Sunday, September 11, 2016

ग्राउंड कवर क्रॉप

ग्राउंड कवर क्रॉप 


खरपतवारों के बारे में भ्रांतियां 


जारो सालो से जब से मानव ने जुताई आधारित खेती को करना सीखा है तब से किसानों और खरपतवारो के मध्य दुश्मनी चल रही है।

अधिकतर किसान और कृषि वैज्ञानिक यह मानते हैं की खरपतवारें हमारी फसलों का खाना खा लेती हैं इसलिए पैदावार प्रभावित होती है इसलिए वो चुन चुन कर उन्हें निकालते  रहते हैं।

जबकि कुदरती सत्य यह है की खरपतवारें (ग्राउंड कवर क्रॉप ) जमीन का सुरक्षा कवच है। इसलिए हम धरती माता की पूजा करते हैं इसके पीछे सत्य यह है की धरती माता हमारे शरीर के माफिक जीवित है वह  हमारे शरीर की तरह खाती  पीती है और साँस लेती है।
जापान के मस्नोबू फुकुओका जी द्वारा लिखी उनके
अनुभवो पर आधारित किताब 

खरपतवारें धरती माता को हरियाली से ढांक  लेती हैं जिस से धरती की समस्त जैव -विविधताएं सुरक्षित होकर तेजी से पनपती है जो धरती को पोषकता प्रदान करते हुए उसे उर्वरक और पानीदार बना देती है। इस ढकावन  के कारण धरती  धूप ,ठण्ड , बरसात और तेज हवाओं से सुरक्षित हो जाती है।

किन्तु जब किसान खरपतवारों को दुश्मन समझ कर जमीन को खूब जोतता और बखरता है तो भूमि कणो का आपसी सम्बन्ध टूट जाता है वे बिखर जाते हैं जो हवा और पानी से बह और उड़ जाते हैं। इस से जमीन की आधी ताकत एक बार की जुताई से नस्ट हो जाती है और खेत मरुस्थल में तब्दील हो जाते है।

मरुस्थली खेत में बिना सिंचाई ,उर्वरक खाद के फसलों का उत्पादन नहीं होता है और और जो होता है वह प्रदूषित रहता है।

जुताई के कारण  बारीक मिटटी बरसात के पानी के साथ मिल कर कीचड में तब्दील हो जाती है जिसके कारण बरसात का पानी जमीन में सोखा नहीं जाता है वह  तेजी से बहता है अपने साथ मिट्टी (जैविक खाद ) को भी बहा  कर ले जाता है।

मरुस्थली जमीन में गैर-कुदरती ,बे स्वाद ,रोग पैदा करने वाली फसलें पैदा होती हैं। आज जितने भी हम वृक्ष विहीन रेगिस्तान देख रहे है वो सभी जमीन की जुताई आधारित खरपतवारों को मारकर की जाने वाली खेती के कारण है।

यही कारण है की आज कल बिना जुताई की खेती का चलन  शुरू हो गया है। जिसमे बिना जुताई की कुदरती खेती का पहला स्थान है। 

Monday, September 5, 2016

स्कूली बच्चों की आत्म हत्या ?

स्कूली बच्चों की आत्म हत्या ?

हम पैदा होते ही हैं स्कूल जाने के लिए 

सीखने की आज़ादी होना चाहिए 


मारे पैदा होते ही हम पर अनेक प्रकार के बंधन डलने  लगते हैं जिसमे सब से बड़ा बंधन  हमारी शिक्षा को लेकर होता है।  माता पिता बच्चों  के पैदा  होते ही उसके भविष्य के प्रति चिंतित होने लगते हैं और उनके सामने स्कूल के आलावा कोई विकल्प नहीं रहता है इसलिए हमे मजबूरन स्कूलों के हवाले कर दिया जाता है और हम स्कूल के गुलाम हो जाते हैं।
महाराष्ट्र में 2014 में  ८००० बच्चों ने आत्म  हत्या कर ली है। 

स्कूल चाहे कोई भी उसे भी अपने भविष्य की चिंता रहती है इसलिए वह भी स्कूली सिस्टम के गुलाम हो जाते हैं उन्हें वही पढ़ाना  पड़ता है जिसे सिस्टम चाहता है।  पढ़ाई के सिलेबस  भी इस सिस्टम के अनुसार तय किए जाते हैं।  अधिकतर यह सिस्टम पूंजीपति घरानो के अधीन रहता है।  ये घराने हमेशा अपनी पूँजी बढ़ाने के लिए बाजार खोजते रहते हैं और एक दिन हमारी पढ़ाई का पूरा सिस्टम हमारे सहित इस बाजार की भेंट चढ़ जाता है।
बाजार में कोई यह नहीं देखता कि क्या  सही है की क्या गलत है वहां तो खरीदने और बेचने के लिए कीमतों का खेल चलता है सस्ता खरीदो और महंगा बेचो। इस खेल का दबाव हमारे स्कूली बच्चों और पेरेंट्स पर आ जाता है।
पेरेंट्स महँगे और महंगे स्कूलों को हमारे बच्चों के भविष्य के खातिर ठीक समझते हुए उन्हें दाखिला दिलाते  रहते हैं।
जितने महंगे स्कूल होते हैं उतनी महंगी पढ़ाई बन जाती है जिसको अधिक से अधिक नम्बरों की जरूरत रहती है। जो जितने अधिक नंबर लाएगा वही  आगे जाता है।

