Thursday, April 10, 2014

TRUTH AND NONVIOLENCE

सत्य और अहिंसा

आमआदमी की लड़ाई 

ऋषि -खेती 

भारत की आज़ादी की लड़ाई महात्मा गांधीजी के नेतृत्व में हमने अंग्रेजों से "सत्य और अहिंसा " के बल जीती थी,किन्तु इस आज़ादी को चंद बेईमान लोगों ने सत्ता के खातिर मिट्टी में मिला दिया। जिसमे परंपरागत राजनैतिक पार्टियों की सरकारों बड़ा हाथ है . ये सरकारें विकास के नाम पर भ्रस्टाचार करती हैं तथा जाती और धर्म के नाम पर लोगों को आपस में लड़वा  कर भ्रस्टाचार में लिप्त हो जाती है.

यही कारण है की हमारे देश में खेती किसानी जो इस देश को आत्मनिर्भर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी अब दम तोड़ रही है. खेत रेगिस्तान में तब्दील हो रहे हैं किसान आत्महत्या करने लगे हैं. इसी कारण उधोगधंदे भी नहीं पनप रहे बाजार में मंदी सर पर चढ़ी जा रही है.  महंगाई ,बेरोजगारी चरम सीमा पर है वहीं हमारा पर्यावरण दूषित हो गया है हमे खाने को कुदरती खाना नहीं मिल रहा है वहीं पीने के पानी और हवा में भी जहर घुल रहा है. कैंसर जैसी महामारियां मुंह बाये खड़ी है.

इन्ही समस्याओं को लेकर विगत दिनों दिल्ली में एक अहिंसातमक आंदोलन भ्रस्टाचार को लेकर अन्नाजी के नेतृत्व में किया गया जो सत्य और अहिंसा पर आधारित था जिसे भारी  संख्या में लोगों का समर्थन मिला किन्तु दुर्भाग्य की बात है इस आंदोलन का मौजूदा सरकारों और जन प्रतिनिधियों पर कोई भी असर नहीं हुआ और आंदोलन बिना किसी निष्कर्ष के खत्म हो गया.

किन्तु इस आंदोलन से निकले कुछ साहसी लोगों ने इस आंदोलन को एक नयी दिशा प्रदान कर इस आंदोलन को राजनीती में बदल दिया उसका मूल कारण यह था की जिन लोगों के आगे हम  गिड़गिड़ाते हैं वे सब के सब सत्ता के भूखे हैं और उनके आगे चुनाव जीतने के अलावा कोई और उदेश्य नहीं है. इसलिए उन्होंने  आमआदमी के गुस्से  को एक अहिंसात्मक राजनीतिक आंदोलन की तरफ मोड़ दिया जिसका नाम रखा गया "आमआदमी पार्टी " जिसका  उदेश्य सत्ता को हासिल करना नहीं है वरन देश भर में जनता के ऐसे आंदोलनों को एकत्रित करना है जो आज नहीं तो कल अन्याय के कारण हिंसा की तरफ मुड़ सकते हैं. यह हिंसा का विकल्प है.

इस आंदोलन का पहला  प्रयोग दिल्ली में सरकार बनाने तक  हम सबने देखा अब यह आंदोलन पूरे देश में
जन  आंदोलन की शक्ल हासिल कर रहा है जिसमे देश भर से अनेक आंदोलनकारी लोग जुड़ रहे हैं. यह आज २०१४ के लोकसभा चुनाव में अपनी उपस्थिती दर्ज कराने में सफल हो गया है. यह   स्वराज के नाम से दूसरी आज़ादी की लड़ाई के रूप में जाना जाने लगा है जिसमे पूरी दुनिया से लोग जुड़ रहे है इस की जड़ में महात्मा गांधीजी के आदर्श कूट कूट कर भरे हैं. यह लड़ाई  बापू के सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चल रहा है. इस कारण इसमें फेल होने का कोई भय नहीं है.

इस आंदोलन में भले श्री केजरीवालजी के मात्र उंगिलयों पर गिने जा सकने वाले दोस्तों के नाम  दिखाई देते हों  पर इस से अंदरूनी तौर पर करोड़ों देशवासी जुड़ते जा रहे हैं.इसका मूल कारण हर घर में आ  रही अनेक समस्याएं है और इन समस्याओं को हल करने में मौजूदा परंपरागत राजनैतिक पार्टियां बेकार  सिद्ध हुई हैं.

