Sunday, April 9, 2017

कैंसर भी कुदरती तरीके से ठीक हो जाता है।

जब सेम भैया(सेमुअल बेंजमिन फ्रांसिस  FB फ्रेंड ) ने कैंसर को लेकर सवाल उठाया है तब मेरे मन में अपनी कहानी सुनाने की इच्छा जाग्रत होगई है। विगत दिनों मेरी पत्नी शालिनी जिनकी उम्र 65 वर्ष की है को अचानक हार्ट अटेक आ गया था उन्हें हमने स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया ही था की अचानक मुझ (71 +)को भी पेरेलेसिस की शिकायत लगी तो मुझे भी उनके साथ अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया ,

५दिन के बाद हमे छुट्टी देकर भोपाल रिफर कर दिया जहाँ शालिनी को मुल्टीब्लॉकेजेस के कारण बाईपास की सलाह दी गयी। हम सोच रहे थे की क्या करें कि मुझे पुन : राइट साइड पेराल्टिकल अटेक आ गया था। थोड़ा बहुत इलाज के बाद हमे घर भेजदिया गया.

हम दोनों के  मामले गंभीर थे फिर भी हमने हिम्मत से काम लिआ। जैसा विदित है हम पिछले ३० सालो से कुदरती खेती और कुदरती इलाज विषय पर काम कर रहे हैं इसलिए हमारे लिए यह एक झटका था। हमने आखिर इस विषय को गंभीर मानते हुए खोज जारी रखी।

हमने यह पाया की यह सब हमारी Type 2 diabetes   के कारण हुआ है तो फिर हमने अपनी खोज को आगे बढ़ाते हुए यह खोजा की आखिर कुदरती कौन सा तरीका है जिस से हम अपनी Type 2 diabetes को ठीक कर सकते हैं।  तो हमे एक वीडियो मिला जिसमे बताया गया है की करीब 50 % अमेरिकन को डायबिटीज है या होने के करीब है और ये लोग कैंसर ,दिल /दिमाग की बीमारी से ग्रस्त हो रहे हैं।

यह बात अनेक बार कही जा रही है कि टाइप २ डायबिटीज का   सम्बन्ध हमारे खान पान से है जो हमे कैंसर ,हार्ट अटेक ,स्ट्रोक आदि की और धकेल रहा है। हमने यह भी पाया है की अधिकतर डायबिटीज /ब्लड प्रेशर की शिकायत का सम्बन्ध विषैले भोजन से हो रहा है। जिसमे अनाज ,आलू ,चावल और शकर (GPS)  का उपयोग ज्यादह होता है।

फिर क्या था हमने अपने ऊपर प्रयोग शुरू कर दिया एक हफ्ते में हमारी डायबिटीज पूरी तरह बिना दवाई के ठीक हो गयी। हम पूरी तरह इन्सुलिन और गोलियों से मुक्त हो गए। जैसे ही हमारी शुगर ठीक हुई हमारी हिम्मत बढ़ गयी। हमने सभी दवाइयों को धीरेधीरे  बंद कर दिया।  जिस से मल्टीपल ब्लॉक और पैरालिसिस में लाभ होने लगा हमे बइपास और हानिकर रासायनिक दवाओं से मुक्ति मिल गयी।

इस अनुभव के आधार पर हम कह सकते हैं की यदि कैंसर के रोगी को भी विष रहित कुदरती भोजन मिले तो वह  भी ठीक हो सकता है।

अब हमने केवल अपने वजन और शुगर पर ध्यान केंद्रित कर दिया और सब  प्रभुजी पर छोड़ दिया उसकी मेहरबानी हो उसने हमे चंगा कर दिया। हमने यह भी पाया की यह बीमारी गैरकुदरती खाने के कारण है जिसे हमने लापरवाही के चलते छोड़ दिया था।

