Wednesday, June 21, 2017

आदिवासी समूह तेजश्वनी के साथ दो दिवसीय कार्यशाला 1 8 -1 9 जून 2017 


यह कार्य शाला डिंडोरी जिले के आदिवासी विभाग के द्वारा जैविक खेती को समझने के लिए हमारे फार्म पर आयोजित की गयी थी। इसमें ९महिलायें और १० पुरुष थे।  इन सभों पर अपने अपने छेत्र में जैविक खेती के प्रचार प्रसार का भार है। इन लोगों को असली जैविक खेती की जानकारी हेतु हमारे फार्म पर लाया गया था। चूंकि हमारा फार्म  पिछले ३० सालो से बिना जुताई की कुदरती खेती(असली जैविक खेती ) का अभ्यास कर रहा है। जिसे हम ऋषि खेती कहते हैं।

ऋषि खेती से तात्पर्य यह है की हमारे ऋषि जन जंगलों में रहते थे अपने पर्यावरण को बिना बिगाड़े अपना जीवन यापन करते थे। किन्तु जब से हमारे देश में "गेंहूं क्रांति " आयी है।  हमारा पर्यावरण नस्ट हो गया है। इसलिए हम अब कुदरती हवा ,पानी और आहार की कमी में जी रहे हैं। इस बात को अब सरकार भी समझने लगी है इसलिए जैविक खेती के नाम से एक सुधार योजना लाई गयी है जिसका हम स्वागत करते हैं।

जैविक का मतलब है" कुदरत " यानि हमारा पर्यावरण जिसे हमे पुन: जीवित करना है। खेती माध्यम है जिस रास्ते  से हमने अपने पर्यावरण को बिगाड़ा है हमे उसी रास्ते से इसे ठीक करना है। हमने यह पाया है फसलोत्पादन के लिए की जा रही जुताई का इसमें बहुत बड़ा हाथ है। किसान पेड़ों को काटकर खेत बना रहे हैं और जुताई कर खेतों को मरुस्थल कर छोड़ते जा रहे हैं।

हरियाली की कमी के कारण बरसात कम हो जाती है जुताई करने से बरसात का  पानी जमीन में सोखा नहीं जाता है। भूमिगत जल की कमी हो जाती है जिसका सीधा प्रभाव खेती और आजीविका पर पड़ता है। डिंडोरी का आदिवासी छेत्र इसके उदाहरण है।  अब जुताई को छोड़कर हरियाली को बढ़ाने पर जोर देने के सिवाय कोई उपाय नहीं है। इस काम  को करने में ऋषि खेती तकनीक सर्वोत्तम है।

ऋषि खेती तकनीक खरपतवारों और पेड़ों को बचाते  हुए उनके समनवय से सम्पन्न होती है। इसके लिए हम सभी प्रकार के बीजों को जिसमे जंगली ,अर्ध जंगली फलदार पेड़ ,आनाज सब्जी चारे आदि के बीजों को मिला कर क्ले मिट्टी से सीड बाल बनाकर बिखराते जाते हैं। साथ में जुताई ,मानव निर्मित खाद और दवाइयों को पूरी तरह बंद कर देते हैं।
Image may contain: 1 person, sitting
हमने पाया है की एक बरसात में में हमारे खेत हरियाली से भर जाते हैं। दुसरे साल इसमें अपने आप अनेक झाड़ियां और पेड़ पनपने लगते हैं जिस से हमे फसल हमारे पशुओं के लिए चारा मिलने लगता है। मरुस्थली खेत हरियाली में परिवर्तित हो जाते हैं। भूमिगत जल का स्तर उठने लगता है। बरसात भी ठीक से होने लगती है।

इस पूरी कार्य शाला में इस बात को समझाने की कोशिश की गयी है जिसे प्रतिभागियों ने बड़े ध्यान से समझा है उन्होंने सीड बॉल बनाये हैं उन्हें खेत में बिखराया है। इसलिए हमे उम्मीद है की यह "जैविक खेती का मिशन " यदि चलता है तो मात्र कुछ सालो  में डिंडोरी आदिवासी अंचल पूरे देश में चल रही खेत और किसानो की समस्या को हल करने वाला गुरु हो जायेगा।

यह काम आप जैसे आमआदमी ही कर सकते हैं इसमें हम अपना पूरा सहयोग करने का वायदा करते हैं।

धन्यवाद

राजू टाइटस
होशंगाबाद


 

Friday, June 9, 2017

खरपतवारें बहुत उपयोगी हैं !

खरपतवारें  बहुत उपयोगी हैं !

रपतवारों को मारते समय  इन महत्वपूर्ण बिंदुओं को याद रखना उचित होगा।
जैसे ही भूमि की जुताई करना बंद कर दिया जाता है, खरपतवार की मात्रा बहुत घट जाती हैं कहीं तो वो बहुत कम हो जाती हैं।
पिछली फसल को काटने के पूर्व ही यदि नई फसल के बीज बो दिए जायेंगे तो इस फसल के बीज खरपतवार के पहले अंकुरित हो जाएंगे।
 रबी  की खरपतवारों  के बीज खरीफ की चावल की फसल के काटने  के बाद ही अंकुरित होते हैं , लेकिन तब तक रबी  की गेंहूँ /सरसों  काफी बढ़ जाती है।
इसी प्रकार गर्मी की  खरपतवार गेंहूँ  और सरसों की फसले कटने के बाद अंकुरित होती  है, लेकिन उस समय तक अगली  फसल काफी  बढ़ चुकी होती है । बीजों की बोनी इस ढंग से करें कि दोनों फसलों के बीच के अंतर न रहे। इससे अनाज के बीजों को खरपतवार से पहले ही अंकुरित हो, बढ़ने का मौका मिल जाता है।
फसल कटनी के तुरंत बाद खेतों में पुआल/नरवाई आदि को फैला देने से खरपतवार का अंकुरण बीच में ही रुक जाता है। अनाज के साथ ही भूमि आवरण के रूप में सफेद क्लोवर  भी बो देने से खरपतवार को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।
खरपतवार की समस्या से निपटने का प्रचलित तरीका मिट्टी को जोतने। खोदने  का है, लेकिन जब हम ऐसा करते हैं तो मिट्टी के भीतर  गहरे बैठे हुए, वे बीज, जो वैसे अंकुरित नहीं हुए होते, सजग होकर अंकुरित हो उठते हैं। साथ ही तेजी से बढ़ने वाली किस्मों का इन परिस्थितियों में बढ़ने का बेहतर मौका मिल जाता है। अतः आप कह सकते हैं कि जो किसान जमीन की गहरी जुताई  करके खरपतवार को काबू में लाने का प्रयत्न करता है, वह वास्तव में अपनी मुसीबत के  बीज बो रहा होता है।
जहरीले कीटनाशकों का उपयोग
मेरे ख्याल में अब भी कुछ लोग ऐसे होंगे जो सोचते हैं कि यदि उन्होंने रसायनों का उपयोग नहीं किया तो उनके फल वृक्ष तथा फसलें,  देखते-देखते मर  जाएगी। जब कि सच्चाई यह है कि इन रसायनों का ‘उपयोग करके ही’ वे ऐसी परिस्थितियां निर्मित कर लेते हैं  कि उनका  भय साकार हो जाता है।
हाल ही में जापान में लाल देवदार वृक्षों की छाल को घुन लगने से भारी क्षति पहुंची रही हैै। वन अधिकारी  इन्हें काबू में लाने के लिए हेलिकाप्टरों के जरिए दवाओं का छिड़काव कर रहे हैं। मैं यह नहीं कहता कि अल्प समय के  लिए इसका सकारात्मक असर नहीं होगा। मगर मैं जानता हूं कि इस समस्या से निपटने के लिए एक और भी तरीका है।
आधुनिक शोध  के मुताबिक घुन का संक्रमण प्रत्यक्ष न होकर मध्यवर्ती गोल-कृमियों के बाद ही होता है। गोलकृमि तने में पैदा होकर, पोषक तत्वों व पानी के बहाव को रोकते हैं, और उसीसे देवदार मुरझा कर सूख जाता है। बेशक, इसका असली कारण अब तक अज्ञात है।
गोल कृमियों का पोषण वृक्ष के तने के भीतर लगी फफूंद से होता है। आखिर पेड़ के भीतर यह फफूंद इतनी ज्यादा कैसे फैल गई? क्या इस फफूंद का बढ़ना, गोल कृमियों के वहां आने के बाद शुरू हुआ? या गोल कृमि वहां इसलिए आए कि वहां फफूंद पहले से थी? यानी असली ससवाल  घूम-पिफरकर यहीं आकर ठहरता है कि पहले क्या आया? गोल कृमि या फफूंद?
एक और भी ऐसा सूक्ष्म जीवाणु है, जिसके बारे में हम बहुत कम जानकारी रखते हैं, और जो हमेशा फफूंद के साथ ही आता है, और वह फफूंद के लिए जहर का काम भी करता है। हर कोण से प्रभावों
और गलत प्रभावों का अध्ययन करने के बाद निश्चयपूर्वक केवल एक यही बात कही जा सकती है कि देवदार के वृक्ष असाधरण संख्या में सूखते जा रहे हैं।
लोग न तो यह जान सकते हैं कि देवदार की इस बीमारी का असली कारण क्या है, और न उन्हें यह पता है कि उनके ‘इलाज’ के अंतिम परिणाम क्या होंगे। यदि आप बिना सोचे-समझे प्रणाली से छेड़-छाड़ करेंगे तो आप भविष्य की किसी अन्य विपदा के बीज बो रहे होंगे।
  मुझे अपने इस ज्ञान से कोई खुशी नहीं होगी कि गोल कृमियों से होनेवाली तात्कालिक हानि को रासायनिक छिड़काव के जरिए कम कर दिया गया है। इस तरह की समस्याओं को, कृषि रसायनों का उपयोग करते हुए हल करने का यह तरीका बहुत ही गलत  हैं इससे भविष्य में समस्याएं और भी विकट रूप ले लेेंगी।
प्राकृतिक कृषि के ये चार सिद्धांत जुताई नहीं ,निंदाई नहीं, कोई रासायनिक उर्वरक या तैयार की हुई खाद नहीं, रसीनो का कोई उपयोग नहीं  प्रकृति के आदेशों का पालन करते हैं तथा कुदरती सम्पदाओं की रक्षा करते हैं।मेरी कुदरती खेती का यही मूल मन्त्र है । अनाज, सब्जियों और फलों की खेती  सार यही है।

