Saturday, October 25, 2014

COW PROTECTION: RISHI KHETI

ऋषि खेती और गौ - संवर्धन 

बसे रासायनिक खेती पर सवाल उठने शुरू हुए हैं  भारत में लोगों का ध्यान भारतीय परम्पागत देशी खेती किसानी पर केंद्रित हुआ है। भारतीय देशी खेती किसानी में पशु पालन का बड़ा महत्व रहा है जिसमे गाय,भेंस ,बकरियों,सूअर मुर्गियों  के आलावा ऊँट, भेड़  आदि सम्मलित हैं। इन सबमे गाय का महत्व सबसे ऊपर है भारत में गाय  की पूजा की जाती है।    उसका मूल कारण गाय से दूध  मिलता है ,बेलों का उपयोग खेतों को जोतने ,बखरने और ट्रांसपोर्ट के लिए काम में लाया जाता रहा है। गोबर और गोमूत्र को पवित्र माना जाता रहा है। उस से  खाद और दवाइयाँ बनती हैं जिसका का फसलोत्पादन में विशेष महत्व देखा गया है।

देशी खेती किसानी में हरयाली और पशुपालन का समन्वय बड़ी बुद्धिमानी से किया जाता था। यह खेती झूम या बेगा लोगों के द्वारा की जाने वाली खेती से जरा भिन्न है झूम खेती  जहाँ जुताई बिलकुल नहीं की जाती है वहीं देशी खेती किसानी में हलकी या कम से कम जुताई की परम्परा है किन्तु किसान जुताई से होने वाले भूछरण और जल के अपवाह से सचेत रहते थे। इसलिए वे जुताई के कारण मरू होते खेतों में जुताई बंद कर दिया करते थे उसमे पशु चराये जाते थे।  खेत मात्र कुछ सालो में पुनर्जीवित हो जाते थे। जुताई करते समय भी किसान गर्मियों में जितना भी कूड़ा ,कचरा ,गोबर ,गोंजन रहता था उसे वे खेतों में वापस डाल  दिया करते थे। पड़ती करना और गोबर ,गोंजन को खेतों में वापस डालने के आलावा किसान और कुछ नहीं करते थे। प्राचीन काल से किसानो को दलहन और बिना दलहन जाती की फसलों के  चक्र के बारे में पता था इसलिए वे बदल बदल कर फसलें बोते थे। दलहन फसलें नत्रजन देने का काम करती हैं वहीं गैर दलहन फसलें नत्रजन खाने का काम करती हैं। हरेभरे चारागाहों और हरे भरे जंगलों के समन्वय से पशु पालन खेती में संतुलन बना रहता था। अधिकतर लोग गांवों में ही रहते थे इसलिए खेती ,पशुपालन और हम लोगों की जीवन पद्धति में भी समन्वय रहता था।
गाय को परिवार के सदस्य की तरह प्यार करना चाहिए। 

किन्तु आज़ादी के बाद के मात्र कुछ सालो ने इस जीवन पद्धति को मिटा कर रख दिया है।  लोग गांवों की जगह शहरों में रहना पसंद करने लगे हैं बिजली और पेट्रोलियम के बिना उनका काम नहीं चलता है। किसान भारी मशीनो और ,रसायनो के सहारे खेती करने लगे हैं इस कारण हमारा पशु धन अब लुप्त प्राय हो रहा है। खेती पूरी तरह आयातित तेल की गुलाम हो गयी है। बड़े से बड़ा किसान कर्जदार हो गया है उसे कुदरती दूध और खान पान नसीब नहीं है।खेत मरुस्थल में तब्दील हो रहे है ,भूमिगत जल सूख गया है ,मौसम परिवर्तित हो रहा है धरती गर्म होने लगी है किसान आत्म हत्या करने लगे हैं ,हरघर में कैंसर जैसी बीमारी दस्तक दे रही है।

मेरी बहन की देशी गाय 


आर्गेनिक (जैविक ) खेती की खोज डॉ हॉवर्ड ने इंदौर म.प्र. में रासायनिक खेती के विकल्प के रूप में की थी यह पश्चिमी देशों में जहाँ डेयरी,पोल्ट्री ,पिगरी आदि के वेस्ट का प्रबंधन मुश्किल हो रहा है प्रदुषण फेल रहा है वहां बहुत उपयोगी सिद्ध हुई है किन्तु इस से बहुत बड़े इलाके के ऑर्गेनिक पदार्थों का शोषण होता है जिसे बहुत छोटे सीमित इलाके में डाल  कर जुताई कर खेती की जाती है। जुताई से होने वाले भूमिछरन और जल अप्रवाह के लिए ये विज्ञान चुप है। इसलिए यह देशी खेती किसानी की तरह टिकाऊ नहीं है। इसमें  रासायनिक खादों की जगह कम्पोस्ट बनाकर डाला जाता है। इसके सामान ही जीरो बजट खेती है जिसमे जुताई कर गोबर++ से बने बायो फ़र्टिलाइज़र डालने की सलाह दी जाती है। इस खेती में जल अप्रवाह और भूमिछरन से होने वाले नुक्सान का कोई जिक्र नहीं हैं इसलिए यह भी टिकाऊ नहीं नहीं है।