दुआ हर हाल में लाभ पहुंचाती है पर हमे यह नहीं भूलना चाहिए की यह शरीर उसकी देन है जिसकी हिफाज़त  करना हमारा धर्म है। यह जब ठीक रह सकता है जब हम उसकी बनाई कुदरत का भी ध्यान रखें। जहाँ तक डाक्टर दवाइयों का प्रश्न है यह अब संदेह के घेरे में हैं। इनसे हमे सतर्क रहने की जरुरत है।
 वीडियो को भी देखें -
*समुएल बेंजामिन फ्रांसिस ,मेरे भाई  भोपाल  में ख्याति प्राप्त पास्टर हैं वे सब जगह महामारी के रूप में फेल रही कैंसर की बीमारी से चिंतित हैं। जो सभी को दुआ करने की सलाह देते हैं। उन्होंने फेस बुक के माध्यम से इस समस्या को हम तक पहुंचाया है।

Thursday, December 22, 2016

बिना -जुताई की जैविक कुदरती खेती

बिना -जुताई की जैविक कुदरती  खेती

रसायन नहीं ,गोबर नहीं ,कीट और खरपत-मारक नहीं ,मशीन नहीं 
ब से भारत में "हरित क्रांति " के नाम से गहरी जुताई ,जहरीले रसायनों ,भारी  सिंचाई ,और मशीनों से खेती की जा रही है तब से एक ओर  जमीन बंजर हो रही हैं और किसान गरीब होते जा रहे हैं।

फलदार पेड़ों के साथ गेंहू की खेती 
ऋषि खेती बिना जुताई ,बिना खाद और दवाइयों से की जाने वाली खेती है इसमें भारी  सिंचाई और मशीनों की भी जरूरत नहीं है। इस खेती का आविष्कार जापान के जग प्रसिद्ध सूक्ष्म जीवाणु के जानकार और कुदरती खेती के किसान ने किया है। पूरे विश्व में कुदरती खेती ( नेचुरल फार्मिंग ) के नाम से  है।

भारत में हमे इस खेती को करते करीब तीस साल हो गए हैं। इन तीस सालों  में हमने कभी भी जुताई नहीं की है ना  ही कोई जहरीला रसायन डाला है ना ही हमने जैविक खाद का कोई उपयोग किया है। असल में ऋषि खेती कुदरती रूप से पैदा होने वाली वनस्पतियों के साथ और उनके तरीके से की जाती है। जैसे कुदरती वनों और चरोखरों में देखने को  मिलता है।
कुदरती वनों में बीज जमीन पर पड़े रहते हैं जो अपने आप सुरक्षित  और जमीन की ऊपरी सतह अनुकूल मौसम आने पर ऊग आते हैं इसी प्रकार हम सीधे बीजों को फेंक कर या क्ले (  खेतों और जंगलों से बह  कर निकलने वाली चिकनी मिटटी जिस से मिटटी  बर्तन बनाये जाते है। ) में कोटिंग कर सीड बाल बना कर बिखराते देते हैं।  यह प्रक्रिया ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार जंगली बीज गिर जाते हैं।  सीड बाल से बीजों  की सुरक्षा हो जाती है जो मौसम आने पर ऊग आते हैं।
आल इन वन 

हम खरपतवारों को मारते नहीं है यह जमीन के सुधार में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। इनके साथ अनेक कुदरती जैव-विविधताएं रहती है जो जमीन में जल का  प्रबन्ध करती हैं ,फसलों की रक्षा करती हैं और पोषक तत्व प्रदान करने का काम करती है।
इस कुदरती प्रबंध के कारण खेत बहुत ताकतवर हो जाते हैं उनमे ताकतवर फसलें पनपती है  जिनमे कोई रोग नहीं लगता है। इस कारण किसान को लागत  और श्रम का बहुत लाभ मिलता है और बम्पर फसलें  उतरती हैं।






