Tuesday, August 26, 2014

Growing together with a poplar plantation

Growing together with a poplar plantation
OASIS PLANTATION AT KLANAUR VILLAGE STANDING KESHAV BANSAL & MAHESH GOYAL
I am Keshav Bansal, M.Phil Public Admin from Bhatinda in Punjab. I worked as lecturer, Principal in rural areas of Punjab, during my 30 year. I aspired a job of doing agriculture in villages.
In our area only paddy-wheat-cotton cycle is there. Water level is going down day by day. Farmers are not ready to change their mind.
I left my job and started searching into a scope of agriculture. During family visits to Haridwar I saw lot of tree plantations in the fields. I visited Yamunagar, Hoshiarpur and FRI Dehradun and went through the system of Agro forestry in Haryana, Punjab and U.P. After calculating profits and scope, I planned to do the same.
After consulting with experts, friends, different farmers and relatives we decided to start a poplar plantatation in Yamunanagar Distt. of Haryana. I prepared a complete project report, refined by the accounting experts and same was put in PNB Bank for Finance.
The project was approved and financed by PNB. We created an Organised OASIS AGROINFRA LTD, acquired 300 acres of land from different farmers on lease for 5-6 years duration and started poplar Plantation in January 2011 along with different inter crops like sugarcane, wheat, maize, zimikand, turmeric, potato, mustard and other suitable crops.
We achieved wonderful growth of poplars and crops. The following year in 2012 we acquire 500 acres of land and planted poplars, eucalyptus there in. We made SELF-HELP Groups and handed over land in small pieces to them for working, caring and supervision of all the fields on sharing basis. We have given work to lot of families, a lot of small farmers and handsome lease to land owners.
Later on after taking land on lease in 2013 we planted poplars in 200 acres. Now in 2014 we are planting poplar trees in 200 acres of land totalling 1200 acres land, this is a lifelong project with handsome income and satisfaction doing creative work which is eco-friendly.
There is a lot of chances to rise in this field and to provide job and work to others. We are maintaining day to day reports and growth progress charts, we have achieved wonderful growth in all our plantations. One can earn minimum 1 lac INR or 1700 USD every year from one acre of land after all the expenses.
We think we are the largest poplar plantation in North India, and we will increase the area every year.
We have our own nurseries of poplars for own use and for sale purpose. We are motivating farmers in Punjab & Haryana to plant trees along with intercrops instead of traditional crops. We supplied poplar baby plants to farmers on concession bases to plant the same in their fields and guide them method of plantation and caring the same.
Every year with the growth of poplar plants different new farmers are contacting us for poplar plantation day by day our network of plantation is increasing. There is a great scope of agro forestry for the farmers, younger’s and other entrepreneurs, those who want to do something, just an effort and confidence is required.
Photo: Oasis Plantation at Klanaur Village – With Keshav Bansal and Mahesh Goyal
Blogpost and photo by Keshav Bansal (Bathinda, Punjab-India) – oasisbtd(at)gmail.com
 

Saturday, August 9, 2014

Kailash Murthy (Rishi kheti ) Mysore Karnatka.

 1-https://www.youtube.com/watch?v=FcxxVjQTO8Q

2-https://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=czid5jujFc4

Sunday, August 3, 2014

NATURAL AGRO FORESTRY

ऋषि जंगल खेती 

जुताई ,खाद ,दवाई ,मोनोकल्चर नहीं (ALL IN ONE )

 










Saturday, July 12, 2014

DROUGHT REASON AND SOLUTION

सूखे की समस्या का कारण और निवारण 

 
इन दिनों हमारा देश अब तक के सबसे बड़े सूखे की समस्या से ग्रस्त है। अधिकतर छोटे बड़े बाँध , छोटे बड़े तालाब तालाब ,कुए ,नलकूप आदि सूख गए हैं।  हर रोज किसानो की आत्म हत्या के  समाचार आ रहे हैं।
पिछले साल मध्य भारत में बहुत पानी गिरा था किन्तु इस साल अभी तक पानी  नहीं के बराबर गिरा है। अनेक खेतों की फसल सूख गयी है।  पीने तक के पानी का गम्भीर संकट उत्पन्न हो गया है।