इस प्रकार एक ओर  पेरेंट्स और  फीस के चक्कर  में उलझ जाते हैं वहीं हमारे बच्चे और अधिक नंबर के चक्कर में उकझ जाते है।  इसी दबाव के चलते बच्चों पर आत्म हत्या करने के के आलावा कोई रास्ता  नहीं बचता है। ऐसा नहीं है की यह दवाब केवल बच्चों पर ही रहता है पेरेंट्स भी इसके शिकार  हो जाते है। बच्चे अच्छे नम्बर नहीं ला पाये इस लिए  अनेक पेरेंट्स भी आत्म हत्या कर लेते हैं।

किन्तु यदि हम हमारे समाज के सफल लोगों की तरफ देखें चाहे  वे अच्छे खिलाडी बने है ,अच्छे कारोबारी बने हैं,अच्छे अभिनेता बने हैं ,अच्छे डॉ या वकील बने हैं किसान बने हैं।  उनका आधार अच्छे नंबर नहीं रहा है वे सभी अपनी प्रतिभा के अनुसार अच्छे बने हैं। उनकी अच्छाई के पीछे उनकी सीखने की आज़ादी रही है।

सीखने की आज़ादी में बच्चा बेफिक्र होकर वह सब सीखता है जिसमे उसकी रूचि होती है यही उसकी असली पढ़ाई रहती है।  रूचि जिसे हम पागलपन भी कह सकते। जब रूचि का चस्का लगता है वह बच्चा उठते बैठते सोते खाते  पीते वही  सोचता रहता है जिसकी रूचि उसमे है। इस पागलपन में वह सफल हो जाता है।  कभी निराशा नहीं आती वह आत्म हत्या के बारे में कभी सोच ही नहीं सकता है।  वरन वह यह  सोचता है की मेरे काम जल्दी निपट जाये ऐसा न हो की में बूढा हो जाऊं और  फिर इस काम को ना कर सकूँ।

इसलिए हमे हमारे बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए हमे उनको उनकी रूचि के अनुसार सीखने की आज़ादी के साथ साथ सहयोग करने की जरूरत है। इसमें शुरुवाद पेरेंट्स को करना चाहिए फिर हमारे स्कूलों को भी इसी प्रकार की शिक्षा और सिलेबस तैयार करना चाहिए  जिसमे हमारे समाज को  भी पूरा पूरा  सहयोग करने की जरूरत है।

आजकल नो स्कूल या होम स्कूल की अवधारणा प्रबल हो रही है जिसमे बच्चों को अपने आप सीखने दिया जाता है।  उन्हें कुछ सिखाने  की कोशिश नहीं की जाती है किन्तु ऐसा नहीं है को बच्चों को इसमें लावारिश छोड़ दिया जाता है ,जब बच्चा कुछ पूछता है या सीख्नने लिए आग्रह करता है उस पेरेंट्स उसे मदद करते हैं जिसमे दबाव बिलकुल नहीं रहता है। उदाहरण के लिए जब बच्चा पूछता है की रेल कैसे चलती है तो हमे उसे रेल कैसे चलती है बताना जरूरी हो जाता है।  इसके लिए यह जरूरी नहीं है हमे भी जाने की रेल कैसे चलती है। हमे उसे ऐसे स्कूल में ले जाने की जरूरत जहाँ से वह सीख सके की रेल कैसे चलती है। इस प्रकार अनेक आयाम  हो सकते हैं।

तमाम परम्परगत स्कूल हमारे कुदरती ज्ञान प्राप्ति में बाधक है उनमे रहकर हमारे बच्चों का दिमाग खराब हो रहा है क्योंकि जो बच्चा सीखना चाहता है उसे वह नहीं सिखाया जाता है इसलिए उसका दिमाग खराब हो जाता है।  वह गलत दिशा पकड़ लेता है जिसका आभास पेरेंट्स और टीचर दोनों को नहीं होता है।