कुदरती खेती में सुबबूल और बकरी पालन का विशेष महत्व है। दोनों एक दुसरे के पूरक और पर्यावरण को बचाने का काम करते हैं। साथ में ईंधन भी मिलता है।





खरपतवार जिन्हें किसान दुश्मन मानते हैं कुदरती खेती का मूल तत्व हैं इन्हें हम मरते नहीं वरन बचाते हैं। गाजर घास बहुत ग्राउंड कवर के लिए बहुत उपयोगी है।



नरवाई और पुआल जिन्हें किसान जला  देते हैं कुदरती  खेती में बहुत काम करती है। 

Sunday, September 11, 2016

ग्राउंड कवर क्रॉप

ग्राउंड कवर क्रॉप 


खरपतवारों के बारे में भ्रांतियां 


जारो सालो से जब से मानव ने जुताई आधारित खेती को करना सीखा है तब से किसानों और खरपतवारो के मध्य दुश्मनी चल रही है।

अधिकतर किसान और कृषि वैज्ञानिक यह मानते हैं की खरपतवारें हमारी फसलों का खाना खा लेती हैं इसलिए पैदावार प्रभावित होती है इसलिए वो चुन चुन कर उन्हें निकालते  रहते हैं।

जबकि कुदरती सत्य यह है की खरपतवारें (ग्राउंड कवर क्रॉप ) जमीन का सुरक्षा कवच है। इसलिए हम धरती माता की पूजा करते हैं इसके पीछे सत्य यह है की धरती माता हमारे शरीर के माफिक जीवित है वह  हमारे शरीर की तरह खाती  पीती है और साँस लेती है।
जापान के मस्नोबू फुकुओका जी द्वारा लिखी उनके
अनुभवो पर आधारित किताब 

खरपतवारें धरती माता को हरियाली से ढांक  लेती हैं जिस से धरती की समस्त जैव -विविधताएं सुरक्षित होकर तेजी से पनपती है जो धरती को पोषकता प्रदान करते हुए उसे उर्वरक और पानीदार बना देती है। इस ढकावन  के कारण धरती  धूप ,ठण्ड , बरसात और तेज हवाओं से सुरक्षित हो जाती है।

किन्तु जब किसान खरपतवारों को दुश्मन समझ कर जमीन को खूब जोतता और बखरता है तो भूमि कणो का आपसी सम्बन्ध टूट जाता है वे बिखर जाते हैं जो हवा और पानी से बह और उड़ जाते हैं। इस से जमीन की आधी ताकत एक बार की जुताई से नस्ट हो जाती है और खेत मरुस्थल में तब्दील हो जाते है।

मरुस्थली खेत में बिना सिंचाई ,उर्वरक खाद के फसलों का उत्पादन नहीं होता है और और जो होता है वह प्रदूषित रहता है।

जुताई के कारण  बारीक मिटटी बरसात के पानी के साथ मिल कर कीचड में तब्दील हो जाती है जिसके कारण बरसात का पानी जमीन में सोखा नहीं जाता है वह  तेजी से बहता है अपने साथ मिट्टी (जैविक खाद ) को भी बहा  कर ले जाता है।

मरुस्थली जमीन में गैर-कुदरती ,बे स्वाद ,रोग पैदा करने वाली फसलें पैदा होती हैं। आज जितने भी हम वृक्ष विहीन रेगिस्तान देख रहे है वो सभी जमीन की जुताई आधारित खरपतवारों को मारकर की जाने वाली खेती के कारण है।

यही कारण है की आज कल बिना जुताई की खेती का चलन  शुरू हो गया है। जिसमे बिना जुताई की कुदरती खेती का पहला स्थान है। 

Monday, September 5, 2016

स्कूली बच्चों की आत्म हत्या ?

स्कूली बच्चों की आत्म हत्या ?