खरपतवारों के संग  गेंहूँ /सरसों /चावल और फलों की खेती 
इन खेतों में अनाज और क्लोवर   के साथ कई विभिन्न प्रकार के खरपतवार भी उग रहे हैं। खेतों में जो धान  का पुआल पिछली पतझड़ के मौसम में बिछाया गया था, वह सड़कर अब बढि़या जैविक खाद  में बदल गया है। पैदावार प्रति चैथाई एकड़ एक टन (एक किलो / वर्ग मीटर ) होने की संभावना है।
घास के  विशेषज्ञ प्रोफेसर कावासे तथा प्राचीन पौध  पर शोध् कर रहे प्रोफेसर  ने कल जब मेरे खेतों में गेंहूँ  और हरे खाद की महीन चादर बिछी देखी तो उसे उन्होंने कलाकारी का एक खूबसूरत नमूना कहा। एक स्थानीय किसान, जिसने मेरे खेतों में खूब सारी खरपतवार देखने की उम्मीद की थी, उसे यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ कि कई अन्य तरह के पौधें के बीच गेंहूँ  और सरसों  खूब तेजी के साथ बढ़ रही है । अनेक  विशेषज्ञ भी यहां आए हैं और उन्होंने भी खरपतवार देखी, चारों ओर उगती क्लोवर  और खरपतवारों को देखा  और अचरज से मुंडी  हिलाते हुए यहां से चल दिए।
बीस साल पहले जब मैं अपने फल-बागों में स्थाई भूमि आवरण उगाने में लगा था, तब देश के किसी भी खेत या फल-बाग में घास का एक तिनका भी नजर नहीं आता था। मेरे जैसे बागानों को देखने के बाद ही लोगों की समझ में आया कि फलों के पेड़, घास और खरपतवार के बीच भी बढ़ सकते हैं। आज, नीचे घास उगे हुए फलबाग आपको जापान में हर कहीं नजर आ जाएंगे तथा बिना घास-आवरण के बागान अब दुर्लभ हो गए हैं।
यही बात अनाज के खेतों पर भी लागू होती है। चावल, गेंहूँ  तथा सरसों  को, सारे साल भर, क्लोवर  और खरपतवार से ढंके खेतों में भी मजे से उगाया जा सकता है।
इन खेतों में बोनी और कटनी की कार्यक्रम सूची की मैं जरा विस्तार से समीक्षा करना चाहूंगा। अक्टूबर के प्रारम्भ में, कटनी से पहले क्लोवर और तेजी से बढ़ने वाली गेंहूँ /सरसों  की फसल के बीज धान  की पक रही फसल के बीच ही बिखेर दिए जाते हैं।
गेंहू या सरसों  और क्लोवर  के पौधे जब  एक-दो इंच उपर तक आ जातें हैं तब  तक चावल भी पक कर कटने योग्य हो जाता है। चावल की फसल काटते समय क्लोवर  और गेंहूँ  के नन्हे पौधे  किसानों के पैरों तले कुचले जाते हैं, लेकिन उन्हें फिर  से पनपने में ज्यादा समय नहीं लगता। धान  की गहाई पूरी हो जाने के बाद उसकी  पुआल को खेत पर फैला दिया जाता है।
यदि धान  शुरू बरसात  में सीधा बोया  गया हो और बीजों को ढंका न गया हो तो बीजों को अक्सर चूहे या परिंदे खा जाते हैं, या वे जमीन में ही सड़ जाते हैं। इससे बचने के लिए में धान  के बीजों को बोने से पहले मिट्टी की गोलियों में लपेट देता हूं। बीजों को एक टोकरी या चपटे बरतन में गोल-गोल और आगे-पीछे हिलाया जाता है। इसके बाद उन पर महीन क्ले मिट्टी  छिड़क दी जाती है, और बीच-बीच में उन पर पानी का ‘हल्का’ सा छिड़काव भी किया जाता है। इस के करीब आध इंच व्यास की गोलियां बन जाती हैं।
गोलियां बनाने का एक और तरीका भी है। पहलेधान के बीजों को कुछ घंटों तक पानी में  डुबो दिया जाता है। फिर  धान को गीली मिट्टी में हाथों या पैरों से गूंध् लिया जाता है। इसके बाद तार की मुर्गा जाली में से इस मिट्टी  को दबाकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बदल दिया जाता है  को एक-दो दिनों तक थोड़ा सूखने दिया जाता है ताकि हथेलियों से उनकी गोलियां बनाई जा सकेें। सबसे अच्छा तो यह होगा कि हर गोली में एक ही बीज हो। एक दिन में इतनी गोलियां बन जाएंगी, जिनसे कई एकड़ में बुआई की हो सकती है।
परिस्थितियों के मुताबिक कभी-कभी मैं इन गोलियों को बोने के पहले उनमें अन्य अनाजों या सब्जियों के बीज भी रख देता हूं।
मध्य नवम्बर से मध्य दिसंबर के बीच कीअवधि  मैं धान  की बीजों वाली इन गोलियों को गेंहूँ या सरसों  की नई फसल के बीच बिखेर देता हूं। ये बीज बरसात  में भी बोए जा सकते हैं।
फसल को सड़ाने के लिए खेत पर कुक्कट खाद की एक पतली परत भी फैला दी जाती है। इस तरह पूरे साल की बोनी पूरी होती है।
मई में रबी  के अनाज की फसल काट ली जाती है। उसकी गहाई के बाद उसका पुआल भी खेत में बिखेर दिया जाता है।
इसके बाद खेत में एक हफ्रते या दस दिन तक पानी बना रहने दिया जाता है। इससे क्लोवर  और खरपतवार कमजोर पड़ जाती है, और चावल को गेंहूँ /सरसों की नरवाई  में से अंकुरित हो कर बाहर आने का मौका मिल जाता है। जून और जुलाई में बारिश का पानी ही पौधें के लिए पर्याप्त होता है। अगस्त महीने में खेतों में से ताजा पानी सिर्फ  बहाया जाता है, उसे वहां रुकने  नहीं दिया जाता है। ऐसा हफ्ते  में एक बार किया जाता है। इस समय तक  कटनी का समय हो जाता है।
 कुदरती तरीके  से  चावल और गेंहूँ / के अनाज की खेती का वार्षिक चक्र ऐसे चलता है। बोनी और कटनी का यह तरीका  इतने करीब से प्राकृतिक क्रम की नकल करता है कि उसे कोई कृषि तकनीक कहने की बजाए प्राकृतिक कहना ही उचित होगा।
चैथाई एकड़ के खेत में बीज बोने या पुआल फैलाने में किसान को एक या दो घंटे से ज्यादा का समय नहीं लगता। कटनी के काम को छोड़कर, गेंहूँ  की फसल को अकेला किसान भी मजे से उगा सकता है। एक खेत में चावल की खेती का जरूरी काम भी दो या तीन लोग ही परम्परागत जापानी औजारों की मदद से निपटा लेते हैं। अनाज उगाने की इससे सरल तरीका  और कोई नहीं हो सकता  है। इस तरीके से  बीज बोने तथा पुआल फैलाने के अलावा खास कुछ भी नहीं करना पड़ता, लेकिन इस सीधी -सादी तकनीक तक  पहुंचने में मुझे तीस बरस का समय लग गया।
खेती का यह तरीका जापान की प्राकृतिक स्थितियों के अनुसार विकसित हुआ है, लेकिन मैं सोचता हूं कि प्राकृतिक खेती को अन्य क्षेत्रों में अन्य देसी फसलें उगाने के लिए भी अपनाया जा सकता है। मसलन जिन इलाकों में पानी इतनी आसानी से उपलब्ध् नहीं होता, वहां पहाड़ी चावल, ज्वार, बाजरा या कुटकी को उगाया जा सकता है। वहां क्लोवर  की जगह अन्य दलहन  की किस्मों का जैसे  बरसीम ,रिजका ,मेथी  मोठ खेतों को ढंकने के लिए ज्यादा अच्छे उपयोगी साबित हो सकते हैं। प्राकृतिक कृषि उस इलाके की विशिष्ट परिस्थितियों के मुताबिक अपना अलग रूप धरण कर लेती है, जहां उसका उपयोग किया जा रहा हो।
इस प्रकार की खेती की शुरुवाद  करने से पूर्व कुछ थोड़ी निंदाई, छंटाई या खाद बनाने की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन बाद में हर साल इसमें क्रमशः कमी लाई जा सकती है। आखिर में जाकर सबसे महत्वपूर्ण चीज कृषि
करने के सोच पर निर्भर है। 

ढेंचा में ऋषि खेती करते पंजाब के किसान मक्का Rra Aha U ll


ढेंचा में ऋषि खेती करते पंजाब के किसान
मक्का
Rra Aha U ll

ढेंचा  एक दाल जाती का पौधा होता है जो जमीन में जबरदस्त यूरिया बनाने का काम करता है। इसके ढकाव में मक्का की खेती करने से पहले साल ही बंपर उत्पादन लिया जा सकता है।  

ढेंचे के ढकाव को ट्रेक्टर चलाकर  कर सुलाया जा रहा है इसमें हाथों से मक्का के बीज गड़ा दिए जायेंगे। 
जुताई नहीं ,खाद नहीं ,दवाई नहीं 
इस कवर में सीड बॉल बिखरा कर भी सुलाया जा सकता है इस से वीड कन्ट्रोल और यूरिया दोनों का लाभ मिलेगा। 

Thursday, June 8, 2017

मूंग की खेती के बाद करें बिना जुताई धान की खेती

मूंग  खेती के बाद करें बिना जुताई धान की खेती 


धान में खरपतवार नियंत्रण 


न दिनों आपके खेत में मूंग की फसल पक रही है। उस को सुखाने के लिए जहर का छिड़काव इसलिए किया जाता है जिससे वह सूख जाये इस से उत्पादन  प्रभावित होता है साथ में फसल भी जहरीली हो जाती है।  मूंग में फलियां लगती रहती हैं पहले की फलियां पक  कर सूखने लगती हैं। इन्हे हाथों से तुड़वाने से उत्पादन अधिक मिलता है।

