Monday, February 8, 2016

खेसरी दाल की वापसी



खेसरी दाल की वापसी 


जब से माननीय नरेंद्र मोदीजी ने सिक्किम को जैविक प्रदेश का नाम दिया है और हर प्रदेश को जैविक खेती करने का आव्हान किया और केंद्रीय खाद्य मंत्री श्री पासवान जी ने खेसरी दाल की तारीफ़ की है तब से रासायनिक खेती का बोरिया  बिस्तर लिपटने लगा है। श्री पासवानजी का यह कहना की न मेरा परिवार  स्व मेने बचपन में खूब इस दाल का सेवन किया है यह दाल बहुत ताकतवर और लाभप्रद है।  इसी प्रकार श्री स्वामीनाथन जी की पुत्री भी इस दाल को देश में आये  दाल संकट का हल मानती हैं।

मुझे याद है जब हम छोटे थे और रासायनिक खेती शुरू नहीं हुई थी बेलों से जुताई कर खेती की जाती थी।  उन दिनों खेसरी दाल को बरसात के बाद बो दिया  जाता था  जो मूल रूप से बेलों को चारे के रूप में देने के लिए बोया जाता था इसको खाने से बैल  बहुत जल्दी मोटे हो जाते थे जिनसे बहुत जुआई का काम लया जाता था।

खेसरी दाल का सबसे अच्छा गुण  यह था की इसका बीज जमीन पर पड़ा रह जाये तो यह सुरक्षित रहता है जो अपने मौसम में अपने आप उग आता है।  यह खेतों में जबरदस्त नत्रजन प्रदान करने वाला पौधा है तथा इसमें जबरदस्त प्रोटीन होता है जो खाने के लिए सर्वोत्तम है।

 इन्ही गुणों के कारण इस दाल को प्रतिबंधित कर दिया गया था।  यह प्रतबंध व्यापारिक सोच के चलते किया गया था। प्रतिबंध के बाद भी इस दाल का चलन आज भी होता है इसकी दाल अरहर की दाल में मिलावट के काम में आती है।  दूसरा देशी परम्परागत खेती किसानी में यूरिया का चलन किसानो को स्वीकार्य नहीं था इसलिए भी इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया था।

यह कहा  जाता है की इसमें जहर है जिस से लखुए का रोग हो जाता है यह भ्रान्ति है। जबकि यूरिया और अनेक किस्म के भोपाली जहर खुले आम चल रहे जिनसे एक  अनेक बीमारियां हो रही है किन्तु खेती किसानी के डॉ इसका विरोध नहीं करते हैं।

खेसरी दाल एक बहुत अच्छा कम या बिना सिंचाई के होने वाला ग्राउंड कवर की फसल है जो नत्रजन देने के आलावा ,नमी  के संरक्षण और खरपतवारों और कीड़ों की रोक थाम में बहुत ही महत्व पूर्ण फसल है।  यह बिना जुताई की जैविक खेती की जान है।

अब जबकि रासायनिक खेती के कारण खेत बंजर होने लगे है खेती अलाभकारी हो गयी है अनेक किसान खेती छोड़ रहे हैं या आत्म हत्या कर रहे हैं।  इस दाल का महत्व समझ में आ रहा है इस लिए इसको वापस लाने की कोशिश हो रही  है। हम इसका स्वागत करते हैं।

भारतीय परम्परगत देशी खेती किसानी में दालों  का बहुत महत्व था हर किसान खेतों की नत्रजन बरकरार रखने के लिए दालों  को बोया करता था जिसमे सिंचाई ,जमीन की जुताई और मानव निर्मित जैविक खादों की कोई जरूरत नहीं है।

अरहर के साथ ११-१२ अनाजों को बो दिया जाता था जिनसे साल भर की खेती आसानी से हो जाती थी किन्तु जब से हरित क्रांति के नाम से सिंचाई पर आधारित रासायनिक खेती का आगमन हुआ है तब से किसान कंगाल होने लगे हैं। खेती में हो रहे घाटे  का कारण किसान खेती  छोड़ रहे हैं।

केवल खेसरी दाल के वापस आने से दालों समस्या हल होने वाली नहीं है।  दालों  को यदि वापस लाना है तो रासायनिक यूरिया पर प्रतिबन्ध लगाना होगा क्योकि यही वह रसायन है जिसने दालों  के महत्व को कम कर दिया है। दूसरा सबसे अधिक घातक उपाय है जमीन की जुताई जिस खेतों की नत्रजन गैस बन कर उड़ जाती है और खेतों की जैविक खाद बह जाती है।