हम पैदा होते ही हैं स्कूल जाने के लिए 

सीखने की आज़ादी होना चाहिए 


मारे पैदा होते ही हम पर अनेक प्रकार के बंधन डलने  लगते हैं जिसमे सब से बड़ा बंधन  हमारी शिक्षा को लेकर होता है।  माता पिता बच्चों  के पैदा  होते ही उसके भविष्य के प्रति चिंतित होने लगते हैं और उनके सामने स्कूल के आलावा कोई विकल्प नहीं रहता है इसलिए हमे मजबूरन स्कूलों के हवाले कर दिया जाता है और हम स्कूल के गुलाम हो जाते हैं।
महाराष्ट्र में 2014 में  ८००० बच्चों ने आत्म  हत्या कर ली है। 

स्कूल चाहे कोई भी उसे भी अपने भविष्य की चिंता रहती है इसलिए वह भी स्कूली सिस्टम के गुलाम हो जाते हैं उन्हें वही पढ़ाना  पड़ता है जिसे सिस्टम चाहता है।  पढ़ाई के सिलेबस  भी इस सिस्टम के अनुसार तय किए जाते हैं।  अधिकतर यह सिस्टम पूंजीपति घरानो के अधीन रहता है।  ये घराने हमेशा अपनी पूँजी बढ़ाने के लिए बाजार खोजते रहते हैं और एक दिन हमारी पढ़ाई का पूरा सिस्टम हमारे सहित इस बाजार की भेंट चढ़ जाता है।
बाजार में कोई यह नहीं देखता कि क्या  सही है की क्या गलत है वहां तो खरीदने और बेचने के लिए कीमतों का खेल चलता है सस्ता खरीदो और महंगा बेचो। इस खेल का दबाव हमारे स्कूली बच्चों और पेरेंट्स पर आ जाता है।
पेरेंट्स महँगे और महंगे स्कूलों को हमारे बच्चों के भविष्य के खातिर ठीक समझते हुए उन्हें दाखिला दिलाते  रहते हैं।
जितने महंगे स्कूल होते हैं उतनी महंगी पढ़ाई बन जाती है जिसको अधिक से अधिक नम्बरों की जरूरत रहती है। जो जितने अधिक नंबर लाएगा वही  आगे जाता है।

इस प्रकार एक ओर  पेरेंट्स और  फीस के चक्कर  में उलझ जाते हैं वहीं हमारे बच्चे और अधिक नंबर के चक्कर में उकझ जाते है।  इसी दबाव के चलते बच्चों पर आत्म हत्या करने के के आलावा कोई रास्ता  नहीं बचता है। ऐसा नहीं है की यह दवाब केवल बच्चों पर ही रहता है पेरेंट्स भी इसके शिकार  हो जाते है। बच्चे अच्छे नम्बर नहीं ला पाये इस लिए  अनेक पेरेंट्स भी आत्म हत्या कर लेते हैं।

किन्तु यदि हम हमारे समाज के सफल लोगों की तरफ देखें चाहे  वे अच्छे खिलाडी बने है ,अच्छे कारोबारी बने हैं,अच्छे अभिनेता बने हैं ,अच्छे डॉ या वकील बने हैं किसान बने हैं।  उनका आधार अच्छे नंबर नहीं रहा है वे सभी अपनी प्रतिभा के अनुसार अच्छे बने हैं। उनकी अच्छाई के पीछे उनकी सीखने की आज़ादी रही है।

सीखने की आज़ादी में बच्चा बेफिक्र होकर वह सब सीखता है जिसमे उसकी रूचि होती है यही उसकी असली पढ़ाई रहती है।  रूचि जिसे हम पागलपन भी कह सकते। जब रूचि का चस्का लगता है वह बच्चा उठते बैठते सोते खाते  पीते वही  सोचता रहता है जिसकी रूचि उसमे है। इस पागलपन में वह सफल हो जाता है।  कभी निराशा नहीं आती वह आत्म हत्या के बारे में कभी सोच ही नहीं सकता है।  वरन वह यह  सोचता है की मेरे काम जल्दी निपट जाये ऐसा न हो की में बूढा हो जाऊं और  फिर इस काम को ना कर सकूँ।