R A Ull जी  के खेत की मूंग 
दूसरा इसका यह फायदा रहता है की खेत मूंग के पौधों से ढंका रहता है। इसलिए उसमे आगे खरपतवारों की समस्या भी नहीं रहती है। इस ढकवान में बरसात आने पर मूंग उड़द और धान के बीजों को क्ले के साथ मिला कर गीली सीड बाल छिडकी जा सकती हैं।  जिस से हमे फिर से मिश्रित फसल मिल  जाएगी साथ में खेत में भरपूर कुदरती यूरिया भी मिल जायेगा जिसके सहारे गेंहूं की कुदरती फसल भी आसानी से ली जा सकती है।
गेंहूं की फसल के धान काट्ने से पहले ही खेत में गेंहूं के बीज छिड़क दिए जा सकते हैं। उनके जमने के बाद धान की फसल को काट कर धान को झाड़ कर पुआल को उगते हुए गेंहूं पर  फेंक दिया जाता है।

फ़ोटो: THE ONE STRAW REVOLUTION
I believe that a revolution can begin from this one strand of straw. Seen at a glance, this rice straw may appear light and insignificant. Hardly anyone would believe that it could start a revolution. But I have come to realize the weight and power of this straw. For me, this is revolution is very real.
एक तिनके से आई क्रांति. 
मेरे मानना है की धान के पुआल के एक तिनके से बहुत बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकती है. देखने में ये तिनका बहुत छोटा सा और बेकार नजर आता है. किसी को भी  विश्वाश नहीं होगा की ये किसी क्रांति को जन्म दे सकता है. किन्तु मुझे इस तिनके की ताकत और छमता का आभास हो गया है. ये वास्तविक क्रांति है.
धान की पुआल से निकलते गेंहूं के नन्हे पौधे 
इस प्रकार की धान की खेती में पानी भरा नहीं जाता है वरन उसकी अच्छे से निकासी की जाती है जरूरत पड़ने पर नालियां बना ली जाती हैं।
   
फ़ोटो: RICE STRAW SCATTERED OVER GERMINATING WINTER CROP.
पानी की निकासी के लिए बांयी गयी नालियां 

Monday, June 5, 2017

बिना जुताई की खेती और बकरी पालन



बिना जुताई की खेती और बकरी पालन 


म पिछले करीब 50 सालो से खेती को आत्म निर्भर बनाने के उदेश्य से पशु पालन से जुड़े हैं। पहले हमने देशी किस्म की गायों के पालने का काम शुरू किया था साथ में कुछ भेंसे भी रखीं थीं। दूध को पास में लगी कॉलोनी में बेचने के लिए हम अपने कर्मचारियों को भेजते थे।  हमरा उदेश्य था की लोगों के पास शुद्ध कुदरती  दूध पहुँच जाये। लोग इस से बहुत खुश थे। उसका कारण यह है की शुद्ध दूध कोई बेचते नहीं है सब पानी मिलाकर दूध बेचते हैं।

ये वाकया उन दिनों का है जब हम जुताई कर देशी खेती किया करते थे। खेतों में बैलो से जुताई की जाती थी हमारा उदेश्य यह था की दूध से आमदनी होती रहेगी और गोबर की खाद से खेती होती रहेगी। कुछ समय ऐसा हुआ भी। उन दिनों हम पशुओं के लिए कुदरती चरोखर बचा कर रखते थे। जिसमे पशु चरते थे। दुधारू पशुओं को अलग से दाना दिया जाता था। जो कुदरती होता था।
फ़ोटो:
बरबरी जाती की बकरी साल में दो बार बच्चे देती है तीन बच्चे तक देती है
दो लीटर दूध भी देती है। 
किंतु यह तरीका अधिक दिन तक नहीं चल पाया हमे "हरित क्रांति " के चक्कर में फंस गए थे।  हमारे खेतों पर आधुनिक खेती के मेले  आयोजित होते थे। हाइब्रिड बीजों , रासायनिक उर्वरकों ,कीटनाशकों से खेती करना सिखाया जाता था। साथ में गोबर की खाद डालने को भी कहा  जाता था। शुरू में तो अच्छा उत्पादन मिला किन्तु मुनाफा नहीं था इस तरह हम करीब १५ साल आधुनिक वैज्ञानिक खेती में से जुड़े रहे।

इस दौर में हमने पशुपालन मे भी तब्दीली के साथ संकर नस्ल की गायों को  पालना शुरू कर दिया था। दूध का उत्पादन भी बहुत बढ़ गया था किन्तु मुनाफा नदारत था।  इसलिए हमे ऋषि खेती करने का निर्णय ले लिया और पांच साल हम पशु पालन से दूर रहे थे।  किन्तु दूध ऐसी जरूरत बन गया था हमे पुन : हमे पशु पलना पड़ा।
इस समय हमने देशी किस्म की भैंसों को पालना शुरू किया साथ में हमने चारे के लिए सुबबूल को भी लगाना शुरू कर दिया था। किन्तु सुबबूल का चारा भैंसों को कम पड़ता था इसलिए हम भैंस कम करते गए।आखिर में  एक भैंस रह गई थी इसी प्रकार एक गाय भी हमने पाल कर अनुभव किया जिसमे हमे निराशा हाथ लगी।
फ़ोटो:
सुबबूल के पेड़ों के साथ बकरीपालन सुबबूल की पत्तियों के साथ अलग से कुछ देने की जरूरत नहीं है।
बड़े जानवरों के साथ हरे चारे के लिए बड़े मैदान हो तब ठीक रहता है इसलिए करीब ५० साल में हमारा अनुभव गाय  भेंसो के साथ ठीक नहीं रहा था। हमेशा  हरे चारे और अनाज की कमी बनी रहती थी।   सं 1999 में हमारी मुलाक़ात जापान के हमारे ऋषि खेती के गुरु फुकुकाजी से हुई थी उन्होंने हमे सुबबूल के पेड़ों के साथ गायों को पालने की बात बताया था उनका कहना है की पशु पालन अपने पर्यवरण के अनुसार होना चाहिए।

अच्छे जंगल है तो हम हाथी  भी पाल सकते हैं नहीं तो क्रमश हमे जानवरों को कम और छोटा करने की जरूरत है।  हमने ऐसा ही किया एक गाय भी हम नहीं पाल पाए हमे बकरियों का पालन शुरू करना पड़ा। बकरी पालन हमे ठीक लगा। एक तो जब चाहें  हम बकरियों को कम कर सकते हैं।  दूसरा इनका दूध बहुत स्वादिस्ट और गुणकारी होता है। आर्थिक मुनाफे  भी यह कम नहीं है। यह हमारा एटीएम है।

जब हम जुताई नहींकरते हैं तो हमारे खेत असंख्य वनस्पतियों से भर जाते हैं।  बकरियां सभी वनस्पतियों को थोड़ा थोड़ खाती रहती हैं।  इस से खरपतवारों का नियंत्रण हो जाता है। इनकी मेंगनी खेतों में समानता के साथ अपने आप बिखरती जाती हैं जिनसे अनाज सब्जियों और फलदार पेड़ों को बहुत फायदा होता है।

जबकि गाय भैंसों के गोबर से बहुत गंदगी होती है उनको बड़ी सार में पालना पड़ता हैं जिन्हे गेंहू का भूसा और धान का पुआल देना और दाना देना बहुत दुखदायी रहता है। श्रम भी अधिक लगता है।
आज जबकि जुताई के कारण खेत मरुस्थ बन रहे हैं उन्हें सुधारने  के लिए  बकरीपालन अच्छा उपाय है।
यह आम के आम गुठली के दाम जैसा है।

इनका बाज़ार भी बहुत आसान है कुछ सड़क पर फेंकने की जरूरत नहीं है। यह खेती कर्ज ,अनुदान और मुआवजे से मुक्त है। 

Friday, June 2, 2017

गौ माता की आस्था

गौ माता की आस्था 


Image may contain: 3 people, horse, outdoor and natureभारत एक कृषि प्रधान देश है जिसमे पशु पालन जंगल खेती के कारण हम हजारों साल बचे रहे हैं।  टिकाऊ जीवन पद्धति में गाय का विशेष महत्व रहा है।  बेलों से जहां ऊर्जा मिलती थी वहीं गाय के दूध से स्वास्थ जुड़ा है। गोबर गोंजन को खेतों में खाद के लिए बहुत उपयोगी माना गया है।

यही कारण है आज भी हमारे देश में गाय को माता  मान कर उसकी पूजा होती है। प्राचीन देशी खेती किसानी हजारों साल टिकाऊ रही है। यह भारत की संस्कृति का आधार है।

किन्तु जबसे हमारे देश में गहरी जुताई रसायनो  और मशीनों से खेती का चलन शुरू हुआ है तब से हमारी संस्कृति और गौ माता की आस्था को भारी  धक्का लगा है। पहले हर किसान अपने घर में गाय को पालता था। गाय परिवार के सदस्य की तरह रहती थी। उसकी परवरिश भी माँ  की तरह की जाती थी। किन्तु अब लोग खेती किसानी से हट  कर शहरों में रहने लगे हैं जहां गायों को पालने की सुविधा नहीं है इसलिए लोग गोशालाओं पर निर्भर हो गए हैं।  पहले हर गाँव में चरोखर हुआ करते थे। गाँव में खुद के जंगल होते थे।  जहां दिन भर पशु कुदरती चारा चरते चरते थे। इसलिए उनका दूध कुदरती स्वास्थवर्धक होता था।

अब गौशालाओं में गायों को मुनाफे के लिए पाला जाता है।  उन्हें गैर  कुदरती आहार जैसे यूरिया का अनाज और भूसा ,पुआल खाने को दिया जाता है। खुला चरने की स्वतंत्रता नहीं है। गायों के बच्चों को भी पैदा होते मार दिया जाता है उनका मुखौटा बना कर गायों का दूध लगाया जाता है। इसके लिए गायों को ऑक्सीटोसीन के इंजेक्शन दिए जाते हैं जो बहुत जहरीले होते हैं इस से दूध भी जहरीला हो जाता है। अधिक से अधिक दूध मिले इसलिए अनेक प्रकार की दवाइयां गायों को दी जाती हैं। इसलिए अब गाय के दूध से भी कैंसर हो जाने का खतरा हो गया है।