हम पिछले 30  सालो से बिना जुताई करे जैविक खेती को अमल में ला रहे हैं जिसे हम ऋषि खेती कहते हैं। इसमें हम मूल रूप से दलहन फसलों से नत्रजन पैदा करते हैं जिसके सहारे  गेंहूँ और चावल को बोते हैं जिस से हमे बंपर फसलें  मिल जाती हैं।


Tuesday, January 26, 2016

सही जैविक खेती से सुधरेगी किसानो की हालत

 सही जैविक खेती से सुधरेगी किसानो की हालत 

प्रधान मंत्रीजी ने  सिक्किम प्रदेश को जैविक प्रदेश का नाम देकर और सभी राज्यों का इसका अनुसरण करने की अपील कर सही में खेती किसानी में चल रही समस्या के समाधान के लिए बहुत बड़ा काम किया है।
बिना जुताई की जैविक खेती करने का रोलर इस यंत्र से
खरपतवारो को जमीन पर सुला दिया जाता है और
बिनजुताई करे बोनी कर दी जाती है।
इसमें सिंचाई भी जरूरी नहीं है.

वैसे तो जैविक खेती जो ऑर्गेनिक  खेती का अनुवाद है कोई बहुत नया नाम नहीं है। ऑर्गेनिक  खेती का आविष्कार १९२४ में इंदौर मद्यप्रदेश में दुनिया भर में आर्गेनिक खेती के पितामय जग प्रसिद्ध डॉ हावर्ड ने किया है। उन दिनों जब रासायनिक खेती का भारत में चलन नहीं था इसकी विदेशों में बहुत चर्चा हो रही थी।  इसी  विकल्प में उन्होंने भारत की देशी परंपरागत खेती किसानी का अनुसरण करते हुए इस नयी विचार धारा  को जन्म दिया था।  

उन्होंने यह पाया था कि भारत में परंपरागत खेती किसानी जिसमे पशु पालन के साथ खेती की जाती है क्यों ?हजारों सालो से "टिकाऊ " है।  उन्होंने इसके लिए भारतीय परंपरागत खेती किसानी में अपनाई जा रही तकनीकों के आधार पर इंदौर में रिसर्च कर यह पाया की की आज भी यदि भारतीय खेती किसानी का सही मायने में अनुसरण किया जाये तो हम आयातित रासायनिक खेती के प्रदूषण कारी प्रभाव से बच सकते हैं। 

इसी आधार पर उन्होंने सभी कृषि अवशेषों जैसे नरवाई  ,पुआल ,पत्तियां ,तिनके आदि से जैविक खाद बनाने की विधि बनाई जो भारत से कहीं ज्यादह विदेशों में जहाँ गोबर ,मुर्गि की बीट  सूअर आदि के अवशेषों का डिस्पोजल समस्या थी को अपनाया जाने लगा।  इसके कारण पूरे विश्व में रासायनिक खेती पर सवाल खड़े होने लगे। तब से रासयनिक खेती विवादों में घिरी है जो आज तक है।  

अब जब भारत में  बड़े पैमाने पर रासायनिक  खेती के पर्यावरणीय ,सामाजिक और आर्थिक नुक्सान नजर आने लगे हैं तो हम जो हमेशा तकनीकों के वास्ते विदेशों का मुंह तकते रहते हैं हमे जैविक खेती एक रामबाण  तकनीक के रूप में नजर आ रही है। 

किन्तु हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय परंपरागत देशी खेती किसानी सबसे बेहतर थी और है इसी लिए आज भी टिकाऊ है।  इस खेती में पशुपालन के समन्वय से देशी खेती किसानी में असिंचित बिना जुताई की खेती ,हलकी जुताई की खेती किसानी में ऐसी अनेक विधियां हैं जिनके अनुसरण की जरूरत है।
 जुताई आधारित विदेशी ऑर्गेनिक  फार्मिंग हमारे देश के लिए के उपयुक्त नहीं है।  जुताई करने से बरसात का पानी जमीन में नहीं समाता है वह तेजी से बहता है अपने साथ कई टन  जैविक खाद को बहा  कर ले जाता है। ऋषि पंचमी का पर्व हमे यही बताता है।  इस पर्व में कांस घास  की पूजा की जाती है और बिना जुताई के अनाजों का सेवन किया जाता है।  कांस घास जब खेतों में फूलने लगती है इसका मतलब यह है खेत सूखने लगे है इन्हे सही करने के किसान खेतों को पड़ती कर दिया कर देते थे उसमे पशु चराये जाते थे जिस से खेत पुन : पानीदार और उर्वरक हो जाते हैं। 

