Friday, July 3, 2015

"जैविक खेती" का भ्रम

"जैविक खेती" का भ्रम 

भारत एक कृषि प्रधान देश है। जिसमे परम्परागत खेती किसानी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। यह खेती हजारों साल स्थाई रही है। किन्तु मात्र कुछ से सालो से "हरित क्रांति " के नाम से लाई गयी वैज्ञानिक खेती ने इसे बर्बाद कर दिया है , किसान खेती छोड़ रहे हैं , लाखों किसान आत्महत्या करने लगे हैं।

इसके पीछे खेती करने के लिए की जा रही गहरी जुताई का बहुत बड़ा योगदान है। जुताई करने से खेतों की खाद बह जाती है जमीन के अंदर पानी नहीं जाता है। इस कारण खेत कमजोर हो जाते हैं ,उनमे कमजोर फसलें उत्पन्न होती हैं जिनमे खरपतवारों और कीड़ों आदि का बहुत प्रकोप होता है। खेत मरुस्थल में तब्दील हो गए हैं।

हमारी देशी परम्परागत खेती किसानी में बिना जुताई की खेती का  चलन आज भी आदिवासी अंचलों में देखने को मिल जाता है। जिसमे बेगा ,उतेरा आदि हजारों सालो  से आज भी उतनी संपन्न हैं जितनी वो पहले थीं। जुताई आधारित देशी खेती किसानी में किसान जुताई के कारण   कमजोर होते खेतों में  कुछ साल के लिए जुताई बंद कर देते थे   जिस से खेत उपजाऊ हो जाते थे।

जब से जुताई आधारित वैज्ञानिक खेती पर प्रश्न चिन्ह लगा है तबसे "जैविक खेती " करने की बात वैज्ञानिकों के द्वारा की जाने लगी है। किन्तु बहुत कम लोग जानते हैं की "जैविक " यानि ओर्गानिक भी एक जुताई  आधारित वैज्ञानिक खेती है। इसमें भी जुताई करने से उतनी ही हानि होती है जितनी परम्परागत वैज्ञानिक खेती में हो रही है।

अधिकतर लोग "जैविक खेती " को गौ माता की धार्मिक आस्था के साथ जोड़ कर देखते हैं। किन्तु बहुत कम लोग यह जानते हैं की परम्परागत देशी खेती किसानी और आयातित जैविक खेती में जमीन आसमान का अंतर है।  यह भी जुताई के कारण होने वाले नुकसानों  के कारण रासयनिक खेती के बराबर गैर टिकाऊ है।


Friday, June 26, 2015

कुदरत को पहचानना मानव के बस की बात नहीं है !

कुदरत को पहचानना मानव के बस  की बात नहीं है !

फुकुओका 
धर  कुछ समय से मेरे मन में विचार आ रहा है कि किसी भी निष्कर्ष पर  पहुंचने के लिए किसानों के साथ  वैज्ञानिक, कलाकार, दार्शनिक और धार्मिक लोग यहां आएं और इन खेतों को देखें और आपस में बातचीत करें और सब लोग अपनी विशेषज्ञता को कुछ छण  भूल कर फिर निष्कर्ष निकालें की आखिर यह क्या है?

वैज्ञानिक सोचते हैं कि वे प्रकृति को समझ सकते हैं। वे यह दावा इसलिए करते हैं कि उनको इस बात का पूरा विश्वास हो चुका है कि वे प्रकृति को जान सकते हैं। वे प्रकृति की जांच कर, उसे मानव के लिए उपयोगी बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।  लेकिन मेरे विचार से  कुदरत  को समझना इंसान के बीएस की बात नहीं है।
यहां पहाडि़यों पर झोपडि़यों में रहते हुए प्राकृतिक खेती में मदद करते हुए कुछ सीखनेवाले युवाओं से, मैं अक्सर कहता हूं कि पहाड़ पर उग रहे वृक्षों को तो कोई भी देख सकता है। उनकी पत्तियों का हरापन तो नजर आता है। धान  के पौधें को भी वे देख सकते हैं। वे सोचते हैं कि उन्हें पता है हरियाली क्या है। रात-दिन कुदरत  के संपर्क में आते हुए वे समझने लगते हैं कि वे कुदरत  को जान गए हैं। लेकिन जैसे ही उन्हें लगने लगे कि वे कुदरत  को समझने लगे हैं, तब उन्हें समझ लेना चाहिए की वे गलत रास्ते पर हैं।