इसलिए हम पेरेंट्स और बच्चों  को सलाह देते हैं की वो जितनी जल्दी हो सके रूचि रहित शिक्षा से बाहर निकल  लें और उन्हें रूचि सहित शिक्षा प्राप्त करें।  यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है किन्तु इसके लिए  जरूरी है रूचि रहित स्कूलों को छोड़ने की, जब तक आप रूचि रहित स्कूल नहीं छोड़ेंगे आप रूचि सहित शिक्षा  नहीं प्राप्त कर सकते हैं।

आत्म-हत्या करने से अच्छा है बच्चे स्कूल छोड़ने का विकल्प चुने पेरेंट्स को बच्चों के इस निर्णय में सहयोग करने की जरूरत है।

rajuktitus@gmail.com




Tuesday, August 23, 2016

धरती माता का लहू बह रहा है , खेत और किसान मर रहे हैं। बिना जुताई की कुदरती खेती अपनाये।

धरती माता का लहू बह रहा है , खेत और किसान मर रहे हैं।
बिना जुताई की कुदरती खेती अपनाये। 


ज कल बरसात के दिन हैं सभी जगहों पर नदी नालो डबरों में मटमैला पानी नजर आ रहा है। पानी जो बरसता है  बिलकुल साफ़ रहता पर यह मटमैला क्यों हो जाता है ? यह धरती माता के लहू के कारण हो जाता है जिसे हम क्ले (कीचड ) कहते हैं। यह क्ले असली "कुदरती खाद "है। जब हम इस क्ले  का सूख्स्म अध्यन करते हैं तो हमे पता चलता है की इस में असंख्य जमीन को उर्वरकता  प्रदान करने वाले सूक्ष्म जीवाणु है। आज तक किसी वैज्ञानिक ने क्ले के एक कण में कितने और कौन कौन से जीवाणु है का पता नहीं लगा पाया है।
 जापान के जग प्रसिद्ध सूक्ष्म जीवाणु  वैज्ञानिक और कुदरती खेती के किसान  स्व. मस्नोबू फुकुओकाजी ने इसके महत्व को जान कर "बिना जुताई की कुदरती खेती "का आविष्कार किया  है। जिसके कारण जुताई आधारित आधुनिक और देशी खेती करने की तकनीकें हमारे पर्यावरण के लिए बहुत घातक सिद्ध हो गयी हैं।
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धरती माता का लहू बह रहा है। 
बिना -जुताई की कुदरती खेती जिसे हम भारत में पिछले ३० सालो से कर रहे हैं।  हम अपने खेतों में फसलों को उगाने के लिए अनेक बीजों को क्ले में मिलाकर करीब आधे इंच की व्यास की गोलियां बना लेते हैं। जिन्हें एक वर्ग मीटर में 10 गोलियों के हिसाब से बिखरा देते हैं।

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सीड बॉल से ऊगता नन्हा पौधा

इस प्रकार धरती माता का लहू बहना  रुक जाता है और खेत ताकतवर और पानीदार हो जाते है जिस से बिना खर्च और महनत  के बम्पर  फसल मिलती है।
क्ले से बनी सीड बॉल्स 

Monday, August 22, 2016

किसान का गोल्ड है :ऋषि खेती

किसान का गोल्ड है :ऋषि खेती 


ब से भारत में "हरित क्रांति " के नाम से गहरी जुताई ,जहरीले रसायनों ,भारी  सिंचाई ,और मशीनों से खेती की जा रही है तब से एक ओर  जमीन बंजर हो रही हैं और किसान गरीब होते जा रहे हैं।

ऋषि खेती बिना जुताई ,बिना खाद और दवाइयों से की जाने वाली खेती है इसमें भारी  सिंचाई और मशीनों की भी जरूरत नहीं है। इस खेती का आविष्कार जापान के जग प्रसिद्ध सूक्ष्म जीवाणु के जानकार और कुदरती खेती के किसान ने किया है। पूरे विश्व में कुदरती खेती ( नेचुरल फार्मिंग ) के नाम से  है।

भारत में हमे इस खेती को करते करीब तीस साल हो गए हैं। इन तीस सालों  में हमने कभी भी जुताई नहीं की है ना  ही कोई जहरीला रसायन डाला है ना ही हमने जैविक खाद का कोई उपयोग किया है। असल में ऋषि खेती कुदरती रूप से पैदा होने वाली वनस्पतियों के साथ और उनके तरीके से की जाती है। जैसे कुदरती वनों और चरोखरों में देखने को  मिलता है।
कुदरती वनों में बीज जमीन पर पड़े रहते हैं जो अपने आप सुरक्षित  और जमीन की ऊपरी सतह अनुकूल मौसम आने पर ऊग आते हैं इसी प्रकार हम सीधे बीजों को फेंक कर या क्ले (  खेतों और जंगलों से बह  कर निकलने वाली चिकनी मिटटी जिस से मिटटी  बर्तन बनाये जाते है। ) में कोटिंग कर सीड बाल बना कर बिखराते देते हैं।  यह प्रक्रिया ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार जंगली बीज गिर जाते हैं।  सीड बाल से बीजों  की सुरक्षा हो जाती है जो मौसम आने पर ऊग आते हैं।