इस समस्या का मूल कारण खेती करने के लिए की जा रही जमीन की जुताई (Tilling and plowing ) है। 

अधिकतर लोग सोचते हैं की पानी की समस्या से निपटने  के लिए  लिए छोटे बड़े बांध ,तालाब आदि एक पक्का उपाय है यह सच नहीं है। हरे भरे वनो से आच्छादित पहाड़ों को देखिये वहां बिना बरसात के झरने चलते रहते हैं।  जबकि मेदानी इलाके  बूँद बूँद पानी को तरस रहे हैं। यह समस्या हमने गैर कुदरती खेती करके उत्पन्न की है। हम लगातार हरे भरे वन ,बाग़ बगीचों ,और चरोखरों को अनाज के खेतों में तब्दील करते जा रहे हैं। जो मरुस्थल में तब्दील होते जा रहे हैं।

जुताई करने से बरसात का पानी जमीन में नहीं समाता है वह तेजी से बहता है अपने साथ खाद को भी बहा कर ले जाता है।  जब जमीन को नहीं जोता  या खोदा जाता है तो इसके विपरीत बरसात का पानी जमीन में रिस  जाता है वह बहता नहीं है इसलिए खेत की मिट्टी (जैविक खाद ) का बहना भी रुक जाता है।  बरसात  के जल को संग्रहित करने का यह सबसे उत्तम तरीका है।
 हमने  पिछले 27 सालों  से अधिक समय से  खेतों की जुताई बंद कर दी है इस कारण हमारे उथले कुए साल भर भरे रहते हैं। इसलिए हमारा मानना है की-

बहते पानी को रोकने की वजाय बहती जैविक खाद (मिट्टी ) को रोकना जरूरी है।


                                               
https://www.youtube.com/watch?v=q1aR5OLgcc0&feature=player_detailpage



बिना जुताई की कुदरती खेती जिसका आविष्कार जापान के स्व. मनोबू फुकोकाजी ने  किया है एक मात्र
 
ऐसा  तरीका है जिसमे " जैविक खाद " और जल का पूरा पूरा संरक्षण हो जाता है। यह खेती करने की सबसे सरल और उत्तम तकनीक है जो" कुछ मत करो " के  दर्शन और कुदरती सत्य से परिपूर्ण विज्ञान पर आधारित है।


https://www.youtube.com/watch?v=5_5eoUojVpI&feature=player_detailpage

पिछली बार जब मेरी मुलाकात फुकूओकाजी से  गांधीआश्रम में हुई थी उस समय वह कह रहे थे की अभी तक आपने खेती के बारे में जो कुछ भी पढ़ा है उसे भूल जाओ और मेरी किताबों को भी भूल जाओ बस जमीन पर बीज बोने का एक मात्र ऐसा काम जिसे हमें करते जाना है उसके लिए जमीन को खोदना ,खरपतवारों को मारना ,कीड़े आदि को मारना कुछ नहीं करने की जरुरत है केवल हम  रोज बीज इकठा कर उन्हें क्ले ( कपे  वाली मिट्टी जो नदी नालों या पुराने तालाबों में इकट्ठा रहती है जिस से मिट्टी के बर्तन बनते हैं ) की गोलियां बनाकर बिखरते जाएँ। ऐसा करने से हम आसानी से अपने खाने का इंतज़ाम कर सकते हैं और अपने बिगड़ते पर्यावरण को सुधार सकते हैं। जिस से सूखे की समस्या का भी समाधान हो जायेगा। यह  हर हाथ को काम और किसान को समाज सम्मान दिलाने की योजना है।