उपरोक्त दोनों खेती करने में जुताई के कारण हरियाली का बहुत नुक्सान होता है इसलिए पशुपालन के लिए कुदरती चारा नहीं मिलता है पशुओं को  गैर कुदरती अनाज,चारा  और दवाइयाँ दी जाती हैं जिस से उनके दूध  और गोबर पर विपरीत असर पड़ता है वो  अपने कुदरती गुण  खो देते हैं। भारतीय खेती किसानी में गौसंवर्धन बहुत जरुरी है कुदरती दूध हमारे आहार का प्रमुख अंग है। इसकी कमी से एक और जहाँ कैंसर जैसी बीमारियां पनपती हैं वहीँ गाय के कच्चे दूध से कैंसर भी ठीक हो जाता है।
सुबबूल चारे के पेड़ 

ऋषि खेती जिसे जापान के जाने माने कृषि वैज्ञानिक मस्नोबू फुकुओका ने विकसित किया है इस समस्या का हल है। यह खेती " कुछ मत करो " के सिद्धांत पर आधारित है। यानि जुताई नहीं ,कम्पोस्ट नहीं ,कोई रसायन नहीं ,कोई जीवामृत ,अमृत मिट्टी पानी की जरुरत नहीं ,कोई बायो फ़र्टिलाइज़र की जरुरत नहीं। बस बीजों को सीधे या क्ले से बनी बीज गोलियों  को फेंकने भर से यह खेती हो जाती है।  इस खेती में धरती में पनपने वाली तमाम जैव विविधताओं की रक्षा हो जाती है। यह पूरी तरह अहिंसा पर आधारित खेती है। लुप्त होते गोवंश सहित अनेक पशुओं का असली आधार हरियाली है जुताई करने से हरियाली नस्ट हो जाती है इसलिए कुदरती पशु आहार नहीं मिलता है।   कृत्रिम आहार से पशु बीमार हो जाते हैं उनके गोबर और दूध में वह ताकत नहीं रहती है जिसके लिए उन्हें पाला जाता है।  ऋषि खेती करने से मात्र एक बरसात में खेत हरियाली से भर
जाते है।  जैविक खाद और जैविक चारे की कोई कमी नहीं रहती है। भूछरण और जल अप्रवाह पूरी तरह रुक जाता है। खेत ताकतवर हो जाते हैं वे भरपूर कुदरती फसलें देने लगते हैं। देशी उथले कुए लबालब हो जाते हैं।
अधिकतर लोग कहते हैं की ऋषि खेती करने से पशु पालन प्रभावित होता है यह भ्रान्ति है हम पिछले २८ सालों से इस खेती को पशुपालन के साथ कर रहे हैं। यह एक मात्र ऐसी खेती है जिसमे हरियाली ,पशु पालन और फसलोत्पादन का  समन्वय रहता है।

ऋषि खेती करने से खेत हरे कुदरती चारे से भर जाते हैं। 
 खेतों में हम सुबबूल लगाते हैं सुबबूल एक दलहनी पौधा है जो खेतों में नत्रजन सप्लाई  करने में सबसे उत्तम है इसके भूमि ढकाव मे असंख्य जमीन को ताकतवर बनाने वाले जीव जंतु ,कीड़े मकोड़े ,सूक्ष्म जीवाणु निवास करते हैं यह बरसात करवाने और बरसात के पानी को जमीन में सोखने मके लिए बहुत उपयोगी है। इसके रहते भूमि छरण (soil  erosion) और जल अप्रवाह (Runoff ) बिलकुल रुक जाता है। सुबबूल की पत्तियों में भरपूर प्रोटीन रहता है अलग से किसी भी गेरकुदरती आहार को देने की जरुरत नहीं रहती है। दूध बहुत स्वादिस्ट और कुदरती रहता है गोबर से उत्तम जैविक खाद बनती है जिसे सीधे खेतों में डाल दिया जाता है। जल अपर्वाह और भूमि छरण नहीं होने के कारण जैविक खाद का बिलकुल छरण नहीं होता है।


जुताई नहीं करने के कारण ऋषि खेती एक मात्र असली कुदरती और जैविक खेती की श्रेणी में आती है जबकि जुताई आधारित जैविक और जीरो बजट खेती जमीन की जैविकता की हिंसा के कारण न तो कुदरती हैं ना  ही ये जैविक हैं।  जो इनके प्रचार कर रहे हैं उसका आधार असत्य और हिंसात्मक है। इनसे गौसंवर्धन  का दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है।








Tuesday, October 21, 2014

कैसे करें ? ऋषि खेती

 कैसे करें ? ऋषि खेती 
ब से आधुनिक वैज्ञानिक खेती में लगातार घाटा होने लगा है और किसान जैविक खेती करके भी संतुस्ट नहीं हो रहे हैं तब से हमारे पास आये दिन अनेको लोग फोन कर पूछने लगे हैं की हम कैसे ऋषि खेती करें ? अनेक लोग देश विदेश से बहुत कस्ट उठाकर यहाँ तक केवल यही जानने के लिए आते हैं की आखिर यह खेती होती कैसे है ?

