Monday, April 6, 2015

हमारा पर्यावरण और हरित क्रांति

हमारा पर्यावरण और हरित क्रांति

पेड़ों के साथ करें बिना जुताई की "ऋषि खेती "


भारत एक कृषि प्रधान देश के रूप में जाना जाता है।  जिसकी अधिकांश आबादी गाँवों में रहती है जो खेती किसानी पर आश्रित है। किन्तु विगत कुछ सालो  से जब से भारी सिंचाई ,रसायनो और मशीनो का खेती में आगमन हुआ है।  खेती किसानी की आत्मनिर्भरता ,पर्यावरण  और सामाजिक स्थिती में बहुत अधिक कमी आई है। इसके कारण एक और जहां हमारी रोटी जहरीली होती जा रही है वहीं मिट्टी अनुपजाऊ हो रही है और मौसम में परवर्तन हो रहा है जिस से बाढ़ ,सूखा ,ग्लोबल वार्मिंग ,और ज्वर भाटों की समस्या गंभीर हो गयी है। रेगिस्तान पनप रहे हैं ,हवा में जहर घुलने लगा है।

खेती किसानी देश की समृद्धि में एक रीढ़ की हड्डी के समान है जब रीढ़ ही टूट जाएगी तो देश कैसे चलेगा।  आज जो महानगरीय विकास दिख रहा है उसके पीछे खेती किसानी का बहुत बड़ा हाथ है किन्तु जैसे जैसे खेती किसानी कमजोर हो रही है महानगरीय जीवन पर भी उसका असर दिखाई देने लगा है।

दिल्ली जिसे हम देश का दिल कहते हैं में पीने के पानी और सांस  लेने लायक हवा की भारी कमी दिखाई दे रही है यही हाल पूरे देश के महानगरों की है या होने जा रही है। यदि हम सेटेलाइट से देखें तो हमे पूरे देश  में बहुत बड़े भू भाग पर रेगिस्तान या पेड़ विहीन खेत नजर आएंगे। ये वह भूभाग है जो कभी हरियाली से ढंका था जिसे जुताई आधारित खेती किसानी ने नस्ट कर दिया है।

भारतीय प्राचीन परम्परागत खेती किसानी जिसमे खेती पशु पालन, बाग़ बगीचों ,चरोखरों और वनो के सहारे की जाती थी अब लुप्त हो गयी है। प्राचीन खेती में फसलों का  उत्पादन जुताई के बिना या हलकी जुताई से की जाती थी।  जब किसान देखते थे की अब खेत कमजोर होने लगे हैं किसान खेतों को पड़ती कर दिया कर देते थे जिस खेत अपने आप हरियाली से ढक  जाते थे और वे पून : ताकतवर हो जाते थे।

किन्तु मात्र कुछ सालो की रसायन और मशीनो पर आधारित गहरी जुताई वाली खेती ने खेतों को मरुस्थल बना दिया है। यह बहुत गंभीर समस्या है। यही हाल जारी रहा तो वह दिन दूर नही है  की हमे खाने के अनाजों के लाले पड़  जायेंगे।  ऐसा नहीं है की  हमे बहुत अच्छा अनाज खाने को मिल रहा है। यह अनाज जो हम खा रहे हैं यह कमजोर खेतों से रसायनो के बल पर पैदा किया गया है जो स्वाद और गुण रहित है जिसे खाने से अनेक  बीमारियां उत्पन्न हो रही हैं।

आज से २८ साल पहले हम भी आधुनिक वैज्ञानिक खेती जो "हरित क्रांति " के नाम से जानी जाती है करते थे जिस से हमारे खेत भी मरुस्थल में तब्दील हो गए थे। खेत कांस घास से धक गए थे.उथले कुओं का पानी सूख गया था। फसलों की लागत  अधिक  थी आमदनी कम होने के कारण खेती घाटे का सौदा बन गयी थी। हमारे पास खेती को छोड़ने के  सिवाय कोई उपाय नही बचा था।