कहीं कहीं जहाँ क्ले नहीं मिलती है वहां दीमक की मिटटी का भी उपयोग किया जा सकता है. बीज गोली को मजबूत होना चाहिए यह क्ले की क्वालिटी पर निर्भर  करता है हम बीज गोलियों को बना कर उन्हें पानी में डूबा कर उनकी मजबूती का टेस्ट करते हैं यदि वह बिखरने लगती है तो हम मिट्टी में १० % बुझा हुआ चूना मिला लेते हैं यह सलाह हमे Sowing seeds in deserts by Fukuoka से मिली है।

क्ले सब से ताकतवर जैविक खाद है यह गोबर की खाद से १०० गुना अधिक ताकतवर है। इसमें केंचुओं के आलावा असंख्य सूक्ष्म जीवाणु के बीज रहते हैं जो जमीन को उर्वरकता प्रदान करते हैं और जमीन को पोरस बना देते हैं। यह एक प्रकार का "जामन " है जैसा दूध को दही बनाते समय डाला जाता है यह एक प्रकार का" यीस्ट" है जो ब्रेड बनाते समय उसे स्पोंजी बनाने के लिए डाला जाता है। क्ले से खेत जल्द ही उर्वरक  और छिद्रित हो जाते हैं यह काम किसी भी मशीन या रसायन के बस की बात नहीं है।

तैयार गोलियों को यहाँ वहाँ अपनी आवशयकता अनुसार बिखराने  से कुदरती खेती हो जाती है। खरपतवारों और फसलों में लगने वाले रोगों का अपने आप नियंत्रण हो जाता है। यह खेती पेड़ों के साथ हो जाती है। इस तरीके से पनपते मरुस्थलों को भी काबू में किया जा सकता है। अनेक संस्था रेगिस्तानों में बीज गोलियों को हवाई जहाजों से फेंकने का काम कर रहने लगी हैं।







Wednesday, July 9, 2014

STOP DESERTIFICATION


हरियाली है जहाँ खुशहाली वहां हैं.

सूखे से निपटने की योजना 

No Till Organic Farming (बिना -जुताई की कुदरती खेती )

नागेन्द्र  नर्मदा नेचरल फॉर्म कुर्सी थापा गॉंव पिपरिया होशंगाबाद म. प्र.

ग्लोबल वार्मिंग ,मौसम परिवर्तन ,ग्रीन हॉउस गैस उतसर्जन्  को  थामना
जलप्रबंधन और जैव -विविधताओं का संरक्षण, किसान को आत्म निर्भर बनाना ,कुदरती बीज और आहार उपलब्ध करना आदि। 

ये कैसा विकास है जिसमे वन विभाग पेड़ लगा रहा  है और किसान पेड़ों को उखाड कर चाँवल के खेत बनाकर उन्हें रेगिस्तान बनाकर  छोड़ता जा रहा है। 

महोदय ,
गहरी जुताई और रसायनों के बल पर चल रही खेती एक ओर जहाँ खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी है वहीं इसके चलते भूमि ,जल और जैव -विविधता का बहुत छरण हो रहा है। इस से हमारा पर्यावरण बहुत दूषित हो रहा है।  एक ओर जहाँ किसानो की आजीविका प्रभावित हो रही है वही हरियाली का सँकट पैदा हो गया है। कुदरती आहार ,पानी और जलाऊ लकड़ी नहीं मिल रहा है। 
जुताई करने से पेड़ सूख जाते हैं। 

इसी समस्या के निवारण हेतु टाइटस नेचरल फॉर्म ( मो -9179738049 )  पिछले  २७ सालों से बिना -जुताई की कुदरती खेती जो एक पर्यावरणीय खेती है के रिसोर्स सेंटर के रूप में कार्यरत है जिस से प्रेरणा लेकर श्रीमती चांदनी सिन्हा जी ने ग्रांम कुर्सी थापा पिपरिया मे निजी जमींन पर इस आशय का फार्म तैयार किया है। जिसका उदेश्य  आस पास के गांव के लोगों को बिना जुताई की कुदरती खेती करके दिखाना है। 
जुताई से खेत मरुस्थल बन जाते हैं। 