आयातित ऑर्गेनिक  फार्मिंग में ट्रेक्टरों से की जाने वाले जुताई को हानिकर नहीं माना जाता है  जिस से खेतों की उर्वरकता और नमी का बहुत नुक्सान होता है। इसमें और रासायनिक खेती में अंतर नहीं है। किन्तु इसका मतलब नहीं है की किसान मशीनो का उपयोग बिकुल बंद कर दें यह अब सम्भव भी नहीं। 

इसलिए किसानो को बिना जुताई की जैविक खेती को अमल में लाना चाहिए जिसमे खेती  और कम पावर के ट्रैक्टरों से क्रिम्पर रोलर की मदद से खेती की जाती है। इसे बैलों से या सीधे बीजों को छिड़क कर भी आसानी से किया जा सकता है।

अब जब सरकार ने मान लिए है कि रासायनिक खेती हर हाल में नुकसान दायक है हमे सही जैविक खेती अपनाने की जरूरत है अन्यथा वही  हाल होगा जो रासायनिक खेती में हो रहा है।
  


Sunday, January 24, 2016

नर्मदाजी में मिलने वाले नालों को भी नर्मदा जी जैसा सम्मान मिलना चाहिए !

नर्मदाजी में मिलने वाले नालों को भी नर्मदा जी जैसा सम्मान मिलना चाहिए !


होशंगाबाद नर्मदा नदी के किनारे बसा एक पवित्र स्थान है यहां हजारों साल से श्रद्धालु नर्मदाजी के दर्शन और पूजा के लिए आते हैं इस नदी के घाटों पर अनेक मंदिर बने है और बन रहे हैं। अधिकतर श्रद्धालु अनेक तीज त्योहारों पर नर्मदाजी में डुबकी लगाने आते हैं।
टाइटस ऋषि खेती फार्म के बीच से निकलता शहर के   गंदे पानी का नाला 

आजकल होशंगाबाद की नगरपालिका शहर के घर घर में नर्मदाजी के जल को पहुचाने का काम कर रही है। जिसके कारण काम में लया गया  नर्मदा नदी का बहुत अधिक जल वापस नदी में अनेक नालों के माध्यम से मिल रहा है जिसमे अनेक प्रकार के कचरे और गन्दा पानी डाला जा रहा है जो नर्मदाजी मिल कर नर्मदाजी पवित्रता को नस्ट कर रहा है।

असल में नर्मदाजी के शुद्ध जल को घर घर पहुँचाने के पीछे आम जनता की नर्मदाजी के प्रति आस्था है जिसमे लोगों को यह समझना चाहिए यह जल पवित्र है इसे हमे उसी प्रकार सम्मान देना चाहिए जैसे हम माँ नर्मदाजी को देते हैं। इसलिए हमे इस पानी को गन्दा होने से बचाने  की सख्त जरूरत है और इसे भी पवित्र मान आकर इसे गन्दा होने बचाना चाहिए।

हमारे ऋषि खेती फार्म से निकलने वाले नाले के प्रति हमारा यही नजरिया हम अपने घर का एक बूद भी गन्दा जल नाले नहीं जाने देते है इसे बायो गैस के माध्यम से शुद्ध कर खेतों में फसलों  को उगाने में काम में ला रहे हैं और इस नाले के आस पास सोन्दर्यी करण  करने में लगे है , किन्तु इस नाले में लोगों के द्वारा फेंका जाने वाला कचरा मुसीबत बना हुआ है।  हम जानते हैं की हम हर बात के लिए प्रशाशन  को दोष नहीं दे सकते हैं।  यदि हम यह चाहते हैं हमे नर्मदाजी का शुद्ध जल मिले तो हमे इन गंदे नालों को भी शुद्ध रखने की जरूरत है।