आखिर कुदरत  को समझना असंभव क्यों है?
 जिस चीज को हम कुदरत  मानते हैं, वह वास्तव में हर व्यक्ति के दिमाग में उठनेवाला उसका अपना विचार मात्र  है।
 जिन्हें वास्तविक प्रकृति दिखाई देती है वे हैं  बच्चे   वे ही बगैरसोच समझ के कुदरत को सीधे  और स्पष्ट देख सकते  हैं।
 यदि हम पौधें के नाम भी पता कर लेते  हैं कि यह नारंगी की प्रजाति का मेंडेरिन संतरा है, या वह देवदार-जाति की चीड़ पेड़  है, तो भी कुदरत  अपने असली रूप में नहीं नजर आती है।

पूर्णता से अलग करके देखी हुई कोई भी वस्तु असली  नहीं होती है।

भिन्न२  डाक्टरी  से जुड़े लोग  जब खेतों में धान  के  एक  पौधे  को जांचते  हैं, तो कीड़ों की बीमारियों के विशेषज्ञ को केवल कीड़े से हुई क्षति ही नजर आती है, खादों के  विशेषज्ञ केवल पौधे में पोषकता की कमी  पर ध्यान देता है।

आज की स्थिति में इस डाक्टरी की अज्ञानता से बचना ना  मुमकिन है।

उदाहरण के तौर पर, अनुसंधान  केंद्र से आए एक डाक्टर  से, जब वह धान  के टिड्डे और मेरे खेत की मकडि़यों की जांच-पड़ताल कर रहा था, मैंने कहा,  महोदय, चूंकि आप मकडि़यों पर अनुसंधान  कर रहे हैं, इसलिए आपकी दिलचस्पी, टिड्डे के बहुत से अन्य कुदरती -दुश्मनो  में से केवल मकड़ी  में ही है।

इस साल  मकडि़यां बहुत पैदा हो गई है, लेकिन पिछले साल  यहां टोड  बहुत थे,  इसके पिछले साल यहाँ संख्या मेंढकों बहुत  थी।
ऐसे परिवर्तन यहां अक्सर देखे जा सकते हैं।

जीव जंतु ,कीड़े मकोड़ों  के आपसी संबंधों  की जटिलताएं भी इतनी है कि किसी भी विशेष रिसर्च  के तहत किसी खास वक्त पर किसी एक कीड़ों के दुश्मन  की भूमिका को समझ पाना असंभव है। कुछ ऐसे भी मौसम होते हैं, जब पत्तियों पर बैठने वाले टिड्डों की आबादी कम होती है तब मकडि़यों की संख्या ज्यादा होती है ऐसे भी दिन होते हैं जब बारिश खूब हो जाने से मेंढक खूब हो जाते हैं और मकडि़यों को चट कर जाते हैं या फिर  बारिश कम होने से न तो टिड्डे  नजर आते हैं न मेंढक दिखाई देते हैं।

कीट- नियंत्रण  की सामान्य जैविक विधियां जो खुद कीटों की परस्पर संबंधों  को नजरअंदाज करती है, बिल्कुल बेकार हैं । मकडि़यों और टिड्डों पर रिसर्च  करते समय मेंढकों और मकडि़यों के बीच के संबंधों  पर भी विचार किया जाना चाहिए तब  बात इस मुकाम पर पहुंचेगी जिसमे  हमें मेंढक विशेषज्ञ की भी जरूरत पड़ेगी, बाद में इस शोध् में मकड़ी, टिड्डा तथा चावल विशेषज्ञ के अलावा एक जल-प्रबंध्न विशेषज्ञ को भी शामिल करना  होगा,  इसके अलावा इन खेतों में मकडि़यों की भी चार या पांच किस्में हैं।

मुझे याद है कुछ बरस पहले एक व्यक्ति सुबह-सुबह मेरे घर दौड़ा आया और पूछने लगा कि, ‘क्या मैंने अपने खेतों को रेशम की जाली या किसी ऐसी चीज से ढंक दिया है।’ मेरी समझ में नहीं आया कि वह क्या कह रहा है सो मैं खुद अपनी आंखें से मामला क्या है, यह देखने भागा तो पाया की हम लोगों ने कुछ ही समय पूर्व चावल की फसल काटी थी, और रातों-रात धान  के ठूंठ और नीचे उगी हुई घास मकड़ी के जालों के ढंक गई थी। वही रेशम की चादर जैसे दिखाई दे रही थी  सुबह के कोहरे में चमकते और लहराते वे मकड़ी के जाले एक शानदार दृश्य उपस्थित कर रहे थे।