अभी ये आंदोलन देश के महानगरों में उत्पन्न आमआदमी की तकलीफों से प्रेरित होकर महानगरों तक ही केंद्रित है किन्तु ये धीरे देश के दूरदराज गांवों में भी अपनी पैठ बनाने लगा है. गांवों की स्थिति महानगरों से कहीं अधिक गंभीर है. हमारा देश खेती किसानी वाला देश है जिसमे पिछले हजारों सालो से खेती किसानी पर्यावरण के अनुकूल आत्म निर्भर और टिकाऊ थी किन्तु मात्र आज़ादी के कुछ सालो में ये खेती आयातित तेल की गुलाम होकर रह गयी है और तेल का व्यापार देश की बड़ी २ कम्पनियों  के हाथ में चला गया है. तेल एक तो सहज उपलब्ध नहीं है तथा वह महंगा होता जा रहा है. उस से प्रदूषण चरम सीमा पर है और तेल के कुए भी अब सूखते जा रहे हैं. ऐसे में एक और किसानो के आगे आजीविका संकट आ गया है और आमआदमी के खाने पीने की दिक्कतों में तेजी से इजाफा हो रहा है. जो खाना आज हमे मिल रहा है वह भी कमजोर और प्रदूषित है जिसके कारण कैंसर जैसी महामारियां अब चरम पर हैं.

किसी भी देश की जनता उस देश में प्राप्त कुदरती खान और आवोहवा पर निर्भर रहती है. जिसका सम्बन्ध हरियाली और उस पर आश्रित जैवविधताओं से रहता है. इसी लिए कहा जाता है की हरियाली है जहाँ खुशहाली है वहां, किन्तु मौजूदा सरकारी खेती किसानी ने हरियाली को बहुत ही तेजी से नस्ट किया है इस कारण हम अब कुदरती आवोहवा और खान पान से महरूम हो रहे हैं. हमारी धरती जिसे हम प्यार से भारत माँ कहकर बुलाते है बीमार होकर मूर्छित हो गयी है उस में हमे खाना खिलाने की ताकत नहीं रही है.

महानगरीय विकास हर हाल में दूरदराज के गांवों और आसपास के पर्यावरण पर निर्भर रहता है किन्तु जिस तरह से ये विकास हो रहा है वह विकास नहीं विनाश है. एक दिन तेल या बिजली नहीं मिले तो लोग  मरने लगेंगे। जबकि आज भी अनेक गांवों में बिजली और तेल के बिना लोग लोग आराम से रह रहे हैं. असल में महानगरीय विनाश को कम  करने की जरुरत है. उसके लिए नगरों की अपेक्षा दूरदराज के गांवों में हो रही खेती किसानी को आत्मनिर्भर और पर्यावरणीय बनाने के जरुरत है. शेर और हाथी पालना कोई पर्यावरणीय काम नहीं है असल में हर खेत पर्यावरणीय कुदरती हरियाली से ढंका होना चाहिए।

यांत्रिक जुताई ,जहरीले रसायनो और भारी सिचाई पर आधारित खेती हमारे पर्यावरण के लिए  बहुत घातक सिद्ध हो रही  है यह खेती असत्य और हिंसा पर आधारित है.  जमीन की जुताई और जहरीले रसायनो से जमीन मर जाती है. यह सबसे बड़ी हिंसा है. जब तक यह हिंसा जारी रहेगी हमारे मानव एवं कुदरती संसाधनो के हनन को नहीं रोक जा सकता है.

ऋषि खेती एक गांधीवादी खेती है जो सत्य और अहिंसा पर आधारित है यह खेती जुताई रसायनो के बगैर की जाती है इस से एक और जहाँ हरियाली पनपती हैं वहीं बरसात का पानी जमीन में समां जाता है. पानी की कमी सबसे बड़ी समस्या है. दिल्ली गुजरात देश के सबसे विकसित कहे जाने वाले प्रदेश  हैं किन्तु वहां पीने के पानी का अकाल है.

