Friday, November 21, 2014

कार्यशाला का असर

 कार्यशाला का असर 
Biodiversity and Human Well Being : Towards Landscape Approach
जैव विविधता और लोक कल्याण : कुदरती स्थलों की भूमिका 

Organised by

Madhya Pradesh Forest Department


In collaboration with

Wildlife Institute of India, Dehradun

Under the aegis of

The World Bank

assisted

Biodiversity Conservation and Livelihood Improvement Project 
(BCRLIP )
जैवविविधता संरक्षण और आजीविका सुधार योजना 

on 17 To 19 November 2014

at Pachmari, Madhya Pradas
            "कुदरत तब बचाती है जब हम कुदरत को बचाते हैं "

भूमिका 


 कुदरती विविधताओं का संरक्षण विकास की पहली सीढ़ी है। इसकी मांग सबसे अधिक सबसे अधिक विकसित कुदरती संरक्षित छेत्रों  के पास देखी जा रही है। वन विभाग ने अपनी अनेक योजनाओं के माध्यम से स्थानीय लोगों की आजीविका को चलाने में महारथ हासिल की है।  जिसके विस्तार की अब आवश्यकता है।  

इसी उदेश्य को लेकर भारत सरकार का पर्यावरण मंत्रालय और म. प्र. का वन विभाग अनेक स्व सेवी संस्थाओं ,ग्रामीण लोगों  की सहभागिता से 
जैव विविधता संरक्षण और आजीविका योजना को लागू  करने जा रहा है। जिसकी यह पहली राष्ट्रीय कार्य शाला थी। 

जिसमे उत्तराखंड से 'अशोक ' गुजरात से 'गिर '  केरला से 'पेरियार ' तमिलनाडु से 'कालक्काड़ -मुंडनथुरई '  'आदि विकसित कुदरती छेत्र के अनेक लोगों ने भाग लेकर सफल कहानियों को प्रस्तुत किया। इस कार्य शाला का आयोजन सतपुड़ा टायगर रिज़र्व और पेंच रिज़र्व के माध्यम से किया गया था। 

मुझे भी कार्यशाला में सिरकत करने का अभूत पूर्व मौका मिला मेरा विषय ऋषि खेती था जिसे  हम अपने पारिवारिक फार्म में पिछले २८ सालों से कर रहे हैं। ऋषि खेती एक जैवविविध संरक्षित खेती है जिसमे आजीविका चलाने  के लिए एक आल इन वन कुदरती बगीचा बनाया गया है। जिसमे सुबबूल का जंगल है जिस से चारा ,जलाऊ लकड़ी ,अनाज ,सब्जिया ,दूध और देशी मुर्गी के अंडे प्राप्त होते हैं। 

ऋषि खेती में नींदा या खरपतवार नाम की कोई चीज नहीं है सभी भूमि पर पैदा होने वाली वनस्पतियों को संरक्षित कर उनके सहारे से फसलों  का उत्पादन किया जाता है।  इसमें बीमारियों का कभी कोई प्रकोप नहीं रहता है इसलिए कीड़ों को मारने का कोई काम नहीं है। 

इसमें अधिकतर काम हाथों से किया जाता है बीजों को बोने से पहले  क्ले (कीचड वाली मिट्टी ) में मिलाकर बीज गोलियां बना ली जाती है। क्ले बहुत ताकतवर जैव-विविधता वाली मिट्टी  रहती है। इसमें जमीन को उर्वरक ,पानीदार और पोरस बनाने वाले असंख्य सूख्स्म जीवाणु रहते है।

जुताई नहीं करने से और जमीन पर वनस्पतियों के कवर के रहने से एक और जहाँ भूमि छरण पूरी तरह रुक जाता है वहीं बरसात का जल जमीन में अवशोषित हो  जाता है। 

ऋषि खेत  शतप्रतिशत संरक्षित कुदरती वनो की तरह काम करते हैं। ये एक और जहाँ जैवविविधताओं को संरक्षण प्रदान करते हैं ग्लोबल वार्मिंग  से निजात दिलाते हैं ,ग्रीन हॉउस गैस को सोख कर उसे जैविक खाद में तब्दील करते हैं ,मौसम परिवर्तन को नियंत्रित करने में सहयोग प्रदान करते हैं। वहीं आजीविका का सर्वोत्तम उपाय हैं। 

ऋषि खेती के सभी उत्पाद कुदरती की श्रेणी में आते हैं जिनकी  मांग ऊंची कीमत पर उपलब्ध है।  फल ,दूध, अंडे ,सब्जी ,अनाज कैंसर जैसी बीमारी को ठीक करने की दवाई है ये जंगली उत्पादों के साथ खरीदे और बेचे जाते हैं। किसी भी जुताई आधारित खेती से इन उत्पादों की तुलना नहीं हो सकती है क्योंकि  वे बहुत कमजोर होते हैं। 