इस अद्भुत घटना के बारे में खास बात यह है कि जब भी ऐसा होता है और यह बहुत दिनों में एक
बार होता है, तो वह सिर्फ  एक या दो दिनों तक टिकता है। ध्यान से देखने पर यह पता चलेगा कि हर वर्ग इंच क्षेत्रा में कई-कई मकडि़यां हैं। वे खेत में इतनी सघनता से फैली रहती हैं कि आपको कहीं, खाली जगह दिखाई ही नहीं देगी। एक चैथाई एकड़ छेत्र  में तो हजारों-लाखों की तादाद में भी हो सकती हैं , दो-तीन दिन बाद खेत पर जाने पर कई-कई गज लंबे जालों के टुकड़े टूट कर हवा में लहराते हैं, और हर जाले के साथ पांच-छह मकडि़यां चिपकी हुई होती है। यह नजारा वैसा ही होता है, जैसे हवा में देवदार के बीज या डेंडेलियन के रोयें उड़ गए हो। नन्हीं-नन्हीं मकडि़यों जालों के टुकड़ों से चिपटी आसमान मैं तैरती-इतराती रहती है। इस अद्भुत प्राकृतिक लीला को देखकर आप सहमत होंगे कि कवियों और कलाकारों को भी इस सम्मेलन में शरीक होेना चाहिए।

जैसे ही रसायन खेत में छिड़के जाते हैं, यह सब क्षण भर में नष्ट हो जाता है। एक बार मैंने सोचा कि चूल्हों की राख इन पर छिड़कने में कोई हर्ज नहीं होगा।  उसका  नतीजा यह हुआ कि दो या तीन दिन बाद खेत में एक भी मकड़ी नहीं थी। राख के कारण जाली के तिनके अपने आप बिखर गए थे, और हजारों-लाखों मकडि़यां मुट्ठी भर, मासूम नजर आनेवाली राख की बलि चढ़ गई। कीटनाशक का प्रयोग सिर्फ  टिड्डों या उसके कुदरती दुश्मनो  से निजात पाने का ही मामला नहीं है। इससे कुदरत  के कई जरूरी काम  भी प्रभावित होते हैं।
शरद  ऋतु में इन मकडि़यों के झुंडों का धान  के खेतों में आने, और इस तरह अचानक गायब हो जाने का रहस्य अभी तक समझा नहीं जा सका है। कोई नहीं जानता कि वे यहाँ  पर कहां से आती हैं, सर्दियों  में कैसे जिंदा रहती हैं तथा गायब होने पर वे कहां चली जाती हैं।

यानी रसायनों का उपयोग केवल कीटनाशक -वैज्ञानिकों के मतलब की बात नहीं है , दार्शनिकों, धर्म गुरुओं , कलाकारों तथा कवियों को भी यह तय करने में मदद करनी होगी कि रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग करना चाहिए या नहीं, या जैव- कीट नाशक  के प्रयोग भी सही हैं या नहीं ?

इस जमीन पर चैथाई एकड़  से हम लगभग एक टन ( एक किलो /वर्ग मीटर )  चावल तथा इतनी ही रबी  की गेंहूँ /सरसों की फसल लेेंगे, यदि फसल  ऊपर   तक पहुंच जाती है, जैसा कि कई बार होता है, तो इससे ज्यादा पैदावार आपको खोजने पर भी शायद कहीं भी पैदा होती नहीं मिलेगी।

 चूंकि इस अनाज की खेती के साथ आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक  का कोई वास्ता नहीं रहा, यह आधुनिक विज्ञान की गलतयों  का एक प्रत्यक्ष प्रमाण है।

 जो भी यहां आकर इन खेतों को देखता है वह मान लेता है कि  कुदरत को समझ पाना इंसान के बस  की बात नहीं है , विज्ञान ने हमारी केवल इतनी सेवा की है की उसने हमे बता दिया है की हम कुछ नहीं जानते हैं।