हम पिछले २७ सालो से अपने पारिवारिक खेतों में ऋषि खेती का अभ्यास कर रहे हैं तथा इसके प्रचार प्रसार में सलग्न हैं. हम खुश हैं की आज जहाँ महानगरों में जहाँ कुदरती आवो हवा और भोजन उपलब्ध नहीं है हमे  कोई कमी नहीं है. आज की सभी पार्टियां अपने चुनावी वायदों में कोई भी यह नहीं कह रही हैं की हम लोगों कुदरती आवोहवा और खाना उपलब्ध कराएँगे सभी सीमेंट  कंक्रीट के विकास की बात कह रही हैं.
चुनाव जीतने के बाद सारा काम निजी कंपनियों के हवाले कर दिया जायेगा नेता लोग मोटी मोटी रकम लूट कर अपने घर में बैठ जायेंगे।

ऋषि खेती एक ऐसी  योजना है जिसमे निजी कंपनियों का कोई रोल नहीं है इस लिए कोई बढ़ावा नहीं दे रहा है.
ऐसे अनेक काम है जिसमे पैसे की कोई जरुरत नहीं रहती है अन्नाजी का कहना है आज पैसे से सत्ता और सत्ता से पैसे का खेल चल रहा है. आमआदमी पार्टी एक ऐसी पार्टी है जो सत्य और अहिंसा के आधार पर बनी है उस से हम उम्मीद करते हैं की वो अब  पैसे के खेल पर विराम लगाएगी और ऋषि खेती जैसी बिना लागत  की खेती को बढ़ने में सहयोग करेगी जिस से आमआदमी को कुदरती आवो हवा और आहार मिल सके.

आजकल अनेक पढ़े लिखे और बहुत पढेलिखे लोग और अनेक अमीर लोग इस बात को पहचान कर ऋषि खेती की और आकर्षित हो रहे हैं उनका कहना है हम पैसे का करें हमे तो कुदरती आवो,हवा और भोजन चाहये।अमेरिका ,ब्राज़ील,ऑस्ट्रेलिया ,केनेडा आदि देशो में बिना जुताई की खेती के रूप में ऋषि खेती अपने पांव जमा रही है. जबकि उनका पर्यायवरण हमारे देश की अपेक्षा उतना अच्छा नहीं यही है. इसलिए हम उम्मीद करते हैं की हम  सब अब अपने खातिर इस यज्ञ में आहूती करेंगे।
धन्यवाद
शालिनी एवं राजू टाइटस
ऋषि खेती के किसान


Friday, March 28, 2014

SCIENTIFIC FARMING IS FAILING

एक तिनका क्रांती 

मासानोबू फुकुओका 

 मेरे खेतों पर निगाह डालें 

ये सरसों  और गेंहूं के खेत हैं। इन खेतों से मुझे प्रति चौथाई एकड़ एक टन अनाज मिल जाता है. यह उत्पादन जापान के सबसे उत्पादक वैज्ञानिक खेती के उत्पादन के बराबर है. जबकि मेने अपने खेतों को पिछले २५ सालो से ना जोता है ना ही बखरा है. मै इन खेतों में किसी भी प्रकार के खाद और दवा का उपयोग नहीं करता हूँ.
एक टन प्रति चौथाई एकड़ पैदावार 


सरसों और गेंहूं की बोनी करने के लिए मै धान की कटाई से करीब १५-२० दिन पहले खड़ी धान की फसल में बीजों को छिड़क देता हूँ. धान की कटाई और  धान को झड़ाने के बाद में बची पुआल को उगते नन्हे पौधों के ऊपर जहाँ का तहां आड़ा तिरछा फेंक देता हूँ.
एक किलो प्रती वर्ग मीटर पैदावार 

धान की बुआई भी में इसी प्रकार करता हूँ धान के बीजों को सीधा मै  गेंहूं और सरसों के खेतों में सीधे फेंक देता हूँ. गेंहूं और सरसों की नरवाई को भी मै इसी प्रकार खेतों पर जहाँ का तहां फेंक देता हूँ. धान और गेंहूं की फसल चक्र में ये विधि मेरे ही खेतों में अपनाई जाती है.

इसमें खेतों में पानी भर कर रखना ,रोपा लगाना ,कीचड आदी मचाने की कोई जरुरत नहीं है. इस खेती की पैदावार वैज्ञानिक खेती के बराबर जरुर है किन्तु जमीन और फसल की गुणवत्ता  का कोई मुकाबला नहीं है.






Wednesday, March 26, 2014

पूरे देश में कृषी की ग्रोथ नेगेटिव है.


पूरे देश में कृषी की ग्रोथ नेगेटिव है. 

खेत मरुस्थल में तब्दील हो रहे हैं ,इसलिए किसान आत्म-हत्या कर रहे हैं.


