । अनेक  विशेषज्ञ भी यहां आए हैं और उन्होंने भी खरपतवार देखी, चारों ओर उगती क्लोवर  और खरपतवारों को देखा  और अचरज से मुंडी  हिलाते हुए यहां से चल दिए।
बीस साल पहले जब मैं अपने फल-बागों में स्थाई भूमि आवरण उगाने में लगा था, तब देश के किसी भी खेत या फल-बाग में घास का एक तिनका भी नजर नहीं आता था। मेरे जैसे बागानों को देखने के बाद ही लोगों की समझ में आया कि फलों के पेड़, घास और खरपतवार के बीच भी बढ़ सकते हैं। आज, नीचे घास उगे हुए फलबाग आपको जापान में हर कहीं नजर आ जाएंगे तथा बिना घास-आवरण के बागान अब दुर्लभ हो गए हैं।
यही बात अनाज के खेतों पर भी लागू होती है। चावल, गेंहूँ  तथा सरसों  को, सारे साल भर, क्लोवर  और खरपतवार से ढंके खेतों में भी मजे से उगाया जा सकता है।
इन खेतों में बोनी और कटनी की कार्यक्रम सूची की मैं जरा विस्तार से समीक्षा करना चाहूंगा। अक्टूबर के प्रारम्भ में, कटनी से पहले क्लोवर और तेजी से बढ़ने वाली गेंहूँ /सरसों  की फसल के बीज धान  की पक रही फसल के बीच ही बिखेर दिए जाते हैं।
गेंहू या सरसों  और क्लोवर  के पौधे जब  एक-दो इंच उपर तक आ जातें हैं तब  तक चावल भी पक कर कटने योग्य हो जाता है। चावल की फसल काटते समय क्लोवर  और गेंहूँ  के नन्हे पौधे  किसानों के पैरों तले कुचले जाते हैं, लेकिन उन्हें फिर  से पनपने में ज्यादा समय नहीं लगता। धान  की गहाई पूरी हो जाने के बाद उसकी  पुआल को खेत पर फैला दिया जाता है।
यदि धान  शुरू बरसात  में सीधा बोया  गया हो और बीजों को ढंका न गया हो तो बीजों को अक्सर चूहे या परिंदे खा जाते हैं, या वे जमीन में ही सड़ जाते हैं। इससे बचने के लिए में धान  के बीजों को बोने से पहले मिट्टी की गोलियों में लपेट देता हूं। बीजों को एक टोकरी या चपटे बरतन में गोल-गोल और आगे-पीछे हिलाया जाता है। इसके बाद उन पर महीन क्ले मिट्टी  छिड़क दी जाती है, और बीच-बीच में उन पर पानी का ‘हल्का’ सा छिड़काव भी किया जाता है। इस के करीब आध इंच व्यास की गोलियां बन जाती हैं।
गोलियां बनाने का एक और तरीका भी है। पहलेधान के बीजों को कुछ घंटों तक पानी में  डुबो दिया जाता है। फिर  धान को गीली मिट्टी में हाथों या पैरों से गूंध् लिया जाता है। इसके बाद तार की मुर्गा जाली में से इस मिट्टी  को दबाकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बदल दिया जाता है  को एक-दो दिनों तक थोड़ा सूखने दिया जाता है ताकि हथेलियों से उनकी गोलियां बनाई जा सकेें। सबसे अच्छा तो यह होगा कि हर गोली में एक ही बीज हो। एक दिन में इतनी गोलियां बन जाएंगी, जिनसे कई एकड़ में बुआई की हो सकती है।
परिस्थितियों के मुताबिक कभी-कभी मैं इन गोलियों को बोने के पहले उनमें अन्य अनाजों या सब्जियों के बीज भी रख देता हूं।