भला हो जापान के बिना जुताई की  कुदरती खेती के किसान और जग प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक मस्नोबू फुकूओकाजी का जिनके अनुभवों की किताब "दी वन स्ट्रा रिवोलूशन  " का जिस्ने  हमारी आँखे खोल दी इस किताब से हमे पता चला की फसलोत्पादन में हजारों साल से की जाने वाली जमीन की जुताई खेती किसानी में सबसे बड़ा नुक्सान दायक  काम है।  इसके कारण खेत कमजोर हो जाते हैं  और जुताई नहीं करने से खेत ताकतवर हो जाते हैं उनमे खाद और पानी का संचार हो जाता है।

जैसे ही हमे यह बात समझ में आयी हमने जुताई को बंद कर दिया और बिना जुताई करे खेती करने लगे इस से एक और हमारा खेती खर्च घट गया और हमारे खेत पु न : ताकतवर बन गए जिस से हमे कम लागत में गुणकारी फसलें मिलने से खेती लाभ प्रद बन गयी। कुओं में पानी लबालब रहने  लगा।

खेती और उसके पर्यावरण का चोली दामन का साथ है जो खेत में रहने वाली हरियाली पर निर्भर है। खेतों में रहने वाली तमाम वनस्पतियां जिन्हे हम खरपतवार कहते हैं ये , झाड़ियाँ और पेड़ खेत की जान हैं। जुताई करने से खेत की हरियाली नस्ट हो जाती है ,उसकी जैविकता नस्ट हो जाती है ,बरसात का पानी जमीन में नहीं जाता है। रसायन और मशीनी जुताई इस समस्या को तेजी से बढ़ाती है।

बिना जुताई की खेती इस समस्या से निपटने का सबसे सस्ता ,सुंदर और टिकाऊ उपाय है।









Sunday, April 5, 2015

कुदरती शिक्षा

कुदरती शिक्षा 

जकल शिक्षा का मतलब बदल गया है। शिक्षा अब केवल पूंजिपतयों के व्यवसायों को चलाने  के काम की रह गयी है। आधार ,मोबाइल और बैंक खाता जरूरी समझा जा रहा है किन्तु इस से किस को फायदा है इसका लाभ उधोग जगत उठा रहा है।  जो लोग जंगलों में रह रहे हैं महानगरीय शिक्षा से वंचित हैं वे फिर भी सुखी हैं। वो कुदरती खान पान और हवा का सुख भोग रहे हैं किन्तु जो लोग महानगरों में  है वे कुदरती खान पान से तो वंचित हैं तथा बेरोजगारी ,गरीबी और महामारियों के बोझ तले  दबे हैं।

इसका मतलब यह नहीं है की जंगलों में रहने वालों को शिक्षा नहीं मिलना चाहये यह उनका जन्म सिद्ध अधिकार है किन्तु यदि वह नहीं मिल रही है तो उनको चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि शिक्षा का अब मतलब बदल गया है।  सबसे अच्छी शिक्षा हमारे अपने पर्यावरण  के अनुकूल हमारे रहन सहन  और अपनी मात्र भाषा के अनुसार हमारे लिए होना चाहये। महानगरों में जो अंग्रेजी जानता  है वही  पढ़ा लिखा समझा जाता है यह गलत है। इस से हमारा शोषण हो रहा है।

जंगल आज भी  आत्मनिर्भर महाज्ञान से भरे हैं हमे उसे सही तरीके से जी सकें उसमे ही हमारी भलाई है हमे महानगरों की और ललचाई निगाह से ताकने की जरूरत नहीं है जंगल स्वर्ग हैं वहीँ महानगर अब नरक में तब्दील होते जा रहे हैं।

आधुनिक वैज्ञानिक खेती से हजार गुना अच्छी जंगलों में होने वाली बेगा , झूम, बारह अनाजी और उतेरा  खेती हैं।  जिनमे प्रदूषण बिलकुल नहीं हैं इनसे जल वायु संरक्षित रहती है जबकि आधुनिक वैज्ञानिक खेती से जलवायु परवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग पनप  रही है।  इसी प्रकार जंगलों में बीमारी और इलाज नाम की कोई चीज नहीं होती है।  वहां का रहन सहन अपने आप स्वास्थ प्रद है जबकि महानगरों में मलेरिया ,डेंगू ,स्वानफलु ,कैंसर महामारियों बन रही हैं।  नकली डाक्टरों और दवाओं का मकड़जाल जनता को चूस रहा है। जबकि जंगली हवा ,पानी और आहार खुद डाक्टर और दवा हैं।