ऋषि खेती "कुछ मत करो " के मूल सिद्धांत पर आधारित है।  गीताजी में लिखा है की कर्म जब कुदरत के विरुद्ध हो जाता है वह कुकर्म में तब्दील हो जाता है। इसलिए अकर्म (कुछ मत करो ) को बहुत महत्त्व दिया गया है।
दाना पानी के संपादक श्री अरुण डिकेजी  हैं पत्रिका बुलाने के
लिए +919926462068 पर संपर्क करें। 

हमारे देश में आज भी ऐसे उदाहरण देखने को मिल जायेंगे जिसमे किसान एक साथ कई किस्म के बीजों को मिलकर बरसात से पहले सीधे फेंक भर देते हैं और साल भर फसलें काटते रहते हैं।  इन विधियों को झूम या बेगा  खेती के नाम से जाना जाता है। यह विधि आदिवासी अंचलों में देखी जा सकती है।  इससे किसान हजारों साल आत्म निर्भर रहते आये हैं।

बेगा या झूम खेती की खासियत यह है की ये किसान बिजली और पेट्रोलियम के बिना ,जुताई ,खाद और दवाइयों के बिना खेती करते हैं। ये पहले हरियाली के भूमि ढकाव को बचाते हैं जिस से हरयाली के साथ असंख्य धरती की जैव विविधतायें पनप जाती है। जिस से धरती उर्वरक बन जाती है उसमे नमी का संचार हो जाता है। फिर इस हरयाली को काटकर वहीं डाल  दिया जाता है  सूख जाती है उसे जला  दिया दिया जाता है जिस से जमीन बीज बोने लायक बन जाती है। उसमे अनेक बीजों को एक साथ सीधा बरसात आने से पहले छिड़क दिया जाता है। इस से सब बीज उग जाते हैं फिर एक एक कर फसलें काटी जाती हैं। किसान केवल तीन साल तक इस जमीन पर फसलें उगाते हैं फिर दुसरे जमीन के टुकड़े को तैयार कर लेते हैं। पुराने जमीन के टुकड़े को पुन : हरयाली पनपने के लिए छोड़ दिया जाता हैं।

ऋषि खेती का भी यही आधार है फर्क केवल इतना है इसमें हरियाली को जलाया नहीं जाता है उसे वहीं  रहने दिया दिया जाता है  इसलिए जमीन को बदलने की जरुरत नहीं रहती है बीजों को सुरक्षित करने के लिए उन्हें क्ले की गोलियों में बंद कर दिया जाता है जिस से बीज अपने आप समय आने पर उग आते हैं।

क्ले उस मिट्टी को कहते हैं जो खेतों ,जंगलों ,पहाड़ों से बह कर नदी ,तालाब ,पोखरों में इकठ्ठा हो जाती है इस मिट्टी से ही मिट्टी के बर्तन बनाये जाते हैं। इस मिट्टी को किसान लोग कमजोर होते खेतों में भी डालते हैं जिस से खेत पुन: ताकतवर हो जाते हैं।  इस मिट्टी में असंख्य आँखों से नहीं दिखाई देने वाले सूक्ष्म जीवाणु ,केंचुओं आदि के अंडे रहते हैं जो जमीन को तेजी से उर्वरक और पानीदार बना देते हैं। इस मिट्टी में  जब हम  बीज को बंद कर देते हैं  तो बीज चूहों,चिड़ियों, धूप और बेमौसम पानी से सुरक्षित हो जाते हैं जो अपने समय पर अनुकूल वातावरण को पाकर उग आते हैं जैसे असंख्य खरपतवारों के बीज उग आते हैं।

 बीज गोलियों को बनाने के लिए सबसे पहले हमे उत्तम क्ले का चुनाव करने की जरुरत है उत्तम क्ले की खासियत यह रहती है उसकी गीली गोली पानी में पड़े रहने पर भी नहीं घुलती है, सूखने पर इतनी कड़क हो जाती है की उसे चूहे ,गिलहरी दांतों से तोड़ नहीं सकते हैं ,हवाई जहाज  से फेंकने पर भी वह टूटती नहीं है। इस क्ले को आवश्यकतानुसार इकठ्ठा कर बारीक कर छान लिया जाता है फिर इसमें एकल या मिश्रित बीजों को मिलकर आटे की तरह गूथ लिया जाता है गुथी  मिट्टी से एक या आधा इंच बीजों की साइज के अनुसार व्यास वाली गोलियां बना ली जाती हैं जिन्हे छाया में सुखा कर स्टोर कर लिया जाता है। अनेक लोग एक साथ बैठ कर इस प्रकार कई एकड़ खेत के लिए गोलियां बना लेते हैं।