मध्य नवम्बर से मध्य दिसंबर के बीच कीअवधि  मैं धान  की बीजों वाली इन गोलियों को गेंहूँ या सरसों  की नई फसल के बीच बिखेर देता हूं। ये बीज बरसात  में भी बोए जा सकते हैं।
फसल को सड़ाने के लिए खेत पर कुक्कट खाद की एक पतली परत भी फैला दी जाती है। इस तरह पूरे साल की बोनी पूरी होती है।
मई में रबी  के अनाज की फसल काट ली जाती है। उसकी गहाई के बाद उसका पुआल भी खेत में बिखेर दिया जाता है।
इसके बाद खेत में एक हफ्रते या दस दिन तक पानी बना रहने दिया जाता है। इससे क्लोवर  और खरपतवार कमजोर पड़ जाती है, और चावल को गेंहूँ /सरसों की नरवाई  में से अंकुरित हो कर बाहर आने का मौका मिल जाता है। जून और जुलाई में बारिश का पानी ही पौधें के लिए पर्याप्त होता है। अगस्त महीने में खेतों में से ताजा पानी सिर्फ  बहाया जाता है, उसे वहां रुकने  नहीं दिया जाता है। ऐसा हफ्ते  में एक बार किया जाता है। इस समय तक  कटनी का समय हो जाता है।
 कुदरती तरीके  से  चावल और गेंहूँ / के अनाज की खेती का वार्षिक चक्र ऐसे चलता है। बोनी और कटनी का यह तरीका  इतने करीब से प्राकृतिक क्रम की नकल करता है कि उसे कोई कृषि तकनीक कहने की बजाए प्राकृतिक कहना ही उचित होगा।
चैथाई एकड़ के खेत में बीज बोने या पुआल फैलाने में किसान को एक या दो घंटे से ज्यादा का समय नहीं लगता। कटनी के काम को छोड़कर, गेंहूँ  की फसल को अकेला किसान भी मजे से उगा सकता है। एक खेत में चावल की खेती का जरूरी काम भी दो या तीन लोग ही परम्परागत जापानी औजारों की मदद से निपटा लेते हैं। अनाज उगाने की इससे सरल तरीका  और कोई नहीं हो सकता  है। इस तरीके से  बीज बोने तथा पुआल फैलाने के अलावा खास कुछ भी नहीं करना पड़ता, लेकिन इस सीधी -सादी तकनीक तक  पहुंचने में मुझे तीस बरस का समय लग गया।
खेती का यह तरीका जापान की प्राकृतिक स्थितियों के अनुसार विकसित हुआ है, लेकिन मैं सोचता हूं कि प्राकृतिक खेती को अन्य क्षेत्रों में अन्य देसी फसलें उगाने के लिए भी अपनाया जा सकता है। मसलन जिन इलाकों में पानी इतनी आसानी से उपलब्ध् नहीं होता, वहां पहाड़ी चावल, ज्वार, बाजरा या कुटकी को उगाया जा सकता है। वहां क्लोवर  की जगह अन्य दलहन  की किस्मों का जैसे  बरसीम ,रिजका ,मेथी  मोठ खेतों को ढंकने के लिए ज्यादा अच्छे उपयोगी साबित हो सकते हैं। प्राकृतिक कृषि उस इलाके की विशिष्ट परिस्थितियों के मुताबिक अपना अलग रूप धरण कर लेती है, जहां उसका उपयोग किया जा रहा हो।
इस प्रकार की खेती की शुरुवाद  करने से पूर्व कुछ थोड़ी निंदाई, छंटाई या खाद बनाने की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन बाद में हर साल इसमें क्रमशः कमी लाई जा सकती है। आखिर में जाकर सबसे महत्वपूर्ण चीज कृषि
करने के सोच पर निर्भर है। 