खेतों में जुताई होने के कारण कुदरती घास  का एक तिनका नहीं रहने दिया जाता है। सारे  चरोखर और निजी जंगल अब जुताई के अनाजों के खेत बन गए हैं। यही कारण  है की अब गौमाता की तस्वीर लगाकर पूजा होती है। खेती किसानी से जुडी आस्था अब नहीं रही है।

अनेक लोग इस आस्था को अपने मतलब के लिए भुनाने  का काम कर रहे हैं। वो लोग गोबर और गौ मूत्र की दवाइयां बना  कर बेचने लगे हैं। अनेक कृषि वैज्ञानिक भी अब इस आस्था के नाम से अनेक प्रकार जैविक खेती की पद्धतियां बेच रहे हैं। किन्तु वे कुदरती चरोखरों और जंगलों को बचाने के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं।

हम पिछले 30 सालो से अधिक समय से बिना जुताई की कुदरती खेती कर रहे हैं जिसमे पशु पालन भी जुड़ा है
हम चारे के लिए सुबबूल के पेड़ लगाते हैं। सुबबूल की पत्तियों में हाई प्रोटीन है।  यह उत्तम चारा है इसके जड़ें खेत में कुदरती यूरिया बनाने का काम करती हैं जिनके सहारे गेंहूं चावल की खेती भी आधुनिक खेती से अच्छी हो जाती है। कुदरती हरे और सूखे चारे की कोई कमी नहीं रहती है। कोई भी दुधारू पशु सुबबूल के सहारे  आसानी से पल जाता है।

किन्तु यह तभी संभव जब हम बिना जुताई ,बिना खाद और बिना मानव निर्मित दवाइयों  का उपयोग करें।
सुबबूल पेड़ है इसलिए पेड़ों से मिलने वाले सभी फायदे भी मिलते रहते हैं। अनाजों  की फसलों में आधुनिक  खेती के बराबर उत्पादन मिलता है वहीं सुबबूल से चारा ,लकड़ी और पशुओं की आमदनी से करीब एक लाख रूपये प्रति एकड़ आमदनी अतिरिक्त है। 

Thursday, June 1, 2017

सुबबूल के बीजों का सीड बॉल बनाना

सुबबूल के बीजों का सीड बाल बनाना 


सुबबूल एक द्विदल जाती का पेड़ है इसलिए यह जमीन से जितना ऊपर रहता है अपनी छाया के छेत्र में नत्रजन (यूरिया ) सप्लाय करने  का काम करता है। यह फसलों को गर्म और ठंडी हवा से बचाता है। फसलों पर लगने वाले रोगों से बचाव करता  है। बरसात को लाता है बरसात के पानी को संग्रहित कर भूमिगत जल के स्तर को बढ़ाता है।  इसकी पत्तियां हाई प्रोटीन चारे से युक्त रहती हैं। दुधारू पशु इसे चाव से खाते  हैं।  इस से साल भर हरा चारा मिलता है।  इस पेड़ की खासियत यह है कि यह बहुत तेजी से बढ़ता है। जितना काटो उतना तेजी से पनपकर फिर जैसा की तैसा हो जाता है।

इसकी लकड़ी इमरती और जलाऊ के लिए बहुत उपयोगी है। इसके साथ गेंहू और चावल की बिना जुताई  ,खाद और दवाइयों की उन्नत खेती भी हो जाती है।

इसको उगाने के लिए शुरू में सीड बॉल बना कर फैलाना सबसे अच्छा रहता है। इसके लिए हमे क्ले (कपा ) चाहिए यह सामन्यत: तालाब के नीचे जब पानी सूख जाता है मिलता है। यह नदी नालों के किनारे पर भी मिलता है। यह जंगलों और खेतों से बह कर वहां इकट्ठा होता है। यह मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए उपयोगी है। इसको परखने के लिए एक सीड बाल बनाकर उसे पानी में डाल कर रखने से वह  घुलती नहीं है।

इस मिट्टी को साफ़ कर बारीक कर  लिया जाता है इसके साथ बीजों का करीब 1 :7 के हिसाब से मिक्सर बना कर आटे की तरह गूथ लिया जाता है।मिट्टी  गूँथी हुई मिट्टी कर्री होना चाहिए यानी जब हम अपने कान के नीचे लटकने वाले भाग को पकड़ते हैं उतनी कर्री होना चाहिए।

इसके बाद हाथों से करीब १/२ इंच व्यास की गोलियां बना ली जाती है


Wednesday, May 31, 2017

सीड बॉल क्रांति



सीड बॉल क्रांति 


1999 में जापान के ख्याति प्राप्त कृषि वैज्ञानिक एवं कुदरती खेती के प्रणेता श्री स्व मस्नोबू फुकुओकाजी गाँधी आश्रम सेवाग्राम में पधारे थे। उन्हें वहां एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में आमंत्रित किया था। इस की जानकारी मुझे मेरे मित्र जेकब नेलिथेनम ने दी मै  सीधे वहां पहुँच गया। जब हम वहां पहुंचे फुकुओकाजी अपनी टीम के साथ मीटिंग हाल के बाहर कुर्सी लगाकर बैठे थे उनके साथ श्री मकीनो अनुवादक ,दो लड़कियां और एक वीडियो ग्राफर भी थे। हाल के अंदर भाषण चल रहे थे जो उन्हें पसंद नहीं थे इसलिए वो बाहर पोस्टर आदि लगाकर बैठे थे। किन्तु अफ़सोस की बात उन्हें सुनने के लिए वहां कोई नहीं था।

मै और जेकब उनके पास सीढ़ियों पर बैठ गए थे। इस से 10 साल पहले वे हमारे फार्म पर पधार चुके थे। हम सन 84 -85 से कुदरती खेती का अभ्यास कर रहे थे उन्होंने हमे पहचान लिया। फिर क्या था हमारे बीच संवाद शुरू हो गया। मकीनो जी हिंदी  में अनुवाद करने लगे।  देखते देखते अनेक लोग उनकी बांतो को सुनने के लिए के लिए इकठे होने लगे भीड़ इकठा होने लगी। हाल के अंदर के लोग भी भाषण छोड़ कर बाहर आ गए।

वो बता रहे थे की पिछले अनेक सालो से वो नेचरल फार्मिंग कर रहे हैं अनेक किताबें उन्होंने लिखी हैं अनेक बार अख़बार में और मेगज़ीनो में उनके लेख छपे हैं। अभी यहां आने से पहले में तंजानिया गया था वहां पांच साल पहले भी में गया था। वहां बहुत भयंकर सूखा पड़ा था वहां बरसात होना भी बंद हो गई थी।

Image may contain: 1 person, sitting and childपहले वहां घने जंगल थे किन्तु जुताई और रसायनो पर आधारित खेती के आने से सारे जंगल नस्ट हो गए थे। खान ,पानी और पशुओं के लिए चारा भी नहीं था। गंभीर  संकट पैदा हो गया था। दुनिया भर से समाज सेवक वहां जा रहे थे पर कुछ नहीं हो रहा था। उन्होंने बताया की वो ऐसे दूर दराज  के इलाके में में गए  जहाँ पहले कोई नहीं गया था।

वहां कुछ लोग बिना जुताई करे हाथों से बीजों को गड़ा  कर खेती कर जैसे तैसे गुजर कर रहे थे।वहां उन्होंने लोगों को सीड बॉल बनाना सिखाया दुर्भाग्य से वहां क्ले मिट्टी नहीं मिली पर दीमक की मिट्टी बहुत थी उस से सीड बॉल बनाई  गयी। मरता क्या नहीं करता बच्चा बच्चा सीड बॉल बनाकर गुलेल से  सीड बाल बनाकर फेंकने लगा। जब दुबारा फुकुओका जी ५ साल बाद वहां गए तो दंग रह गए बहुत बड़ा इलाका हरियाली से ढक गया था। जहां बरसात नहीं होती थी वहां बरसात होने लगी पशुओं के लिए चारा खाने को अनाज सब उपलब्ध था।
Image may contain: 7 people, people sitting, child and indoor


फुकुओकाजी ने बताया कि "जुताई वाली खेती "के कारण पनपते रेगिस्तानों को थामने  के लिए सीड बाल सब से सरल सस्ता उपाय है। इसमें हरियाली का विज्ञान और दर्शन  छुपा है। 

Monday, May 29, 2017

धार्मिक आहार

धार्मिक आहार



जितने धर्म गुरु हैं वो उतने प्रकार के आहार के बारे में कहते हैं जैसे कोई शाकाहार को अच्छा बताता है तो कोई दूध को अच्छा कहता है। कहीं मछली की पूजा होती है तो कहीं बकरे को पूजा जाता है। कोई प्याज और लहसुन को गलत बताता है तो कोई अच्छा कहता है।  हमारा कहना यह है की हर किसी को अपने खाने के बारे में  कुदरती नजर से देखने की जरुरत है।  जैसे गेंहूं और चावल शाकाहार हैं। किन्तु जुताई के कारण कमजोर हो गयी जमीन में उगाये जा रहे हैं जिनमे यूरिया सहित अनेक विषैले जहर उँडेले जा रहा रहे हैं।  जो शुगर जैसी अनेक बीमारियों का कारण बन रहे हैं।
Image result for unnatura cow keeping
उसी प्रकार गाय के दूध को अमृत कहा जाता है। किन्तु अनेक गाये गोशालाओं में बंधी रहती हैं उनको अनेक प्रकार का गैरकुदरती चारा और दवाइयां दी जाती हैं जिसके कारण दूध भी विषैला हो जाता है। वैसे मछली अब गैर कुदरती तरीके से पाली जाने लगी हैं। यही हाल प्याज  और लहसुन पर भी लागू होती है।

आंवला और तुलसी अब जुताई वाले खेतों में पैदा किया जा रहा है इस लिए अब उनमे भी रोग निरोग शक्ति नहीं है। यही हाल शहद का हो गया है गैर कुदरती तरीके से पैदा किया गया शहद  अब सेवन करने लायक नहीं है।