इस से निम्न लाभ अपेक्षित हैं। 
१- हरियाली को बढ़ाना। 
२- ग्रामीण महिलाओं और बच्चों को खेती से जोड़ना। 
३-सीड बॉल बनाकर आर्थिक लाभ  दिलवाना। 
४- कुदरती बीजों और आहार क़े  विकृय से लाभ दिलवाना। 
५- जहरीले कृषि रसायनो का त्याग  करना। 
६ -बिजली और डीजल की बचत करना। 
७-बकरी और देशी मुर्गी पालन को बढ़ावा देना। 
८-अनाज ,सब्जी ,ईंधन में आत्म निर्भरता हासिल करना। 

बिना जुताई की खेती को करने का तरीका 
क्ले की गोलियां बनाना और खेत में डालना बहुत आसान काम है। 

यह खेती बिना जुताई ,खाद ,निंदाई ,दवाइयों, मशीनो और सिंचाई के की जाती है इस क़ो  करने के लिए गांव के आस पास से क्ले (कपे  वाली मिट्टी ) को इकठ्ठा किया जाता है इस मिट्टी और  बीजो को मिलाकर सीड बाल बनायी जातीं हैं जिन्हे सीधे बरसात  के मौसम में खेतोँ में छिड़क दिया जाता है। सभी प्रकार के बीजों के लिए केवल यही तकनीक काम में लाई जातीं  हैं। क्ले जिसमे असंख्यं सूख्स्म जीवाणु और लाभप्रद कीड़ो के  अंडे आदि रहते  हैँ यह ज़मीन को नत्रजन  के अलावा  अनेक पोषक  तत्व प्रदान करते है। खरपतवार आदि को मारा नहीं जाता किँतु उन्हें सुरक्षा  प्रदान की जाती है। खरपतवार और अनेक जीवजन्तु ,सूक्ष्म जीवाणु मिलकर खेत को गहराई तक ताकतवर और नम बनाते हैं।
बिना जुताई की खेती का आविष्कार जापान की जग प्रसिद्ध सुक्ष्म जीवाणु विशेषज्ञ स्व.  मस्नोबू फ़ूओकाजी ने किया हैं। उनकी किताब "दी वन स्ट्रॉ रिवोलुशन " पूरी दुनिया में  अनेक भाषाओं में पढ़ी जाती है। भारत में यह किताब अनेक प्रादेशिक भाषाओं मे उपलब्ध हैं। अमेरिका ,अफ्रीका ,भारत ,ग्रीस ,फ़िलिपीन आदि देशों में इसके अनेक फार्म बन गए है और बनते जा रहे हैं। भारत में पंजाब ,महाराष्ट्र ,उड़ीसा ,कर्णाटक ,गुजरात , तमिलनाडु आदि प्रदेशों में इसके फ़ार्म बन गये हैँ तथा बनते जा रहे हैं।
कुर्सी थापा गांव में किसान बीज गोलियां बना रहे हैं। 


निवेदन 
क्ले की बीज गोलियां सूखे को बर्दाश्त कर लेती हैं कम पानी में भी खेती हो जाती है 

महोदय बिना जुताई की खेती एक कार्बन सेविंग योजना है जिसे क़ृषि एवं पर्यावरण संरक्षण योजनाओ का कोई लाभ उपलबध नही हैं इसलिए इसे भरपूर कार्बन सेविंग अनुदान दिलवाया जाये जिस से इस महत्व पूर्ण योजना का विकास हो सके और अन्य किसान भी इसे अपनाकर अपने को और अपने पर्यावरण को समृद्ध कर सकें।

धन्यवाद

श्रीमती चांदनी  सिन्हा
नागेन्द्र  नर्मदा नेचरल फॉर्म
कुर्सी  थापा
पिपरिया
मो -9711466466                                                                                      

Tuesday, July 8, 2014

Diffrennce in Till and No-Till (Video)

