Saturday, September 9, 2017

गेंहू और धान का फसल चक्र (फुकुओका जापान )

गेंहू और धान का फसल चक्र (फुकुओका जापान )

"एक तिनके से आई क्रांति "से  संशोधित 


मैं मानता हूं कि धान  के पुआल के  एक तिनके से बहुत बड़े बदलाव की शुरआत हो सकती है। देखने से
यह तिनका छोटा सा और महत्वहीन नजर आता है। शायद ही किसी को विश्वास होगा कि वह किसी
इंकलाब की शुरआत कर सकता है। लेकिन मुझे इस तिनके के वजन और क्षमता का अहसास हो चुका
है। मेरे लिए यह क्रांति  वास्तविक है।
जरा सरसों  और गेंहू  के इन खेतों को देखिए। इस पक रही फसल से प्रति चैथाई एकड़ लगभग
एक टन  पैदावार ली जा सकेगी। मेरे ख्याल से यह एहिमे प्रिपफैक्चर जिले - जो कि जापान
के रासायनिक खेती के सबसे अधिक उत्पादन देने वाले  इलाकों  की पैदावार के बराबर है और इन खेतों को पिछले पच्चीस सालों से जोता नहीं गया है।
इनकी बुआई के नाम पर मैं सिर्फ गेंहू  और सरसों  के बीजों को सितम्बर /ओक्टूबर  के मौसम में, जबकि धान  की फसल खेतों में खड़ी होती है, इन्हीं खेतों में बिखेर देता हूं। कुछ हफ्तों  बाद मैं धान  की फसल काट लेता हूं और धान  का पुआल सारे खेत में फैला देता हूं।
यही तरीका धान  की बुआई के लिए अपनाया जाता है। ठण्ड  की इस फसल को 20 मई के
आसपास काट लिया जाएगा। फसल पूरी तरह से पकने के लगभग दो सप्ताह पूर्व मैं धान  के बीजों को
सरसों  और गेंहू  की फसल पर बिखेर देता हूं। ठण्ड  की फसल  की कटाई तथा गहाई हो जाने के बाद मैं इसका नरवाई  भी खेतों में बिखेर देता हूं।
मेरे खयाल से धान  तथा जाड़े की फसलों की बुआई के लिए इस एक ही विधि  उपयोग करना,
इस प्रकार की खेती में ही किया जाता है।

लेकिन एक तरीका इससे भी आसान है। अगले खेत की तरफ
चलते हुए मैं आपको बताना चाहूंगा कि वहां उग रहा धान  पिछली ठण्ड की फसल के साथ ( सीड बॉल से  ) ही बोया गया था। इस खेत में बुआई का सारा काम जनवरी  के पहले दिन तक निपटा लिया गया है। धान के बीज अपने मौसम में ही उगते हैं। ठण्ड में ये सुप्त अवस्था में रहते हैं। 

इन खेतों में आप यह भी देखेंगे कि वहां बरसीम  और खरपतवार भी उग रही है। धान  के
पौधें के बीच बरसीम अक्तूबर महीने के प्रारंभ में, यानी गेंहू  और सरसों के साथ  बोई गई थी।
खरपतवार उगने की मैं परवाह नहीं करता क्योंकि उनके बीज अपने आप आसानी से झड़ते और उगते
रहते हैं।

अतः इन खेतों में बुआई का क्रम इस प्रकार रहता हैः अक्तूबर के प्रारंभ में बरसीम धान  के बीच बिखेरी
जाती है, और ठण्ड  की फसलों की बुआई वहीं उस महीने के मध्य हो जाती है। नवम्बर की शुरआत में
धान  काट लिया जाता है और उसके बाद अगले वर्ष के लिए धान  के बीज (सीड बॉल में ) बो दिए जाते हैं और सारे खेत में पुआल फैला दिया जाता है। आपको यहां जो सरसों  और गेंहू  दिखलाई दे रही है, उसे इसी ढंग से उगाया गया है।
चैथाई एकड़ में खेत में ठण्ड  की फसलों और धान  की खेती का सारा काम केवल एक-दो व्यक्ति
ही कुछ ही दिनों में निपटा लेते हैं। मेरे ख्याल से अनाज उगाने का इससे ज्यादा आसान, सहज तरीका
कोई अन्य नहीं हो सकता।