Tuesday, June 23, 2015

खरपतवारों के संग गेंहूँ /सरसों /चावल और फलों की खेती

खरपतवारों के संग  गेंहूँ /सरसों /चावल और फलों की खेती 

फुकुओका 
न खेतों में अनाज और क्लोवर   के साथ कई विभिन्न प्रकार के खरपतवार भी उग रहे हैं। खेतों में जो धान  का पुआल पिछली पतझड़ के मौसम में बिछाया गया था, वह सड़कर अब बढि़या जैविक खाद  में बदल गया है। पैदावार प्रति चैथाई एकड़ एक टन (एक किलो / वर्ग मीटर ) होने की संभावना है।
घास के  विशेषज्ञ प्रोफेसर कावासे तथा प्राचीन पौध  पर शोध् कर रहे प्रोफेसर  ने कल जब मेरे खेतों में गेंहूँ  और हरियाली से भरी चादर बिछी देखी तो उसे उन्होंने कलाकारी का एक खूबसूरत नमूना कहा। एक स्थानीय किसान, जिसने मेरे खेतों में खूब सारी खरपतवार देखने की उम्मीद की थी, उसे यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ कि कई अन्य तरह के पौधें के बीच गेंहूँ  और सरसों  खूब तेजी के साथ बढ़ रही है । अनेक  विशेषज्ञ भी यहां आए हैं और उन्होंने भी खरपतवार देखी, चारों ओर उगती क्लोवर  और खरपतवारों को देखा  और अचरज से मुंडी  हिलाते हुए यहां से चल दिए।
बीस साल पहले जब मैं अपने फल-बागों में स्थाई भूमि आवरण उगाने में लगा था, तब देश के किसी भी खेत या फल-बाग में घास का एक तिनका भी नजर नहीं आता था। मेरे जैसे बागानों को देखने के बाद ही लोगों की समझ में आया कि फलों के पेड़, घास और खरपतवार के बीच भी बढ़ सकते हैं। आज, नीचे घास उगे हुए फलबाग आपको जापान में हर कहीं नजर आ जाएंगे तथा बिना घास-आवरण के बागान अब दुर्लभ हो गए हैं।
यही बात अनाज के खेतों पर भी लागू होती है। चावल, गेंहूँ  तथा सरसों  को, सारे साल भर, क्लोवर  और खरपतवार से ढंके खेतों में भी मजे से उगाया जा सकता है।
इन खेतों में बोनी और कटनी के  कार्यक्रम को  मैं जरा विस्तार से बताता हूँ।  अक्टूबर के प्रारम्भ में, कटनी से पहले क्लोवर और तेजी से बढ़ने वाली गेंहूँ /सरसों  की फसल के बीज धान  की पक रही फसल के बीच ही बिखेर दिए जाते हैं।
गेंहू या सरसों  और क्लोवर  के पौधे जब  एक-दो इंच उपर तक आ जातें हैं तब  तक चावल भी पक कर कटने योग्य हो जाता है। चावल की फसल काटते समय क्लोवर  और गेंहूँ  के नन्हे पौधे  किसानों के पैरों तले कुचले जाते हैं, लेकिन उन्हें फिर  से पनपने में ज्यादा समय नहीं लगता। धान  की गहाई पूरी हो जाने के बाद उसकी  पुआल को जहाँ का तहाँ खेतों में  फैला दिया जाता है।
यदि धान  शुरू बरसात  में सीधा बोया  गया हो और बीजों को ढांका  न गया हो तो बीजों को अक्सर चूहे या परिंदे खा जाते हैं, या वे जमीन में ही सड़ जाते हैं। इससे बचने के लिए में धान  के बीजों को बोने से पहले क्ले मिट्टी की गोलियों में लपेट देता हूं। बीजों को एक टोकरी या चपटे बरतन में गोल-गोल और आगे-पीछे हिलाया जाता है। इसके बाद उन पर महीन क्ले मिट्टी  छिड़क दी जाती है, और बीच-बीच में उन पर पानी का ‘हल्का’ सा छिड़काव भी किया जाता है। इस के करीब आध इंच व्यास की गोलियां बन जाती हैं।
गोलियां बनाने का एक और तरीका भी है। पहले धान के बीजों को कुछ घंटों तक पानी में  डुबो दिया जाता है। फिर  धान को गीली मिट्टी में हाथों या पैरों से गूंध् लिया जाता है। इसके बाद तार की मुर्गा जाली में से इस मिट्टी  को दबाकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बदल दिया जाता है  को एक-दो