Saturday, April 4, 2015

पर्यावरणीय संरक्षित भूमि को बचाने की अपील

पर्यावरणीय संरक्षित भूमि को बचाने की अपील 

वन ,स्थाई कुदरती चरोखरों ,बिना जुताई के खेतों और बाग  बगीचों को बढ़ावा दिया जाये। 

कुदरती खान पान और हवा हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है जिस से हम वंचित हो रहे हैं। 

गैर कुदरती खेती ,कल-कारखानो  और वाहनो पर रोक  लगाई  जाये। 

मारे देश में पर्यावरण प्रदूषण ,मौसम परिवर्तन ,गर्माती धरती , ग्रीन हॉउस गैसों का उत्सर्जन ,सूखा और बाढ़ की समस्या दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। इसका सीधा सम्बन्ध जुताई आधारित रासायनिक  खेती , प्रदूषण फैलाने वाले कल कारखानो, तेलचलित वाहनो ,सड़कों और बड़े बांधों से है।

अनेक महानगरों में तो पर्यावरण प्रदूषण इस हद तक बढ़ गया है की लोगों को सांस लेना  दूभर हो गया है। अनेक स्थान ऐसे हैं जहां सूखे के कारण फसलें पैदा होना बंद हो गयी हैं।  अनेक स्थान ऐसे हैं जहां बेमौसम इतनी बरसात हो रही है की लोग आये दिन भूस्खलन और बाढ़ से परेशान हो रहे हैं। ज्वारभाटों के कारण समुद्र के किनारे रहने वाले लोग आये दिन परेशान हो रहे हैं।

इन  समस्याओं की जड़ में पिछले हजारों से चल रहा गैरपर्यावरणीय विकास है। इसी तारतम्य में भारत सरकार ने पुन : विकास के नाम पर नया भूमिअधिग्रहण बिल बनाया है। जिसके माध्यम से अनेक ऐसे काम किए जाने हैं जिनसे हमारा पर्यावरण और अधिक प्रभावित होने वाला है। इन कार्यों के लिए यह दलील दी जा रही है की हमारे देश में किसानो की आर्थिक स्थिती  ठीक नहीं है उन्हें और अनेक पढेलिखे बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध करना सरकार की जवाबदारी  है इसलिए भूमि को अधिग्रहित कर उन पर कल कारखाने आदि लगाये जायेंगे जिस से रोजगार के अवसर उपलब्ध हो सकें।

वैसे सरसरीतोर पर सरकार का यह कहना सही लगता है की जो देश अभी तक हमारे जल,जंगल और जमीन पर आश्रित था वह अब उनकी कमी के कारण समस्यों से ग्रसित हो गया है इसलिए किसानो की  माली हालत और बढ़ते पढे लिखे लोगों की बेरोजगारी की समस्या एक बहुत बड़ी मुसीबत बन गया है उसका हल जरूरी है। किन्तु प्रश्न यह उठता है की क्या हमारे पर्यावरण  की अनदेखी का असर हमारे कलकरखानो और वहां करने वालों पर नहीं पड़ेगा।

 उदाहरण के तोर पर दिल्ली और गुजरात को देखिये जो देश के  सबसे विकसित प्रदेश है वहां पीने का पानी उपलब्ध नहीं है ,सांस लेने के लिए मिलने वाली मुफ्त हवा नहीं मिल रही है। इस समस्या को कलकरखानो से नहीं दूर किया जा सकता है बल्कि  उनसे यह समस्या और बढ़ेगी।

इस समस्या का सीधा और सबसे सरल उपाय यह है की हरियाली को बढ़ाया  जाये जहां कहीं भी हरियाली के साधन उपलब्ध हैं उन्हें बचाने की जरूरत है। जैसे कुदरती वन छेत्र ,स्थाई बाग़ बगीचे ,स्थाई चरोखरें, बिना जुताई के खेत आदि। असल में होना तो यह चाहिए  की पर्यावरणीय इन छेत्रों  को बढ़ावा देने  के लिए सरकार को कुछ प्रलोभन देना चाहिए जो अभी तक सरकार नहीं कर रही है दूसरा सरकार को विकास के लिए उन तमाम छेत्रों को जिनसे हमारा पर्यावरण दूषित हो रहा है जैसे प्रदूषण फैलाने वाले कल कारखाने ,जुताई  आधारित रासायनिक खेती ,बड़े बाँध आदि पर रोक लगाने  जरूरत है।