बड़े खेतों के लिए बीज गोलियां बनाने के लिए कंक्रीट मिक्सर का इस्तमाल किया जाता है।

 बीज गोलिओं को फेंकने से पूर्व खेतों में  यदि घास , या अन्य वनस्पतियां उत्पन्न हो जाती हैं तो उन से डरने की कोई जरुरत नहीं है वरन उन्हें भी संरक्षण देने की जरुरत है इनके ढकाव में असंख्य जीव जंतु  ,कीड़े मकोड़े पलते  हैं जो खेतों को उर्वरक और पानीदार बना देते हैं। यह ढकाव बीज गोलियों को भी सुरक्षित रखते हैं। ताकतवर कुदरती बीजों की उत्तम बीज गोलियों से पहले ही साल में उत्तम परिणाम मिलते हैं।

ऋषि खेती में सभी कृषि अवशेषों जैसे खरपतवार ,पुआल ,नरवाई आदि को जहाँ का तहां कुदरती रूप में फेंक दिया जाता है जो सड़  कर खतों को उत्तम जैविक खाद प्रदान करता है। अधिक  जानकारी के लिए  फोन या ईमेल से सम्पर्क करें।

राजू टाइटस
rajuktitus@gmail.com. mobile no. 09179738049






Sunday, October 19, 2014

नदी जिए अभियान

नदी जिए अभियान 

"पानी ना तो आसमान से आता है ना वह धरती से आता है पानी तो केवल हरियाली से आता है "
                                                                                               फुकूओकाजी
हरियाली है जहां खुशहाली है वहां
       
ब खेती करने के लिए खेतों को जोता जाता है जुती बखरी बारीक मिट्टी बरसात के पानी को जमीन में नहीं जाने देती है वह तेजी से  बह कर खेतों की जैविक खाद को बहा कर ले जाता है। इस से खेत सूख जाते है। भूमिगत जल नीचे चला जाता है जिसका असर सीधे हरियाली पर पड़ता है वनस्पतियां सूखने लगतीं है।
चित्र न. 1 

चित्र न. 1
जुताई करने से मिट्टी बह  जाती है। 
चित्र न. 2 
यहाँ दो अलग अलग जार में पानी में जुती और बिना जुती  मिट्टी को एक साथ बराबर मात्र में डाला गया है।  जुताई वाली मिट्टी  पानी में बिखर जाती है।  इस से यह पता चलता है की कितनी बड़ी मात्रा  में हमारी कीमती मिट्टी  इस प्रकार हर साल पानी के साथ बह जाती है।
दुसरे जार में जिसमे बिना जुताई की मिट्टी  को रखा गया है वह पानी के साथ बिखरती नहीं हैं। इस कारण कितना भी पानी गिरे मिट्टी खेतों बरक़रार रहती है।
चित्र न. 2
जुताई करने से बरसात का पानी जमीन में नहीं समाता है।
इस चित्र में दो बर्तन लिए गए हैं जिनमे एक साथ फिर जुती और बिना जुती  मिट्टी को बराबर मात्र में एक साथ डाल  कर ऊपर से पानी डाला गया है।  जुताई वाली मिटटी के भीतर पानी नहीं जा रहा है वह ऊपर से बह  रहा है।  जबकि दूसरे बर्तन में जिसमे बिना जुताई की मिट्टी रखी  गयी है ने पूरा पानी सोख लिया है वह नीचे बर्तन में इकठ्ठा हो गया है।

उपरोक्त दोनों प्रयोगों से पता चलता है की खेती करने के लिए की जारही जमीन की जुताई कितनी नुक्सान दायक है।

हमारी नदियों के सूखने का मूल यही कारण है। यही कारण है जिस के कारण किसान गरीब हो रहे हैं।
ऋषि खेती ,खेती करने की एक ऐसी तकनीक है जिसमे जुताई की कोई जरुरत नहीं रहती है।  मिट्टी के नहीं बहने से खाद की भी जरुरत नहीं रहती है। ताकतवर मिट्टी  में ताकतवर फसलें पैदा होती हैं उसमे बीमारियों और खरपतवारों की समस्या नहीं रहती है।