हम खरपतवारों को मारते नहीं है यह जमीन के सुधार में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। इनके साथ अनेक कुदरती जैव-विविधताएं रहती है जो जमीन में जल का  प्रबन्ध करती हैं ,फसलों की रक्षा करती हैं और पोषक तत्व प्रदान करने का काम करती है।
बीन जुताई की सोयाबीन की फसल 
इस कुदरती प्रबंध के कारण खेत बहुत ताकतवर हो जाते हैं उनमे ताकतवर फसलें पनपती है  जिनमे कोई रोग नहीं लगता है। इस कारण किसान को लागत  और श्रम का बहुत लाभ मिलता है और बम्पर फसलें  उतरती हैं।

इसी लिए हम कहते है ऋषि खेती किसान का गोल्ड मैडल है। 

Wednesday, August 3, 2016

सब्जियों की ऋषि -खेती

 सब्जियों की ऋषि -खेती

जुताई नहीं  ,रासायनिक जहर नहीं ,गोबर नहीं 

घास आदि खरपतवारें जमीन के लिए वरदान हैं इन्हें नहीं मारें। 

मारे इन खेतों को देखिये अनेक प्रकार जंगली , अर्ध जंगली वनस्पतियां ,पेड़ झाड़ियां यहां ऐसी लगी जैसे  कुदरती वनों में देखने मिलती हैं। यह वन नहीं है यह हमारा कुदरती खेत है। कुदरती खेती से पूर्व हम जुताई आधुनिक वैज्ञानिक खेती का अभ्यास करते थे जिसके कारण हमारे खेती मरुस्थल में तब्दील हो गए थे। इस कारण हमे खेती में बहुत घाटा हो रहा था। हम  कर्ज में फंस गए थे। जैसे  जुताई  कुदरती खेती का पता चला  जुताई ,गोबर की खाद और जहरीले रसायनों  उपयोग बंद दिया। ऐसा करने से से खेत एक साल में हरियाली से  ढँक गए थे। 
क्ले (जैविक खाद ) से बीज गोलियां को बनाना

हम इस हरियाली के बीच बीज गोलिया बना कर या सीधे बीजों को फेंक कर हरियाली को काट कर वहीं बिछा  देते थे। बिछावन इस प्रकार बिछाई जाती है की नीचे तक रौशनी रहे जिसके सहारे नन्हे पौधे बिछावन से बाहर निकल जाते हैं। धीरे इस हरियाली के मध्य से न जाने कितने पेड़ निकल आये और हमारे खेत घने ऊंचे पेड़ों से ढँक गए।  जिनसे हमे हर प्रकार का फायदा मिलने लगा है। 

यह खेती सब्जियों और दालों के लिए वरदान हैं हम बीजों को क्ले (जैविक खाद ) में मिला कर बीज गोलियां तैयार कर लेते हैं। जिन्हें खरपतवारों के बीच यहना वहां बिखरा देते हैं जरूरत पड़ने पर खरपतवारों को काट कर बीज गोलियों के ऊपर फेल देते हैं।  इस प्रकार आसानी से बिना कुछ किये बुआई का काम बिना मशीन ,  जहरीले रसायनों और गोबर के हो जाता है। 

बीज गोलियों को सूखे या गीले घास आदि से ढांकना

आजकल जैविक खेती का बहुत हल्ला है अनेक किसान जुताई कर रसायनों के बदले जैविक खाद बना कर डालते हैं अनेक प्रकार की जैविक खाद अब बाजार में मिलने लगी हैं किन्तु उन्हें मालूम नहीं है की जुताई करना 
खेती में सबसे बड़ा घातक अजैविक काम है इसके चलते खेत और फसलें  कभी जैविक नहीं बन सकते  हैं। 

बिना जुताई की कुदरती सब्जियां
 खेतों में जैविक खाद बना कर डालना या खरीद कर डालना गैर जरूरी काम है जुताई नहीं करने से खेत का कीमती खाद का बहना  रुक जाता है खरपतवारों को वापस जहां का तहाँ डाल  भर देने से खाद की आपूर्ति हो जाती है और बरसात का जल खेतों में समा जाता हैं जिसके कारण सिंचाई भी गैर जरूरी हो जाती है भूमिगत जल स्तर में बहुत इजाफा होता है।

Sunday, July 10, 2016

बाढ़ में सूखा

बाढ़ में सूखा 

पानी गिरा  नहीं की बाढ़ आ गयी और कुओं में पानी नहीं 


जंगल काट कर खेत बना दिए अब बरसात का पानी जमीन के अंदर नहीं जा रहा है इसलिए सूखा और बाढ़ दोनों कहर ढा रहे हैं। 