हम पर्यावरणीय भूमि को अधिग्रहित कर उन्हें प्रदूषित करने वाले कार्यों में  उपयोग लाने  के पक्षधर नहीं है।
कुदरती खान ,पान और हवा हमारा  जन्म सिद्ध अधिकार है उसे हम अब नहीं छोड़ सकते हैं। सरकार को कोई भी भूमि को अधिग्रहित  करने से पूर्व हमे इस बात की गारंटी देने की जरूरत है।






Dan Forgey_Adding Cover Crops to a No Till System

Monday, March 30, 2015

विकास के लिए भूमि सुधार जरूरी है

विकास के लिए भूमि सुधार जरूरी है 

खेती किसानी में  चल रही जमीन की जुताई से खेत मरुस्थल में तब्दील हो रहे हैं


भूमि सुधार के लिए करें पेड़ों के साथ खेती


 हमारे इन कुदरती खेतों को देखें इनमे पक  रही गेंहूँ की फसल सामान्य है।  इन खेतों को पिछले 28 सालों से जोता नहीं गया है। जुताई करने से खेत की जैविकता नस्ट हो जाती है बरसात का पानी जमीन में नहीं जाता है वह तेजी से बहता है अपने साथ खेत की जैविक खाद को भी बहा कर ले जाता है। 

अच्छी  जमीन वही है  जिसमे तमाम जैवविविधताएं रहती है जैसे पेड़ , जीव जंतु सूक्ष्मजीवाणु आदि। इसमें गहराई तक घनी जड़ों का जाल पाया जाता है। इसकी ऊपरी सतह  से नीचे तक हवा और पानी का संचार होता है। बरसात का पानी जमीन के द्वारा सोख लिया जाता है जो वास्प बन एक और सिंचाई का काम करता है और बादल  बन बरसात करवाता है।

अच्छी जमीनो में जैवविविधताएं खूब पनपती है, फसलें भी कुदरती उत्पन्न होती हैं।  यही असली विकास है। आजकल खेती किसानी के लिए जंगल काटे जा  हैं।  विकास के नाम पर कंक्रीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं। 
ऊर्जा के लिए ,सड़कों आदि के लिए जंगलों को तेजी साफ़ किया जा रहा है। खदाने खोदी जा रहीं हैं।  विकास विनाश है। 

इस विनाशकारी  विकास के कारण मौसम परिवर्तन की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गयी है।  जिसके कारण हमारी जमीने ,फसलें तेजी से नस्ट होने लगी हैं। हम अकाल की और बढ़ चले हैं। आज जब हम कुदरती हवा ,आहार और पानी के घरे संकट से गुजर रहे हैं वहीँ बिजली और पेट्रोल  की मांग तेजी से बढ़ रही  है जिससे  सांस लेने लायक हवा और पीने लायक पानी और जीने के लिए कुदरती आहार विलुप्ति की कगार पर है। 


एक ओर जहाँ सरकार की ऊर्जा और धन शहरी मांग को ही पूरा नहीं कर पा रहा है वहीँ इस मांग की आपूर्ति में गैरशहरी छेत्रों का भारी शोषण हो रहा है। जिसे से हरियाली ,हवा ,पानी और आहार के श्रोत समाप्त हो रहे हैं।  किसान खेती छोड़ने लगे हैं।  खेती किसानी में दी जाने वाली सरकारी सहायता ऊँट के मुंह में जीरे के समान है। 

इसलिए अब भूमि सुधार मानवीय हित में सर्वोपरि बन गया है।  भूमि सुधार के लिए जंगलों को संरक्षित किया जाना एक उपाय है किन्तु खेती किसानी में इसके विपरीत कार्य हो रहा है जिस से मरुस्थल तेजी से पनप  रहे हैं। इसलिए पेड़ों के साथ की जाने वाली बिना जुताई की खेती ही सर्वोत्तम उपाय है। 