इसलिए हमे हमारे बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए हमे उनको उनकी रूचि के अनुसार सीखने की आज़ादी के साथ साथ सहयोग करने की जरूरत है। इसमें शुरुवाद पेरेंट्स को करना चाहिए फिर हमारे स्कूलों को भी इसी प्रकार की शिक्षा और सिलेबस तैयार करना चाहिए  जिसमे हमारे समाज को  भी पूरा पूरा  सहयोग करने की जरूरत है।

आजकल नो स्कूल या होम स्कूल की अवधारणा प्रबल हो रही है जिसमे बच्चों को अपने आप सीखने दिया जाता है।  उन्हें कुछ सिखाने  की कोशिश नहीं की जाती है किन्तु ऐसा नहीं है को बच्चों को इसमें लावारिश छोड़ दिया जाता है ,जब बच्चा कुछ पूछता है या सीख्नने लिए आग्रह करता है उस पेरेंट्स उसे मदद करते हैं जिसमे दबाव बिलकुल नहीं रहता है। उदाहरण के लिए जब बच्चा पूछता है की रेल कैसे चलती है तो हमे उसे रेल कैसे चलती है बताना जरूरी हो जाता है।  इसके लिए यह जरूरी नहीं है हमे भी जाने की रेल कैसे चलती है। हमे उसे ऐसे स्कूल में ले जाने की जरूरत जहाँ से वह सीख सके की रेल कैसे चलती है। इस प्रकार अनेक आयाम  हो सकते हैं।

तमाम परम्परगत स्कूल हमारे कुदरती ज्ञान प्राप्ति में बाधक है उनमे रहकर हमारे बच्चों का दिमाग खराब हो रहा है क्योंकि जो बच्चा सीखना चाहता है उसे वह नहीं सिखाया जाता है इसलिए उसका दिमाग खराब हो जाता है।  वह गलत दिशा पकड़ लेता है जिसका आभास पेरेंट्स और टीचर दोनों को नहीं होता है।

इसलिए हम पेरेंट्स और बच्चों  को सलाह देते हैं की वो जितनी जल्दी हो सके रूचि रहित शिक्षा से बाहर निकल  लें और उन्हें रूचि सहित शिक्षा प्राप्त करें।  यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है किन्तु इसके लिए  जरूरी है रूचि रहित स्कूलों को छोड़ने की, जब तक आप रूचि रहित स्कूल नहीं छोड़ेंगे आप रूचि सहित शिक्षा  नहीं प्राप्त कर सकते हैं।

आत्म-हत्या करने से अच्छा है बच्चे स्कूल छोड़ने का विकल्प चुने पेरेंट्स को बच्चों के इस निर्णय में सहयोग करने की जरूरत है।

rajuktitus@gmail.com




Tuesday, August 23, 2016

धरती माता का लहू बह रहा है , खेत और किसान मर रहे हैं। बिना जुताई की कुदरती खेती अपनाये।

धरती माता का लहू बह रहा है , खेत और किसान मर रहे हैं।
बिना जुताई की कुदरती खेती अपनाये। 