इस कार्यशाला से ऋषि खेती को बहुत सम्मान मिला है अनेक अधिकारी गण ,स्वं सेवी संस्था के लोग इसे देखने आ रहे हैं। 
जैविक खेती के विशेषज्ञ डॉ ठाकरे जी जो छिंदवाड़ा  से पधारे थे ने कहा की "ऋषि खेती असली जैविक खेती है "  वाइल्ड लाइफ के विशेषज्ञ  श्री असीम श्रीवास्तवजी ने इसे अभूतपूर्व कहकर हमे आशीर्वाद दिया उसी प्रकार तमिलनाडु और केरल से पधारे अधिकारीगण ने इस ऋषि खेती योजना को अपने छेत्र में लागू करवाने  के लिए हमे आमंत्रित किया है। 
सतपुरा टायगर रिज़र्व के अधिकारी श्री मिश्रजी ने कहा की हम इसे निरंतर देखते रहेंगे इसे एक रेसोर्से सेंटर बनाएंगे। 

इस प्रकार यह कार्यशाला ऋषि खेती के लिए एक मील का पत्थर साबित हुई है कार्यशाला और प्रोजेक्ट मुख्य अधिकारी श्री जितेंद्र अग्रवालजी ने कहा ऋषि खेती को अब किसी की बैसाखी की जरुरत नहीं है क्योंकि यह जैवविविधता संरक्षित लोककल्याण की योजना बन गयी है। 

वन विभाग के प्रधान वन संरक्षक श्री अहमद इकबाल साहब ऋषि खेती योजना को ग्रामीण आजीविका के लिए हर सतर पर लागू करवाना  चाहते हैं जिस से  आँखों से नहीं दिखाई देने वाले सूख्स्म जीवाणु से लेकर देश के बड़े से लोगों का संवर्धन  हो जाये। 

सतपुरा टायगर रिज़र्व के श्री आर पी सिंह साहब जिनके कन्धों पर इस कार्य शाला का भार था उन्होंने कहा है हम ऋषि खेती योजना को जैवविविधता संरक्षण और ग्रामीण आजीविका के लिए बहुत महत्व देते हैं किसानो को इस फार्म में प्रशिक्षण दिलवायेंगे। 

इस अभूतपूर्व समर्थन और सहयोग के लिए टाइटस ऋषि खेती फार्म आप सभी का आभारी है और कार्यशाला में बुलाने के लिए आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद देता है। 

ऋषि खेती एक निजी योजना है जिसका प्रशिक्षण निशुल्क है। 
आने जाने ,ठहरने ,खाने का प्रबंध प्रशिक्षार्थी स्वं उठाते हैं।  

राजू टाइटस 
ऋषि खेती फार्म होशंगाबाद। म.प्र. 461001 
9179738049 rajuktitus@gmail.com









Tuesday, November 11, 2014

जैव-विविधता संरक्षण एवं ग्रामीण आजीविका

ऋषि खेती 

जैव-विविधता संरक्षण एवं ग्रामीण आजीविका 


हरियाली है जहाँ खुशहाली है वहां

एक ओर हमारा पर्यावरण और वन विभाग हरियाली बढ़ाने के लिए आये दिन नए नए प्रयास कर रहा है वहीं किसान लोग  इसके विपरीत हरियाली को नस्ट कर रोटी के खातिर इसे मिटाने में लगे है। इसलिए वन एवं खेती किसानी  में एक दुश्मनी चल पड़ी है। इस कारण धरती की जैव -विविधतायें तेजी से नस्ट हो  रही हैं जिसका असर हमारी पालनहार ग्रामीण आजीविका पर बहुत पड़ रहा  है।
नरवाई और पुआल को पनपते नन्हे पौधों के ऊपर जहाँ का तहाँ
डाल  दिया जाता है जिस से उत्पादन तेजी से बढ़ता है। 

भारतीय प्राचीन  खेती किसानी में हरयाली ,पशु पालन और खेती के बीच समन्वय रहता था किन्तु जब से आधुनिक वैज्ञानिक खेती का चलन शुरू हुआ तबसे कोई भी किसान अपने खेतों में पेड़ों को रखना नहीं चाहता है उसे छाया और खरपतवारों से डर लगता है इसलिए वह हरयाली और तमाम जैव विविधताओं को मारने में अपनी पूरी ताकत लगा रहा है इस कारण अब खेत और किसान मरने लगे हैं।
क्ले से बनी बीज गोलियां 

ऋषि खेती योजना जिसे हम अपने खेतों में पिछले २८ साल से कर रहे हैं इसका मूल उदेश्य कुदरती जैवविविधताओं को बचाते हुए अपनी आजीविका को संपन्न करना है। जिससे हमे कुदरती रोटी के साथ साथ हवा ,पानी ,चारा ,ईंधन और पैसा वहीं अपने खेतों में मिल जाये और हमे कुछ करने की जरुरत न हो। एक परिवार जिसमे ५-६ सदस्य रहते के लिए एक चौथाई एकड़ जमीन बहुत है। हर सदस्य को प्रतिदिन
औसतन एक घंटे  से अधिक के समय की जरुरत नहीं है।