खेती का यह तरीका रासायनिक  कृषि की तकनीकों के सर्वथा विपरीत है। यह जैविक कृषि ,जीरो बजट खेती और परंपरागत देशी खेती की तकनीकों को बेकार सिद्ध कर देता है। खेती के इस तरीके, जिसमें कोई मशीनों द्वारा निर्मित खादों तथा रसायनों का उपयोग नहीं होता, के द्वारा भी औसत जापानी खेतों के बराबर या कई बार उससे भी ज्यादा पैदावार हासिल करना संभव है। इसका प्रमाण यहां आपकी आंखों के सामने
है।





Saturday, September 2, 2017

कचरे यानि भूमि ढकाव की फसलों के साथ कुदरती खेती

कचरे यानि भूमि ढकाव की फसलों के साथ कुदरती खेती 

सामान्य खेत के कचरे 

चरों को सामन्य भाषा में खरपतवार या नींदा कहा जाता है। ज्न्हे बरसों से किसान मारता  आ रहा है। आदिवासी किसान इन्हे जला कर बिना जुताई की खेती करते हैं परम्परगत खेती किसानी  में इन्हे जुताई कर मारा जाता रहा है जबसे रासायनिक खेती का आगमन हुआ है तब से अनेक खरपतवार नाशक जहर आ गए जिन्हे डालने से नींदे जल जाते हैं। 

फसलोत्पादन के लिए वर्षों से यह माना जाता रहा है की कचरे मूल फसलों का खाना खा लेते हैं इसलिए फसलों का उत्पादन कम हो जाता है। इसलिए किसान बार बार खेतों की जुताई करता है ,कचरों को चुन चुन कर निकलता रहता है तथा अनेक किस्म के जहर डालता रहता है। 

बीजों को बोने  से पहले

पशु मूत्र +क्ले कीचड से उपचारित करते हैं। 

इस कारण खेत बीमार हो जाते हैं जिन में बीमार फसले  पैदा होती है किसान को घाटा हो जाता है । जापान के मस्नोबू फुकुओका जी ने अस्सी   साल और हम पिछले तीस सालो से बिना जुताई ,बिना निंदाई गुड़ाई करे कुदरती खेती कर रहे हैं। हमने ये पाया है की ये कचरे कुदरती खेती में विशेष सहयोग प्रदान करते हैं।

फेके गए बीज उग रहे हैं। 

इन कचरो के नीचे असंख्य जीव जंतु कीड़े मकोड़े रहते हैं जो खेत को खटोडा और पानीदार बना देते हैं और खेत को बहुत अच्छा बखर देते है । इस काम को कोई  मशीन या रसायन नहीं कर सकता है। 

इसलिए हम बरसात आने के बाद कचरों को आने देते है जब वो बड़े हो जाते हैं उनके साथ फसलों के बीज भी उपचारित कर फेंक देते है। ये उग कर कचरों से ऊपर निकल आते है कचरे उन्हें आने देते हैं उन पर कोई रोग  आता है तो उसे भगा देते है ,नमि को संरक्षित रखते हैं खाद बनाते है। 

कचरे में चल रही सब्जी की बेला 

   

 

Thursday, August 24, 2017

सन के भूमि ढकाव में बिना जुताई गेंहूं की खेती

सन के भूमि ढकाव में बिना जुताई गेंहूं की खेती 

सन की तैयार फसल में गेंहू बो दिया गया है। 

सन एक उत्तम कुदरती यूरिया बनाने वाली फसल है इसको किसान हरी खाद के लिए बोते हैं।  वो सन को खेत में जुताई कर मिट्टी में मिला देते हैं यह बहुत गलत तरीका है इस से सन  के द्वारा  बनाई गई कुदरती यूरिया गैस बन कर उड़ जाती है। और सन की फसल भी नहीं मिलती है।  हमारी सलाह है की इसमें सन  की फसल लेना चाहिए और फसल पकने से पहले सन की खड़ी में जब नमि रहती है खड़ी  फसल के बीच गेंहूं के बीजों को छिड़क देना चाहिए बाद में जब सन की फसल पक  जाती है उसे काट कर गहाई करने के बाद सन का  स्ट्रॉ पनपते गेंहू  ऊपर फेंक देना चाहिए।


सन की फसल काट ली गई है 
 
 
सन के स्ट्रॉ को उगते गेंहू पर फेंक दिया गया है। 
 
 
गेंहू की तैयार फसल 



Tuesday, August 22, 2017

कवर क्रॉप क्या है ?