दिनों तक थोड़ा सूखने दिया जाता है ताकि हथेलियों से उनकी गोलियां बनाई जा सकेें। सबसे अच्छा तो यह होगा कि हर गोली में एक ही बीज हो। एक दिन में इतनी गोलियां बन जाएंगी, जिनसे कई एकड़ में बुआई  हो सकती है।
परिस्थितियों के मुताबिक कभी-कभी मैं इन गोलियों को बोने के पहले उनमें अन्य अनाजों या सब्जियों के बीज भी रख देता हूं।
मध्य नवम्बर से मध्य दिसंबर के बीच कीअवधि  मैं धान  की बीजों वाली इन गोलियों को गेंहूँ या सरसों  की नई फसल के बीच बिखेर देता हूं। ये बीज बरसात  में भी बोए जा सकते हैं।
फसल को सड़ाने के लिए खेत पर कुक्कट खाद की एक पतली परत भी फैला दी जाती है। इस तरह पूरे साल की बोनी पूरी होती है।
मई में रबी  के अनाज की फसल काट ली जाती है। उसकी गहाई के बाद उसकी नरवाई  भी खेत में बिखेर दी जाती है।
इसके बाद खेत में एक हफ्रते या दस दिन तक पानी बना रहने दिया जाता है। इससे क्लोवर  और खरपतवार कमजोर पड़ जाती है, और चावल को गेंहूँ /सरसों की नरवाई  में से अंकुरित हो कर बाहर आने का मौका मिल जाता है। जून और जुलाई में बारिश का पानी ही पौधें के लिए पर्याप्त होता है। अगस्त महीने में खेतों में से ताजा पानी सिर्फ  बहाया जाता है, उसे वहां रुकने  नहीं दिया जाता है। ऐसा हफ्ते  में एक बार किया जाता है। इस समय तक  कटनी का समय हो जाता है।
 कुदरती तरीके  से  चावल और गेंहूँ / के अनाज की खेती का वार्षिक चक्र ऐसे चलता है। बोनी और कटनी का यह तरीका  कुदरत के इतना करीब है  कि उसे कोई कृषि तकनीक कहने की बजाए प्राकृतिक ही कहेगा।
चैथाई एकड़ के खेत में बीज बोने या पुआल/नरवाई  फैलाने में किसान को एक या दो घंटे से ज्यादा का समय नहीं लगता। कटनी के काम को छोड़कर, गेंहूँ  की फसल को अकेला किसान भी मजे से लगा  सकता है। एक खेत में चावल की खेती का जरूरी काम भी दो या तीन लोग ही परम्परागत जापानी हसियों  की मदद से निपटा लेते हैं।
अनाज उगाने की इससे सरल तरीका  और कोई नहीं हो सकता  है।
 इस तरीके से  बीज बोने तथा पुआल/नरवाई  फैलाने के अलावा खास कुछ भी नहीं करना पड़ता, लेकिन इस सीधी -सादी तकनीक तक  पहुंचने में मुझे तीस बरस का समय लग गए।
खेती का यह तरीका जापान की प्राकृतिक स्थितियों के अनुसार विकसित हुआ है, लेकिन मैं सोचता हूं कि प्राकृतिक खेती को अन्य क्षेत्रों में अन्य देसी फसलें उगाने के लिए भी अपनाया जा सकता है। मसलन जिन इलाकों में पानी इतनी आसानी से उपलब्ध् नहीं होता, वहां पहाड़ी चावल, ज्वार, बाजरा या कुटकी को उगाया जा सकता है। वहां क्लोवर  की जगह अन्य दलहन  की किस्मों का जैसे  बरसीम ,रिजका ,मेथी  मोठ खेतों को ढंकने (हरी खाद ) के लिए ज्यादा अच्छे उपयोगी साबित हो सकते हैं। प्राकृतिक कृषि उस इलाके की विशिष्ट परिस्थितियों के मुताबिक अपना अलग रूप धरण कर लेती है, जहां उसका उपयोग किया जा रहा हो।
इस प्रकार की खेती की शुरुवाद  करने से पूर्व कुछ थोड़ी निंदाई, छंटाई या खाद डालने  की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन बाद में हर साल इसमें क्रमशः कमी लाई जा सकती है। आखिर में जाकर सबसे महत्वपूर्ण चीज कृषि
करने के सोच पर निर्भर है। 