इसलिए हमारा कहना है की हमे जो भी खाना हो उसे कुदरती होना चाहिए।  

Monday, May 22, 2017


जुताई से बड़ी कोई हिंसा नहीं है।

जुताई से बड़ी कोई हिंसा नहीं है 


ब हम फसलों के उत्पादन के लिए खेतों में हल या बखर चलाते हैं उस समय हम खेतों के सभी पेड़ों को काट देते हैं उनके ठूंठ भी खोदकर फेंक देते हैं।  पेड़ जो हमे प्राण वायु प्रदान करते हैं ,पेड़ जो हमे बरसात देते हैं ,पेड़ हमे जो फल और चारा देते हैं ,पेड़ हमे ईंधन देते हैं उनके काटने से हमारी धरती गर्म हो जाती है।

पेड़ों के साथ साथ हम उन तमाम झाड़ियों को भी काट देते हैं जिनके सहारे असंख्य जीव जंतु कीड़े मकोड़े जीवन यापन करते हैं वो मर जाते हैं। पेड़ों के साथ झाड़ियां और झाड़ियों के साथ घास और अनेक वनस्पतियां रहती हैं जो एक दुसरे के पूरक होते हैं इनके साथ असंख्य जीव जंतु कीड़े मकोड़े और जानवर रहते हैं जो मर जाते हैं। ये कीड़े मकोड़े जमीन में बहुत काम करते हैं मिट्टी को भुर भुरा बनाते हैं इनके जीवन चक्र से खाद और पानी का संचार होता है। जुताई करने से ये सब मर जाते हैं।
अपनी मिट्टी की स्व  जांच करें अपने खेत से जुताई वाली और बिना जुताई वाली मिट्टी उठायें उसे पानी में डाल कर देखें। 

असल मरती है हमारी धरती माँ जो दुनिया की सबसे बड़ी हिंसा है। यही कारण है हमारे किसान अब मरने लगे हैं लाखों  किसानो ने आत्म हत्या कर ली है और हर दिन करते जा रहे हैं। जब धरती माँ मर जाती है तो हम उसमे अनेक जहरीले रसायन जैसे यूरिया आदि डालते हैं इस से माँ की बची कूची जान भी निकल जाती है हमारा भोजन जहरीला हो जाता है जिस से हम लोग भी मरने लगे हैं।
जुताई करने का सबसे बड़ा नुक्सान बरसात के पानी का शोषण नहीं होना है इसलिए सूखा पड़  रहा है रेगिस्तान पनप रहे हैं। 

Sunday, May 21, 2017

खेतों की जुताई और हम लोग

खेतों की जुताई का हमारे जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव 

ज कल जो भी शाकाहार हम खा रहे हैं वह अधिकतर खेतों से आता है। जब भी फसलों के उत्पादन के लिए खेतों में हल /बखर चलाये जाते हैं तो  पेड़ों और झाड़ियों और घासों आदि को साफ़ कर दिया जाता है। जमीन को खूब जाता और खोदा जाता है।  इस प्रक्रिया से जब बरसात आती है बखरी  मिट्टी कीचड बन जाती है जो बरसात के पानी को जमीन में नहीं जाने देती है।  इस कारण बरसात क अपनी तेजी से बहता है अपने साथ खेत की खाद को भी बहा कर ले जाता है। इस कारण बाढ़ आ जाती है और सूखा पड़ता है।

एक बार की जुताई में करीब खेत की आधी खाद बह  जाती है ऐसा हर बार होता है खेत कमजोर हो जाते हैं इसलिए किसान खेतों में यूरिया डालते हैं जो जहरीला रसायन है। जिस से हमारा खाना भी जहरीला हो जाता है। १- पेड़ों झाड़ियों घासों आदि की कमी के कारण हमे सांस लेने लायक कुदरती हवा कमी हो जाती है।
२- बाढ़ आने से सब डूब जाता है और पानी की कमी के कारण पीने के पानी की कमी हो जाती है।
३-यूरिया आदि  विषैले  रसायनो से  हमारी रोटी  भी जहरीली हो जाती है।
४-इस कारण हम और हमारा परिवार बीमार होने लगता है कैंसर जैसी आनेक बीमारियां  हमे घेर लेती हैं।

क्ले की सही पहचान करें और यूरिया हटाएँ

क्ले की सही पहचान करें और यूरिया को टाटा करें


क्ले मिट्टी की सही पहचान करने के लिए गोलियॉं को पानी में डाल कर कुछ समय रखते हैं जो क्ले होती है वह घुलती या बिखरती नहीं है।
कटोरी में पानी भरकर उसमे गोलियां डाली गयी हैं। जो नहीं घुल रही हैं
इस से बीज सुरक्षित बने रहते हैं। 
यह मिट्टी जुताई वाले खेतों से या जंगलों से बह कर निकलती है। जो नदी नालो और तालाब के अंदर मिलती है। इस मिट्टी में असंख्य खेत को उर्वरता प्रदान करने वाले सूक्ष्म जीवाणु रहते हैं।  असली नत्रजन हमे इस मिटटी से मिलता है।
यह सर्वोत्तम खाद है यूरिया और गोबर ,गोमूत्र की खाद की  जरूरत नहीं है उस से फसलें कमजोर होती हैं उस से फसलें कमजोर होती हैं जिनमे कीड़े लग जाते हैं। 

Saturday, May 20, 2017

अरहर के सीड बॉल बनाना

अरहर की सीड बाल बनाना 


बसे पहले हम क्ले मिट्टी की जांच करते हैं।  जांच करने के लिए एक दो गोलियों को बिना बीज के बना कर पानी में  कर रखते हैं क्ले की गोली घुलती नहीं है।

दूसरा अरहर के बीज एक दम  गीली मिट्टी के साथ मिलने पर फूलने लगते हैं इस कारण गोलियां टूट जाती हैं।
इसके दो उपाय हैं पहला बीजों को गर्मियों में पानी में भिगालकर पहले ही फूल लिए जाता है फिर गोली बना कर जल्दी धुप में सुख लिया जाता है। दूसरा गर्मियों में क्ले को बारीक कर रख लें बोने  से पहले बरसात में गीली गोलियों को बना कर फेंक लें।

अरहर के लिए हम आधा इंच व्यास की गोलियां बनाते हैं इसमें 1 :7 के अनुपात यानि एक भाग बीज और ७ भाग मिट्टी ली जाती है किन्तु इस अनुपात का भी  टेस्ट कर लेना चाहिए।




Thursday, May 18, 2017

किडनी बचाओ !


बेवर खेती श्री नरेश विश्वाश जी की पोस्ट

यूरिया से पैदा खाना तुरंत बंद करें

यूरिया का खाना तुरंत बंद करें


 फसलों के उत्पादन के लिए जब खेतों को खोदा / जाता उसकी कुदरती नत्रजन (यूरिया ) गैस बन कर उड़ जाती है इसलिए खेती के डाक्टर लोग यूरिया डालने की सलाह देते हैं।  यूरिया जहर है।  इसको डालने से जो खाना पैदा होता है उसको खाने से शुगर को बीमारी हो जाती है जो सब बीमारियों की माँ है।

जब हमको शुगर हो जाती है डाक्टर हमको मेटाफॉर्मिन और इन्सुलिन इंजेक्शन लेने की सलाह देते हैं। इन दवाइयों से जांचने पर ब्लड शुगर समान्य दिखाई देती है ,किन्तु बीमारी जाती नहीं है। यह ठीक बुखार उतरने वाली दवा जैसा है बुखार तो उत्तर जाता है पर बीमारी जहां की तहां रहती है।

किन्तु जब हम यूरिया का खाना बंद कर देते हैं   तो शुगर की बीमारी ठीक हो जाती है इस बीमारी से आगे होने वाले खतरे भी टल  जाते हैं। हार्ट अटैक ,स्ट्रोक ,कैंसर ,गैंग्रीन अनेक बीमारियां मूलत: शुगर के कारण होती हैं।
ये जानकारी डाक्टर लोग नहीं देते हैं क्योंकि उन्हें यह पढ़ाया ही नहीं जाता है।

हम पिछले 30 सालो से  बिना जुताई ,खाद और यूरिया की खेती कर रहे हैं हमे भी शुगर हो गई थी मेरी पत्नी को हार्ट अटैक और मुझे स्ट्रोक हो गया था। इसलिए हमने यह जानकारी हासिल की है।  बिना दवाइयों के स्वस्थ हैं। हम यूरिया का खाना बिलकुल नहीं खाते हैं।

जब हम बिना यूरिया के खाने की जानकारी लेते हैं  गेहूं ,चावल ,आलू और शकर इस से ग्रसित मिलती हैं। प्राय : सभी कार्बोहैड्रेट इस से ग्रसित हैं किन्तु फलों ,दूध ,अंडे ,मांस और मछली में इसका असर कम पाया जाता है किन्तु आजकल मक्का ज्वार बाजरा भी इस से अछूते नहीं हैं। इसलिए हम नारियल के बूरे का इस्तमाल करते हैं। नारियल सब जगह मिलता है। नारियल के आते की रोटी भी बन जाती है।  जैसे ही हम गेंहूं ,चावल आलू शक़्कर आदि को बंद करते हैं शुगर की बीमारी राम राम करती चली जाती है।
एक भाग नारियल का बूरा +२ भाग बेसन मिला कर रोटी बन जाती है। दालों में भी यूरिया का उपयोग नहीं होता है। इसलिए दालें भी खाये जा सकती हैं।
यह इस बात का उदाहरण है की यूरिया  कितना खतरनाक जहर है। अधिक जानकारी के लिए मुझे फोन किया जा सकता है। 09179738049


Wednesday, May 17, 2017

मुर्गा जाली से बनाये ढेर सारी गोलियां

मुर्गा जाली से बनाये ढेर सारी गोलियां 


धिकतर लोग यह पूछते हैं इतनी ढेर गोलियां कैसे बनेंगी ?
बीजों को क्ले में मिलाकर रोट बनाकर छोटे छोटे टुकड़े काटना 
हम प्राय : बीज गोलियां रोज बनाते है। इसे हम सीड बॉल  योगा  कहते हैं। इस से एक तो हमारा समय पास होता है साथ में व्यायाम हो जाता है और बहुत सी गोलियां इकठ्ठी हो जाती हैं। सीड बाल योगा  घर में टीवी देखते भी हो जाता है। असल में बिना जुताई की खेती और हमारे पर्यावरण की समृधि के लिए सीड बॉल्स का बहुत बड़ा योगदान है।