मारी खेती किसानी हमारे पर्यावरण के अनुसार चलती है जिसमे कुदरती जल और मिट्टी की उर्वरता की अहम् भूमिका है.किन्तु जब फसलोत्पादन के लिए हरयाली को नस्ट कर खेतों को जोता जाता है तब बरसात का पानी जमीन में ग्रहण  नहीं होता है वह तेजी से बहता है जो अपने साथ खेत की जैविक खाद को भी बहा कर ले जाता है. करीब हर साल १५ टन जैविक खाद इस प्रकार खेतों से बह जाती है. 
बिना-जुताई की खेती से रेगिस्तानो को थामने की योजना 

दूसरा जुताई करने से खेतों की जैविक खाद गैस में तब्दील होकर उड़ जाती है जिस से एक और खेत कमजोर हो जाते है वही ग्रीन हॉउस गैस की समस्या उत्पन्न हो जाती है. एक बार जुताई करने से खेत की आधी ताकत 
नस्ट हो जाती है. इसलिए सूखे और बाढ़ दोनों की समस्या आम रहती है किसान घाटे में रहते हैं.

यही कारण है कि खेती किसानी में भयंकर अनुदान दिया जा रहा है. इसके बावजूद किसान आत्म-हत्या कर रहे हैं. ऐसा नेगेटिव ग्रोथ के कारण है.

ग्रोथ को बढ़ाने के लिए अनेक किसान अब बिना जुताई की खेती करने लगे हैं. जिस से जैविकता और पानी का छरण पूरी तरह रुक जाता है और खेत किसान संपन्न हो रहे है. जुताई के कारण पनपते मरुस्थल जीवित हो रहे हैं.

Monday, March 24, 2014

STOP DESERTIFICATION

पानी ना तो आसमान से आता है नाही वह जमीन के भीतर से आता है पानी तो हरियाली से आता है.-फुकुओका 

प्राचीन  खेती किसानी में किसान जब अपने खेतों में कान्स घास को फूलता देखते थे वे जुताई को बंद कर खेतों को पड़ती कर दिया करते थे.  उन्हें पता चल जाता था कि अब खेतों का पानी सूखने लगा है. पड़ती करने से खेत हरियाली से ढक जाते हैं  जिस से खेत पुन: पानीदार हो जाते हैं.  हमारे इलाके में ऋषि पंचमी के त्यौहार में कांस घास की पूजा होती है और बिना-जुताई के अनाजों को फलाहार के रूप में सेवन किया जाता है. इस बात से पता चलता है कि हमारे पूर्वज किसान कितने समझदार और उन्नत थे।
कांस घास 


झूम खेती 
आज भी अनेक आदिवासी अंचलों में "झूम खेती " होती है. जो पिछले हजारों साल से हो रही है इसमें किसान पहले हरियाली के भूमि ढकाव को बचाते हैं जिस से जमीन पानीदार और उर्वरक हो जाती है. हरियाली के ढकाव में असंख्य जीव जंतु ,कीड़े मकोड़े ,सूक्ष्म जीवाणु पैदा हो जाते हैं जिनके जीवन चक्र से जमीन के पोषक तत्वों की आपूर्ती हो जाती है और बरसात का पानी जमीन में समां जाता है जो वाष्प बन सिंचाई का काम करता है. इस का लाभ लेने के लिए आदिवासी लोग एक सीमित जमीन के टुकड़े की हरियाली को काटकर उसे जला देते हैं जिस से जमीन फसलोत्पादन के लिए तैयार हो जाती है. इस जमीन में वे बरसात में अनेक बीजों को मिलाकर छिड़क देते हैं जिस से उन्हें अनेक किस्म की फसलें प्राप्त हो जाती है. कुछ फसलें बरसात के रहती है तथा कुछ फासले अगले मौसम की रहती है जिसमे दाल,चावल सब्जियां आदी रहती हैं. बीच बीच में फलों के पेड़ों को छोड़ दिया जाता है जिस से उन्हें फल भी मिल जाते हैं. इस जमीन के टुकड़े में करीब तीन साल तक ही खेती करते हैं इसके बाद वे फिर से जमीन को छोड़ देते है जिस से वह पुन: हरियाली के भूमि ढकाव से धक् जाती है जिसमे पानी और उर्वरकता का संचार हो जाता है.
क्लोवर के साथ धान की खेती 

जापान क विश्व विख्यात कृषि वैज्ञानिक और कुदरती खेती के किसान मासानोबू फुकुओकाजी ने भी इस कुदरती तकिनक के शेयर कुदरती खेती का विकास किया है. वे अपने धान ,गेंहूं और राइ  के खेतों में एक स्थाई भूमिधकाव  की वनस्पती जिसे वे क्लोवर कहते हैं सालभर जीवित रखते हैं जिस से उनके खेत उर्वरक और पानीदार रहते हैं उस में बदल बदल कर धान ,गेंहू और राइ की फसल होती रहती है. जिसका उत्पादन बढ़ते क्रम में रहता है.