जहरीले कीटनाशकों का उपयोग

जहरीले कीटनाशकों का उपयोग

फुकुओका 
मेरे ख्याल में अब भी कुछ लोग ऐसे होंगे जो सोचते हैं कि यदि उन्होंने रसायनों का उपयोग नहीं किया तो उनके फल वृक्ष तथा फसलें,  देखते-देखते मर  जाएगी। जब कि सच्चाई यह है कि इन रसायनों का ‘उपयोग करके ही’ वे ऐसी परिस्थितियां निर्मित कर लेते हैं  कि उनका  भय साकार हो जाता है।
हाल ही में जापान में लाल देवदार वृक्षों की छाल को घुन लगने से भारी क्षति पहुंची रही हैै। वन अधिकारी  इन्हें काबू में लाने के लिए हेलिकाप्टरों के जरिए दवाओं का छिड़काव कर रहे हैं। मैं यह नहीं कहता कि अल्प समय के  लिए इसका सकारात्मक असर नहीं होगा। मगर मैं जानता हूं कि इस समस्या से निपटने के लिए एक और भी तरीका है।
खेतों में रासायनिक जहर डालने से आसपास की
मछलियाँ ,मेंढक ,सांप भी मर जाते है। 
आधुनिक शोध  के मुताबिक घुन का संक्रमण प्रत्यक्ष न होकर मध्यवर्ती गोल-कृमियों के बाद ही होता है। गोलकृमि तने में पैदा होकर, पोषक तत्वों व पानी के बहाव को रोकते हैं, और उसीसे देवदार मुरझा कर सूख जाता है। बेशक, इसका असली कारण अब तक अज्ञात है।
गोल कृमियों का पोषण वृक्ष के तने के भीतर लगी फफूंद से होता है। आखिर पेड़ के भीतर यह फफूंद इतनी ज्यादा कैसे फैल गई? क्या इस फफूंद का बढ़ना, गोल कृमियों के वहां आने के बाद शुरू हुआ? या गोल कृमि वहां इसलिए आए कि वहां फफूंद पहले से थी? यानी असली ससवाल  घूम-पिफरकर यहीं आकर ठहरता है कि पहले क्या आया? गोल कृमि या फफूंद?
एक और भी ऐसा सूक्ष्म जीवाणु है, जिसके बारे में हम बहुत कम जानकारी रखते हैं, और जो हमेशा फफूंद के साथ ही आता है, और वह फफूंद के लिए जहर का काम भी करता है। हर कोण से प्रभावों
और गलत प्रभावों का अध्ययन करने के बाद निश्चयपूर्वक केवल एक यही बात कही जा सकती है कि देवदार के वृक्ष असाधरण संख्या में सूखते जा रहे हैं।
लोग न तो यह जान सकते हैं कि देवदार की इस बीमारी का असली कारण क्या है, और न उन्हें यह पता है कि उनके ‘इलाज’ के अंतिम परिणाम क्या होंगे। यदि आप बिना सोचे-समझे प्रणाली से छेड़-छाड़ करेंगे तो आप भविष्य की किसी अन्य विपदा के बीज बो रहे होंगे।
  मुझे अपने इस ज्ञान से कोई खुशी नहीं होगी कि गोल कृमियों से होनेवाली तात्कालिक हानि को रासायनिक छिड़काव के जरिए कम कर दिया गया है। इस तरह की समस्याओं को, कृषि रसायनों का उपयोग करते हुए हल करने का यह तरीका बहुत ही गलत  हैं इससे भविष्य में समस्याएं और भी विकट रूप ले लेेंगी।
प्राकृतिक कृषि के ये चार सिद्धांत जुताई नहीं ,निंदाई नहीं, कोई रासायनिक उर्वरक या तैयार की हुई खाद नहीं, रसायनो  का कोई उपयोग नहीं , प्रकृति के आदेशों का पालन करते हैं तथा कुदरती सम्पदाओं की रक्षा करते हैं।मेरी कुदरती खेती का यही मूल मन्त्र है । अनाज, सब्जियों और फलों की खेती का  सार यही है।

खरपतवारें बहुत उपयोगी हैं !

खरपतवारें  बहुत उपयोगी हैं !

फुकुओका 
रपतवारों को मारते समय  इन महत्वपूर्ण बिंदुओं को याद रखना उचित होगा।
जैसे ही भूमि की जुताई करना बंद कर दिया जाता है, खरपतवार की मात्रा बहुत घट जाती हैं कहीं तो वो बहुत कम हो जाती हैं।
पिछली फसल को काटने के पूर्व ही यदि नई फसल के बीज बो दिए जायेंगे तो इस फसल के बीज खरपतवार के पहले अंकुरित हो जाएंगे।
धान और क्लोवर एक साथ पनप रहे हैं। 
 रबी  की खरपतवारों  के बीज खरीफ की चावल की फसल के काटने  के बाद ही अंकुरित होते हैं , लेकिन तब तक रबी  की गेंहूँ /सरसों  काफी बढ़ जाती है।
इसी प्रकार गर्मी की  खरपतवार गेंहूँ  और सरसों की फसले कटने के बाद अंकुरित होती  है, लेकिन उस समय तक अगली  फसल काफी  बढ़ चुकी होती है । बीजों की बोनी इस ढंग से करें कि दोनों फसलों के बीच के अंतर न रहे। इससे अनाज के बीजों को खरपतवार से पहले ही अंकुरित हो, बढ़ने का मौका मिल जाता है।
फसल कटनी के तुरंत बाद खेतों में पुआल/नरवाई आदि को फैला देने से खरपतवार का अंकुरण बीच में ही रुक जाता है। अनाज के साथ ही भूमि आवरण के रूप में सफेद क्लोवर  भी बो देने से खरपतवार को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।
खरपतवार की समस्या से निपटने का प्रचलित तरीका मिट्टी को जोतने। खोदने  का है, लेकिन जब हम ऐसा करते हैं तो मिट्टी के भीतर  गहरे बैठे हुए, वे बीज, जो वैसे अंकुरित नहीं हुए होते, सजग होकर अंकुरित हो उठते हैं। साथ ही तेजी से बढ़ने वाली किस्मों का इन परिस्थितियों में बढ़ने का बेहतर मौका मिल जाता है। अतः आप कह सकते हैं कि जो किसान जमीन की गहरी जुताई  करके खरपतवार को काबू में लाने का प्रयत्न करता है, वह वास्तव में अपनी मुसीबत के  बीज बो रहा होता है।

Saturday, June 20, 2015

विश्व योग दिवस भारत सरकार की अच्छी पहल !