ऋषि खेती करने के लिए जमीन की जुताई को बंद कर उसमे अपने आप पैदा होने वाली वनस्पतियों को सुरक्षा प्रदान की जाती है जिससे जमीन में रहने वाली जैव-विविधतायें लौटने लगती हैं जो जमीन को पुन : उर्वरक ,पानीदार और पोरस बना देती हैं। इस वानस्पतिक भूमि ढकाव में हम फसल के बीजों को क्ले (कपे वाली मिट्टी ) में मिलाकर  बीज गोलियां बना लेते हैं और उन्हें इस ढकाव में डाल  देते हैं। क्ले सबसे उत्तम  जैविक खाद रहती है इस में असंख्य जमीन को ताकतवर बनाने वाले सूक्ष्म जीवाणु के अंडे आदि रहते है जो जमीन को तेजी से उर्वरक और पानीदार बना देते हैं। बीजों को सीधा भी फेंक कर बोया जाता है।

ऋषि खेती में हर दलहन जाती के पेड़ों  को सुरक्षा प्रदान की जाती है ये पेड़ जितने ऊंचे होते हैं उतनी ही उसकी छाया के  छेत्र में लगातार नत्रजन सप्लाई करने का काम करते हैं तथा वर्षा करवाते हैं ,भूमिगत जल को ऊपर लाने में सहयोग करते हैं ,फसलों को बीमारी के कीड़ों से बचाते है ,खरपतवारों को नियंत्रित करते हैं ,भरपूर जैविक खाद उपलब्ध कराते हैं। इनसे चारा ,ईंधन मिलता है।
सुबबूल के पेड़ों के साथ गेंहूँ की ऋषि खेती 

हमने इसके लिए सुबबूल को बहुत उपयोगी पाया है ये पेड़ कमजोर जमीनो को उर्वरक बनाने में बहुत उपयोगी है उत्तम प्रोटीन चारे और जलाऊ लकड़ी के लिए भी बहुत उत्तम है।  इसके बीजों को जमीन पर फेंक भर देने से ये पैदा हो जाते हैं बहुत तेजी से बढ़ते हैं। इनसे एक एकड़ से एक लाख रु  प्रति वर्ष आमदनी फसलों  के आलावा हो जाती है।

यमुना नगर पॉपलर के साथ गेंहूँ की खेती 
 ऋषि खेत एक और जहाँ वर्षा वनों की तरह काम करते हैं वहीं ये जैव -विविधताओं के संरक्षण ,मौसम परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग को थामने का भी काम करते हैं। ग्रामीण आजीविका को समृद्ध करने के लिए ऋषि खेती से अच्छा कोई उपाय उपलध नहीं है। हमारा ऋषि खेती फार्म इन दिनों दुनिया में न. वन है। जुताई आधारित जैविक और अजैविक खेती की सभी तकनीकों से सबसे अधिक जैव-विविधताओं का छरण हो रहा है इसलिए ग्रामीण आजीविका के लिए बहुत बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है इस पर रोक लगाने की जरुरत है अन्यथा हम पेड़ लगाते जायेंगे और रोटी के खातिर  उनकी बलि चढ़ती जाएगी ना  जंगल बचेंगे ना शेर बचेंगे ना हम बचेंगे।

धन्यवाद
राजू टाइटस
ऋषि खेती किसान होशंगाबाद। म. प्र.
email- rajuktitus@gmail.com. mobile- 9179738049

Saturday, October 25, 2014

COW PROTECTION: RISHI KHETI

ऋषि खेती और गौ - संवर्धन 

बसे रासायनिक खेती पर सवाल उठने शुरू हुए हैं  भारत में लोगों का ध्यान भारतीय परम्पागत देशी खेती किसानी पर केंद्रित हुआ है। भारतीय देशी खेती किसानी में पशु पालन का बड़ा महत्व रहा है जिसमे गाय,भेंस ,बकरियों,सूअर मुर्गियों  के आलावा ऊँट, भेड़  आदि सम्मलित हैं। इन सबमे गाय का महत्व सबसे ऊपर है भारत में गाय  की पूजा की जाती है।    उसका मूल कारण गाय से दूध  मिलता है ,बेलों का उपयोग खेतों को जोतने ,बखरने और ट्रांसपोर्ट के लिए काम में लाया जाता रहा है। गोबर और गोमूत्र को पवित्र माना जाता रहा है। उस से  खाद और दवाइयाँ बनती हैं जिसका का फसलोत्पादन में विशेष महत्व देखा गया है।