Monday, October 6, 2014

शर्मनाक बयान

शर्मनाक बयान 

वन्य प्राणी संरक्षण सप्ताह 


"सांप को हाथ लगाना तो दूर बच्चों को इनके पास भी नहीं जाने दें "
वन विभाग 

देश इन दिनों पर्यावरण के गंभीर संकट से गुजर रहा है इस लिए वन्य प्राणियों का  संरक्षण किया जा रहा है।    शेर ,हाथी सहित असंख्य लुप्त प्राय : प्राणियों का  संरक्षण जरूरी है। किन्तु जब दैनिक भास्कर जैसा जिम्मेवार अखबार ये कहे इनके पास न जाएँ।  तो इसे क्या कहा जायेगा ? यह बहुत ही शर्मनाक बयान है।  बच्चों को वन्य प्राणियों की संरक्षण की भावना तब  पैदा होगी जब उनके मन से उस डर  को दूर किया जाये।  हम अनेक सालो से ऋषि  खेती कर रहे हैं सांप को अपना दोस्त मानते हैं। सांप अनेक मायनो में बहुत लाभ प्रद रहते हैं इसी लिए इनकी पूजा की जाती है। जिस सांप को यहाँ दिखाया गया है वह जहरीला नहीं है। इन्हे हम पालते हैं इन से  आंतंक नहीं रहता है।  भास्कर को गलत बयानी का खंडन छापना चाहिए।
राजू टाइटस
ऋषि खेती फार्म ,होशंगाबाद

एक कचरा क्रांति

एक कचरा  क्रांति

कुदरती खेती 

वीड जिन्हे हम नींदा या खरपतवार कहते हैं या फसलों से निकलने वाले पुआल ,नरवाई आदि को किसान सामान्य बोलचाल की भाषा में कचरा कहते हैं। कचरा वह वस्तु  होती है जिसका  कोई उपयोग नहीं होता है।  किसान इस कचरे को हमेशा मारते  और  जलाते आये हैं।

किसान कचरों को इसलिए मारते रहते हैं क्योंकि वो ये सोचते हैं की ये कचरे रहेंगे तो हमारी मूल फसलें नहीं पनपेंगी उनका खाना ये फसलें खा लेंगी इसी प्रकार वे फसलों के अवषेशों जैसे नरवाई ,पुआल आदि को जला देते हैं,मेड़ों पर फेंक देते हैं  या पशुओं को खिला देते हैं। कचरे नहीं पनपें इस लिए किसान खेतों में हल और बखर चला कर खेतों के तमाम कचरों को मार देते हैं।
हरे कचरों के ढकाव में धरती ठंडी रहती है भूमिगत पानी
 की वास्प ओस बन सिंचाई का काम करती है। 

 अब आप हमारे इन खेतों पर  निगाह डालें ये हमारे आस पास के खेतों से बिलकुल भिन्न नजर आएगा ये कचरों से भरा खेत है। हर जगह कचरों की हरियाली नजर आएगी। जिसके साथ साथ फलदार वृक्ष ,अनाज ,सब्जियों और चारों की फसलें और उनके साथ विचरण करते मोर, बकरियां ,मुर्गियां आदि।

हमारे पड़ोसी किसान फसलों को बोने  से पहले पिछली फसल के कचरों को आग लगा कर जला देते हैं ,कई बार आयातित तेल से चलने वाली मशीनों से खेतों को खूब खोदते और बखरते हैं। कचरों को मारने के लिए जहर डालते रहते हैं।

जबकि हम " कुछ नहीं करते " पिछली फसल के कचरों को वहीं  पड़ा रहने देते हैं जो वहीँ सड़ कर जैविक खाद बन जाते हैं। खेत साल भर हरियाली से ढके रहते हैं इनके नीचे असंख्य जीव ,जंतु ,कीड़े मकोड़े ,केंचुए आदि पनपते हैं। जिनसे हमारे खेतों में पोषक तत्वों और नमी की कोई कमी नहीं रहती है।
कचरों के साथ कचरों के सामान पनपती धान की फसल 

अपनी फसलों को पैदा करने के लिए कचरों के बीच फसलों के बीजों को क्ले मिट्टी में मिलाकर  बीज गोलियां बनाकर फेंकते रहते हैं जो कचरों के साथ साथ कचरों की तरह कचरों से दोस्ती करती पनपती रहती है। इस खेती को हम कुदरती खेती  कहते हैं।

असल में किसान लोग बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं जो कचरों को मार या जला रहे हैं। इसलिए खेतों में पोषकता और नमी नहीं रही है वे मरुस्थल में तब्दील हो गए हैं। मरुस्थली खेतों में फसलों को पैदा करने के लिय अँधा धुंध जहरीले रसायन खेतों में डाले जा रहे हैं।  जिस से मिट्टी ,हवा ,पानी और फसलें सब जहरीली होती जा रहीं है।

अधिकतर लोग ये सोचते हैं हैं की बरसात आसमान से आती हैं किन्तु यह भ्रान्ति है बरसात तो अपने आप पनपने वालों हरे भरे कचरों से आती है।  कचरे आयातित तेल से उठने वाले जहरीले धुंए को सोख कर जैविक खाद में बदल देते  है।  गर्माती धरती को अपनी छाया से ठंडक प्रदान करते  है।  बरसात ,ठण्ड और गर्मी को नियंत्रित करते  है।