विश्व योग दिवस भारत सरकार की अच्छी पहल !


  भारत की योग विंध्या का विश्व योग दिवस पर पूरे देश में प्रचार कर सरकार ने एक अच्छी पहल की है।  इस कार्यक्रम की यह खूबी रही कि स्वम् प्रधानमंत्रीजी ने योग कर लोगों को प्रेरित किया। हम इस आयोजन की सराहना करते हैं माँननीय प्रधान मंत्रीजी को इस के लिए बधाई देते हैं।

हम विगत  तीन  दशकों से "ऋषि खेती " का अभ्यास कर रहे हैं। ऋषि जन जंगलों में कुदरत के साथ जीवन जीते थे आज भी  उनके द्वारा प्रदिपदित ज्ञान जीवित है उसका उदाहरण योग के रूप में आज भी उपलब्ध है। ऋषि मुनि जंगलों में रहते थे वे कुछ नहीं करते थे। फिर भी उनके द्वारा दिया गया ज्ञान आज की वैज्ञानिक विकृतियों से बचा सकता है।

गाँव देहात में खेती किसानी और जंगलों में कुदरती जीवन जीने वालों के लिए योग जीवन है ,किन्तु शहरों और महानगरों में जहाँ हरियाली की कमी है और वाहनो ,फैक्ट्रियों के धुंए के बीच जहाँ कुदरती खान पान और हवा उपलब्ध नहीं है वहां योग का महत्व अधिक है। उन्हें इस योग के माध्यम से अपने वातावरण को "ऑक्सीजन रिच " बनाने की और ध्यान देने की जरूरत है। धुंए पर रोक लगाने की जरूरत है। बिजली और पेट्रोल के उपयोग को घटाने की जरूरत है। कुदरती आँगन बाड़ी और कुदरती रूफ गार्डनिंग को बढ़ाने की जरूरत है।

नगरों में गंदे पानी और घरेलु कचरे की गंभीर समस्या है इसके कारण मीथेन जैसी हानिकर जैसे बढ़ रही हैं उनके सही निष्पादन की जरूरत है। बायो गैस प्लांट की तकनीक से इस समस्या को हल किया जा सकता है।
गेरकुदरती खेती किसानी हमारे पर्यावरण को सबसे अधिक दूषित कर रही है। जमीन की जुताई और जहरीले रसायनो के कारण खेत मरुस्थल में तब्दील हो रहे हैं कैंसर महामारी का रूप ले रहा है।

ऋषि खेती को अमल में लाकर  हम खेती किसानी से जुडी समस्याओं का हल कर सकते हैं।  अपने पर्यावरण को शुद्ध बना सकते हैं। मोदीजी का यह कहना की योग केवल एक सर्कस नही है उसे यदि हम सर्वांगीण विकास के लिए उपयोग करते हैं तभी योग दिवस मनाना सफल रहेगा।

भारत  में भूतपूर्व प्रधान  माननीय अटलबिहारी बाजपेयी जी ने 'ऋषि खेती ' ,आयर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा को बढ़ाने  में बहुत महत्वपूर्ण काम किया था किन्तु उनके बाद इस काम पर आगे कोई काम नहीं हुआ है।
एलोपेथी के नाम से देश में नकली डाक्टरी का धंधा बहुत पनप रहा है जिस पर रोक लगाने की जरूरत है।
आयुर्वेद चिकत्सा के नाम पर  साबुन ,टूथपेस्ट ,कैप्सूल ,बोतल और डिब्बा बंद दवाइयों का बहुत भ्रामक प्रचार हो रहा है उस पर रोक लगाने की जरूरत है। सभी डिब्बा और बोतल बंद उत्पादों की कड़ाई से जाँच का प्रबंध होना चाहिए। 

फुकूओकाजी कहते हैं मेरी कुदरती खेती को देखिये !

फुकूओकाजी कहते हैं मेरी कुदरती खेती को देखिये !