कवर क्रॉप क्या है ?

कवर क्रॉप हम सब उन वनस्पतियों को कहते है जो कुदरती अपने आप हमारे खेतों में उगती हैं।सामान्य भाषा में इन्हे कचरा कहा जाता है जिन्हे मिटाने  के लिए किसान वर्षों से इन से लड़ाई कर रहा है। पर ये ख़तम होने का नाम नहीं ले रही हैंवरन और जिद्दी हो रही है

 

गाजरघास का कवर 

 

 

 जब यह कचरा कवर बना लेता है उसके नीचे असंख्य जीव जंतु कीड़े मकोड़े सूक्ष्मजीवनु पैदा हो जाते है जो खेत को गहराई तक बखर देते हैं ,खेत को खटोडा बना देते हैं और नमि को भी संरक्षित कर लेते हैं,बीमारी के कीड़ों से फसल को बचते है ,नींदो का नियंत्रण कर  लेते हैं।  अंत में सड़ कर खेत को अतरिक्त जैविक खाद दे देते हैं।

 यानि कचरा ट्रेक्टर ,खाद ,रासायनिक उर्वरक ,कीट /नींद नाशकों आदि सबका काम यह कचरा कर लेता है। गाजर घास इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसे कोई जानवर नहीं खाता है इसलिए  इसकी सुरक्षा के लिए फेंसिंग की जरूरत नहीं रहती है दूसरा यह आज कल सब जगह मिलता है। आसानी से इसके बीजों को खेतों में छिड़क कर इसका लाभ उठाया जा सकता है। इसके बीजों को खरीदने की जरूरत नहीं है.

हम बरसात में कवर क्रॉप को पहले स्य्रक्षा प्रदान करते हैं फिर उसके ढकाव में मौसमानुसार फसल के बीजों को फेंक कर  कर  कवर को पांव से चलने वाले "फुट क्रिम्पर " से दबा कर हरा का हरा सुला देते हैं।  हरा कवर इस प्रकार मरता नहीं है वरन हमारी फसलों के बीजों को सुरक्षित कर लेता है जो उग कर बाहर आ जाती है।

हरा कवर पुन : सीधा होने के चक्कर में तेजी से खेत से पोषक तत्व और पानी को खींचता है जो हमारी फसल को मिलता है जिस से हमे बंपर उत्पादन मिलता है। जबकि जुताई ,खाद जैविक और अजैविक जहरों के उपयोग के कारण फसलों का उत्पादन घटता जाता है।  

9179738049 
 
 

Sunday, August 20, 2017

नेचर स्कूल

नेचर स्कूल 

हमे एक नेचर स्कूल की शुरुवाद करने की जरुरत है। जिसमे हम बच्चों को सबसे पहले अपनी जरुरत की खाने के अनाज ,सब्जियां और फल पैदा करना सिखाना चाहिए। जब हम राजेंद्र सिंह जी के खेत में गए वहां गाँव के बच्चे भी थे जो हमे ऋषि खेती करने सिखाने लगे जैसे हम कचरों को मोड़ने के लिए ट्रेक्टर के उपयोग की बात कर रहे थे बच्चे बोले हम तो खुद दौड़ कर यह काम कर देंगे यह बात बेहद गौर करने की है की हमारे पास बच्चों की बहुत बड़ो फौज तैयार है जिसे हम अनावशयक परंपरागत स्कूल में झोंक कर उनकी कुशलता को कुचल रहे हैं। 

 