देशी खेती किसानी में हरयाली और पशुपालन का समन्वय बड़ी बुद्धिमानी से किया जाता था। यह खेती झूम या बेगा लोगों के द्वारा की जाने वाली खेती से जरा भिन्न है झूम खेती  जहाँ जुताई बिलकुल नहीं की जाती है वहीं देशी खेती किसानी में हलकी या कम से कम जुताई की परम्परा है किन्तु किसान जुताई से होने वाले भूछरण और जल के अपवाह से सचेत रहते थे। इसलिए वे जुताई के कारण मरू होते खेतों में जुताई बंद कर दिया करते थे उसमे पशु चराये जाते थे।  खेत मात्र कुछ सालो में पुनर्जीवित हो जाते थे। जुताई करते समय भी किसान गर्मियों में जितना भी कूड़ा ,कचरा ,गोबर ,गोंजन रहता था उसे वे खेतों में वापस डाल  दिया करते थे। पड़ती करना और गोबर ,गोंजन को खेतों में वापस डालने के आलावा किसान और कुछ नहीं करते थे। प्राचीन काल से किसानो को दलहन और बिना दलहन जाती की फसलों के  चक्र के बारे में पता था इसलिए वे बदल बदल कर फसलें बोते थे। दलहन फसलें नत्रजन देने का काम करती हैं वहीं गैर दलहन फसलें नत्रजन खाने का काम करती हैं। हरेभरे चारागाहों और हरे भरे जंगलों के समन्वय से पशु पालन खेती में संतुलन बना रहता था। अधिकतर लोग गांवों में ही रहते थे इसलिए खेती ,पशुपालन और हम लोगों की जीवन पद्धति में भी समन्वय रहता था।
गाय को परिवार के सदस्य की तरह प्यार करना चाहिए। 

किन्तु आज़ादी के बाद के मात्र कुछ सालो ने इस जीवन पद्धति को मिटा कर रख दिया है।  लोग गांवों की जगह शहरों में रहना पसंद करने लगे हैं बिजली और पेट्रोलियम के बिना उनका काम नहीं चलता है। किसान भारी मशीनो और ,रसायनो के सहारे खेती करने लगे हैं इस कारण हमारा पशु धन अब लुप्त प्राय हो रहा है। खेती पूरी तरह आयातित तेल की गुलाम हो गयी है। बड़े से बड़ा किसान कर्जदार हो गया है उसे कुदरती दूध और खान पान नसीब नहीं है।खेत मरुस्थल में तब्दील हो रहे है ,भूमिगत जल सूख गया है ,मौसम परिवर्तित हो रहा है धरती गर्म होने लगी है किसान आत्म हत्या करने लगे हैं ,हरघर में कैंसर जैसी बीमारी दस्तक दे रही है।

मेरी बहन की देशी गाय 


आर्गेनिक (जैविक ) खेती की खोज डॉ हॉवर्ड ने इंदौर म.प्र. में रासायनिक खेती के विकल्प के रूप में की थी यह पश्चिमी देशों में जहाँ डेयरी,पोल्ट्री ,पिगरी आदि के वेस्ट का प्रबंधन मुश्किल हो रहा है प्रदुषण फेल रहा है वहां बहुत उपयोगी सिद्ध हुई है किन्तु इस से बहुत बड़े इलाके के ऑर्गेनिक पदार्थों का शोषण होता है जिसे बहुत छोटे सीमित इलाके में डाल  कर जुताई कर खेती की जाती है। जुताई से होने वाले भूमिछरन और जल अप्रवाह के लिए ये विज्ञान चुप है। इसलिए यह देशी खेती किसानी की तरह टिकाऊ नहीं है। इसमें  रासायनिक खादों की जगह कम्पोस्ट बनाकर डाला जाता है। इसके सामान ही जीरो बजट खेती है जिसमे जुताई कर गोबर++ से बने बायो फ़र्टिलाइज़र डालने की सलाह दी जाती है। इस खेती में जल अप्रवाह और भूमिछरन से होने वाले नुक्सान का कोई जिक्र नहीं हैं इसलिए यह भी टिकाऊ नहीं नहीं है।

उपरोक्त दोनों खेती करने में जुताई के कारण हरियाली का बहुत नुक्सान होता है इसलिए पशुपालन के लिए कुदरती चारा नहीं मिलता है पशुओं को  गैर कुदरती अनाज,चारा  और दवाइयाँ दी जाती हैं जिस से उनके दूध  और गोबर पर विपरीत असर पड़ता है वो  अपने कुदरती गुण  खो देते हैं। भारतीय खेती किसानी में गौसंवर्धन बहुत जरुरी है कुदरती दूध हमारे आहार का प्रमुख अंग है। इसकी कमी से एक और जहाँ कैंसर जैसी बीमारियां पनपती हैं वहीँ गाय के कच्चे दूध से कैंसर भी ठीक हो जाता है।
सुबबूल चारे के पेड़ 