सूखे कचरों से जैविक खाद बनती हैं , नमी संरक्षित रहती है,
 ,केंचुए ,मेंढक ,छिपकलियां रहती हैं जो
 फसलों को बीमारियों से बचाती हैं।  
हम पिछले २८ सालों से कचरा खेती कर रहे हैं। इस से पहले हम भी जैविक और अजैविक वैज्ञानिक खेती करते थे  हमारे खेत बंजर हो गए थे। खेतों के कुए सूख गए थे। पशुओं के लिए चारा नहीं था।  हम कर्जों में फंस गए थे। किंतु जैसे ही हमे कचरा क्रांति का ज्ञान मिला हमारी दुनिया ही बदल गयी यह कचरे  क्रांति का ज्ञान हमे जापान के मस्नोबू फुकूओकाजी से मिला वे  एक उत्साहित कृषि वैज्ञानिक थे उन्होंने पाया की आज का कृषि विज्ञान जैव -विविधताओं की हिंसा पर टिका है ,सबको कचरा समझ कर मार रहा है। इसलिए आज खेत और किसान मरने लगे हैं। अमेरिका जैसे विकसित कहलाने वाले देश में मात्र दो प्रतिशत किसान  बचे हैं वहां  के तीन चौथाई खेत रेगिस्तान में तब्दील हो गए हैं।  जापान भी उसी की नक़ल कर रहा है। इसलिए भयंकर ज्वर भाटों से उजड़ रहा है।

हमारे  देश में लाखों किसान आत्म  हत्या कर रहे हैं अतिवर्षा और सूखे के कारण हा हा कार मचा है। हर घर  कैंसर जैसी बीमारियां की चपेट में आ रहा है। इस से निपटने के लिए हमे अब कचरों को बचाना ही होगा।
फसलोत्पादन के लिए की जा रही जमीन की जुताई से सबसे अधिक कचरो की हिंसा होती है उसे रोके बिना हम कचरों को नहीं बचा सकते है।

हमारा मानना  है की जुताई आधारित कोई भी खेती जैविक नहीं हो सकती इसी प्रकार कचरा मारक जहर डाल  कर की जाने वाली नो टिल फार्मिंग भी संरक्षक नहीं है।

राजू टाइटस








Wednesday, October 1, 2014

Toilets: A Matter of Pride for the Indian Bride

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Toilets: A Matter of Pride for the Indian Bride

 

By Lesley D. Biswas - India - October 1, 2010

In Haryana, a northeastern state in India, the"No Toilet, No Bride" campaign, launched by the Ministry of Rural Development, has resulted in the construction of approximately 1.4 million toilets across rural India in less than five years. The movement takes advantage of the fact that Haryana suffers form a warped sex ratio, a result of India’s cultural preference for boys over girls. The scarcity of brides in the state helps prospective brides use their bargaining power to force their suitors to construct toilets for them before they marry.

 Basanti has a mobile phone and a color television but no toilet. JharkhandIndia. Photograph courtesy of the author.

Among the first things you notice when you come to India is the repelling sight of people defecating in the open. Be it a rural village or the teeming city slums, you see people lined up besides railway tracks, fields, and rivers answering nature’s call.

Out of the estimated 2.6 billion people globally who have no access to proper sanitation, 638 million belong to India. According to the UN, more than 55 percent of Indians practice open defecation. Even where local municipalities have constructed public toilets, the UN has questioned the utility of these services, terming them unhygienic and unusable and lacking in running water, drainage, and electricity.

The small village of Palamu, in the eastern state of Jharkhand, is a farming community. Basanti, who lives in one of the few brick houses in the village, owns a mobile phone and a color television, but like many others in her village she does not have a toilet.

For women like Basanti the daily struggle begins well before dawn. “I have to wake up early every morning and walk to the nearby stream. First, it is important to find a secluded spot away from men and pigs. Second, the spot should not be already soiled with raw feces,” says Basanti. Most of the spots are overused and for the majority of village folk who walk barefoot, the experience they face every morning is unimaginable.

 “During the monsoons it is worse. In the dark when we visit the water logged field overgrown with grass and floating with night soil, the danger of getting bitten by snakes and scorpions is also high” informs Basanti, veiling her bright smile with her sari palu. Although it is visible that she is embarrassed, what is also evident is that Basanti’s family has the means to construct a toilet, yet a toilet is not their priority. And surprisingly, it is also not the priority among millions of poor across India.
According to a UN study on sanitation, 563.7 million people in India have access to mobile phones while only 366 million have access to a toilet. The report estimates the cost of building a toilet at $300 USD, which includes labor, materials, and advice.

Jack Sim, founder and president of the World Toilet Organization (WTO) points out that the only way poor Indian families will prioritize toilets is through local entrepreneurs. “Train the poor to become sanitation entrepreneurs and sales agents,” says Sim, whose mission is to improve sanitation globally.