हमारा नेचर स्कूल दो काम एक साथ करेगा एक तो वह  बच्चों की खो रही प्रतिभा का संरक्षण करेगा और उन्हें वैकल्पिक ऋषि खेती की शिक्षा, स्वास्थ से तैयार करेगा जिस से हमारे बच्चे आगे चल कर देश के लिए मैडल ला सकें। 

इसके लिए जरूरी है की हमारे पास एक कुदरती खेत हो जैसा राजेंद्र सिंह जी के पास है उन्होंने तो इस काम को शुरू कर दिया है। पहले उन्होंने "सीड बाल "" बनाना सीखा अब वो अनाज सब्जियां फल आदि पैदा करना सीख रहे हैं। इन बच्चोंको राजेंद्र जी ने जैविक सेतु से जोड़ कर उन्हें  दिखा दिया है की हम जहां अपने खाने के लिए कुदरती खाना पैदा कर सकते हैं वहीँ हम इस से पैसे भी कमा सकते है। 

मै  साहसिक शुरुवाद के लिए राजेंद्र सिंहजी और उनके परिवार को बहुत बधाई देता हूँ और वायदा करता हूँ की जब भी जैसी भी उन्हें इस काम के लिए मेरी जरूरत पड़ेगी मै हाजिर रहूंगा।

 मै चाहता हूँ की हमे इन्दौर में राजेन्द्रजी के गाँव से इस योजना को शुरू मान लेना चाहिए इसके लिए यदि राजेन्द्रजी यदि सहमत हैं तो इसकी एक फॉर्मल कमेटी बना कर  युद्ध स्तर पर 

स्कूल का काम शुरू कर देना चाहिए। 

धन्यवाद

राजू टाइटस 

9179738049   

Monday, August 14, 2017

भूमि ढकाव की फसलों का फायदा

भूमि ढकाव की फसलों का फायदा 

भूमि ढकाव की फसले जिन्हे हम नींदा  या खरपतवार समझ कर चुन चुन कर निकलते और मारते रहते हैं  ये असली हमारी फसलें होती हैं जो हमारे खेत को कुदरती हवा ,पानी, जैविक खाद और बीमारियों से सुरक्षित कर देती हैं।

इस ढकाव के नीचे असंख्य जीव जंतु ,कीड़े मकोड़े और सूक्ष्म जीवाणु काम करने लगते हैं जो खेत को पोषक तत्वों और नमि से सरोबार कर देते हैं। इस ढकाव के कारण  फसलों में बीमारियां नहीं लगती हैं।  यह बात जो अधिकतर किसान और खेती के डाक्टर कहते हैं की ये फसलों का खाना खा लेती हैं गलत बात है।

इस गलत धारणा  के कारण  किसान इस हरियाली को वर्षों से नस्ट करते आ रहा है जुताई करने का भी यही कारण है जबकि ये जैव विविधताएं खेत को इतना अच्छा बखर देती है जितना कोई मशीन नहीं बखर सकती हैं और खेत को बहुत अच्छे से खड़ौदा  बना देती हैं।

जब हमारे खेत में नमि ,खाद और छिद्रियता का काम हो जाता है फिर खेत की जुताई करने से खेत मर जाते हैं जो एक गैर जरूरी काम है। जुताई करने से बारीक बखरी बारीक मिट्टी बरसात के पानी के साथ मिल कर कीचड़ में तब्दील हो जाती है जो पानी को खेत में जाने से रोक देती जिस से पानी तेजी से बहता है साथ में खेत की जैविक खाद को भी बहा  कर ले जाता है इस प्रकार एक बार की जुताई से खेत की आधी जैविक खाद  बह  हो जाती है।

हम इस ढकाव में फसल के बीजों को सीधे  या क्ले की सीड बॉल बना कर  फेंक देते हैं और इस हरियाली के ढकाव को जहां का तहाँ हरा का हरा सुला देते हैं जिस से यह मरता नहीं है और हमारे बीजों को सुरक्षित कर लेता है जो उग कर इस ढकाव से बाहर निकल आते हैं। इस दौरान ढकाव की फसल का कार्यकाल पूरा हो जाता है वह  सूख जाता है जो सड़ कर उत्तम जैविक खाद बना देते है।