आज कल  अनेक किसान अपनी जमीन को उर्वरक और पानीदार बनाने के लिए "हरी खाद " के नाम से खेतों में सन,ढेंचा ,चौलाई, गाजर घास  आदी के हरे ढकाव से जमीन उर्वरक और पानीदार बनाते हैं किन्तु वे जमीन की जुताई कर  इस ढकाव को मिट्टी में मिला देते हैं इस से जमीन की उर्वरकता और नमी का लाभ नहीं मिल पाता  है. जुताई करने से खेत की जैविक खाद गैस  बन कर उड़ जाती है और बरसात के पानी के साथ बह जाती है इस कारण खेत निरंतर कमजोर होते जाते हैं उनमे खाद और पानी की भीमकाय मांग होती जाती है.

हरे भूमिधकाव में बिना जुताई करे बुआई करने का तरीका
सामने क्रिम्पर रोलर पीछे जीरो टिलेज सीड ड्रिल। 

बिना-जुताई की जैविक खेती करने के लिए अनेक किसान ट्रेकटर के आगे हरे भूमि ढकाव को मोड़ कर सुला देते हैं तथा उसमे बिना जुताई की बोने की मशीन से बोनी कर बम्पर फसल ले रहे हैं. ढकाव की फसल को मोड़ कर जमीन  पर सुला देने से वह मरता नहीं है पानी और उर्वरकता प्रदान करता रहता है इसमें हरी छाया में रहने वाले अनेक जीव जंतु ,कीड़े मकोड़े सहायता प्रदान करते हैं. यह खेती सिचाई के बिना की जाती है. जो पानी पीती नहीं है वरन पानी देती है.

हम पिछले २७ सालो से बिना जुताई की कुदरती खेती को ऋषि खेती के नाम से कर रहे हैं. जिस से हमारी खेती जो पहले जुताई आधारित खेती करने के कारण घटे का सौदा बन गयी थी अब लाभकारी खेती में तब्दील हो गयी.

बिना पानी भरे कुदरती धान की खेती 
बिना-सिचाई ,बिना-जुताई ,बिना-खाद का कुदरती गेंहूं। 
हमारा मानना है जब तक इस देश के योजनाकार ,किसान ,खेती के डॉ लोग आदी फसलोत्पादन के लिए की जारही जमीन की जुताई पर नियंत्रण नहीं करते है जब इस देश के खेतों और किसानो का विकास नहीं हो सकता है और देश रेगिस्थान में तब्दील होता जायेगा।बड़े बांधों को बनाने से कभी पानी की  समस्या का हल नहीं हो सकता है. खेतों को हरा भरा बनाने से पानी का स्थाई हल हो जाता है. इसलिए फुकुओकाजी जिन्होंने  करीब ७० साल बिना जुताई ,बिना खाद ,बिना निंदाई ,बिना सिंचाई करे खेती कर दुनिया को बता दिया है कि ये सब उपाय निरर्थक ही नहीं बहुत नुक्सान दायक हैं. पानी आसमान से नहीं आता ,पानी धरती से नहीं आता वह तो हरियाली से ही आता है.





Monday, March 17, 2014

सम्पूर्ण बेरोजगारी का हल ऋषि-खेती में है.

सम्पूर्ण बेरोजगारी का हल ऋषि-खेती में है.

धोगिकीकरण बेरोजगारी का कारण है, हल नहीं है। जब से हरित क्रांती के नाम से गहरी जुताई और जहरीले रसायनो का उपय़ोग ओधोगिक खेती के नाम से शुरू हुआ है तब से खेतिहरों  का गांवों से तेजी  से पलायन हुआ है अब स्थिती ये है कि गांवों में खेती के लिए काम वाले  नहीं मिल रहे हैं और शहरों में बेरोजगारों की भीड़ जमा हो रही है.