बिना-जुताई  बिना जल- भराई  की खेती है समाधान। 

जलभराव के कारण भूमिगत जल  आ रही है। 
ध्य प्रदेश में पिछले कुछ सालो से कृषि कर्मण्य पुरूस्कार मिल रहा है। इसका मतलब यह है। हम खाद्यानो में आत्म निर्भर हो गए हैं। 

कल मेरे एक मित्र न कहा  की हमने एक गढ्डे को पूरने के लिए अनेक गढ्डे बना दिए हैं। 

जंगल काट कर खेत बनाना  अब हमको बहुत महंगा पड़ने वाला है। पिछले हजारों सालो से हम हरियाली के कारण पर्यावरण में आत्म निर्भर थे ,हवा ,पानी और हमारी फसलों में कोई कमी नहीं थी।  फिर भी हमने "हरित क्रांति " नामक औद्योगिक खेती को अपना कर हमे पर्यावरणीय भिखारी  बना लिया है। 

एक तो यह समस्या है कि  बादल आ रहे हैं पर बरस नहीं रहे थे और जब बरसे तो दो दिन में इतना बरसे कि बाढ़ ने कहर ढा दिया।  असल मे यह बरसात कोई काम की नहीं है पानी  सब बह कर समुद्र में चला जाता है। इसका मूल सम्बन्ध खेती करने की गैर कुदरती तकनीकी है जो पेड़ों की कटाई ,जमीन की जुताई ,जल-भराई जहरीले रसायनों और भारी मशीनों से की जा रही है।
उथले कुओं का पानी स्वास्थ  वर्धक रहता है। 

परंपरागत भारतीय खेती किसानी में पहले हर किसान अपने खेतों में पेड़ रखता था जिस भूमिगत  जल और बादलों के बीच सम्बन्ध स्थापित रहता था। जिस कुदरती जल चक्र बना रहता था। समय पर बरसात आती थी जो कम से कम  चार माह तक रहती थी। किन्तु हरित क्रांति मात्र कुछ सालों में स्थिति इतनी गम्भीर हो जयेगी इसका अनुमान किसी ने नहीं लगाया था। 

अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं हम अपने इलाके को लातूर और बुंदेलखंड बंनने से बचा सकते हैं हमे केवल बिना जुताई  की खेती पर जोर देने की जरूरत है। बिना जुताई  की खेती से खेत  हरियाली से भर जाते  और कृषि  उत्पादन भी बढ़ता जाता है। इस से बरसात का पानी खेतों के द्वारा सोख लिया जाता है।  भूमिगत जल का स्तर हर साल बढ़ता जाता है ,जिस से उथले कुएं लबालब हो जाते हैं। 


Monday, June 20, 2016

सीड बॉल (बीज गोलियां )

सीड बॉल (बीज गोलियां )

सीड बॉल क्या है ?

बीजों को जब क्ले मिटटी की परत से १/२ इंच से लेकर १ इंच तक की गोल गोल गोलियां से सुरक्षित कर लिया जाता है उसे सीड बॉल कहते हैं।

सीड बॉल का क्या उपयोग है ?

सीड बाल का उपयोग बिना जुताई ,बिना जहरीले रसायनों और बिना गोबर के कुदरती खेती करने और मरुस्थलों को हरियाली में बदलने के लिए उपयोग में लाया जाता है।
जुताई से क्या नुक्सान है ?
जुताई करने से बरसात का पानी जमीन के अंदर नहीं जाता है वह तेजी से बहता है।   खेतकी खाद /मिट्टी को बहा कर ले जाता है इस कारण खेत कमजोर हो जाते हैं। सूखा और  बाढ़ का यही मूल कारण है।

क्ले क्या है ?

क्ले मिटटी है जो मिटटी के बर्तन और मूर्ती आदि को बनने में उपयोग में लाई जाती है। जो तालाब की तलहटी ,नदी ,नालों के किनारे जमा पाई जाती है।

तालाब की चिकनी मिट्टी (क्ले )
क्ले की क्या खूबी है ?

 यह सर्वोत्तम खाद होती है। यह बहुत महीन ,चिकनी होती है।  इसकी गोली बहुत  कड़क मजबूत बनती है।  जिसे चूहा ,चिड़िया तोड़ नहीं सकता है। इसमें बीज पूरी तरह सुरक्षित हो जाता है। इस मिट्टी में असंख्य जमीन को उर्वरता और नमी प्रदान करने वाले सूख्स्म जीवाणु रहते हैं। इसके एक कण  को  सूख्स्म दर्शी यंत्र से देखने पर इसमें सूख्स्म जीवाणुओं आलावा निर्जीव कुछ भी नहीं रहता है।

क्ले की क्या पहचान है ? 

