Saturday, December 13, 2014

यूरिआ का विकल्प है ऋषि खेती


यूरिया खाद का विकल्प है ऋषि खेती 

फ़्रांस के वैज्ञानिक कर रहे हैं अध्यन 



र वर्ष की तरह इस साल भी किसानो में यूरिया  की मांग को लेकर हाहाकार मचा है।  जबकि ऋषि खेती में गेंहूँ की फसल बिना यूरिया के लहलहा रही है। इसका सर्वे करने फ़्रांस के खेती और पर्यावरण के वैज्ञानिक यहाँ पधारे है ये दुनिया भर में हो रही जैविक और अजैविक खेती का अवलोकन करते हुए यहाँ पधारे हैं।    वे यहाँ आने से पहले ईरान ,टर्की ग्रीस आदि से होते हुए भारत में धर्मशाला ,देहरादून ,इंदौर से होते हुए यहाँ आएं हैं।

इनका कहना है की ऋषि खेती में जुताई नहीं होने के कारण खेतों की जैविक खाद  बरसात के पानी से बहने से बच जाती है।  दलहन जाती की वनस्पतियां और पेड़ लगातार खेतों में जैविक खाद बनाते रहते हैं इसलिए किसी भी प्रकार की खाद की जरुरत नहीं रहती है।
फ़्रांस के वैज्ञानिक मनन और चिबु जुताई और बिना जुताई की जमीन में क्या अंतर है
का वैज्ञानिक अध्यन करने के लिए यंत्र बना रहे हैं। 
 जबकि जैविक और अजैविक दोनों प्रकार की खेती में हर बार की जुताई से बरसात का पानी जमीन में नहीं सोखा जाता है वह बह जाता है साथ में खेत की खाद को भी बहा कर ले जाता है । इस से  इसलिए यूरिया के बिना फसल नहीं होती है।

उन्होंने बताया की उन्हें ऋषि खेती की जानकारी  फ्रांस में मिल गयी थी। हम इस खेती को देख कर अचंभित हैं। दलहन  जाती की वनस्पतियों और पेड़ों के साथ होने वाली खेती का यह अद्भुत नमूना है।
 हमने यहाँ पड़ोसी खेतों में होने वाली जुताई और रासायनिक यूरिया की खेती से  तुलनात्मक अध्यन कर यह पाया है की इसमें फसल की रंगत और बढ़वार बहुत अच्छी है। लागत नहीं के बराबर है। गुणवत्ता और पर्यावरणीय लाभ अतिरिक्त मिल रहा है।

सुबबूल के पेड़ अपनी छाया के छेत्र  में लगातार यूरिया सप्लाई करने का काम करते है , इनसे हाई प्रोटीन चारा और ईंधन भी मिल रहा है पशुपालन और जलाऊ लकड़ी की बिक्री से अतिरिक्त आर्थिक लाभ अर्जित हो जाता है। यह क्लीन और ग्रीन खेती है।

जुताई और जहरीले रसायनो से होने वाली खेती पूरी दुनिया में समस्या का कारण बन गयी है इस से हरे भरे जंगल ,बाग़ बगीचे और स्थाई चरोखर मोटे अनाज के मरुस्थलों में तब्दील हो रहे हैं। इस से  मिट्टी ,पानी और फसलों में जहर घुलने लगा है।

Monday, December 8, 2014

जलवायु परिवर्तन थामने में मिसाल बना ऋषि खेती फार्म

जलवायु परिवर्तन थामने में मिसाल बना ऋषि खेती फार्म 

विगत दिनों पछमरी  होटल ग्लेन व्यू में एक "जैवविवधता संरक्षण और आजीविका " विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन (17 -19 नवम्बर 2014 ) " भारतीय वन्यजीव संस्थान और वन एवं पर्यावरण विभाग मध्यप्रदेश की ओर से किया गया था।  जिसमे सभी प्रांतों से करीब 80 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग  लिया था।

कार्यशाला का उदेश्य सतपुरा के संरक्षित छेत्रों में जैवविविधता संरक्षण  के माध्यम से ग्रामीण आजीविका को सुनिश्चित करना था। इसमें सभी संरक्षित छेत्रों से अधिकारी गण , स्वं सेवी संस्था के लोग और किसान पधारे थे। इसमें ऋषीखेती के श्री राजू टाइटस को  बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था। ऋषि खेती एक जलवायु परिवर्तन को थामने  वाली क्लाईमेट स्मार्ट खेती है।

जैसा की विदित है इन दिनों जहाँ विकास का बोलबाला है वहीं  हमारा पर्यावरण दिन प्रति दिन खराब होता जा है। एक और आम आदमी की रोटी का प्रश्न है तो दूसरी और जलवायु  को संरक्षित रखने का प्रश्न है। हम सब जानते हैं कि ग्रामीण आबादी की रोजी रोटी खेती पर आश्रित है। जिसमे अनाज की खेती सबसे महत्वपूर्ण है इसमें सर्वाधिक जमीन उपयोग में आ रही है।