नोट : कुछ  भूमि ढकाव की फसले जिनका कार्यकाल बरसात के साथ ही खतम हो जाता है उन्हें सुलाने की भी जरूरत नहीं है जैसे गाजर घास , समेल घास आदि। वो अपने आप नीचे गिर जाती हैं। 

Friday, August 11, 2017

गेंहूं और धान का फसल चक्र

बिना-जुताई कुदरती खेती 

गेंहूं और धान का फसल चक्र 

बिना जुताई ,खाद ,रसायन और निंदाई की गेंहूं और धान की खेती सच पूछिए तो किसानो की जिंदगी में एक नया  सबेरा लाने वाली है। गेंहू और चावल अब हमारे खाने में  जरूरी हो गया है जो जुताई और रसायनो के कारण अब खाने लायक नहीं रहा है तथा इनके उत्पाद  में अब किसानो को भारी  घाटा होने लगा है इस से वे एक ओर  जहाँ कर्जे में फंसते जा रहे हैं वहीं उनके खेत मरुस्थल में तब्दील हो रहे हैं। इस कारण  आने वाले समय में भारी खाद्य संकट दिखयी दे रहा है। 
हम विगत तीस साल से भी अधिक समय से बिना जुताई की कुदरती खेती का अभ्यास कर रहे हैं जिसे जापान के विश्व विख्यात  वैज्ञानिक श्री मस्नोबू फुकुओकाजी ने खोजा है। जिसे हम ऋषि खेती के नाम से बुलाते है। इस विधि से  एक और किसान अपना खोया सम्मान वापस पाते हैं वहीं खाने की उत्पादकता और गुणवत्ता में जबरदस्त सुधार आता है।  आज का खाना  जहां कैंसर जनित है वहीं ये कैंसर को ठीक करने वाला बन जाता है।  लागत और श्रम की कमी के कारण किसान लाभ में आ जाता है उसके खेत खदोड़े   और पानीदार बन जाते हैं जिनमे उत्पादन बढ़ते क्रम में मिलता है। 
फुकुओका जी गेंहू की खड़ी  फसल में धान की सीड बाल फेंक रहे हैं। 
इस खेती को करने के लिए गेंहूं की खड़ी फसल में समयपूर्व ही धान के बीजों की क्ले (कपे  वाली मिट्टी ) से बनी बीज गोलियों को खेत में बिखरा दिया जाता है जो अपने मौसम में अपने आप उग जाती हैं। इसमें खेतों में जुताई करना ,कीचड मचाना , रोपे  बनाना लगाने की कोई जरूरत नहीं रहती है वरन यह हानिकर रहता है। इसमें खेतों में पानी को भरने के लिए मेड बनाने की जरूरत नहीं रहती  है वरन पानी की अच्छे से निकासी  का प्रबंध  किया जाता है जैसा गेंहूं में होता है। 
धान की फसल को काटने से पूर्व करीब दो सप्ताह पहले गेंहूं की फसल के बीज सीधे खेतो में बिखरा दिए जाते हैं। उसके बाद जब गेंहूं उग आता है धान की फसल को काट लिया जाता है और धान की गहाई के उपरांत बचे पुआल को वापस उगते हुए गेंहूं पर आड़ा तिरछा फेंक दिया जाता है।

फुकुओकाजी धान की खड़ी फसल  में गेंहूं के बीज सीधे फेंक रहे है 
उगते गेंहू के ऊपर पुआल 
उगते धान के ऊपर नरवाई 
इसी प्रकार गेंहूं की नरवाई को भी खेतों में वापस छोड़ दिया जाता है। पुआल और नरवाई गेंहूं और धान  की फसल के लिए उत्तम जैविक खाद बना देते हैं जिस से उत्पादन बढ़ते क्रम में मिलता है। धान और गेंहूं के साथ एक दलहन फसल को भी बोना जरूरी रहता  है जिस के कारण दाल की फसल भी मिल जाती है और गेंहूं चावल के लिए पर्याप्त कुदरती यूरिया की आपूर्ति हो जाती है।