जब हम इस मिटटी की बनी सूखी या गीली गोली को पानी में डालते हैं यह दूसरी मिटटी की तरह बिखरती नहीं है।

क्ले से बनी सीड बॉल का क्या फायदा है ?

यह गोली आम जंगली बीजों की तरह जमीन पर पड़ी रहती है बरसात या अनुकूल मौसम आने पर ऊग आती है।
क्ले की जैविकता तेजी से पनप कर नन्हे पौधे को पर्याप्त पोषक तत्व प्रदान कर देती है। जिस से बंपर उत्पादन मिलता है।


सीड बॉल की खोज किसने की है ?

सीड बॉल की खोज जापान के सूख्स्म जीवाणु विशेषज्ञ स्व. मसनोबु फुकुोकजी ने की है वे अनेको साल इस से बिना जुताई की कुदरती खेती करते रहे हैं।  उनकी पैदावार आधुनिक वैज्ञानिक खेती से बहुत अधिक उत्पादकता और गुवत्तावत्ता  वाली पाई  गयी है।  इसके आलावा जहां वैज्ञानिक  खेती से फसले  ,मिटटी ,पानी और हवा में जहर घुलता है, और सूखा पड़ता है । कुदरती खेती में इसके विपरीत परिणाम आते हैं।  जमीन उर्वरक, पानीदार और हरयाली से भर जाती है।

भारत में इस तकनीक से कौन खेती कर रहा है ?

भारत में अनेक लोग इस विधि से खेती करते है किन्तु हमने इसे सबसे पहले अपनाया है इसलिए भारत  में यह इस विधि का प्रणेता फार्म के रूप में जाना जाता है। हम इसे ऋषि खेती के नाम से करते हैं।
टाइटस फार्म होशंगाबाद म.प्र. पेड़ों और खरपतवारों के साथ
 चावल की खेती 

सीडबाल से फसलों को उगाने में क्या फायदा है ?

इसमें लागत और श्रम बहुत  कम हो जाता है। इसे कोई भी महिला या बच्चा कर सकता है। फसल और खेत की गुणवत्ता में हर साल इजाफा होते जाता है। बरसात का पानी खेत के द्वारा सोख लिया जाता है।भूमि छरण ,जैव -विविधताओं का छरण रुक जाता है। मरुस्थल हरियाली में तब्दील हो जाते हैं।  कुदरती फसलों का सेवन करने से कैंसर जैसी बीमारी भी ठीक हो जाती है।फसलों का स्वाद बहुत बढ़ जाता है।

जुताई नहीं करने से नींदों की समस्या आएगी उसके लिए क्या करना है ?

हर वनस्पति जो कुदरत उगाती है वह काम की रहती है। उसे मारने से वह उग्र रूप धारण  कर लेती है नहीं मारने से वह नियंत्रित हो जाती है और फसलों की दोस्त बन जाती है।  कोई भी वनस्पति कुछ लेती नहीं है वरन देती है। भूमि सुधार के लिए खरपतवारों का होना जरूरी है। खरपतवारों के ढकाव में असंख्य जीव जंतु ,कीड़े ,मकोड़े ,केंचुए आदि रहते हैं जिनके निवास से भूमि की उर्वरता और नमी में जबरदस्त इजाफा होता है। किसी भी प्रकार की खाद की जरूरत नहीं रहती है।

क्ले के साथ यदि हम यूरिया और गोबर को मिला दें तो ताकत और बढ़ जाएगी या नहीं ?

क्ले को कुदरत ने बनाया है यूरिया और गोबर की खाद मानव निर्मित है जो कुदरत बनाती है वह मानव नहीं बना सकता है। इसलिए ताकत कम हो जाती है।

फसलों पर जब बीमारिया आती है तो क्या करते हैं ?

जुताई करने से जुती बखरी बारीक मिटटी कीचड़ में तब्दील हो जाती है इसलिए बरसात का पानी खेत के द्वारा
सोखा नहीं जाता है वह तेजी से बहता है अपने साथ खेत की खाद को भी बहा कर ले जाता है। इसलिए खेत कमजोर हो जाते हैं ,कमजोर खेत में कमजोर फसलें पैदा होती है। इसलिए बीमारियां लग जाती है। दवाइयों के उपयोग से बीमारियां बहुत बढ़ जाती है जैसे कैंसर किन्तु जुताई नहीं करने के कारण खेत ताकतवर हो जाते है उनमे ताकतवर फसलें पैदा होती है। इसलिए रोग नहीं लगते हैं और यदि कोई रोग आता है तो वह  कुदरती ताकत से ठीक हो जाता है। नींदे भी बीमारियों रोकने में सहायक रहते हैं।

सीडबॉल से कौन कौन सी फसल/पेड़ आदि  ऊगा सकते हैं ?