ज कल बरसात के दिन हैं सभी जगहों पर नदी नालो डबरों में मटमैला पानी नजर आ रहा है। पानी जो बरसता है  बिलकुल साफ़ रहता पर यह मटमैला क्यों हो जाता है ? यह धरती माता के लहू के कारण हो जाता है जिसे हम क्ले (कीचड ) कहते हैं। यह क्ले असली "कुदरती खाद "है। जब हम इस क्ले  का सूख्स्म अध्यन करते हैं तो हमे पता चलता है की इस में असंख्य जमीन को उर्वरकता  प्रदान करने वाले सूक्ष्म जीवाणु है। आज तक किसी वैज्ञानिक ने क्ले के एक कण में कितने और कौन कौन से जीवाणु है का पता नहीं लगा पाया है।
 जापान के जग प्रसिद्ध सूक्ष्म जीवाणु  वैज्ञानिक और कुदरती खेती के किसान  स्व. मस्नोबू फुकुओकाजी ने इसके महत्व को जान कर "बिना जुताई की कुदरती खेती "का आविष्कार किया  है। जिसके कारण जुताई आधारित आधुनिक और देशी खेती करने की तकनीकें हमारे पर्यावरण के लिए बहुत घातक सिद्ध हो गयी हैं।
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धरती माता का लहू बह रहा है। 
बिना -जुताई की कुदरती खेती जिसे हम भारत में पिछले ३० सालो से कर रहे हैं।  हम अपने खेतों में फसलों को उगाने के लिए अनेक बीजों को क्ले में मिलाकर करीब आधे इंच की व्यास की गोलियां बना लेते हैं। जिन्हें एक वर्ग मीटर में 10 गोलियों के हिसाब से बिखरा देते हैं।

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सीड बॉल से ऊगता नन्हा पौधा

इस प्रकार धरती माता का लहू बहना  रुक जाता है और खेत ताकतवर और पानीदार हो जाते है जिस से बिना खर्च और महनत  के बम्पर  फसल मिलती है।
क्ले से बनी सीड बॉल्स 

Monday, August 22, 2016

किसान का गोल्ड है :ऋषि खेती

किसान का गोल्ड है :ऋषि खेती 


ब से भारत में "हरित क्रांति " के नाम से गहरी जुताई ,जहरीले रसायनों ,भारी  सिंचाई ,और मशीनों से खेती की जा रही है तब से एक ओर  जमीन बंजर हो रही हैं और किसान गरीब होते जा रहे हैं।

ऋषि खेती बिना जुताई ,बिना खाद और दवाइयों से की जाने वाली खेती है इसमें भारी  सिंचाई और मशीनों की भी जरूरत नहीं है। इस खेती का आविष्कार जापान के जग प्रसिद्ध सूक्ष्म जीवाणु के जानकार और कुदरती खेती के किसान ने किया है। पूरे विश्व में कुदरती खेती ( नेचुरल फार्मिंग ) के नाम से  है।

भारत में हमे इस खेती को करते करीब तीस साल हो गए हैं। इन तीस सालों  में हमने कभी भी जुताई नहीं की है ना  ही कोई जहरीला रसायन डाला है ना ही हमने जैविक खाद का कोई उपयोग किया है। असल में ऋषि खेती कुदरती रूप से पैदा होने वाली वनस्पतियों के साथ और उनके तरीके से की जाती है। जैसे कुदरती वनों और चरोखरों में देखने को  मिलता है।
कुदरती वनों में बीज जमीन पर पड़े रहते हैं जो अपने आप सुरक्षित  और जमीन की ऊपरी सतह अनुकूल मौसम आने पर ऊग आते हैं इसी प्रकार हम सीधे बीजों को फेंक कर या क्ले (  खेतों और जंगलों से बह  कर निकलने वाली चिकनी मिटटी जिस से मिटटी  बर्तन बनाये जाते है। ) में कोटिंग कर सीड बाल बना कर बिखराते देते हैं।  यह प्रक्रिया ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार जंगली बीज गिर जाते हैं।  सीड बाल से बीजों  की सुरक्षा हो जाती है जो मौसम आने पर ऊग आते हैं।

हम खरपतवारों को मारते नहीं है यह जमीन के सुधार में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। इनके साथ अनेक कुदरती जैव-विविधताएं रहती है जो जमीन में जल का  प्रबन्ध करती हैं ,फसलों की रक्षा करती हैं और पोषक तत्व प्रदान करने का काम करती है।
बीन जुताई की सोयाबीन की फसल 
इस कुदरती प्रबंध के कारण खेत बहुत ताकतवर हो जाते हैं उनमे ताकतवर फसलें पनपती है  जिनमे कोई रोग नहीं लगता है। इस कारण किसान को लागत  और श्रम का बहुत लाभ मिलता है और बम्पर फसलें  उतरती हैं।