ऋषि खेती बिना जुताई और बिना रसायनो से की जाने  वाली खेती है. जिस से हर हाथ को काम और खान-पान दोनों बहुलता से उपलब्ध रहता है. पानी की कमी आज कल  सबसे बड़ी समस्या उभर कर आ रही है. दिल्ली और गुजरात जैसे ओधोगिक प्रदेश पानी की कमी के कारण प्यासे है. यह ओधोगिक खेती का ही परिणाम है. ओधोगिक खेती से पर्यावरण नस्ट हो जाता है हरियाली नहीं रहने के कारण पानी नहीं मिलता है असल में पानी ना तो आसमान से आता है ना ही वह धरती से आता है वह तो हरियाली से आता है. बड़े बाँध बना कर पानी की समस्या को दूर नहीं किया जा सकता है हरियाली नहीं रहेगी तो .नदियों में पानी कहाँ से आयेगा और बाँध कैसे भरेंगे।

  1. Natural Farming with Masanobu Fukuoka - YouTube

    www.youtube.com/watch?v=Ft0ylk4sU5M

    23-03-2012 - PermaculturePlanet द्वारा अपलोड किया गया
    Full-length documentary following the legendary MasanobuFukuoka on a visit to India.
औधोगिक खेती और कारखाने गैर -पर्यावरणीय विकास के सूचक हैं. पर्यावरण नहीं रहेगा  तो हम कैसे रह सकते हैं. आज देश में पढ़े लिखे और बहुत अधिक पढ़े लिखे बे रोजगारों को रोजगार देना उद्घोगों के बस की बात नहीं है. क्योंकि इस में खर्च ,समय प्रदूषण और गैर -टिकाऊपन की गम्भीर समस्या है.

जबकि ऋषि-खेती में सामान्य खेती से ८०% खर्च कम आता है. उत्पादकता  और गुणवत्ता के साथ साथ हरियाली तेजी से पनपती है जिस से कुदरती आहार,ईंधन ,चारा सब कुछ मिल जाता है.

लोन के खेल में फंसे किसान, 4 ने की खुदकुशी

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बैंक मैनेजर के लोन के खेल में फंसे किसान, 4 ने की खुदकुशी

मनोज कुमार [Edited By: स्‍वपनल सोनल]  23 फरवरी 2014 | अपडेटेड: 23:16 IST
Symbolic Image
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गाजियाबाद पुलिस ने फ्रॉड के एक ऐसे मामले का खुलासा किया है जिसके कारण अब तक 4 किसानों ने खुदकुशी कर ली है. इतना ही नहीं कई अन्‍य इस वजह से खेत-खलियान और घर बेच गांव छोड़ने पर मजबूर हो गए हैं. किसानों के साथ फ्रॉड का यह खेल किसी ऐरे-गैरे ने नहीं बल्कि सिंडिकेट बैंक के एक ब्रांच मैनेजर ने खेला, जो फिलहाल गाजियाबाद की क्राइम ब्रांच की गिरफ्त में है.
एक ओर जहां सरकार किसानों के लिए अधिक से अधिक सुविधाजनक लोन स्किम लेकर आ रही है, वहीं बैंक मैनेजर ललित कुमार सिंघल ने इसे किसानों के लिए जी का जंजाल बना दिया. ललित कुमार पर आरोप है कि उसने 200 किसानों के नाम फर्जी तरीके से बैंक लोन पास किया और इस तरह कुल 4 करोड़ रुपये का घोटाला किया. अपने दो साथियों के साथ मिलकर ललित कुमार ने किसानों के नाम और पते पर झूठे कागजात तैयार किए और वैसे लोन पास किए जो कभी किसानों को मिले ही नहीं.
...और आने लगे रिकवरी नोटिस
जानकारी के मुताबिक, बैंक मैनेजर और उसके दो साथी आनंद सिंघल और सतवीर सिंह ने फर्जी तरीके से किसानों के नाम लोन पास किए. इनमें आनंद सिंह लोन की उन फाईलो में बैंक गारंटर था और सतवीर बैंक का लीगल एडवायजर.
एक पीड़ित किसान ने बताया कि हम में से किसी को भी लोन की कोई जानकारी नहीं थी. लेकिन जब बैंक से बार-बार रिकवरी नोटिस आने लगा तो समस्‍या बढ़ने लगी. कई किसानों ने तो परेशान होकर खुदकुशी कर ली. जबकि कई गांव छोड़कर चले गए.
जमीन, ट्यूबवेल और मवेशी के लिए लोन
गाजियाबाद के सिटी एसपी शिव हर‍ि मीना ने बताया कि फर्जीवाड़े के इस खेल में ललित कुमार ने अपने साथियों के साथ मिलकर किसानों के नाम पर उनकी जमीन, ट्यूबवेल और भैंस-गाय के लिए लोन पास किया. इनमें से आनद सिंघल ने अक्‍टूबर 2013 में कोर्ट में सरेंडर कर दिया था जबकि सतवीर सिंह की हार्ट अटैक में मौत हो चुकी है. घोटाले का यह मुकदमा 2010 में भोजपुर थाने में दर्ज हुआ था. 2013 से क्राइम ब्रांच इस घोटाले की जांच कर रही है.