Sim goes on to explain the logic behind this theory. “We can create a sustainable sanitation delivery model that is profit driven. The technologies are available. All we need is to build the market supply chain and distribution infrastructures [and] train the poor to collaborate with business people to create a vibrant marketplace that works to earn profit and save lives.”

He further adds, “Toilets have to be designed to be emotionally appealing so that they become status symbols and objects of desire amongst the poor, which is the only reason why poor are buying mobile phones and not investing in toilets.”

Lack of proper sanitation is also a major cause of girls dropping out of school after adolescence. It is estimated that less than half of the 738,150 primary schools run by the government across India have proper toilets. Only 28.25 percent of all primary schools in the country have separate toilets for girls. According to Education World, the human development magazine, improper sanitation is the reason why only 63 million girls of the 102 million girls who begin schooling continue their education up to class VIII, India’s secondary level education.

Water, Sanitation and Hygiene, or WASH, a collaboration between UNICEF and the Geneva-based Water Supply and Sanitation Collaborative Council (WSSCC) to accelerate efforts by both organizations to achieve Millennium Development Goal Seven – to reduce by half the proportion of people without access to safe drinking water and basic sanitation by 2015 - reports that diarrhea due to drinking contaminated water and poor sanitation claims the lives of around two million children globally each year. Half of the deaths reported are in India. With the health ministry of India putting the economic cost for illness and disease from poor sanitation at a staggering $255 a year, a solution is far overdue.

Paul Calvert is the brain behind eco-toilets, a dry compost toilet with a separate urine-diverting system. It has been found that open defecation and private soakaway’s are the prime reason for drinking water getting contaminated, and eco-toilets, says Calvert, ensure that does not happen. “Eco-toilets do not waste water and they do not pollute water. What they do is allow the valuable nutrients to be recycled and used for fuel and fodder production,” explains Calvert.

Another problem brought on by improper sanitation that needs immediate redressing is human scavenging, the demeaning practice of cleaning dry latrines, mostly done with bare hands. To end human scavenging, dry latrines must go.

Image of Paul Calvert's eco-toilet "The Ecopan." Eco-toilets are easy to build and give owners a sense of pride. Photograph courtesy of eco-solutions

Traditional dry latrines are not connected to drainage systems and must be manually cleaned. In 1993 the government of India banned human scavenging under Employment of Manual Scavengers and Construction of Dry Latrines (Prohibition) Act. The act also deems the construction of dry latrines a legal offense holding a penalty of up to one year imprisonment or a fine of around $50.
Despite the ban in 2002-03 there are still 6 million dry latrines used in India, according to Union Ministry for Social Justice and Empowerment. Although it is less common to see women carrying bowls of human feces upon their heads and a thick hard bristled broom in their hand, like some decades ago, 6.4 lakh human scavengers (604,000) are still waiting to be rehabilitated, 95 percent of whom are women.

Dr. Bindeshwar Pathak, founder of Sulabh International, a social service organization that has built over 1.2 million individual toilets and over 7,500 public toilets across India and has liberated over 60,000 scavengers by constructing flush toilets, says, “To eliminate scavenging and bring about total sanitation, the government, NGO’s, and the citizenry need to work in close collaboration to make a real difference. When that happens, programs become a success. But when they work in isolation the project lags behind.”

According to Dr. Pathak, state governments in Jharkhand, Orissa, and Goa who implemented this methodology have eliminated human scavenging. A number of private and government projects are underway to construct toilets by providing subsidies to beneficiaries who seek to build them. But policies alone are not going to solve India’s sanitation problems. Communities, especially women, who suffer the most, must be instrumental in developing solutions.

In Haryana, a northeastern state in India, women are doing just that. The "No Toilet, No Bride" campaign, launched by the Ministry of Rural Development, has resulted in the construction of approximately 1.4 million toilets across rural India in less than five years. The movement takes advantage of the fact that Haryana suffers form a warped sex ratio, a result of India’s cultural preference for boys over girls. The scarcity of brides in the state helps prospective brides use their bargaining power to force their suitors to construct toilets for them before they marry.

“I think such a pledge is very good. It creates a social norm that creates peers pressure for the greater good,” said Sim, who hopes to see India achieve their goal of complete sanitation soon.

When women are willing to change the situation a real difference is made to society. Only if women decide to prioritize toilets can the policy makers ensure their demand is fulfilled.

बकरी और बंदर के दिमाग से चलें !