गोलियों को तेजी से और अधिक मात्रा में बनाने के लिए हम क्ले मिट्टी में बीजो को मिला कर उसे आटे  की तरह गूथ लेते हैं फिर उसके मोटे मोटे रोट बनाकर उन्हें मुर्गा जाली से छोटे छोटे टुकड़ों में काट लेते हैं। इन टुकड़ों को एक तगाड़ी में डाल कर गोल गोल घुमा कर गोल कर लिया जाता है।

टुकड़ों को तगाड़ी में डाल कर गोल गोल बना लिया जाता है। 
फिर जब ये गोलियां अच्छे से सूख जाती हैं इन्हे खेतों में बिखरा दिया जाता है ऊगने से पहले तक ये चूहों /चिड़ियों से सुरक्षित रहती हैं बरसात आने पर बीज जो जमीन के ऊपर से उगते हैं बहुत ताकतवर होते हैं इनमे कीड़े नहीं लगते हैं।  क्ले जो असंख्य खेत को उर्वरता प्रदान करने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं का समूह रहती है खेत  में जैविक खाद  बना देती है।  इस से अच्छा कोई खाद नहीं होता है।

इस प्रकार बिना जुताई करे बिना मानव निर्मित खाद और यूरिया के सबसे उत्तम खेती हो जाती है।  आज कल GM और जीवा अमृत की बहुत बात होती है जिसकी कोई जरूरत नहीं है। जुताई करके पहले खेत कीजैविक उत्तम खाद को बहा देना फिर बाहर से GM ,जैविक और जीवा अमृत डालना कुल मिला कर मूर्खतापूर्ण काम है इस से बचने की जरूरत है।

Tuesday, May 16, 2017

धान की ऋषि खेती

धान की ऋषि खेती


धान के खेत को समतल नहीं करें न उसमे पानी रोकने के लिए मेड बनाये यदि पानी रुकता है तो उसकी अच्छे से निकासी के लिए नाली बना लें। फिर धान की बीज गोलिया बनाकर अच्छे से सुखा कर बारिश से पहले खेतों में बिखेर दे।  एक वर्ग मीटर में कम से कम १० गोलिया रहना चाहिए। पिछली फसल से जो भी अवशेष मिले हैं उन्हें जहां का तहाँ  रहने दें।

साथ में मूंग और उड़द के बीज सीधे यानी बिना गोली बनाये बरसात आने पर बिखेर दें। यह सहफसल नत्रजन के लिए जरूरी है। हर दाल का पौधा अपनी छाया के छेत्र में नत्रजन (यूरिया ) बनाता है। पहले साल थोड़ी निंदाई  हाथों से करने की जरुरत रहती है इसके बाद आगे कोई काम नहीं रहेगा।

यदि सावधानी से धान की गोलियां बनाई जाती हैं तो एक चौथाई एकड़ में एक  किलो के करीब बीज लगता है।  मूंग और उड़द साथ में सीधे फेंकना है इसमें कुल दो किलो बीज प्रति चौथाई एकड़ पड़ता है। शुरू में खरपतवार नियंत्रण के लिए बीज की मात्रा अधिक रखी जाती है।
यह चित्र फुकुओकाजी के खेत की धान का है।  

Monday, May 15, 2017

बहते जल को नहीं बहती मिटटी को रोकने की जरूरत है।



बहते जल  को नहीं बहती मिटटी को रोकने की जरूरत है।

विगत कुछ वर्षों से जल संकट को हल करने के लिए बड़े बड़े बाँध बनाए जा रहे हैं ,अनेक स्टॉप डेम्स बनाए जा रहे हैं ,छोटे बड़े अनेक तालाबों का निर्माण हो रहा है किन्तु जल का संकट कम होने की वजाय बढ़ते ही जा रहा है।  बरसात का असली जल भूमि के ऊपर नहीं भूमि के अंदर जमा होता है। यही जल पूरे साल भर हम सब की  और धरती पर रहने वाली जैव- विविधताओं की प्यास बुझाता है। इतना ही नहीं यह जल वाष्प  बन बदल बनकर बरसात करवाने में  भी सहयोग करता है।
यदि आज कहीं सूखा पड़ता  है तो इसका मतलब यह नहीं है की बरसात नहीं हुई है असल में बरसात  के जल को हमने जमीन के अंदर जाने ही नहीं  दिया है इसलिए जल का संकट आ गया है।  कहा यह जा रहा है की इस साल अच्छी बारिश होगी और जल का संकट खत्म हो जायेगा यह भ्रान्ति है ,जब तक हम बहते जल को धरती के पोर पोर में समाने के लिए प्रयास नहीं करते है और भूमिगत जल के स्तर को नहीं बढ़ाते हैं तब तक ना तो बरसात अच्छी होगी न ही बरसात का जल धरती में सोखा जा सकेगा।

बरसात का जल मिटटी के द्वारा सोखा जाता है कुदरती मिटटी में असंख्य छोटे छोटे छिद्र ,दरार ,चूहों ,जड़ों और असंख्य कीड़ों के द्वारा बनाए घर रहते है जिनसे बरसात का जल धरती के द्वारा सोख लिया जाता है। 

बिना -जुताई की जैविक खेती



बिना -जुताई की  जैविक खेती 

मिटटी ,पानी और फसलों की बंपर हार्वेस्ट 

जैविक खेती करने वाले किसानो के सामने खरपतवारों  नियंत्रण का मुख्य मसला  रहता है। इसलिए वो अपने खेतों को बार बार जोतते रहते हैं  और जहां किसानों पर काम और खर्च का भार  बढ़ जाता है वहीं उनके खेतों में जैविक खाद और पानी की कमी  हो जाती है। जिस से खेत खराब हो जाते हैं और उत्पादन घट जाता है। 

सामने से रोलर हरयाली को सुला  रहा है पीछे से बिना -  जुताई की बोने  की मशीन
बुआई कर रही है। 
जबकि बिना जुताई  जैविक खेती को अपनाने से अनेक फायदे रहते हैं। इसमें किसान अपने ट्रेकटर के आगे खरपतवारों को सुलाने वाला  रोलर लगा लेते हैं जो आगे से खरपतवारों को जमीन पर सुला देता है और पीछे से एक बिना जुताई की सीड  ड्रिल चलती है जो बीजों को बो देती है। इस प्रकार एक बार में काम हो जाता है। इस प्रकार जहां खरपतवारों का नियंत्रण हो जाता है वहीं जुताई नहीं करने से भूमि और छरण  बिलकुल रुक जाता है जिस से जमीन  की उर्वरकता और जल  ग्रहण छमता में बहुत सुधार आ जाता है। 


.
जबकि जुताई करने से मिट्टी धूला  बन जातीहै जिस से जमीन में रहने वाली केंचुए सहित तमाम जैव विविधताएं और उनके घर जो जमीन को उर्वरकता  प्रदान करते हैं नस्ट हो जाते हैं। बिना जुताई की जैविक खेती से एक  बार में बोनी का काम हो जाने से खेत कम दबते हैं जबकि बार २ ट्रेकटर के चलने से जमीन बहुत दब  जाती है उसकी छिद्रियता नस्ट हो जाती है। 

हरे और जिन्दा भूमि ढकाव से नमि संरक्षित रहती  है सिंचाई की जरूरत नहीं रहती है। इस ढकाव के कारण खरपतवारों का भी नियंत्रण हो जाता है। फसलों में  लगने वाली बीमारियों के दुश्मन इस ढकाव में छुप  जाते हैं जिस से बीमारियां नहीं होती   हैं। 

वैज्ञानिकों  के सर्वेक्षणों के  द्वारा यह पाया गया है की इस प्रकार फसलों का सबसे अधिक उत्पादन मिलता है तथा   यह सबसे  अच्छा खरपतवारों के नियंत्रण का तरीका है। 

वैकल्पिक खेती की विधियां

वैकल्पिक खेती की विधियां 


ब से रासायनिक खेती की विधियों पर प्रश्न चिन्ह लगे हैं तब से अनेक वैकल्पिक विधियों की चर्चा होने लगी है। किसान खेती में चल रहे घाटे और प्रदूषण के कारण वैकल्पिक खेती की विधियों की और देखने लगे है।  किन्तु समस्या यह है की अभी तक सरकारों और कृषि वैज्ञानिकों की और से ऐसी किसी भी विधि पर मोहर नहीं लगी है जो रासायनिक खेती का विकल्प बन सके।

इसी विषय को समझने के लिए हम पिछले तीस सालो से बिना जुताई  की कुदरती का अभ्यास कर रहे हैं। जिसके आधार पर आज हम यह बताने में सक्षम है की किसान किस वैकल्पिक खेती को अपनाए जिस से उन्हें घाटा ना हो ,और खेत की कुदरती ताकत तथा जलधारण शक्ति में लगातार इजाफा होते जाये।

सबसे पहले हम इस बात को पूरी तरह साफ़ कर देना चाहते हैं की आज रासायनिक खेती में हो रहे घाटे  और प्रदूषण के पीछे मूलत : क्या कारण है।
जुताई 

रासायनिक खेती का चलन आज़ादी के बाद से ही शुरू हो गया था इस खेती को हरित क्रांति का नाम दिया गया है। खेती गहरी जुताई, भारी सिंचाई , कृषि रासायनिकों और संकर नस्ल के बीजों पर आधारित है। जिसमे जुताई सबसे नुक्सान दयाक काम है। एक बार ट्रैकटर से गहरी जुताई करने से खेत की आधी ताकत नस्ट हो जाती है। यह नुक्सान भूमि-छरण  के माध्यम से होता है। होता यह है की गहरी जुताई बाद खेतों में बरसात होने के कारण जुटी हुई मिटटी कीचड में तब्दील हो जाती है जो बरसात के पानी को जमीन के अंदर सोखने में बाधा  उत्पन्न करती है जिस के कारण पनि जमीन के भीतर ना जाकर तेजी से बहता है वह अपने साथ जुती बारीक मिटटी को भी भा कर ले जाता है। वैज्ञानिकों पता लगाया है की इस प्रकार एक एकड़ से करीब 10 -15 टन मिट्टी बहकर चली जाती है। 

 जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग को थामने  के लिए अपनाए 'नो टिल फार्मिंग '

 