ढेंचा में ऋषि खेती करते पंजाब के किसान मक्का Rra Aha U ll


ढेंचा में ऋषि खेती करते पंजाब के किसान
मक्का
Rra Aha U ll

ढेंचा  एक दाल जाती का पौधा होता है जो जमीन में जबरदस्त यूरिया बनाने का काम करता है। इसके ढकाव में मक्का की खेती करने से पहले साल ही बंपर उत्पादन लिया जा सकता है।  

ढेंचे के ढकाव को ट्रेक्टर चलाकर  कर सुलाया जा रहा है इसमें हाथों से मक्का के बीज गड़ा दिए जायेंगे। 
जुताई नहीं ,खाद नहीं ,दवाई नहीं 
इस कवर में सीड बॉल बिखरा कर भी सुलाया जा सकता है इस से वीड कन्ट्रोल और यूरिया दोनों का लाभ मिलेगा। 

Thursday, June 8, 2017

मूंग की खेती के बाद करें बिना जुताई धान की खेती

मूंग  खेती के बाद करें बिना जुताई धान की खेती 


धान में खरपतवार नियंत्रण 


न दिनों आपके खेत में मूंग की फसल पक रही है। उस को सुखाने के लिए जहर का छिड़काव इसलिए किया जाता है जिससे वह सूख जाये इस से उत्पादन  प्रभावित होता है साथ में फसल भी जहरीली हो जाती है।  मूंग में फलियां लगती रहती हैं पहले की फलियां पक  कर सूखने लगती हैं। इन्हे हाथों से तुड़वाने से उत्पादन अधिक मिलता है।

R A Ull जी  के खेत की मूंग 
दूसरा इसका यह फायदा रहता है की खेत मूंग के पौधों से ढंका रहता है। इसलिए उसमे आगे खरपतवारों की समस्या भी नहीं रहती है। इस ढकवान में बरसात आने पर मूंग उड़द और धान के बीजों को क्ले के साथ मिला कर गीली सीड बाल छिडकी जा सकती हैं।  जिस से हमे फिर से मिश्रित फसल मिल  जाएगी साथ में खेत में भरपूर कुदरती यूरिया भी मिल जायेगा जिसके सहारे गेंहूं की कुदरती फसल भी आसानी से ली जा सकती है।
गेंहूं की फसल के धान काट्ने से पहले ही खेत में गेंहूं के बीज छिड़क दिए जा सकते हैं। उनके जमने के बाद धान की फसल को काट कर धान को झाड़ कर पुआल को उगते हुए गेंहूं पर  फेंक दिया जाता है।

फ़ोटो: THE ONE STRAW REVOLUTION
I believe that a revolution can begin from this one strand of straw. Seen at a glance, this rice straw may appear light and insignificant. Hardly anyone would believe that it could start a revolution. But I have come to realize the weight and power of this straw. For me, this is revolution is very real.
एक तिनके से आई क्रांति. 
मेरे मानना है की धान के पुआल के एक तिनके से बहुत बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकती है. देखने में ये तिनका बहुत छोटा सा और बेकार नजर आता है. किसी को भी  विश्वाश नहीं होगा की ये किसी क्रांति को जन्म दे सकता है. किन्तु मुझे इस तिनके की ताकत और छमता का आभास हो गया है. ये वास्तविक क्रांति है.
धान की पुआल से निकलते गेंहूं के नन्हे पौधे 
इस प्रकार की धान की खेती में पानी भरा नहीं जाता है वरन उसकी अच्छे से निकासी की जाती है जरूरत पड़ने पर नालियां बना ली जाती हैं।
   
फ़ोटो: RICE STRAW SCATTERED OVER GERMINATING WINTER CROP.
पानी की निकासी के लिए बांयी गयी नालियां 

Monday, June 5, 2017

बिना जुताई की खेती और बकरी पालन



बिना जुताई की खेती और बकरी पालन 


म पिछले करीब 50 सालो से खेती को आत्म निर्भर बनाने के उदेश्य से पशु पालन से जुड़े हैं। पहले हमने देशी किस्म की गायों के पालने का काम शुरू किया था साथ में कुछ भेंसे भी रखीं थीं। दूध को पास में लगी कॉलोनी में बेचने के लिए हम अपने कर्मचारियों को भेजते थे।  हमरा उदेश्य था की लोगों के पास शुद्ध कुदरती  दूध पहुँच जाये। लोग इस से बहुत खुश थे। उसका कारण यह है की शुद्ध दूध कोई बेचते नहीं है सब पानी मिलाकर दूध बेचते हैं।

ये वाकया उन दिनों का है जब हम जुताई कर देशी खेती किया करते थे। खेतों में बैलो से जुताई की जाती थी हमारा उदेश्य यह था की दूध से आमदनी होती रहेगी और गोबर की खाद से खेती होती रहेगी। कुछ समय ऐसा हुआ भी। उन दिनों हम पशुओं के लिए कुदरती चरोखर बचा कर रखते थे। जिसमे पशु चरते थे। दुधारू पशुओं को अलग से दाना दिया जाता था। जो कुदरती होता था।
फ़ोटो:
बरबरी जाती की बकरी साल में दो बार बच्चे देती है तीन बच्चे तक देती है
दो लीटर दूध भी देती है। 
किंतु यह तरीका अधिक दिन तक नहीं चल पाया हमे "हरित क्रांति " के चक्कर में फंस गए थे।  हमारे खेतों पर आधुनिक खेती के मेले  आयोजित होते थे। हाइब्रिड बीजों , रासायनिक उर्वरकों ,कीटनाशकों से खेती करना सिखाया जाता था। साथ में गोबर की खाद डालने को भी कहा  जाता था। शुरू में तो अच्छा उत्पादन मिला किन्तु मुनाफा नहीं था इस तरह हम करीब १५ साल आधुनिक वैज्ञानिक खेती में से जुड़े रहे।