ऋषि खेती जिसे जापान के जाने माने कृषि वैज्ञानिक मस्नोबू फुकुओका ने विकसित किया है इस समस्या का हल है। यह खेती " कुछ मत करो " के सिद्धांत पर आधारित है। यानि जुताई नहीं ,कम्पोस्ट नहीं ,कोई रसायन नहीं ,कोई जीवामृत ,अमृत मिट्टी पानी की जरुरत नहीं ,कोई बायो फ़र्टिलाइज़र की जरुरत नहीं। बस बीजों को सीधे या क्ले से बनी बीज गोलियों  को फेंकने भर से यह खेती हो जाती है।  इस खेती में धरती में पनपने वाली तमाम जैव विविधताओं की रक्षा हो जाती है। यह पूरी तरह अहिंसा पर आधारित खेती है। लुप्त होते गोवंश सहित अनेक पशुओं का असली आधार हरियाली है जुताई करने से हरियाली नस्ट हो जाती है इसलिए कुदरती पशु आहार नहीं मिलता है।   कृत्रिम आहार से पशु बीमार हो जाते हैं उनके गोबर और दूध में वह ताकत नहीं रहती है जिसके लिए उन्हें पाला जाता है।  ऋषि खेती करने से मात्र एक बरसात में खेत हरियाली से भर
जाते है।  जैविक खाद और जैविक चारे की कोई कमी नहीं रहती है। भूछरण और जल अप्रवाह पूरी तरह रुक जाता है। खेत ताकतवर हो जाते हैं वे भरपूर कुदरती फसलें देने लगते हैं। देशी उथले कुए लबालब हो जाते हैं।
अधिकतर लोग कहते हैं की ऋषि खेती करने से पशु पालन प्रभावित होता है यह भ्रान्ति है हम पिछले २८ सालों से इस खेती को पशुपालन के साथ कर रहे हैं। यह एक मात्र ऐसी खेती है जिसमे हरियाली ,पशु पालन और फसलोत्पादन का  समन्वय रहता है।

ऋषि खेती करने से खेत हरे कुदरती चारे से भर जाते हैं। 
 खेतों में हम सुबबूल लगाते हैं सुबबूल एक दलहनी पौधा है जो खेतों में नत्रजन सप्लाई  करने में सबसे उत्तम है इसके भूमि ढकाव मे असंख्य जमीन को ताकतवर बनाने वाले जीव जंतु ,कीड़े मकोड़े ,सूक्ष्म जीवाणु निवास करते हैं यह बरसात करवाने और बरसात के पानी को जमीन में सोखने मके लिए बहुत उपयोगी है। इसके रहते भूमि छरण (soil  erosion) और जल अप्रवाह (Runoff ) बिलकुल रुक जाता है। सुबबूल की पत्तियों में भरपूर प्रोटीन रहता है अलग से किसी भी गेरकुदरती आहार को देने की जरुरत नहीं रहती है। दूध बहुत स्वादिस्ट और कुदरती रहता है गोबर से उत्तम जैविक खाद बनती है जिसे सीधे खेतों में डाल दिया जाता है। जल अपर्वाह और भूमि छरण नहीं होने के कारण जैविक खाद का बिलकुल छरण नहीं होता है।


जुताई नहीं करने के कारण ऋषि खेती एक मात्र असली कुदरती और जैविक खेती की श्रेणी में आती है जबकि जुताई आधारित जैविक और जीरो बजट खेती जमीन की जैविकता की हिंसा के कारण न तो कुदरती हैं ना  ही ये जैविक हैं।  जो इनके प्रचार कर रहे हैं उसका आधार असत्य और हिंसात्मक है। इनसे गौसंवर्धन  का दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है।








Tuesday, October 21, 2014

कैसे करें ? ऋषि खेती

 कैसे करें ? ऋषि खेती 
ब से आधुनिक वैज्ञानिक खेती में लगातार घाटा होने लगा है और किसान जैविक खेती करके भी संतुस्ट नहीं हो रहे हैं तब से हमारे पास आये दिन अनेको लोग फोन कर पूछने लगे हैं की हम कैसे ऋषि खेती करें ? अनेक लोग देश विदेश से बहुत कस्ट उठाकर यहाँ तक केवल यही जानने के लिए आते हैं की आखिर यह खेती होती कैसे है ?

ऋषि खेती "कुछ मत करो " के मूल सिद्धांत पर आधारित है।  गीताजी में लिखा है की कर्म जब कुदरत के विरुद्ध हो जाता है वह कुकर्म में तब्दील हो जाता है। इसलिए अकर्म (कुछ मत करो ) को बहुत महत्त्व दिया गया है।
दाना पानी के संपादक श्री अरुण डिकेजी  हैं पत्रिका बुलाने के
लिए +919926462068 पर संपर्क करें। 

हमारे देश में आज भी ऐसे उदाहरण देखने को मिल जायेंगे जिसमे किसान एक साथ कई किस्म के बीजों को मिलकर बरसात से पहले सीधे फेंक भर देते हैं और साल भर फसलें काटते रहते हैं।  इन विधियों को झूम या बेगा  खेती के नाम से जाना जाता है। यह विधि आदिवासी अंचलों में देखी जा सकती है।  इससे किसान हजारों साल आत्म निर्भर रहते आये हैं।