यह तब संभव होगा जब हम नालों को भी नर्मदाजी जैसा सम्मान देंगे।

Wednesday, January 20, 2016

सूखे की समस्या : समाधान ऋषि खेती

सूखे की समस्या : समाधान ऋषि खेती 

मारा ऋषि खेती फार्म होशंगाबाद की जीवन दायनी माँ नर्मदा नदी के तट पर बसा है। जिसमे पानी की कोई कमी नहीं है। हमारे फार्म में उथले देशी कुए हैं जो 40 फ़ीट तक ही गहरे हैं जो साल भर पानी से लंबा लब रहते हैं। एक और जहाँ हमारे आस पास के खेतों के कुए भरी बरसात में दम  तोड़ देते हैं वहीं  हमारे कुए भरी गर्मी में भी भरे रहते हैं। 
बिना जुताई ,बिना खाद ,बिना दवाई  धान का पौधा 

किन्तु ऐसी स्थिती तब नहीं थी जब हम आधुनिक वैज्ञानिक खेती को अमल में लाते थे जिसमे गहरी जुताई और खरपतवार नियंत्रण जरूरी रहता है।  हरयाली को दुश्मन मान कर मार दिया जाता है। यह परिस्थिति  तब बनी जब हमने बिना जुताई की कुदरती खेती को अमल में लाना शुरू किया। 

इस बात से यह सिद्ध हो जाता है की
 " जमीन में जल के  संचयन के लिए हरियाली आधार है और जमीन की जुताई  हरियाली का दुश्मन है। "
 असल में जब भी हम जमीन की जुताई करते हैं जुती हुई बारीक मिटटी बरसात के पानी के साथ मिल कर  कीचड़ में तब्दील हो जाती है जो  बरसाती के पानी को जमीन में नहीं जाने देती है इसलिए पानी तेजी से बह जाता है साथ में अपने साथ जुती  हुई बारीक उपजाऊ जैविक खाद को भी बहा  कर ले जाता है जिस से भूमिगत जल का स्तर लगातार घटता जाता है और खेत कमजोर  होते जाते हैं  

ऋषि खेती करने के लिए जमीन की जुताई को नहीं किया जाता है जिस से जमीन अपने आप हरियाली से ढक जाती है। ये हरियाली पानी की जननी है जिसे हम खरपतवार कहते हैं।  असल में खरपतवार कुदरती भूमि ढकाव का प्रबंध है जिसे बचाने से जमीन की जैव-विविधता बच जाती है जैसे केंचुए , चीटी, चूहे आदि जो जमीन को बहुत अंदर तक पोला बना देते हैं जिस से बरसात का पानी जमीन में समा  जाता है। 
जब से हमने जुताई को बंद किया तबसे कभी हमने बरसात के पानी को खेतों से बह  कर बाहर निकलते नहीं देखा है  वह पूरा का पूरा जमीन में समा जाता है। 

जुताई नहीं करने से खेत वर्षा वनो के माफिक काम करने लगते हैं जो एक ओर  बरसात को आकर्षित करते हैं वहीं बरसात के जल को जमीन में संचयित करते हैं। जिस से सूखे का समाधान हो जाता है। 
जमीन की जुताई खेती में हजारों सालों से बहुत पवित्र  काम माना जाता रहा है इसलिए किसान इसे करते हैं और कृषि वैज्ञानिक भी जानते हुए  इसका विरोध नहीं कर पाते है। किन्तु आजकल बिना जुताई की खेती की अनेक विधियां अमल में लाई जाने लगी है। इसका मूल उदेश्य खेतों की जैविक खाद और बरसात के जल का संचयन है। 
असल में किसान खरपतवारों और छाया के डर के बार बार जुताई करते रहते हैं जबकि ये खरपरवारे जमीन में जैविक खाद और जल के स्रोत हैं।
 एक बार की जमीन की जुताई से जमीन की आधी  जैविक खाद पानी के साथ बह जाती है इस प्रकार हर बार करीब १०-१५ टन /एकड़ जैविक खाद का नुक्सान हो जाता है। जिसकी कीमत लाखों /करोड़ों में है।
सूखे का मूल का कारण खेतों में की जा रही जुताई है जो अनावश्यक है। इसके कारण ही जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग समस्या बन रही है।  बार बार बाढ़  आने का भी यही कारण है।

अब जब यह दिखाई देने लगा है की खेत मरुस्थल में तब्दील हो रहे हैं और खेती किसानी घटे का सौदा बनती जा रही है तो जैविक खेती की बात हो रही है किन्तु जुताई के चलते जिसमे टनो जैविक खाद बह  जाती है का कोई औचित्य नहीं है। 