न दिनों न भारत वरन पूरी दुनिया गर्माती धरती और जलवायु परिवर्तन की गंभीर समस्या में फंस गई  है। बेमौसम बरसात ,सूखा , बाढ़ और समुद्रों में उठते ज्वार भाटे समस्या के सूचक हैं।  इस समस्या के पीछे मौजूदा गैरपर्यावरणीय विकास जिम्मेवार है जिसमे हरयाली का नहीं होना मूल बात है। यह समस्या मानव निर्मित है। जिसे हम  ठीक कर सकते हैं। 

सबसे अधिक इस समस्या के पीछे गैरकुदरती खेती है। जिसमे हरियाली विहीन जुताई आधारित खेती का मूल दोष है। जब हम आसमान से नीचे हमारी  धरती को देखते हैं तो सबसे अधिक भू भाग हमे खेती के कारण बन गए मरुस्थलों और बन रहे मरुस्थलों का नजर आएगा जिनमे दूर दूर तक हरियाली का नामोनिशान नहीं है। 

जब भी हम फसलों के उत्पादन के लिए जमीन की जुताई करते हैं सब से पहले  हम हरे भरे पेड़ों को काट देते हैं उसके ठूंठ को  भी खोद खोद कर निकाल देते हैं।  सभी हरी वनस्पतियों जैसे घास आदिको भी हम जमीन पर नहीं रहने देते है। उन्हें बार बार खोद कर निकाल देते हैं। ऐसा करने से घरती की जैविकता पूरी तरह नस्ट हो जाती है।  जैविक खाद (कार्बन ) गैस बन कर उड़ता है जो आसमान में कंबल की तरह आवरण बना लेता है जिस से धरती पर सूर्य की गर्मी प्रवेश तो कर जाती है किन्तु वापस नहीं जा पाती है  लगातार गर्मी बढ़ती रहती है।  

जैसा की हम जानते हैं हमारा मानसून धरती के तापमान से संचालित होता है वह गड़बड़ा जाता है। इसलिए बेमौसम बरसात का होना ,सूखा और बाढ़ की स्थिति निर्मित होती है। 

बिना जुताई की कुदरती खेती जिसे हम कुदरती  खेती कहते हैं ऐसी खेती करने की तकनीक है जिसमे जुताई ,खाद ,निंदाई और दवाई की कोई जरूरत नहीं रहती है। इस खेती को हरयाली के साथ किया जाता है।  जिसमे दलहन जाती के पेड़ ,फसलें और वनस्पतियों का बहुत योगदान है।  ये एक और जहाँ जैविक खाद बनाते हैं वहीँ फसलों में लगने वाली बीमारियों की रोक थाम करते है ,जल का प्रबंधन करते  हैं। 

कुदरती  खेत ठीक कुदरती वर्षा वनो की तरह  कार्य करते हैं।  इसमें मशीनो और रसायनो  को बिलकुल जरूरत  नहीं रहती है।  इसकी उत्पादकता और गुणवत्ता रासयनिक खेती से अधिक रहती है। इस खेती को करने के लिए सरकारी कर्जे ,अनुदान और मुआवजे  की जरूरत भी नहीं रहती है। 

कुदरती  खेती में हम दलहन जाती के पेड़ लगाते हैं जिनसे हमे चारा ,नत्रजन ,जैविक खाद और ईंधन मिल जाता है।  इनके सहारे  हम अनाज ,और दालों  और सब्जियों की खेती करते रहते हैं। बीजों को हम सीधा छिड़कते हैं या उनकी बीज गोलियां बना कर छिड़क देते हैं। 

अमेरिका में आजकल" नो टिल फार्मिंग" का अभ्यास शुरू हो गया है।  जिसे संरक्षित खेती भी कहा जाता है।  नो टिल फार्मिंग से खेतों की जैविक खाद (कार्बन ) गैस बन कर उड़ती नहीं है ना ही वह बरसात के पानी से बहती है। इस कारण खेतों से होने वाले ग्रीन हॉउस गैसों का उत्सर्जन बहुत कम हो जाता है। जमीन में बरसात का जल संरक्षित हो जाता है। जिसके कारण हरियाली पनपने लगती है जो ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को सोखने का काम करती है।

जलवायू परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का चोली दामन का साथ है। जिसका मूल कारण हरियाली की कमी है। हरियाली  का  सबसे अधिक नुक्सान जुताई आधारित खेती से हो रहा है। नो टिल फार्मिंग  अँधेरे में एक रौशनी की किरण के समान है।  

आंगनबाड़ी में बेल वाली सब्जियां पैदा करने का सरलतम कुदरती तरीका

आंगनबाड़ी में बेल वाली सब्जियां पैदा करने का सरलतम कुदरती तरीका
क्ले (कपा ) से बनी बीज गोलियां 

क्ले के साथ गिलकी के बीज दिखाए हैं 

एक इंच व्यास वाली गोली में केवल एक बीज रखते हैं 

इसके बाद हाथों से गोल गोल घुमाकर गोल कर लेते हैं
फिर अच्छे से सुखा लेते हैं 
लौकी कददू गिलकी बलहर तोरईआदि के लिए कपे की कम से कम एक इंच व्यास की गोली बनाकर अच्छे से कड़क सुखा लें फिर अपनी आंगन बाड़ी में बिखरा दें।क्ले मिट्टी को आटे की तरह गूथ लिया फिर एक एक बीज में चिपका लिया फिर हाथों से गोल गोल कर लिया। ऐसे हम अनेक गोलियां बना सकते हैं गोली का साइज करीब एक इंच का रखते हैं। छोटे बीजों के लिए तथा अधिक मात्रा में गोलियों को बनाने के लिए दूसरा तरीका है। यह तरीका किचन गार्डनिंग के लिए है। अच्छे से गोलियों को सुखा कर गार्डन में बिखराते जाएँ। ये बेल हैं उन्हें मालूम है कि कहाँ जाना है। जुताई निंदाई गुड़ाई कीट और नींदा मारने काम नहीं करना है। खाद भी नहीं डालना है क्ले खाद बना देती।

 गोलियों को बरसात से पूर्व अपनी आंगनबाड़ी में बिखरा देते हैं। 

Friday, May 12, 2017

यूरिया और गोबर /गोमूत्र से बनी दवाई गैर जरूरी हैं।


यूरिया और गोबर /गोमूत्र से बनी दवाइयां गैर जरूरी हैं। 

 जुताई नहीं करने और कृषि अवशेषों को जहां का तहां वापस कर देने से पोषक तत्वों की आपूर्ति हो जाती है। 

तालाब  की मिटटी (क्ले ) सर्वोत्तम खाद है इस से बीज गोलियां बनाकर  करे बिना जुताई खेती 


भारत में परम्परगत देशी खेती किसानी का सबसे बड़ा इतिहास है।  हजारों साल तक यह खेती "टिकाऊ "रही है।  किसान हलकी या  बिलकुल जुताई के बिना खेती करते थे।  वो जुताई से होने वाले जल और भूमि के छरण  से जागरूक थे इसलिए  जब खेत जुताई से कमजोर हो जाते थे वो खेतों की जुताई बंद कर देते  थे। बिना जुताई के खेतों में पशु चराए जाते थे इस से खेत पुन : ताकतवर हो जाते हैं। ऋषि -पंचमी में आज भी कान्स घास की पूजा की जाती है और बिना -जुताई के कुदरती अनाजों को फलाहार की तरह सेवन करने की सलाह दी जाती है।
परम्परागत देशी खेती किसानी में गोबर ,गोमूत्र  से बनी खाद और दवाई का कोई उपयोग नहीं किया जाता था। गर्मियों  में किसान सभी कृषि अवशेषों जैसे गोबर ,गोंजन ,नरवाई ,पुआल आदि को खेतों  में वापस डाल देते थे।
बिना जुताई करे खेती करने के लिए तालाब की मिटटी
जिसे क्ले कहते हैं से बीज गोलियां बनाकर अच्छी बरसात हो जाने
पर खेतों में डाल देते हैं क्ले सर्वोत्तम खाद है। 
आधुनिक वैज्ञानिक खेती ने अनावश्यक रासायनिक खाद और दवाइयों को  बढ़ावा दिया है। जो हानिकारक सिद्ध हो गए हैं।  इनसे पर्यवरण प्रदूषण होरहा है रोटी में जहर घुलने लगा है। यूरिया आदि के  विकल्प में गोबर और गो मूत्र की खाद  दवाइयां बनाई जा रही हैं।  ये मानव निर्मित गैर कुदरती होने के कारण नुक्सान देय सिद्ध हो रही है। असल में कृत्रिम नत्रजन जमीन को मान्य नहीं होती है इसलिए गैर  कुदरती नत्रजन को जमीन गैस बनाकर उड़ा देती है इसे Denitrification कहा जाता है। इस प्रक्रिया में जमीन में जमा कुदरती नत्रजन भी उड़ जाती है,  किसान को इस से बहुत अधिक आर्थिक नुक्सान होता है।

असल में कृषि के सभी अवशेषों जैसे पुआल ,नरवाई ,पत्तियों ,टहनियों आदि में फसलों के लिए आवश्यक तत्व रहते है। जिन्हे अधिकतर किसान जला देते है या खेतों से बाहर फेंक देते हैं और खेतों को जोत  बखर देते हैं। जब बरसात होती तब जुताई के कारण  खेतों की बारीक मिटटी कीचड़ बन जाती है जिसके कारण बरसात का पानी जमीन में नहीं सोखा जाता है वह तेजी से बहता  है अपने साथ सभी पोषक तत्वों को बहाकर ले जाता है।
 जुताई नहीं करने और  नरवाई ,पुआल आदि को जहां का तहां डाल  देने   एक ओर जहाँ पोषक तत्वों की आपूर्ति हो जाती है हैं वहीं ये नमी भी संरक्षित हो जाती है ,खरपतवार  नियंत्रित हो जाते  हैं और फसलों का  कीड़ों से  बचाव हो जाता  है। इस ढकाव के नीचे असंख्य केंचुए , दीमक ,चींटे /चींटीं जैसे अनेक कीड़े मकोड़े ,सूख्स्म जीवाणु रहने लगते हैं। जिनसे नमी और पोषकतत्व मिलते रहते हैं।  इसलिए किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद दवाई और  गोबर /गोमूत्र से बनी दवाइयों की जरूरत नहीं रहती है।