बेगा या झूम खेती की खासियत यह है की ये किसान बिजली और पेट्रोलियम के बिना ,जुताई ,खाद और दवाइयों के बिना खेती करते हैं। ये पहले हरियाली के भूमि ढकाव को बचाते हैं जिस से हरयाली के साथ असंख्य धरती की जैव विविधतायें पनप जाती है। जिस से धरती उर्वरक बन जाती है उसमे नमी का संचार हो जाता है। फिर इस हरयाली को काटकर वहीं डाल  दिया जाता है  सूख जाती है उसे जला  दिया दिया जाता है जिस से जमीन बीज बोने लायक बन जाती है। उसमे अनेक बीजों को एक साथ सीधा बरसात आने से पहले छिड़क दिया जाता है। इस से सब बीज उग जाते हैं फिर एक एक कर फसलें काटी जाती हैं। किसान केवल तीन साल तक इस जमीन पर फसलें उगाते हैं फिर दुसरे जमीन के टुकड़े को तैयार कर लेते हैं। पुराने जमीन के टुकड़े को पुन : हरयाली पनपने के लिए छोड़ दिया जाता हैं।

ऋषि खेती का भी यही आधार है फर्क केवल इतना है इसमें हरियाली को जलाया नहीं जाता है उसे वहीं  रहने दिया दिया जाता है  इसलिए जमीन को बदलने की जरुरत नहीं रहती है बीजों को सुरक्षित करने के लिए उन्हें क्ले की गोलियों में बंद कर दिया जाता है जिस से बीज अपने आप समय आने पर उग आते हैं।

क्ले उस मिट्टी को कहते हैं जो खेतों ,जंगलों ,पहाड़ों से बह कर नदी ,तालाब ,पोखरों में इकठ्ठा हो जाती है इस मिट्टी से ही मिट्टी के बर्तन बनाये जाते हैं। इस मिट्टी को किसान लोग कमजोर होते खेतों में भी डालते हैं जिस से खेत पुन: ताकतवर हो जाते हैं।  इस मिट्टी में असंख्य आँखों से नहीं दिखाई देने वाले सूक्ष्म जीवाणु ,केंचुओं आदि के अंडे रहते हैं जो जमीन को तेजी से उर्वरक और पानीदार बना देते हैं। इस मिट्टी में  जब हम  बीज को बंद कर देते हैं  तो बीज चूहों,चिड़ियों, धूप और बेमौसम पानी से सुरक्षित हो जाते हैं जो अपने समय पर अनुकूल वातावरण को पाकर उग आते हैं जैसे असंख्य खरपतवारों के बीज उग आते हैं।

 बीज गोलियों को बनाने के लिए सबसे पहले हमे उत्तम क्ले का चुनाव करने की जरुरत है उत्तम क्ले की खासियत यह रहती है उसकी गीली गोली पानी में पड़े रहने पर भी नहीं घुलती है, सूखने पर इतनी कड़क हो जाती है की उसे चूहे ,गिलहरी दांतों से तोड़ नहीं सकते हैं ,हवाई जहाज  से फेंकने पर भी वह टूटती नहीं है। इस क्ले को आवश्यकतानुसार इकठ्ठा कर बारीक कर छान लिया जाता है फिर इसमें एकल या मिश्रित बीजों को मिलकर आटे की तरह गूथ लिया जाता है गुथी  मिट्टी से एक या आधा इंच बीजों की साइज के अनुसार व्यास वाली गोलियां बना ली जाती हैं जिन्हे छाया में सुखा कर स्टोर कर लिया जाता है। अनेक लोग एक साथ बैठ कर इस प्रकार कई एकड़ खेत के लिए गोलियां बना लेते हैं।

बड़े खेतों के लिए बीज गोलियां बनाने के लिए कंक्रीट मिक्सर का इस्तमाल किया जाता है।

 बीज गोलिओं को फेंकने से पूर्व खेतों में  यदि घास , या अन्य वनस्पतियां उत्पन्न हो जाती हैं तो उन से डरने की कोई जरुरत नहीं है वरन उन्हें भी संरक्षण देने की जरुरत है इनके ढकाव में असंख्य जीव जंतु  ,कीड़े मकोड़े पलते  हैं जो खेतों को उर्वरक और पानीदार बना देते हैं। यह ढकाव बीज गोलियों को भी सुरक्षित रखते हैं। ताकतवर कुदरती बीजों की उत्तम बीज गोलियों से पहले ही साल में उत्तम परिणाम मिलते हैं।

ऋषि खेती में सभी कृषि अवशेषों जैसे खरपतवार ,पुआल ,नरवाई आदि को जहाँ का तहां कुदरती रूप में फेंक दिया जाता है जो सड़  कर खतों को उत्तम जैविक खाद प्रदान करता है। अधिक  जानकारी के लिए  फोन या ईमेल से सम्पर्क करें।

राजू टाइटस
rajuktitus@gmail.com. mobile no. 09179738049






Sunday, October 19, 2014

नदी जिए अभियान

नदी जिए अभियान 

"पानी ना तो आसमान से आता है ना वह धरती से आता है पानी तो केवल हरियाली से आता है "
                                                                                               फुकूओकाजी
हरियाली है जहां खुशहाली है वहां
       