सीडबाल से जंगली पेड़,अर्धजंगली पेड़ ,फलदार पेड़,चारे के पेड़ ,अनाज सब्जियां आदि सब एक साथ ऊगा सकते हैं। इस तकनीक में फसलों पर छाया का असर नहीं होता है। इस प्रकार बहुत कम जगह से बहुत अधिक
पैदावार ली जा सकती है।

क्या इस तकनीक से रेगिस्तानों को हरा भरा बनाया जा सकता है ?

फुकुोकजी ने ऐसे प्रयोग किये हैं सीड बॉल से जहां बारिश होना बंद हो गयी थी चारा और खाने को नहीं था को हरा भरा बना दिया जिस से बारिश भी होने लगी है।  वो कहते हैं यदि हमे जल्दी अपने रेगिस्तानों को हरा भरा बनाना है तो हम हवाई जहाज से सीडबाल का छिड़काव कर सकते हैं।

क्या  हम छतों पर या अपनी आँगन बाड़ी में सीडबाल का उपयोग कर सकते हैं ?

समान्यत: आंगनबाड़ी या छतों पर फसलों को उगाने के लिए मानव निर्मित खादों का उपयोग किया जाता है जिस के कारण बहुत बीमारियां आती है यदि इसमें क्ले की बनी सीड बाल का उपयोग किया जाता  है और अनेक वनस्पतियों को एक साथ उगाया जाता है तो बीमारियां नहीं लगाएंगी और हमे कुदरती आहार मिल जायेगा।

सीडबाल को बड़े पैमाने पर बनाने के लिए  क्या करना चाहिए ?

बड़े पैमाने पर हम सीड बॉल को बनाने के लिए मुर्गा जाली का इस्तमाल करते हैं। बीज और क्ले को पांवों से गूथ कर मुर्गा  जाली से उसके छोटे छोटे टुकड़े गिरा  लेते हैं  जिन्हे थोड़ा फरका  होने देते हैं फिर गोल बड़े बर्तन में  गोल गोल घुमा लेते है जिस से गोलियां बन जाती है।  और बड़े पैमाने पर हम कंक्रीट मिक्सर का उपयोग कर असंख्य गोलिया मिनटों में बना सकते है।

क्या सीड बाल को बनाना प्रतिदिन की पूजा पाठ ,व्यायाम ,योगा की तरह है ?

जी हाँ बल्कि उस से भी अच्छा है इसे हर कोई घर में प्रति दिन की गतिविधि बना सकता है यह भी पूजा पाठ ,योग और व्यायाम की तरह है।  क्ले मिटटी को हाथ लगाना बहुत अच्छी गतिविधि है इस से पूरा शरीर लाभान्वित हो जाता है। प्रतिदिन घर में आने वाली सब्जियों में बहुत बीज रहते है उन्हें इकट्ठा करके हम बीज गोलियां बनाते  रहे और सुखा  कर स्टोर कर लें जब मौसम आये तो उन्हें बगीचे में बिखरा भर देने से फसलों का उत्पादन हो जाता है।

क्ले कहां से मिलेगी ?

पुराने तालाब से जब पानी सूख जाता है, नदी ,नालों की कगार से।

सीडबाल कैसे बनाए ?

बड़े पैमाने पर सीड बाल बनाने के लिए सूखी क्ले को बारीक कर उसमे बीज मिला ले आटे की तरह पाँव से गूंथ ले फिर एक मुर्गा जाली की फ्रेम बनाकर छोटे छोटे टुकड़े काट लें फिर जब वो फर्के हो जाएँ उन्हें हाथों से गोल करले। ध्यान ये रहे की एक १/२ इंच व्यास गोली में एक दो ही बीज रहे।

छोटे पैमाने पर तो यह अच्छा रहता है की क्ले को बारीक कर आटे  की  वाली छलनी से छान  कर रख लें फिर जितने बीज हों उनके 7  भाग मिटटी को आंटे को मिलाकर गूंथ लें फिर हाथ से गोलिया बनाकर सुखा कर रखले
जब अच्छी बारिश हो जए तब उन्हें बिखरा दें एक वर्ग मीटर में करीब १० गोली का हिसाब थी रहता है। बरसात में सीधे गीली गोलियों को बिखराया जा सकता है।बहुत बड़े पैमाने पर कांक्रीट मिक्सर का भी इस्तमाल किया जाता है।
 यह भी तरीका है। --वीडियो

                                         Masanobu Fukuoka Makes Seed Balls 


चिकेन नेट से सीड बॉल बनाने की विधि 
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सीड बॉल बनाने और उगाने की सावधानियां 