किसान ने लगाई फांसी

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समझौते के कागज को नोटिस समझ किसान ने लगाई फांसी

आशीष मिश्र [Edited By: स्‍वपनल सोनल] | लखनऊ, 16 मार्च 2014 | अपडेटेड: 15:23 IST
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वह किसान का बेटा था. मां-बाप ने उसका नाम 'आबाद' रखा था. यकीनन वे चाहते होंगे कि उनका लाल ताउम्र आबाद रहे, लेकिन घटती पैदावार और कर्ज के बोझ ने उसे बर्बाद कर दिया. देश में खेतीहर किसान, पैदावार की कमी और बैंक से बढ़ते कर्ज का का खौफ क्‍या होता है इसकी एक बानगी यूपी के महोबा में देखने को मिली. यहां एक किसान के घर अदालती कागज आता है. घर की माली हालत ऐसी है कि वह कर्ज चुका नहीं सकता. ऐसे में बिना कागज पढ़े अपनी जिंदगी से निराश वह किसान खुद को फांसी लगा लेता है, ज‍बकि वह कागज राष्‍ट्रीय लोक अदालत से समझौते के लिए भेजा गया पत्र था.
दरअसल, महोबा कचहरी में 12 अप्रैल को राष्‍ट्रीय लोक अदालत के जरिए किसानों व अन्य लोगों के वादों का निस्तारण किया जाना है. इसके तहत जिला विधिक प्राधिकरण ने शुक्रवार को आबाद मोहम्‍मद को पत्र भेजा. पत्र में 20 मार्च को न्यायालय में आकर सुलह समझौते के आधार पर लोन का निस्तारण किए जाने की बात थी, लेकिन अनपढ़ किसान उसे बैंक के अधिकारियों का नोटिस समझ बैठा और उसने शनिवार को घर पर पंखे के हुक से फांसी लगा ली.
तीन साल पहले लिया था कर्ज
जानकारी के मुताबिक, महोबा के मोहल्ला कसौराटोरी निवासी आबाद मोहम्मद की बीजानगर रोड पर पांच बीघा कृषि भूमि है. साल 2011 में आबाद ने भारतीय स्टेट बैंक महोबा से खेती के लिए 20 हजार रुपये कर्ज लिए थे, जिसे वह अब तक नहीं चुका पाया था.
बताया जाता है कि आबाद ने बैंक से बोरिंग करवाने के लिए पैसे लिए थे. उसने बोरिंग करवा भी दी थी. इससे हर साल अच्छी उपज मिलने लगी. खेत में उत्पादन क्षमता बढऩे से किसान ने बैंक का कुछ लोन अदा कर दिया. अब उसे ब्याज सहित करीब 15 हजार रुपये अदा करना था. इस साल खेत में अच्छी फसल भी तैयार थी, लेकिन अधिक बारिश और ओले गिरने के कारण उसकी फसल बर्बाद हो गई. बैंक का कर्ज अदा करना तो दूर आबाद के घर रोजी रोटी का संकट बढ़ गया.
मृतक के बेटे शफीक का कहना है कि शुक्रवार को बैंक का नोटिस आने के बाद से ही पिता परेशान थे. एसडीएम सत्यप्रकाश राय ने बताया कि बैंक का कुछ पैसा बकाया होने के कारण 12 अप्रैल को लगने वाली लोक अदालत में पैसा जमा कर समझौते को जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ने आबाद के पास पत्र भेजा था, जिसे पुलिसकर्मी ने तामील कराया था. तामील के बाद उसने फांसी लगा ली. जांच के लिए नायब तहसीलदार को भेजा गया है.