अधिकतर हमारा अनाज जमीन की हरयाली को नस्ट कर पैदा किया जाता है।   जिस से सब से अधिक जैवविविधताओ की हिंसा  होती है जिस से जलवायु परिवर्तन की समस्या उत्पन्न हो रही है। सूखा ,बाढ़ ,ज्वार भाटों का आना ,बादलों का फटना आदि अनेक समस्याएं इस से उत्पन्न हो रही हैं। खेत बंजर हो रहे हैं ग्रामीणो की आजीविका का खतरा पैदा हो गया है।

 इसलिए हमे हरे भरे संरक्षित छेत्रों की जरुरत हैं जिसमे जैवविविधताएं पनपती रहें ये संरक्षित छेत्र एक ओर जहाँ जलवायु को नियंत्रित करते हैं वहीं ग्रीन हॉउस गैसों को सोखने का भी काम करते हैं। सतपुरा टाइगर प्रोजेक्ट इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। किन्तु प्रश्न फिर भी ग्रामीण आजीविका का बना हुआ है जिसे हल करने की जरुरत है। अधिकतर प्रतिभागियों ने जैवविविधताओं को संरक्षित करते हुए आजीविका को सुनिश्चित करने के अनेक उपाय बताये।
हरियाली के रक्षक (सतपुरा टाइगर रिज़र्व )

इसलिए अब समय आ गया है की हम खेती के उस रास्ते को बदल दें जिस से हरयाली नस्ट होती है हमे ऐसी खेती अपनाना पड़ेगा जो संरक्षित छेत्रों की तरह जलवायु को नियंत्रित करे और ग्रीन हॉउस  गैसों का अवशोषण भी करे।
ऋषि खेती में फसलो का उत्पादन खरपतवारों और वृक्षों के संरक्षण के माध्यम से किया जाता है जिस से साल भर खेत हरियाली से भरे रहते हैं। इस कारण ऋषि खेत जलवायु संरक्षण और ग्रीन हॉउस गैस के अवशोषण में महत्व पूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह जैवविविधताओं को संरक्षित करते हुए आजीविका चलाने का  सबसे अच्छा तरीका  सिद्ध हुआ है।  ऋषि खेती तकनीक विश्व में प्रथम स्थान पर आ गयी है।
पेड़ों के नीचे गेंहूँ की ऋषि खेती 

इस कार्य शाला में संरक्षित छेत्रों के आलावा खेती किसानी से जुड़ा एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिला जो ऋषि खेती तकनीक का मुकाबला कर सके।  इसलिए आयोजकों ने इसे अनुकरणीय सर्वोत्तम मिसाल बता कर सम्मानित किया है।

कार्यशाला पूरे तीन दिन तक चली अंतिम दिन अनेक अधकारी गण ऋषि खेती फार्म को देखने पधारे जिन्होंने कहा की यह जलवायु थामने वाली बहुत उत्तम खेती है इसका विस्तार होना चाहिए।





Wednesday, December 3, 2014

CLIMATE SMART AGRICULTURE

CLIMATE SMART AGRICULTURE
(जैव विविधता संरक्षण और आजीविका सुधार )

जलवाऊ परवर्तन को थामने  वाली खेती
(ऋषि खेती )

ब से ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की समस्या के खतरे बढ़ने लगे हैं विस्व स्तर पर उस से लड़ने के लिए अनेक उपाय भी किये जाने लगे हैं। हम सब जानते हैं की ये खतरे हमारे हरे भरे पर्यावरण को रेगिस्तान में बदलने के कारण उत्पन्न हुए हैं।
कड़कनाथ से क्रॉस चूजे 

हरियाली का सीधा सम्बन्ध हमारी जलवायु से है हरियाली है तो जलवायु चक्र जिसमे गर्मी ,बरसात और ठण्ड सामान्य रहते हैं। हजारों सालो  से हम इसका लुत्फ़ उठाते रहे हैं किन्तु गैरपर्यावरणीय विकास के कारण अब हरियाली तेजी से नस्ट होने लगी है जिसमे गैर कुदरती खेती का सबसे बड़ा हाथ है। इसलिए जलवायु परिवर्तन की समस्या सबसे बड़ी समस्या बन गयी है।

पिछले दो सालों में उत्तराखंड और कश्मीर जैसे सबसे हरे भरे इलाकों में इस समस्या ने जो कहर दिखाया है वह बहुत ही भयानक है जिसकी कल्पना मात्र से हम डर जाते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है की ऐसे अनेक खतरे हमारे ऊपर मंडराने लगे हैं। 
बरबरी बकरी 