ब खेती करने के लिए खेतों को जोता जाता है जुती बखरी बारीक मिट्टी बरसात के पानी को जमीन में नहीं जाने देती है वह तेजी से  बह कर खेतों की जैविक खाद को बहा कर ले जाता है। इस से खेत सूख जाते है। भूमिगत जल नीचे चला जाता है जिसका असर सीधे हरियाली पर पड़ता है वनस्पतियां सूखने लगतीं है।
चित्र न. 1 

चित्र न. 1
जुताई करने से मिट्टी बह  जाती है। 
चित्र न. 2 
यहाँ दो अलग अलग जार में पानी में जुती और बिना जुती  मिट्टी को एक साथ बराबर मात्र में डाला गया है।  जुताई वाली मिट्टी  पानी में बिखर जाती है।  इस से यह पता चलता है की कितनी बड़ी मात्रा  में हमारी कीमती मिट्टी  इस प्रकार हर साल पानी के साथ बह जाती है।
दुसरे जार में जिसमे बिना जुताई की मिट्टी  को रखा गया है वह पानी के साथ बिखरती नहीं हैं। इस कारण कितना भी पानी गिरे मिट्टी खेतों बरक़रार रहती है।
चित्र न. 2
जुताई करने से बरसात का पानी जमीन में नहीं समाता है।
इस चित्र में दो बर्तन लिए गए हैं जिनमे एक साथ फिर जुती और बिना जुती  मिट्टी को बराबर मात्र में एक साथ डाल  कर ऊपर से पानी डाला गया है।  जुताई वाली मिटटी के भीतर पानी नहीं जा रहा है वह ऊपर से बह  रहा है।  जबकि दूसरे बर्तन में जिसमे बिना जुताई की मिट्टी रखी  गयी है ने पूरा पानी सोख लिया है वह नीचे बर्तन में इकठ्ठा हो गया है।

उपरोक्त दोनों प्रयोगों से पता चलता है की खेती करने के लिए की जारही जमीन की जुताई कितनी नुक्सान दायक है।

हमारी नदियों के सूखने का मूल यही कारण है। यही कारण है जिस के कारण किसान गरीब हो रहे हैं।
ऋषि खेती ,खेती करने की एक ऐसी तकनीक है जिसमे जुताई की कोई जरुरत नहीं रहती है।  मिट्टी के नहीं बहने से खाद की भी जरुरत नहीं रहती है। ताकतवर मिट्टी  में ताकतवर फसलें पैदा होती हैं उसमे बीमारियों और खरपतवारों की समस्या नहीं रहती है।

Monday, October 6, 2014

शर्मनाक बयान

शर्मनाक बयान 

वन्य प्राणी संरक्षण सप्ताह 


"सांप को हाथ लगाना तो दूर बच्चों को इनके पास भी नहीं जाने दें "
वन विभाग 

देश इन दिनों पर्यावरण के गंभीर संकट से गुजर रहा है इस लिए वन्य प्राणियों का  संरक्षण किया जा रहा है।    शेर ,हाथी सहित असंख्य लुप्त प्राय : प्राणियों का  संरक्षण जरूरी है। किन्तु जब दैनिक भास्कर जैसा जिम्मेवार अखबार ये कहे इनके पास न जाएँ।  तो इसे क्या कहा जायेगा ? यह बहुत ही शर्मनाक बयान है।  बच्चों को वन्य प्राणियों की संरक्षण की भावना तब  पैदा होगी जब उनके मन से उस डर  को दूर किया जाये।  हम अनेक सालो से ऋषि  खेती कर रहे हैं सांप को अपना दोस्त मानते हैं। सांप अनेक मायनो में बहुत लाभ प्रद रहते हैं इसी लिए इनकी पूजा की जाती है। जिस सांप को यहाँ दिखाया गया है वह जहरीला नहीं है। इन्हे हम पालते हैं इन से  आंतंक नहीं रहता है।  भास्कर को गलत बयानी का खंडन छापना चाहिए।
राजू टाइटस
ऋषि खेती फार्म ,होशंगाबाद

एक कचरा क्रांति

एक कचरा  क्रांति

कुदरती खेती 

वीड जिन्हे हम नींदा या खरपतवार कहते हैं या फसलों से निकलने वाले पुआल ,नरवाई आदि को किसान सामान्य बोलचाल की भाषा में कचरा कहते हैं। कचरा वह वस्तु  होती है जिसका  कोई उपयोग नहीं होता है।  किसान इस कचरे को हमेशा मारते  और  जलाते आये हैं।

किसान कचरों को इसलिए मारते रहते हैं क्योंकि वो ये सोचते हैं की ये कचरे रहेंगे तो हमारी मूल फसलें नहीं पनपेंगी उनका खाना ये फसलें खा लेंगी इसी प्रकार वे फसलों के अवषेशों जैसे नरवाई ,पुआल आदि को जला देते हैं,मेड़ों पर फेंक देते हैं  या पशुओं को खिला देते हैं। कचरे नहीं पनपें इस लिए किसान खेतों में हल और बखर चला कर खेतों के तमाम कचरों को मार देते हैं।
हरे कचरों के ढकाव में धरती ठंडी रहती है भूमिगत पानी
 की वास्प ओस बन सिंचाई का काम करती है। 