१-दाल जाती के बीजों की सीड बॉल बनाते  वक्त बीज फूलने के कारण सीड बॉल फुट जाती हैं इसलिए उन्हें पानी में कुछ समय भीगा कर पहले फुला लेना चाहिए और तुरंत धूप में सुखा लेना चाहिए यदि मौसम सही है तो सीधे फेक लेने चाहिए।
२-कभी कभी ऊगते समय जब सीड बॉल से बीज अंकुरित होने लगते हैं उन्हें चींटी आदि खा लेती हैं ऐसी परिस्थिति में हम सीड बॉल बनाते समय गाजर घास की पत्तियों को पीस कर मिला देते हैं। जिस से चीटियां नहीं खाती हैं। अन्य कोई देशी स्थानीय उपाय भी किया जा सकता है।  एक बार तेज बारिश होने पर चींटी आदि नहीं रहते हैं।
३-सीड बॉल उगाते समय पिछली फसल का स्ट्रॉ बहुत सहायक रहता है।  नीचे सीड बॉल ऊपर स्ट्रॉ कवर सबसे उत्तम उपाय है।  यदि नहीं है तो ग्राउंड कवर को ऊगने देना चाहिए फिर इस कवर में सीड बॉल डाल दिया जा सकता है।
4-  बनाते समय गोली का साइज बीज के अनुसार बड़ा होना  चाहिए मसलन गोली के ऊपर बीज नहीं दिखने चाहिए और गोली चिकनी ,मजबूत बनना चाहिए।

५ -कुदरती खेती में खरपतवार कोई समस्या नहीं रहती है इसलिए सीड बॉल बनाकर डालना एक मात्र काम रह जाता है।
रबी की फसल की नरवाई से ऊगती धान की सीड बाल 

सीड बॉल के फेल हो जाने के कारण 

१- सही क्ले का नहीं होना।
२- बीजों में अंकुरण छमता नहीं रहने के कारण


३- सही मौसम का नहीं होने
४-सीड बाल की सुरक्षा में कमी यानि हरे या सूखे मल्च के ढकाव की कमी
५- सीड बॉल के दो बड़े दुश्मन है पहला कुतरकर खाने वाले जानवर जैसे चूहे,  गिलहरी  और कीड़े आदि

सीड बॉल फेल होने से कैसे बचें 

१- गोली बड़ी और गोल तथा चिकनी होना चाहिए।
२ -गोली को हवादार स्ट्रा पिछली फसल  नरवाई या पुआल से ढका होना चाहिए यदि नहीं है आपातकालीन परिस्थिति में गोली को थोड़ा डिबल  भी किया जा सकता है ,या किसी कुदरती अवरोधक जैसे गाजर घास या नीम आदि का भी उपयोग  सकता है।
३- बारीक बीजों जैसे क्लोवर ,राजगीर (Amranth ) ,गाजर घास आदि ऊगा कर हरा मल्च तैयार किया जा सकता है।
लाल मिर्ची के पाउडर से गोलियों
 का बचाव 
४- बड़े हरियाली के ढकाव  जैसे घास ,गाजर घास आदि के अंदर सीड बाल फेंक कर घास की ऊंचाई और फसल की ऊंचाई के अनुसार कतई की जा सकती है। कटे घास आदि से मल्च  बनता है  जिस से सीड बाल  की सुरक्षा हो जाती है। पिछली फसल की नरवाई /पुआल आदि गोलियों को चिडयों से बचाने में सहयोग करते हैं।
५ - स्तनधारी जैसे चूहे ,गिलहरी ,सुअर को जब पता चल जाता है की बीज गोलियों में बीज हैं तब वे गोलियों को को बहुत नुक्सान पहुंचाते हैं इन से बचाने के लिए गोलियों की ऊपरी सतह पर लाल मिर्ची के पाउडर की परत लगा देने से वो गोलियों को नुक्सान नहीं करते हैं।
धान की पुआल से ऊगती रबी की फसल 

सीड बॉल ही क्यों जरूरी है। 

१-जो बीज जमीन की ऊपरी सतह  से ऊगता है जहां हवा, पोषकता, नमी और पर्याप्त सूर्य की रौशनी रहती है वह शुरू से ताकतवर रहता है। इसलिए जमीन की ऊपरी सतह को खराब नहीं करना चाहिए।
२- जमीन की ऊपरी सतह हमारे पर्यावरण के संवर्धन के लिए बहुत उपयोगी रहती है।

 ३-कृषि में महनत और लागत को कम करने के लिए।
४-  हर हाथ को काम और आराम के लिए।
5- हरियाली ,गरीबी और बीमारीओं को कम करने के लिए।
6-पनपते मरुस्थलों को थामने और पुराने मरुस्थलों को हरा भरा बनाने के लिए।
७ -आत्म -निर्भरता के लिए।