एक जमाना था जब हम सब हरे भरे वनो के मध्य सुख से रहते थे जहाँ जंगली जानवर और हमारे बीच रहन सहन में एक संतुलन स्थापित था।  सब एक दुसरे के पूरक थे।  किन्तु उस समय हम अविकसित कहलाते थे और जो इन जंगलों से निकल कर बिजली और पेट्रोलियम के सहारे जिंदगी जी रहे थे विकसित कहलाते थे इसलिए आज भी असली विकास क्या है ? हम लोगों को नहीं मालूम है। 

 अब  खेती और जंगल दो अलग अलग स्थान हो गए हैं इन भूभागों के बीच तार की बाड़  लगा दी गयी है जैसे 
पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के बीच लगी है। हमे इस बागड़ को खत्म करना है। 
ऋषीकृपा के  भूमिधकाव में गेंहू की  खेती 

हमे खेती और जंगलों के बीच वही  समन्वय स्थापित करना है जैसा पहले था। इसके लिए हमे ऐसी खेती को अपनानां होगा जो कुदरती जंगलों के सिधान्तो पर आधारित हो। जंगलों में भी खेती हो रही है वहां जंगली पेड़ और जंगली पेड़ों की सुरक्षा की जाती है वह भी स्मार्ट खेती है फर्क ये है की उसमे गेंहूँ ,चावल ,दूध ,फलों आदि की खेती नहीं होती जिसके हम अपने खेतों में जंगलों की तरह गेंहूँ ,चावल ,फल ,दूध आदि पैदा करने लगें तो हमारे खेत भी जंगलों की तरह स्मार्ट हो जायेंगे और हमे जंगलों में पिकनिक मनाने  जाने की जरुरत नहीं रहेगी। लोग हमारे खेतों में आने लगेंगे। 
बीजों की सीधे बुआई 
सुबबूल के पेड़ों के नीचे गेंहूँ की खेती

बकरी  और अनाज की खेती एक साथ संभव है। 
पेराघास को सुलाकर बीजों की बोनी
ऋषि खेती जिसे हम २८ सालों से कर रहे हैं ये ऐसी ही स्मार्ट खेती है इसमें जंगलों की तरह जुताई ,खाद दवाईयों ,की कोई जरुरत नहीं है। यहाँ जंगलों की माफिक किसी भी वनस्पति को खरपतवार नहीं समझा जाता है।  हर उस जीव जंतु ,कीड़े मकोड़े ,पेड़ पौधे की इसमें सुरक्षा की जाती है जिसे कुदरत उसे यहाँ भेजती है।




CLIMATE CHANGE AND BIODIVERSITY CONSERVATION

जलवायु परिवर्तन  और जैव विविधता संरक्षण
 Natural Farming (बिना जुताई की कुदरती खेती )
लवायु का  सीधा सम्बन्ध जैव विविधताओं के संरक्षण से है। सबसे अधिक जैवविवधताओं का नुक्सान फसलोत्पादन के लिए की जा रही जमीन की जुताई से हो रहा है दूसरा नुक्सान जमीन पर पनपने वाली वनस्पतियों को नस्ट करने से हो रहा है जिसे हम खरपतवार कहते हैं।

सामान्यता: किसान जमीन की जुताई दो कारणों से करते हैं पहला वे  सोचते हैं की जिस भी फसल को हम बो रहे हैं उसका खाना उसके साथ पैदा होने वाली वनस्पतियां खा लेंगी ये भ्रान्ति है कोई भी वनस्पती जमीन में संग्रहित खाने को नहीं खाती  है वरन उसमे खाना इकठा करती हैं।
खरपतवारों के संग गेंहूँ की खेती 
जब जमीन खाली  रहती है अपने आप उस में वनस्पतियां उगने लगती हैं इन वनस्पतियों की जड़ें जमीन के भीतर चली जाती हैं तथा तना और पत्तियां ऊपर छा  जाती है। यह जमीन को ढंकने का कुदरती प्रबंध है। यह जलवायु को नियंत्रित करने के जरूरी है। इस ढकवान के कारण बरसात होती है  और बरसात का जल भूमि में संगृहित रहता है। इस ढकवान की हरी हरी पत्तियां एक और प्राण वायु प्रदान करती हैं तथा दूषित  हवा को सोख लेती हैं।

यह भूमि ढकाव धीरे 2 बढ़ कर घने वनो में तब्दील हो जाता है जिसकी की कोई सीमा नहीं है। बहुत कम लोग जानते हैं की जमीन स्वम असंख्य सूक्ष्म जीवाणु का समूह है उसमे जान होती है वह भी साँस लेती है उसे भी प्यास और भूख लगती है। इस ढकाव के अंदर अनेक जीव जंतु ,कीड़े मकोड़े निवास करते हैं। यह एक छोटा असंख्य जैवविवधताओं का पहला और बहुत जरूरी जंगल है। इसकी सुरक्षा  नहीं करने के कारण  हम घटी  में जी रहे हैं।
अनेक सब्जियों और खरपतवारों  के साथ फल रही मोसम्बी 