जुताई और बिना जुताई की खेती में अँतर देखिये 


जुताई करने से खेत की बहु मूल्य जैविक खाद( मिट्टी )  बह जाती है और बरसात का पानी जमीन में नही जातां हैं।  हर साल खेत की जुताई करने से खेत  की मिट्टी बहुत सख़्त हो जाती हैं किन्तु बरसात के पानी के साथ मिल कर वह बह जाती है दूसरा  वह बरसात के पानी को जमीन में नहीं जाने देती है। हर साल करीब 10 -15 टन जैविक खाद एक एकड़ से बह जातीँ हैं।  करीब आधी ताकत नस्ट हो ज़ाती हैं। मौसम परिवर्तन का यह असली कारण है।

हर साल इस कारण से सूखा और बाढ़ आ रहा हैं।
https://www.youtube.com/watch?v=q1aR5OLgcc0



किसान आत्म हत्या कर रहे हैं।

इस विडिओ को भेजने के लिए हम उदित जी को घन्यवाद देते हैं। Udit Kumar
Udit Kumar's profile photo
kumar.udit@gmail.com
उदित जी नेचरल फार्मर हैँ ग़ाज़ियाबाद  में रह्ते हैं बायो तकनिकी विशेषज्ञ हैँ। 

Monday, July 7, 2014

Letter to Devender sharmiji (Expert food security)

श्री देवेन्द्र शर्मा जी
लोकसभा टीवी कार्यक्रम आमने  सामने 7 जुलाई 2014
विषय :- खेती किसानी
मान्यवर
नमस्कार
मै आज इस वार्ता को सुन रहा था जिसमे आपने बखूबी किसानो कि दुर्दशा का ज़ो विवरण  प्रस्तुत्त किया है वह सच में बहुत भयावय हैं। इस से ऐसा प्रतीत होता है की अभी तक सरकारों ने खेती किसानी की लिये कुछ भी नहीं किया है। किन्तु हम ये देख रहे हैं कि कांग्रेस हो या भाजपा दोनों ने खेती किसानी के लिए बहुत कुछ किया हैं और करते जा  रहे हैँ अफ़सोस इस बात का है कि सरकार किसानों के" फटे झोले" में पैसा ङाल  रही है जो गिरता जा रहा है।

समतलीकरण ,खाद ,बीज ,जुताई, सिंचाई से लेकर अनाजों की खरीदी तक  में अंधाधुन्द अनुदान दिया जा रहा है। फिर भी किसानो की माली हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा है। ये" फटा झोला" है जमीन कि जुताई (Tilling ) जिसे कृषि वैज्ञानिकों से लेकर सरकार और  विषेशज्ञ भी नजर अंदाज  कर रहे हैं। हम पिछले २७ सालो से भी अधिक समय से बिना जुताई की कुदरती खेती  कर रहे हैं। जो  पूरी तरह आत्म निर्भर है। हम डीज़ल ,,रासायनिक उर्वरकों ,कीट और खरपतवार नाशकों के उपयोग नही करते हैँ।
 जुताई आधारित कोई भी खेती चाहे वह रसायनो का उपयोग करती है या नहीं टिकाऊ नही हैं।

जुताई करने से हर साल प्रति एकड़ १० से १५ टन जैविक खाद खेतों से बह जाती हैं। ये कहाँ की बुद्धिमानी है क़ी  पहले आप अपने  खेत की खाद को बहा  दें  फिऱ "और दो और दो चिल्लाएं " इसलिए जितने भी करोड़ आप इस " फटे झोले" मे डालेंगें वह नीचे से निकलता जायगा।

इसलिए हमारा निवेदन है कि सरकार को अब" बिना जुताई " की  खेती को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाने की जरुरत है। बिना जुताई की खेती एक मात्र टिकाऊ खेती हैं जो जैविक खाद और जल का संरक्षण करतीं हैं। जब तक किसान अपने खेत की जैविक खाद को बहने से नही रोकता उसके खेत  बंजर  बनते रहेँगे और वे कंगाल होते रहेंगे।
धन्यवाद
राजू टाइटस
ऋषि खेती किसान
rajuktitus@gmail.com