इस दौर में हमने पशुपालन मे भी तब्दीली के साथ संकर नस्ल की गायों को  पालना शुरू कर दिया था। दूध का उत्पादन भी बहुत बढ़ गया था किन्तु मुनाफा नदारत था।  इसलिए हमे ऋषि खेती करने का निर्णय ले लिया और पांच साल हम पशु पालन से दूर रहे थे।  किन्तु दूध ऐसी जरूरत बन गया था हमे पुन : हमे पशु पलना पड़ा।
इस समय हमने देशी किस्म की भैंसों को पालना शुरू किया साथ में हमने चारे के लिए सुबबूल को भी लगाना शुरू कर दिया था। किन्तु सुबबूल का चारा भैंसों को कम पड़ता था इसलिए हम भैंस कम करते गए।आखिर में  एक भैंस रह गई थी इसी प्रकार एक गाय भी हमने पाल कर अनुभव किया जिसमे हमे निराशा हाथ लगी।
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सुबबूल के पेड़ों के साथ बकरीपालन सुबबूल की पत्तियों के साथ अलग से कुछ देने की जरूरत नहीं है।
बड़े जानवरों के साथ हरे चारे के लिए बड़े मैदान हो तब ठीक रहता है इसलिए करीब ५० साल में हमारा अनुभव गाय  भेंसो के साथ ठीक नहीं रहा था। हमेशा  हरे चारे और अनाज की कमी बनी रहती थी।   सं 1999 में हमारी मुलाक़ात जापान के हमारे ऋषि खेती के गुरु फुकुकाजी से हुई थी उन्होंने हमे सुबबूल के पेड़ों के साथ गायों को पालने की बात बताया था उनका कहना है की पशु पालन अपने पर्यवरण के अनुसार होना चाहिए।

अच्छे जंगल है तो हम हाथी  भी पाल सकते हैं नहीं तो क्रमश हमे जानवरों को कम और छोटा करने की जरूरत है।  हमने ऐसा ही किया एक गाय भी हम नहीं पाल पाए हमे बकरियों का पालन शुरू करना पड़ा। बकरी पालन हमे ठीक लगा। एक तो जब चाहें  हम बकरियों को कम कर सकते हैं।  दूसरा इनका दूध बहुत स्वादिस्ट और गुणकारी होता है। आर्थिक मुनाफे  भी यह कम नहीं है। यह हमारा एटीएम है।

जब हम जुताई नहींकरते हैं तो हमारे खेत असंख्य वनस्पतियों से भर जाते हैं।  बकरियां सभी वनस्पतियों को थोड़ा थोड़ खाती रहती हैं।  इस से खरपतवारों का नियंत्रण हो जाता है। इनकी मेंगनी खेतों में समानता के साथ अपने आप बिखरती जाती हैं जिनसे अनाज सब्जियों और फलदार पेड़ों को बहुत फायदा होता है।

जबकि गाय भैंसों के गोबर से बहुत गंदगी होती है उनको बड़ी सार में पालना पड़ता हैं जिन्हे गेंहू का भूसा और धान का पुआल देना और दाना देना बहुत दुखदायी रहता है। श्रम भी अधिक लगता है।
आज जबकि जुताई के कारण खेत मरुस्थ बन रहे हैं उन्हें सुधारने  के लिए  बकरीपालन अच्छा उपाय है।
यह आम के आम गुठली के दाम जैसा है।

इनका बाज़ार भी बहुत आसान है कुछ सड़क पर फेंकने की जरूरत नहीं है। यह खेती कर्ज ,अनुदान और मुआवजे से मुक्त है। 

Friday, June 2, 2017

गौ माता की आस्था

गौ माता की आस्था 


Image may contain: 3 people, horse, outdoor and natureभारत एक कृषि प्रधान देश है जिसमे पशु पालन जंगल खेती के कारण हम हजारों साल बचे रहे हैं।  टिकाऊ जीवन पद्धति में गाय का विशेष महत्व रहा है।  बेलों से जहां ऊर्जा मिलती थी वहीं गाय के दूध से स्वास्थ जुड़ा है। गोबर गोंजन को खेतों में खाद के लिए बहुत उपयोगी माना गया है।