किसान जुताई कर पहले अपने खेत की जैविक खाद को बहा या गैस बनाकर उड़ा  देते हैं फिर गोबर /गोमूत्र ,रासायनिक खाद दवाओं को डालने के लिए आवश्यक श्रम /खर्च करते हैं।
गेंहूं की नरवाई से बीज गोलियों से अंकुरित होकर झांकते
धान के नन्हे पौधे 

रासायनिक और गोबर गोमूत्र से बनाई गयी गैर कुदरती दवाइयां डालने से खेतों की  नत्रजन गैस बन कर उड़ जाती है   जिस से किसान का बहुत पैसा और महनत  बेकार चली जाती है। किसान को घाटा होने लगता है।
 घाटे के  कारण किसान आत्म -हत्या जैसे कठोर कदम भी उठा लेते हैं।

लाखों किसान जुताई ,खाद और दवाइयों के चक्कर में फंस कर आत्म -हत्या कर चुके हैं। इस से खेत भी मरुस्थल में तब्दील हो रहे हैं। पानी का संकट उत्पन्न हो गया है।  जुताई करने से बारीक मिट्टी बरसात के पानी के साथ मिल कर कीचड में तब्दील हो जाती है  बरसात का पानी जमीन में नहीं सोखा जाता है। वह बहता है अपने साथ जैविक खाद को भी बहा  कर ले जाता है।
इसलिए हमारा कहना है कि रासायनिक या गोबर/गोमूत्र से खाद खरीदना या बनाना मूर्खता पूर्ण काम है। 

Wednesday, May 10, 2017

आंगनबाड़ी में उगाएं कुदरती सब्जियां

आंगनबाड़ी में उगाएं कुदरती सब्जियां 
आजकल जबसे विषैली खेती की जानकारी का पता चला है तबसे विष मुक्त आहार उगाने की होड़ लगी है। अनेक लोग इस कारण अपनी खुद की आंगन बाड़ी में सब्जियां उगाने लगे हैं। किन्तु अधिकतर लोगों का कहना है की उन की आंगनबाड़ी  में कीड़े बहुत लगते हैं।  इसका मतलब है की उनकी आंगनबाड़ी कुदरती नहीं है। कुदरती आनाज हो या सब्जियाँ की खासियत यह है की उनमे कीड़े नहीं लगते हैं। 

कुदरती आंगनबाड़ी बनाते समय निम्न बांतो का ध्यान जरूरी है। 
१- जुताई या खुदाई बिलकुल नहीं करना है।

२- किसी भी प्रकार की मानव निर्मित खाद का उपयोग नहीं करना है। 

३- खरपतवारों और कीड़ों को मारने का कोई भी उपाय अमल में नहीं लाना है। 

४ -बीजों को क्ले (कपे ) वाली मिटटी से सीडबाल बनाकर डालें या सीधे छिड़क कर बीजों को जमीन के ऊपर से उगाएं। 

५ -खरपतवारों या अन्य अवशेषों को जहां से लेते हैं  काट कर वहीं इस प्रकार फैला दे जैसा वो अपने आप गिरते हैं। 

Wednesday, May 3, 2017

किसान बचाओ आंदोलन

किसान बचाओ आंदोलन

हम विगत 30 सालों ऋषि खेती का अभ्यास कर रहे हैं। हम हर हाल में खेती किसानी के लिए मिलने वाले कर्ज ,अनुदान और मुआवजे से पूरी तरह मुक्त हैं। जबकि आज म प्र में एक भी किसान नहीं है जिस पर भारी  भरकम कर्ज  न चढ़ा हो इस कारण हमारी प्रदेश की सरकार भी कर्जे में धंसती जा रही है।

हमने अपने ऋषि खेती के अनुभव से पाया है कि खेती के लिए जमीन की जुताई ,यूरिया और कम्पोस्ट आदि गैर जरूरी हैं।  इसी प्रकार समतली करण  भारी  सिंचाई भी गैर जरूरी है। जिसके लिए बड़े बाँध ,तालाब और गहरे नल कूप  गैर जरूरी हैं। फिर सवाल उठता है कि  क्यों किसानो पर इनका कर्जा लादा जा रहा है ? उसका मूल कारण है आज कृषि वैज्ञानिक और सरकार मिल कर किसानो को लूट रहे हैं। ये सब कंपनियों के दलाल हैं। ये बहुत बड़ा भ्रस्टाचार है।

स्वामिनाथजी जिनकी आप बात कर रहे हैं वो हरित क्रान्ति के जनक के रूप में जाने जाते है जो इस लूट के जनक है। हम हर हाल में किसान बचाओ  आंदोलन के पक्षधर है और आमआदमी पार्टी के डोनर मेंबर हैं। हम चाहते हैं किसान बिना जुताई की खेती करें जिस से भूमि छरण , जल का छरण और जैविक खाद का छरण पूरी तरह रुक जाता है। खेत ताकतवर हो जाते हैं फसलों में बीमारी नहीं लगती है। किसान को कर्ज अनुदान और मुवजे की कोई जरुरत नहीं रहती है।

अनेक किसान इस खेती को करने लगे है. जुताई नहीं करने से बरसात का पानी खेतों के द्वारा सोख लिया जाता है। खेत खतोड़े हो जाते हैं।

विगत दिनों  " आप " की टीम हमारे यहां आयी थी उनको मेने यह जानकारी दी थी यदि हमे किसानो को बचाना है तो उन्हें बिना जुताई की खेती करवाना होगा। मै आंदोलन का पूरा समर्थन करता हूँ।   इसमें सहयोग करना चाहता हूँ। इसलिए आपसे निवेदन है की आप किसी जानकार को भेज कर हमारी खेती का मुआयना करवाएं।
धन्यवाद
राजू टाइटस






Sunday, April 9, 2017

कैंसर भी कुदरती तरीके से ठीक हो जाता है।

जब सेम भैया(सेमुअल बेंजमिन फ्रांसिस  FB फ्रेंड ) ने कैंसर को लेकर सवाल उठाया है तब मेरे मन में अपनी कहानी सुनाने की इच्छा जाग्रत होगई है। विगत दिनों मेरी पत्नी शालिनी जिनकी उम्र 65 वर्ष की है को अचानक हार्ट अटेक आ गया था उन्हें हमने स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया ही था की अचानक मुझ (71 +)को भी पेरेलेसिस की शिकायत लगी तो मुझे भी उनके साथ अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया ,

५दिन के बाद हमे छुट्टी देकर भोपाल रिफर कर दिया जहाँ शालिनी को मुल्टीब्लॉकेजेस के कारण बाईपास की सलाह दी गयी। हम सोच रहे थे की क्या करें कि मुझे पुन : राइट साइड पेराल्टिकल अटेक आ गया था। थोड़ा बहुत इलाज के बाद हमे घर भेजदिया गया.

हम दोनों के  मामले गंभीर थे फिर भी हमने हिम्मत से काम लिआ। जैसा विदित है हम पिछले ३० सालो से कुदरती खेती और कुदरती इलाज विषय पर काम कर रहे हैं इसलिए हमारे लिए यह एक झटका था। हमने आखिर इस विषय को गंभीर मानते हुए खोज जारी रखी।

हमने यह पाया की यह सब हमारी Type 2 diabetes   के कारण हुआ है तो फिर हमने अपनी खोज को आगे बढ़ाते हुए यह खोजा की आखिर कुदरती कौन सा तरीका है जिस से हम अपनी Type 2 diabetes को ठीक कर सकते हैं।  तो हमे एक वीडियो मिला जिसमे बताया गया है की करीब 50 % अमेरिकन को डायबिटीज है या होने के करीब है और ये लोग कैंसर ,दिल /दिमाग की बीमारी से ग्रस्त हो रहे हैं।

यह बात अनेक बार कही जा रही है कि टाइप २ डायबिटीज का   सम्बन्ध हमारे खान पान से है जो हमे कैंसर ,हार्ट अटेक ,स्ट्रोक आदि की और धकेल रहा है। हमने यह भी पाया है की अधिकतर डायबिटीज /ब्लड प्रेशर की शिकायत का सम्बन्ध विषैले भोजन से हो रहा है। जिसमे अनाज ,आलू ,चावल और शकर (GPS)  का उपयोग ज्यादह होता है।

फिर क्या था हमने अपने ऊपर प्रयोग शुरू कर दिया एक हफ्ते में हमारी डायबिटीज पूरी तरह बिना दवाई के ठीक हो गयी। हम पूरी तरह इन्सुलिन और गोलियों से मुक्त हो गए। जैसे ही हमारी शुगर ठीक हुई हमारी हिम्मत बढ़ गयी। हमने सभी दवाइयों को धीरेधीरे  बंद कर दिया।  जिस से मल्टीपल ब्लॉक और पैरालिसिस में लाभ होने लगा हमे बइपास और हानिकर रासायनिक दवाओं से मुक्ति मिल गयी।

इस अनुभव के आधार पर हम कह सकते हैं की यदि कैंसर के रोगी को भी विष रहित कुदरती भोजन मिले तो वह  भी ठीक हो सकता है।

अब हमने केवल अपने वजन और शुगर पर ध्यान केंद्रित कर दिया और सब  प्रभुजी पर छोड़ दिया उसकी मेहरबानी हो उसने हमे चंगा कर दिया। हमने यह भी पाया की यह बीमारी गैरकुदरती खाने के कारण है जिसे हमने लापरवाही के चलते छोड़ दिया था।

दुआ हर हाल में लाभ पहुंचाती है पर हमे यह नहीं भूलना चाहिए की यह शरीर उसकी देन है जिसकी हिफाज़त  करना हमारा धर्म है। यह जब ठीक रह सकता है जब हम उसकी बनाई कुदरत का भी ध्यान रखें। जहाँ तक डाक्टर दवाइयों का प्रश्न है यह अब संदेह के घेरे में हैं। इनसे हमे सतर्क रहने की जरुरत है।
 वीडियो को भी देखें -
*समुएल बेंजामिन फ्रांसिस ,मेरे भाई  भोपाल  में ख्याति प्राप्त पास्टर हैं वे सब जगह महामारी के रूप में फेल रही कैंसर की बीमारी से चिंतित हैं। जो सभी को दुआ करने की सलाह देते हैं। उन्होंने फेस बुक के माध्यम से इस समस्या को हम तक पहुंचाया है।