बकरी और बंदर के दिमाग से चलें !
"हरी पत्तियों के रस से हर बीमारी का इलाज करें "


ज कल हम डॉक्टरों के युग में जी  रहे हैं।  हर  किसी चीज़  के आज कल ढेरों डाक्टर उपलब्ध हैं। हमारी बीमारियों के  असंख्य डाक्टर हैं कोई एलोपेथी का डाक्टर है तो कोई नेचरोपैथी  का डाक्टर है तो कोई आयुर्वेद का डाक्टर है।  कोई कहता है की बस झाड़ा फूंकी ही सही इलाज है।
इन पेथियों  के चक्कर में फंस कर हैं  कितना पैसा और समय बर्बाद कर देते हैं और नतीजा सिफर ही निकलता है।
असल में हमारा शरीर ही सब से बड़ा डाक्टर है उसे बस कुदरती खान पान और हवा चाहिए।   वह अपने आप  अपना इलाज कर लेता है जब कुछ  कमी हो जाती है हमारा शरीर  अनेक  व्याधियों में फंस जाता है। हम सीधे डाक्टर के पास चले जाते हैं जो हमे गैर कुदरती दवाइयाँ देना शुरू कर देते हैं जिस से हमारा शरीर और कमजोर जाता है ठीक नहीं होने पर डाक्टर लोग दवाइयाँ बदलते जाते हैं जिस से बीमारियां बे काबू हो जाती हैं। डाक्टर इसे कैंसर बताने लगते हैं।

  यह डाक्टरी का बाज़ार हमारी गलतियों के कारण पनप रहा है। एक बार हमारे ऋषि खेती फार्म को देखने केनेडा से एक डॉ दम्पति आये उन्होंने बतया की उनकी माताजी को कैंसर हो गया था जब  इलाज के लिए कहा तो उन्होंने मना  कर दिया और अपने गाँव में कुदरती खान ,पान ,हवा पर अपने को आश्रित कर लिया  इस से वे मात्र महीने भर में स्वस्थ अनुभव करने लगीं।  उन्होंने शहर में आकर डाक्टरों से कहा की मुझे कैंसर नहीं है डाक्टरों ने उनका पेट खोलकर चेक किया तो कैंसर नदारत था।
मेने उस डाक्टर दम्पति से कहा जो हमारे यहाँ ऋषि खेती देखने आये थे आपने  अपनी माँ  को बिना दवाई से कैंसर से ठीक होते देखा है क्या  ?आप कह सकते हैं कि   कैंसर जैसी बीमारी कुदरती खान पान से ठीक हो सकती है तो  'उन्होंने कहा नहीं '  हमने देखा है पर पढ़ा नहीं है '  इस लिए हम यह नहीं कह सकते की यह इलाज है।  
हम पिछले २८ सालो से अपने खेतों में उन तमाम वनस्पियों को  बचा रहे है जो अपने आप कुदरती उगती हैं  जिन्हे आम किसान कचरा,नींदा  या खरपतवार कहता है। इनमे जंगली ,अर्ध जंगली और कुछ पालतू वनस्पतियां रहती है। इन वनस्पतियों में असंख्य वनस्पतियां बकरियां और बंदर को बहुत पसंद रहती हैं।

हम वनस्पतियों की पत्तियों को तोड़ कर उनका रस  (जूस ) निकाल लेते हैं  इस रस  को हमारे परिवार में किसी को भी कोई भी बीमारी हो पिला देते हैं।  यह रस असल  में ग्रीन ब्लड के जैसा  होता है जो पेट में पहुँच कर खून को शक्ति  प्रदान करता है  जिस से कमजोर शरीर को तुरंत लाभ होता हो जाता है और बीमारी ठीक हो जाती है।
बहुवर्षीय कुदरती वृक्षों की पत्तियां बहुत लाभ प्रद रहतीं हैं।  
इस रस को तैयार करते समय केवल इस बात का ध्यान रखा जाता है की यह पत्तियां बंदर और बकरियों के खाने लायक हैं या नहीं। बंदर और बकरियां जब स्वतंत्र विचरण करते हैं चुन चुन कर पत्तियां ,फल ,सब्जियां आदि का सेवन करते हैं।

ऋषि खेती में जमीन की जुताई ,रसायनो और मानव निर्मित किसी भी प्रकार के खाद का सेवन नहीं किया   जाता है फसलें हमेशा जंगलों में अपने आप उगने वाली वनस्पतियों की तरह उगाई जाती है। बीजों को कपे  वाली (क्ले ) से कोटिंग कर बीज गोलियां बनाई जाती हैं उन्हें कुदरती वनस्पतियों के ढकाव में छिड़क दिया जाता है कहीं कहीं सीधे बीजों को भी छिड़क दिया जाता है। इस प्रकार  ऋषि खेती की फसलें सभी कुदरती हो जाती हैं जो मानव शरीर को स्वस्थ रखने में बहुत उपयोगी सिद्ध हो रही हैं। ऋषि खेती की फसलें  बहुत ताकतवर रहती हैं उनमे बीमारियों का कोई प्रकोप नहीं नहीं रहता है। असंख्य जीव जंतु ,वनस्पतियों के अवशेषों के कारण इनकी रोगनिरोग छमता बढ़ती जाती है।