जुताई , जैविक खाद ,रासायनिक उर्वरक ,कीट एवं खरपतवार नाशकों का उपयोग नहीं।  रोपा लगाना ,कीचड़ मचाना ,पानी भर कर रखने की जरूरत नहीं है। 
कुदरती गेंहूँ की फसल 
मैं मानता हूं कि धान  के पुआल के एक तिनके से  बहुत बड़े बदलाव की शुरुआत  हो सकती है, देखने से यह तिनका छोटा सा और महत्वहीन नजर आता है शायद ही किसी को विश्वास होगा कि वह किसी इंकलाब की शुरुवाद  कर सकता है। लेकिन मुझे इस तिनके के वजन और ताकत  का अहसास हो चुका है। मेरे लिए यह क्रांति  वास्तविक है।
धान की पुआल की धकावन 

जरा सरसों  और गेंहूँ  के इन खेतों को देखिए  इस में पक रही फसल से प्रति चैथाई एकड़ लगभग    एक टन प्रति चौथाई एकड़  (एक किलो प्रति वर्ग  मीटर ) पैदावार ली जा सकेगी। मेरे ख्याल से यह एहिमे प्रिफैक्चर जिले - जो कि जापान के सबसे उर्वरक इलाकों में से है की पैदावार के बराबर है और इन खेतों को पिछले पच्चीस सालों से जोता नहीं गया है।
इनकी बुआई के नाम पर मैं सिर्फ गेंहूँ  और सरसों  के बीजों को रबी  के मौसम में, जबकि धान  की फसल खेतों में खड़ी होती है,  बिखेर देता हूं। कुछ हफ़्तों  बाद मैं धान  की फसल काट लेता हूं और धान  का पुआल सारे खेत में फैला देता हूं।
सरसों (गूगल से लिए गया चित्र )
यही तरीका धान  की बुआई के लिए भी अपनाया जाता है। रबी   की इस फसल को 20 मई के आसपास काट लिया जाएगा। फसल पूरी तरह से पकने के लगभग दो सप्ताह पूर्व मैं धान  के बीजों को सरसों  और गेंहूँ  की फसल पर बिखेर देता हूं।  धान  की कटाई तथा गहाई हो जाने के बाद मैं इसका पुआल भी खेतों में बिखेर देता हूं।
फुकुओका  धान की फसल 
मेरे खयाल से धान  तथा रबी  की फसलों की बुआई के लिए इस एक ही विधि का  उपयोग करना, इस प्रकार की खेती में ही किया जाता है।

 लेकिन एक तरीका इससे भी आसान है। अगले खेत की तरफ चलते हुए मैं आपको बताना चाहूंगा कि वहां उग रहा धान  पिछली रबी   में  गेंहूँ / सरसों  की फसल के साथ ही बोया गया था। इस खेत में बुआई का सारा काम नए साल के पहले दिन तक निपटा लिया गया है।
क्लोवर के साथ पनप रही धान की कुदरती फसल 

इन खेतों में आप यह भी देखेंगे कि वहां सफेद क्लोवर  और खरपतवार भी उग रही है। धान  के पौधें के बीच सफेद क्लोवर  अक्तूबर महीने के प्रारंभ में, यानी गेंहूँ  और सरसों  से कुछ पहले बोई गई थी।
खरपतवार उगने की मैं परवाह नहीं करता क्योंकि उनके बीज अपने आप आसानी से झड़ते और उगते रहते हैं।
अतः इन खेतों में बुआई का क्रम इस प्रकार रहता हैः अक्तूबर के प्रारंभ में सफेद क्लोवर (स्थानीय भूमि ढकाव दलहनी फसल )  धान  के बीच बिखेरी जाती है और जाड़े की फसलों की बुआई वहीं उस महीने के मध्य हो जाती है। नवम्बर की शुरुवाद  में धान  काट लिया जाता है और उसके बाद अगले वर्ष के लिए धान  के बीज बो दिए जाते हैं जो सुप्त अवस्था में वहीं पड़े रहते हैं अपने समय पर उग आते हैं और  सारे खेत में पुआल फैला दिया जाता है। आपको यहां जो सरसों  और गेंहूँ  दिखलाई दे रही है, उसे इसी ढंग से उगाया गया है।
चैथाई एकड़ में खेत में रबी  की फसलों और धान  की खेती का सारा काम केवल एक-दो व्यक्ति ही कुछ ही दिनों में निपटा लेते हैं। मेरे ख्याल से अनाज उगाने का इससे ज्यादा आसान, सरल और बिना लागत का  तरीका कोई अन्य नहीं हो सकता है।
धान की पुआल के नीचे पनपती गेंहूँ और सरसों की फसल 
खेती का यह तरीका आधुनिक  कृषि की तकनीकों के  विपरीत है। यह वैज्ञानिक खेती तथा परम्परागत कृषि तकनीकों  दोनों को बेकार सिद्ध  कर देता है। खेती के इस तरीके  जिसमें  मशीनों ,  मानव निर्मित  खादों तथा रसायनों का उपयोग नहीं होता है।  जबकि पैदावार  औसत जापानी खेतों के बराबर या कई बार उससे भी ज्यादा पैदावार हासिल करना संभव है। इसका प्रमाण यहां आपकी आंखों के सामने  है।