Saturday, January 16, 2016

सुबबूल के पेड़ों ने किया कमाल

सुबबूल के पेड़ों के नीचे पनपती गेंहूँ की फसल 

सुबबूल के पेड़ों ने किया कमाल 


मोटे अनाजों की खेती में नत्रजन के महत्व को नहीं नकारा जा सकता है।  यह कुदरती ,रासायनिक या जैविक रूप में अनाजों की फसलों में उपलब्ध कराई जाती है।

कुदरती तौर  पर यह दलहनी पौधों या पेड़ो से मिलती है। दलहनी पेड़ पौधे अपनी छाया  के छेत्र में लगातार नत्रजन देने का काम  करते हैं। रासायनिक खेती में सामान्यत: नत्रजन यूरिया के द्वारा दी जाती है। जैविक खेती में इसे गोबर या गोमूत्र से बनी खाद के द्वारा पूरा किया जाता है।

असल में यह धारणा है की जो भी फसल हम बोते हैं वह नत्रजन को खा लेती है इसलिए नत्रजन जरूरी है।  किन्तु यह भ्रान्ति है  कुदरत में कोई भी पौधा ऐसा नहीं है जो खाद को खाता है हर पौधा खाद बनाता है। फिर यह सवाल उठना लाज़मी है की नत्रजन की कमी क्यों हो जाती है ? नत्रजन की कमी के दो मूल कारण हैं पहला जमीन की जुताई है जिस से नत्रजन गैस बन कर उड़ जाती है जो ग्रीन हॉउस गैस के रूप में हमारे पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाती है।

दूसरा जमीन की कुदरती नत्रजन जिसे दलहन जाती के पौधे फिक्स करते हैं या जिसे जैविक खादों के माध्यम से दिया जाता है वह रासायनिक नत्रजन के  डालते ही मिन्टो में गैस बन कर उड़ जाती है। रासायनिक नत्रजन जमीन की कुदरती और जैविक दोनों किस्म की नत्रजन को उड़ा देती है।

हम पिछले ३० सालो से  बिना जुताई की कुदरती खेती का अभ्यास कर रहे हैं। शुरू के अनेक साल हम इस कुदरते नत्रजन के चक्र को नहीं समझ पाये थे इस लिए हमे गेंहूँ और चावल की खेती को करने में मुश्किल हो रही थी। किन्तु हमारी इस समस्या को सुबबूल के पेड़ों ने हल कर दिया।

1988 जनवरी में जापान के जगप्रसिद्ध  कृषि वैज्ञानिक श्री मस्नोबू फुकूओकाजी हमारे फार्म पर पधारे थे उन्होंने हमे नत्रजन से संबंधित उपरोक्त जानकारी को उपलब्ध कराया था उन दिनों हम सुबबूल के पेड़ों को काट दिया करते थे उन्होंने हमे बताया की ये जमीन से जितना ऊपर रहते हैं अपने छेत्र में नत्रजन देने का काम करते हैं।

तब से हम सुबबूल के पेड़ों को देवता समझ कर बचाने लगे है इनके नीचे हम आसानी से गेंहूँ के बीजों को छिड़क कर आसपास के सर्वोत्तम वैज्ञानिक खेतों  बराबर पैदावार ले लेते हैं।  हमे इन से  अतिरिक्त लाभ चारे और लकड़ियों के रूप में हो जाता है। पर्यावरण का  लाभ  भी बहुत है।

सुबबूल के पेड़ की पत्तियों में हाई प्रोटीन रहता है जिसको खाकर हमारे पशुओं को कोई भी अतिरिक्त दाना  देने की जरूरत नहीं रहती है। इनसे बहुत बड़ी मात्रा  में लकड़ियाँ मिलती है जो हमारे फार्म की आमदनी में बहुत सहायक हैं।  

Wednesday, January 13, 2016

Visit of Australian Friends

                                            
2Dec2010
 Thrill to meet Raju and faimly and visit the natural farm. Very interesting to see how you grow Wheat in natural environment. Will spread this way of farming in back in Australia.
Mairie
Brisbane
2Dec 2010
Delicious lunch arronsgst the feel tops- thank you so much Shalini. For exceptional knowledge so graciously shared thank you Raju .For a wonderful warm welcome thank you to all of the lovely Titus family warmest wishes to you all .
Margid Bryn.Burns.
Brisbane Q.M.