 अब आप हमारे इन खेतों पर  निगाह डालें ये हमारे आस पास के खेतों से बिलकुल भिन्न नजर आएगा ये कचरों से भरा खेत है। हर जगह कचरों की हरियाली नजर आएगी। जिसके साथ साथ फलदार वृक्ष ,अनाज ,सब्जियों और चारों की फसलें और उनके साथ विचरण करते मोर, बकरियां ,मुर्गियां आदि।

हमारे पड़ोसी किसान फसलों को बोने  से पहले पिछली फसल के कचरों को आग लगा कर जला देते हैं ,कई बार आयातित तेल से चलने वाली मशीनों से खेतों को खूब खोदते और बखरते हैं। कचरों को मारने के लिए जहर डालते रहते हैं।

जबकि हम " कुछ नहीं करते " पिछली फसल के कचरों को वहीं  पड़ा रहने देते हैं जो वहीँ सड़ कर जैविक खाद बन जाते हैं। खेत साल भर हरियाली से ढके रहते हैं इनके नीचे असंख्य जीव ,जंतु ,कीड़े मकोड़े ,केंचुए आदि पनपते हैं। जिनसे हमारे खेतों में पोषक तत्वों और नमी की कोई कमी नहीं रहती है।
कचरों के साथ कचरों के सामान पनपती धान की फसल 

अपनी फसलों को पैदा करने के लिए कचरों के बीच फसलों के बीजों को क्ले मिट्टी में मिलाकर  बीज गोलियां बनाकर फेंकते रहते हैं जो कचरों के साथ साथ कचरों की तरह कचरों से दोस्ती करती पनपती रहती है। इस खेती को हम कुदरती खेती  कहते हैं।

असल में किसान लोग बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं जो कचरों को मार या जला रहे हैं। इसलिए खेतों में पोषकता और नमी नहीं रही है वे मरुस्थल में तब्दील हो गए हैं। मरुस्थली खेतों में फसलों को पैदा करने के लिय अँधा धुंध जहरीले रसायन खेतों में डाले जा रहे हैं।  जिस से मिट्टी ,हवा ,पानी और फसलें सब जहरीली होती जा रहीं है।

अधिकतर लोग ये सोचते हैं हैं की बरसात आसमान से आती हैं किन्तु यह भ्रान्ति है बरसात तो अपने आप पनपने वालों हरे भरे कचरों से आती है।  कचरे आयातित तेल से उठने वाले जहरीले धुंए को सोख कर जैविक खाद में बदल देते  है।  गर्माती धरती को अपनी छाया से ठंडक प्रदान करते  है।  बरसात ,ठण्ड और गर्मी को नियंत्रित करते  है।

सूखे कचरों से जैविक खाद बनती हैं , नमी संरक्षित रहती है,
 ,केंचुए ,मेंढक ,छिपकलियां रहती हैं जो
 फसलों को बीमारियों से बचाती हैं।  
हम पिछले २८ सालों से कचरा खेती कर रहे हैं। इस से पहले हम भी जैविक और अजैविक वैज्ञानिक खेती करते थे  हमारे खेत बंजर हो गए थे। खेतों के कुए सूख गए थे। पशुओं के लिए चारा नहीं था।  हम कर्जों में फंस गए थे। किंतु जैसे ही हमे कचरा क्रांति का ज्ञान मिला हमारी दुनिया ही बदल गयी यह कचरे  क्रांति का ज्ञान हमे जापान के मस्नोबू फुकूओकाजी से मिला वे  एक उत्साहित कृषि वैज्ञानिक थे उन्होंने पाया की आज का कृषि विज्ञान जैव -विविधताओं की हिंसा पर टिका है ,सबको कचरा समझ कर मार रहा है। इसलिए आज खेत और किसान मरने लगे हैं। अमेरिका जैसे विकसित कहलाने वाले देश में मात्र दो प्रतिशत किसान  बचे हैं वहां  के तीन चौथाई खेत रेगिस्तान में तब्दील हो गए हैं।  जापान भी उसी की नक़ल कर रहा है। इसलिए भयंकर ज्वर भाटों से उजड़ रहा है।

हमारे  देश में लाखों किसान आत्म  हत्या कर रहे हैं अतिवर्षा और सूखे के कारण हा हा कार मचा है। हर घर  कैंसर जैसी बीमारियां की चपेट में आ रहा है। इस से निपटने के लिए हमे अब कचरों को बचाना ही होगा।
फसलोत्पादन के लिए की जा रही जमीन की जुताई से सबसे अधिक कचरो की हिंसा होती है उसे रोके बिना हम कचरों को नहीं बचा सकते है।

हमारा मानना  है की जुताई आधारित कोई भी खेती जैविक नहीं हो सकती इसी प्रकार कचरा मारक जहर डाल  कर की जाने वाली नो टिल फार्मिंग भी संरक्षक नहीं है।

राजू टाइटस