अधिकतर खेती किसानी के विशेषज्ञ भी यह मानते है की मोटे अनाज की फसलें पेड़ों के साथ नहीं हो सकती है यह एक भ्रान्ति है।  उनका मानना है की छाया के कारण उत्पादन प्रभावित होता है किन्तु वे नहीं जानते हैं की उत्पादन की कमी जमीन की जुताई और पेड़ों की कमी के  कारण है।  

अब जबकि खेतों में पेड़ों की कमी ,जुताई आदि के कारण खेती किसानी संकट में पड़ने लगी है उसको सुधारने के बदले पढ़े लिखे नवजवानों की बेरोजगारी की समस्या बड़ा मुद्दा बन गया है इसके लिए उधोगों को बढ़ावा दिया जा रहा है जिस से भूमि के पूरीतरह बर्बाद होने के आसार बढ़ गए है।  अभी हम आयातित तेल के गुलाम हैं कल हमे खाने के लिए अनाज ,पानी हवा को आयात करना  पड़ सकता है। कोयला ,हवा ,पानी और फसलें सभी पेड़ों के उत्पाद हैं, जिन्हे हम आयात करने लगे हैं इस से खतरनाक बात और क्या हो सकती है। 

बिना जुताई की पेड़ों के साथ होने वाली खेती को हम ऋषि  हैं यह खेती कुदरती सत्य और अहिंसा पर आधारित है। ऋषि खेती नाम गांधी खेती के लिए आचार्य विनोबाजी ने दिया था किन्तु जापान के गांधी श्री मस्नोबू फुकूओकाजी ने इसे वैज्ञानिक सत्य और अहिंसा से जोड़ कर जो विकास का मार्ग प्रस्तुत किया है उसके आलावा अब हमारे पास बचने का की मार्ग नहीं बचा है।  इस मार्ग के कारण हम बचे है इसलिए हम चाहते है की देश भी बचे। 




Monday, March 23, 2015

पलायन करने से अच्छा है पलायन रोकना

छिंदवाड़ा वन ग्रामो के किसानो की आजीविका और जैवविविधता संरक्षण 

अधिकारियों और किसानो ने सीखा ऋषि खेती 

पलायन करने से अच्छा है पलायन रोकना 

जैव विविधता संरक्षण और ग्रामीण आजीविका सुधार  प्रशिक्षण
टाइटस ऋषि खेती फार्म होशंगाबाद। 
भारत सरकार के वन एवं जलवायु परवर्तन विभाग और मप वन विभाग के सहयोग से होशंगाबाद के सतपुरा टायगर रिज़र्व  ने आज कल जैव विविधता संरक्षण और ग्रामीण आजीविका की सुधार योजना को शुरू किया है। यह योजना सतपुरा -पेंच कॉरिडोर में लागू है।

इस योजना के तहत जल ,जंगल, जमीन और ग्रामीण आजीविका को सुधारने  का लक्ष्य है। यह योजना शहरी विकास की योजनाओं से अलग है। इसमें जंगल में रहने वाले लोगों को विस्थापित किए बिना ऐसी जीवन पद्धति  से जोड़ना है जिसमे लोग हजारों सालो से रहते रहे हैं किन्तु ऐसा तभी संभव है जब किसान अपनी आजीविका के लिए ऐसी खेती करने लगे जिसमे जल,जंगल का विनाश नो होकर वह और अधिक विकसित हो जाये।  आजकल हो ये रहा है है कि पर्यावरण के नाम पेड़ तो लगाये जा रहे हैं किन्तु खेती के लिए उन्हें उखाड़ या काट दिया जा रहा है। जमीनो को खूब जोत खोद कर उसे मुरदार  बना दिया जा रहा है। जिस से हरीभरी जमीने रेगिस्तान में तब्दील हो रही है।

ऋषि खेती ऐसी योजना हैं जिसमे खेती कुदरती वनो के अनुसार की जाती है जुताई ,खाद ,दवाई ,सिंचाई ,समतलीकरण ,कीचड मचाना ,फलदार पेड़ों की शाखाओं की छटायीं आदि कार्यों को नहीं किया जाता है। ये किसान अभी जंगलों में ही रहते है कुदरती खेती के बहुत करीब हैं। इसलिए इन्हे यहाँ सरकार की ओर  से प्रशिक्षण कराया जा रहा है। इनकी समस्याओं का समाधान केवल ऋषि खेती के पास है कोई भी आधुनिक वैज्ञानिक खेती का डाक्टर इनकी समस्याओं को ना तो समझ सकता है न ही वह उसका निवारण कर सकता है। जैसे एक किसान ने पुछा की हम लैंटाना से परेशान है , दुसरे ने पुछा की हमारी जमीन कंकरीली है क्या किया  जाये तीसरे ने कहा की बरसात तो होती है पर सूखा पड़ा है।