इसी लिए हम कहते है ऋषि खेती किसान का गोल्ड मैडल है। 

Wednesday, August 3, 2016

सब्जियों की ऋषि -खेती

 सब्जियों की ऋषि -खेती

जुताई नहीं  ,रासायनिक जहर नहीं ,गोबर नहीं 

घास आदि खरपतवारें जमीन के लिए वरदान हैं इन्हें नहीं मारें। 

मारे इन खेतों को देखिये अनेक प्रकार जंगली , अर्ध जंगली वनस्पतियां ,पेड़ झाड़ियां यहां ऐसी लगी जैसे  कुदरती वनों में देखने मिलती हैं। यह वन नहीं है यह हमारा कुदरती खेत है। कुदरती खेती से पूर्व हम जुताई आधुनिक वैज्ञानिक खेती का अभ्यास करते थे जिसके कारण हमारे खेती मरुस्थल में तब्दील हो गए थे। इस कारण हमे खेती में बहुत घाटा हो रहा था। हम  कर्ज में फंस गए थे। जैसे  जुताई  कुदरती खेती का पता चला  जुताई ,गोबर की खाद और जहरीले रसायनों  उपयोग बंद दिया। ऐसा करने से से खेत एक साल में हरियाली से  ढँक गए थे। 
क्ले (जैविक खाद ) से बीज गोलियां को बनाना

हम इस हरियाली के बीच बीज गोलिया बना कर या सीधे बीजों को फेंक कर हरियाली को काट कर वहीं बिछा  देते थे। बिछावन इस प्रकार बिछाई जाती है की नीचे तक रौशनी रहे जिसके सहारे नन्हे पौधे बिछावन से बाहर निकल जाते हैं। धीरे इस हरियाली के मध्य से न जाने कितने पेड़ निकल आये और हमारे खेत घने ऊंचे पेड़ों से ढँक गए।  जिनसे हमे हर प्रकार का फायदा मिलने लगा है। 

यह खेती सब्जियों और दालों के लिए वरदान हैं हम बीजों को क्ले (जैविक खाद ) में मिला कर बीज गोलियां तैयार कर लेते हैं। जिन्हें खरपतवारों के बीच यहना वहां बिखरा देते हैं जरूरत पड़ने पर खरपतवारों को काट कर बीज गोलियों के ऊपर फेल देते हैं।  इस प्रकार आसानी से बिना कुछ किये बुआई का काम बिना मशीन ,  जहरीले रसायनों और गोबर के हो जाता है। 

बीज गोलियों को सूखे या गीले घास आदि से ढांकना

आजकल जैविक खेती का बहुत हल्ला है अनेक किसान जुताई कर रसायनों के बदले जैविक खाद बना कर डालते हैं अनेक प्रकार की जैविक खाद अब बाजार में मिलने लगी हैं किन्तु उन्हें मालूम नहीं है की जुताई करना 
खेती में सबसे बड़ा घातक अजैविक काम है इसके चलते खेत और फसलें  कभी जैविक नहीं बन सकते  हैं। 

बिना जुताई की कुदरती सब्जियां
 खेतों में जैविक खाद बना कर डालना या खरीद कर डालना गैर जरूरी काम है जुताई नहीं करने से खेत का कीमती खाद का बहना  रुक जाता है खरपतवारों को वापस जहां का तहाँ डाल  भर देने से खाद की आपूर्ति हो जाती है और बरसात का जल खेतों में समा जाता हैं जिसके कारण सिंचाई भी गैर जरूरी हो जाती है भूमिगत जल स्तर में बहुत इजाफा होता है।