यही कारण है आज भी हमारे देश में गाय को माता  मान कर उसकी पूजा होती है। प्राचीन देशी खेती किसानी हजारों साल टिकाऊ रही है। यह भारत की संस्कृति का आधार है।

किन्तु जबसे हमारे देश में गहरी जुताई रसायनो  और मशीनों से खेती का चलन शुरू हुआ है तब से हमारी संस्कृति और गौ माता की आस्था को भारी  धक्का लगा है। पहले हर किसान अपने घर में गाय को पालता था। गाय परिवार के सदस्य की तरह रहती थी। उसकी परवरिश भी माँ  की तरह की जाती थी। किन्तु अब लोग खेती किसानी से हट  कर शहरों में रहने लगे हैं जहां गायों को पालने की सुविधा नहीं है इसलिए लोग गोशालाओं पर निर्भर हो गए हैं।  पहले हर गाँव में चरोखर हुआ करते थे। गाँव में खुद के जंगल होते थे।  जहां दिन भर पशु कुदरती चारा चरते चरते थे। इसलिए उनका दूध कुदरती स्वास्थवर्धक होता था।

अब गौशालाओं में गायों को मुनाफे के लिए पाला जाता है।  उन्हें गैर  कुदरती आहार जैसे यूरिया का अनाज और भूसा ,पुआल खाने को दिया जाता है। खुला चरने की स्वतंत्रता नहीं है। गायों के बच्चों को भी पैदा होते मार दिया जाता है उनका मुखौटा बना कर गायों का दूध लगाया जाता है। इसके लिए गायों को ऑक्सीटोसीन के इंजेक्शन दिए जाते हैं जो बहुत जहरीले होते हैं इस से दूध भी जहरीला हो जाता है। अधिक से अधिक दूध मिले इसलिए अनेक प्रकार की दवाइयां गायों को दी जाती हैं। इसलिए अब गाय के दूध से भी कैंसर हो जाने का खतरा हो गया है।

खेतों में जुताई होने के कारण कुदरती घास  का एक तिनका नहीं रहने दिया जाता है। सारे  चरोखर और निजी जंगल अब जुताई के अनाजों के खेत बन गए हैं। यही कारण  है की अब गौमाता की तस्वीर लगाकर पूजा होती है। खेती किसानी से जुडी आस्था अब नहीं रही है।

अनेक लोग इस आस्था को अपने मतलब के लिए भुनाने  का काम कर रहे हैं। वो लोग गोबर और गौ मूत्र की दवाइयां बना  कर बेचने लगे हैं। अनेक कृषि वैज्ञानिक भी अब इस आस्था के नाम से अनेक प्रकार जैविक खेती की पद्धतियां बेच रहे हैं। किन्तु वे कुदरती चरोखरों और जंगलों को बचाने के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं।

हम पिछले 30 सालो से अधिक समय से बिना जुताई की कुदरती खेती कर रहे हैं जिसमे पशु पालन भी जुड़ा है
हम चारे के लिए सुबबूल के पेड़ लगाते हैं। सुबबूल की पत्तियों में हाई प्रोटीन है।  यह उत्तम चारा है इसके जड़ें खेत में कुदरती यूरिया बनाने का काम करती हैं जिनके सहारे गेंहूं चावल की खेती भी आधुनिक खेती से अच्छी हो जाती है। कुदरती हरे और सूखे चारे की कोई कमी नहीं रहती है। कोई भी दुधारू पशु सुबबूल के सहारे  आसानी से पल जाता है।

किन्तु यह तभी संभव जब हम बिना जुताई ,बिना खाद और बिना मानव निर्मित दवाइयों  का उपयोग करें।
सुबबूल पेड़ है इसलिए पेड़ों से मिलने वाले सभी फायदे भी मिलते रहते हैं। अनाजों  की फसलों में आधुनिक  खेती के बराबर उत्पादन मिलता है वहीं सुबबूल से चारा ,लकड़ी और पशुओं की आमदनी से करीब एक लाख रूपये प्रति एकड़ आमदनी अतिरिक्त है।