सामान्य  खेती में खरपतवारों को बहुत बड़ा दुश्मन माना जाता है। यहाँ तक की मानव निर्मित वनो और फल बागों में भी खरपतवारों को मारने की सलाह दी जाती है।किन्तु यह बहुत गलत है फलदार पेड़ों के साथ पैदा होने वाली वनस्पतियों से फलदार पेड़ो का बड़ा अंतरंग सम्बन्ध रहता है। इन वनस्पतियों के साथ असंख्य जीव जंतु ,कीड़े मकोड़े  तथा असंख्य आँखों से दिखाई नहीं  देने वाले सूख्स्म जीवाणु रहते हैं।  जिनके कारण एक कुदरती संतुलन स्थापित हो जाता है जिस से फलदार पेड़ों में हर साल बढ़ते क्रम में फल लगते हैं ,उनका स्वाद बहुत बढ़िया हो जाता है ,किसी भी प्रकार की बीमारी इन पेड़ों पर नहीं आती है।
सुबबूल के  साथ गेंहूँ की खेती 

फसलों को पैदा करने के लिए की जा रही जमीन की जुताई से एक और जहाँ बरसात का पानी जमीन में नहीं समाता वह बह जाता है साथ में बारीक बखरी मिट्टी को भी बहा कर ले जाता है इस कारण जमीन कमजोर हो जाती है ,कमजोर जमीन में कमजोर फसलें पैदा होती हैं उनमे अनेक प्रकार की मानव निर्मित खादो  और दवाओं का उपयोग किया जाने लगता है जिस से प्रदूषण फेल रहा है। सबसे अधिक समस्या धरती पर बढ़ रही गर्मी और मौसम परिवर्तन की है। पेड़ों की कमी कारण प्रदूषित गैसों का अवशोषण नहीं हो पाता है। बिना जुताई की कुदरती खेती में अनाज ,सब्जी ,चारे के पेड़ सब एक साथ लगाये जाते हैं जैसा कुदरती वनो में देखने को मिलता है।








Tuesday, November 25, 2014

जैव-संरक्षित खेती ( Climate smart Farming)

सुबबूल के पेड़ों के नीचे गेंहूँ की खेती

सुबबूल एक दलहन जाती का पेड़ है जिसकी पत्तियां हाई प्रोटीन वाले चारे के रूप में उपयोग में आती है हर दुधारू पशु इनकी पत्तियों को चाव से खाता है। इसकी लकड़ियाँ  जलाऊ ,इमारती और कागज बनाने के काम में आती हैं। इस पेड़ को खेतों में लगाने से मात्र लकड़ियों से एक लाख रु /प्रति एकड़ की अतिरिक्त आमदनी होती है. पशु चारे और इसके नीचे अनाज ल
गाने का लाभ अतिरिक्त है। यह पेड़ अपने साथ अनेक जैवविविधताओं को संरक्षित करता है ,दलहन जाती का होने के कारण अपनी छाया के छेत्र में लगातार नत्रजन सप्लाई करता है , फसलों पर लगने वाले कीड़ों से फसल को बचाता  है ,खरपतवारों को नियंत्रित करता है ,बरसात के पानी को जमीन में सोख लेता है ,बादलों को आकर्षित कर बरसात करवाने  में सहायता करता है ,ग्रीन हॉउस गैस को सोख कर जैविक खाद में तब्दील करता है , ग्लोबल वार्मिंग को थामने  में सहयोग करता है ,जलवायु परिवर्तन को कम करता है। 
इसके रहने से जुताई खाद ,और दवाइयों की कोई जरुरत नहीं रहती है इसलिए भूमि ,जैव विविधताओं और जल का छरण पूर्णत: रुक जाता है।  जहर मुक्त कुदरती आहार प्राप्त होता है। पर्यावरण प्रदूषण बिलकुल नहीं होता है। इसकी उत्पादकता और गुणवत्ता जुताई और रसायनो से होने वाली खेती से बहुत अधिक है।  इस खेती को करने से खेतों की ताकत साल दर साल बढ़ती जाती है जबकि जुताई आधारित खेती से खेत रेगिस्तानों में तब्दील हो रहे हैं। 

जंगली ,अर्द्ध जंगली और पालतू पशुओं को साल भर हरा चारा उपलब्ध करने के लिए सुबबूल एक सर्वोत्तम उपाय है जबकि घास की चरोखरों से जैवविविधताओं का संरक्षण अवरोधित होता है।