ऐसे अनेक सवाल हैं जिसका वैज्ञानिक कारण और निवारण ऋषि खेती के पास है क्योंकि यह खेती जापान के जाने माने वैज्ञानिक और कुदरती खेती के  किसान स्व श्री मस्नोबू फुकूओकाजी के  ८० साल के कुदरती खेती के अनुभवों पर आधारित है जिसे  टाइटस ऋषि खेती फार्म पिछले २८ सालो से कर रहा है।

हमारा पूरा विश्वाश  है की यदि इन किसानो ने ऋषि खेती को अपना लिया तो उन्हें जंगल छोड़ने की जरूरत नहीं रहेगी वरन  संरक्षण का काम वे स्वयं कर लेंगे। हम इस प्रयास के लिए सतपुरा टायगर रिज़र्व को सलाम करते हैं।


Saturday, March 21, 2015

ऋषि खेती तकनीक से जाने अपनी मिट्टी की जैविकता

जैविक (Organic) और अजैविक(Inorganic) खेती 

मिट्टी का परिक्षण 

ऋषि खेती तकनीक से जाने अपनी मिट्टी  की जैविकता 

ज कल हमारा देश खेती किसानी में चल रहे  तमाम संकटों के कारण बड़ी मुसीबत में फंस गया है।  एक और खेत पानी और खाद की कमी के कारण मरुस्थलों में तब्दील हो रहे हैं वहीँ असंख्य किसान घाटे  के कारण आत्म हत्या करने लगे हैं वे खेती से पलायन करने लगे हैं। मौसम बदलने लगा है ,बेरोजगारी और गरीबी बढ़ती जा रही है। 

मरुस्थली खेतों में बीमार फसलें पक रही हैं जिस से हमारे शरीर भी कमजोर होने लगे हैं  नयी नयी बीमारियां जन्म ले रही हैं। एक और किसानो पर कर्ज चढ़ रहा है वहीं सरकारें भी विदेशी हो गयी है। इस समस्या का मूल कारण धरती माँ की मौत है। हमने खेती केनाम से अपनी धरती माँ को खूब जोत खोद कर इतना लहूलुहान कर दिया है की अब व मर गयी है।

 हर खेत में दो प्रकार की मिट्टी मिल जाती है एक बीच में जिस में हमेशा हल चलता रहता है दूसरी किनारो के मेढ़ों पर जहाँ हल नहीं चलता है। हमने यह पाया है की जहाँ हल नहीं चलता है वह मिट्टी जीवित रहती है जिसे हम जैविक कहते हैं दूसरी मिट्टी वह है जहाँ हमेशा हल चलता रहता है वह मरू मिट्टी रहती है जिसे हम अजैविक मिट्टी कहते हैं। 

अधिकतर  लोग ये समझते है की जुताई वाले चालू खेत अच्छे रहते हैं यह भ्रान्ति है। इसको परखने के लिए हमने बहुत ही सरल विधि विकसित की है जिसे आप निम्न वीडियो के माध्यम से देख सकते हैं। 

पहली विधि 


दूसरी विधि 

हमारे खेतों की  मिट्टी को जैविक बनाने के लिए कुछ करने की जरूरत नहीं है वरन हम जो कर रहे हैं उसे बंद करने की जरूरत है। जब हम खेतों की जुताई को बंद कर देते हैं अपने आप सूक्ष्म जीवाणु ,कीड़े मकोड़े और,जीव जंतु और खरपतवारें पनप कर खेतों को जीवित कर देती हैं। सबसे महत्वपूर्ण काम खेतों में पनपने वाली खरपतवारें करती हैं जैसे   घास ,गाजर घास आदि,  इनके छाया में केंचुएं ,चींटे चीटियाँ ,जड़ें आदि पनप काट खेत को खतोड़ा और पानीदार बना देते हैं।