Monday, January 4, 2016

फलदार पेड़ों की कुदरती खेती


फलदार पेड़ों की कुदरती खेती 

ब से अनाज की वैज्ञानिक खेती में घाटे  की समस्या निर्मित हुई है तब से बहुत किसान फलदार पेड़ों की खेती की ओर  अग्रसर हुए हैं। किन्तु  फलदार पेड़ों में भी वैज्ञानिक खेती अनाजों की खेती की तरह फेल होने  लगी है।  महाराष्ट्र में  संतरों का बहुत बुरा हाल है।  किसान बड़ी महनत  से पेड़ लगाते  हैं किन्तु जब पेड़ फलने  पर आते हैं वो सूखने लगते हैं।
मोसम्बी का कुदरती बगीचा 
इस से किसानो को बहुत निराशा होती है। किन्तु हमने यह पाया है जब किसान फलदार पेड़ों की देखभाल कुदरती तरीके से करते हैं तो हर साल बढ़ते क्रम में फल मिलते हैं उनकी गुणवत्ता और स्वाद में हर साल इजाफा होता है। जिस से अच्छी आमदनी मिलती है।

1988 जनवरी में ऋषि खेती के जनक श्री फुकूओकाजी जब हमारे फार्म पर पधारे थे बता रहे थे की उनका  मोसम्बी का एक एक फल 200 रु. में बिक रहा था।  उनके फलों की यह कीमत उसके स्वाद और जायके के कारण थी। वे अपने फलदार बगीचे में जुताई ,खाद और दवाई का इस्तमाल बिलकुल भी नहीं करते रहे हैं। वे फलदार पेड़ों की शाखाओं की ,छटाई बिलकुल नहीं करते हैं, उनका कहना है की शाखाओं की छटाई करने से पेड़ कमजोर हो जाते है।

कुदरती फलों के बगीचे में अनेक किसान जमीन की जुताई करते रहते है इस से बरसात का पानी जमीन के अंदर नहीं जाता है इसलिए पानी की कमी के कारण भी पड़े सूख जाते है। फलदार पेड़ों के बीच हरयाली का ढकाव होना बहुत जरूरी है इस से अनेक जीव जंतु ,कीड़े मकोड़े ,सूख्स्म जीवाणु रहते हैं  जो लगातार पोषक तत्वों को बनाते हैं ,नमी को संरक्षित रखते हैं जिस से फलदार पेड़ बहुत खुश रहते हैं। वे हर साल बढ़ते क्रम में फल देते हैं।

जब हम अपने बगीचे में जुताई नहीं करते हैं और हरियाली  के ढकाव को साल भर बचाते हैं तो पूरा बगीचा केंचुओं से भर जाता है केंचुओं के घर जमीन में बहुत नीचे गहराई तक रहते हैं जो पानी ,हवा और पोषक तत्वों को जमीन में गहराई तक सप्लाई करने का काम करते हैं।

दीमक भी केंचुओं की तरह बहुत लाभप्रद जीव है यह सूखे अवशेषों को बहुत तेजी से जैविक खाद में बदल देती है किन्तु यदि हम बगीचे में अधिक साफ़ सफाई करते हैं और दीमक को कुछ खाने नहीं मिलता है तो पेड़ों को नुक्सान होता है।

फलदार पेड़ों की कुदरती देखभाल करने में कुछ करने के बदले कुछ नहीं करने की जरूरत रहती है। हम अपने बगीचे में फलदार पेड़ों के बीच में अनाज  और सब्जियों को खेती करते हैं उसमे हम बीजों को जमीन पर बिखरा कर तमाम भूमि ढकाव की वनस्पतियों को जहाँ का तहां काटकर बिछा देते हैं। फसले  उगकर कटे हुए ढकाव के ऊपर छा  जाती है।  इस से दोहरा लाभ मिलता है। दोनों फल के पेड़ और अन्य फसलें एक दुसरे के पूरक रहते हैं।

हम फलदार पेड़ों के साथ सुबबूल भी लगाते हैं ये पेड़ एक और जहाँ बगीचे को गर्म और ठंडी हवा से बचाते  हैं वहीँ पेड़ों को हानिकारक कीड़ों से भी बचाते है दलहन जाती के होने के कारण लगातार नत्रजन सप्लाई करने का भी काम करते हैं।  बरसात को आकर्षित करते हैं जल का प्रबंधन करते हैं।