Tuesday, August 8, 2017

टिकाऊ (स्थाई ) कृषि हेतु सुबबूल की भूमिका

 टिकाऊ (स्थाई ) कृषि हेतु सुबबूल की भूमिका 

भारत एक कृषि प्रधान देश है और रहेगा इस में कोई संदेह नहीं है।  विगत कुछ सालों से आयी आयातित गहरी जुताई ,रासायनिक उर्वरक ,भारी सिंचाई और मशीनों के कारण हमारे देश पर कृषि के अस्तित्व का भारी  संकट आ गया है। खेत मरुस्थल में तब्दील होते जा रहे हैं और किसान खेती छोड़ रहे हैं। खेती किसानी के संकट के कारण उद्योग धंदे भी मंदी  की चपेट में है। पर्यावरण नस्ट होते जा रहा है इस कारण महामारियां अपने चरम पर पहुँच रही है। 
 
हम सब जानते हैं की हमारी खेती किसानी हमारे पशुधन से जुडी है किन्तु अब पशुओं के लिए चारे का गंभीर संकट आ गया है इस कारण  पशुधन भी लुप्तप्राय होने लगा है। एक और हमारे पालनहार अनाज ,फल सब्जियां  प्रदूषित हो गए हैं वहीँ अच्छा दूध ,अंडे मांस भी अब उपलब्ध नहीं है।  इसलिए अब हम बड़े खाद्य संकट में फंस गए हैं। 
 
वैज्ञानिक खेती के कारण हमारा पालनहार कार्बो आहार इतना खराब हो गया है की हर दसवा इंसान मधुमेह , मोटापे और कैंसर जैसी घातक बीमारी के चंगुल में फंसते जा रहा है। दालें जिन्हे हमारे पूर्वज बच्चे पाल कहते थे लुप्त होती जा रही हैं। उनमे भी आवशयक पोषक तत्व नदारत हैं। समस्या यह आ गयी  है की आखिर हम क्या खाएं क्या नहीं खाये।
                                    youtube- Natural Farming : Wheat under Subabul trees Raju Titus
हम विगत तीस साल से अपने पारिवारिक खेतों में  टिकाऊ खेती को भारत में किसानो के करने लायक बनाने में कार्यरत है । जिसे हम ऋषि खेती (बिना जुताई की कुदरती खेती )कहते है। हमने यह पाया है की बिना जुताई करे दालों  को पैदा करने में तो कोई समस्या नहीं किन्तु कार्बो फसलें जैसे  गेंहूं , चावल ,मक्का ,ज्वार बाजार आदि में जबरदस्त यूरिया की मांग रहती है। जिसकी आपूर्ति हम दलहनी फसलों से कर लेते  है। हर दलहनी फसल का पौधा या पेड़ जितना जमीन से ऊपर रहता है अपनी छाया के छेत्र में यूरिया की मांग की आपूर्ति कर देता है। 
 
इसलिए हम अपने खेतों में सुबबूल के पेड़ लगाते है सुबबूल के पेड़ एक और जहां हमारी कार्बो फसलों के लिए पर्याप्त यूरिया की सप्लाई कर  देते हैं तथा  हमारे पशुओं के लिए चारा और जलाऊ लकड़ी का भी इंतज़ाम कर देते हैं। हमने यह पाया है की यदि हम एक एकड़ में कम से कम 100 पेड़ सुबबूल के रखते हैं तो हम इनके सहारे आसानी से कार्बो फसले ले  सकते हैं तथा पशु  पालन भी हम कर सकते हैं जिस से हमे दूध आदि सब मिल जाता है। 
 
सुबबूल की यह खासियत है की यह एक साल में बिजली के खम्बे के बराबर हो जाता है और बीज फेंकने लगता है इसके बीज जमीन पर सुरक्षित पड़े रहते हैं जो बारिश आने पर उग जाते हैं। इसकी लकड़ी पेपर बनाने के भी काम में आती है।  एक एकड़ से करीब 5 साल में एक किसान चार लाख रु की लकड़ी बेच सकता है इसलिए यह अनेक प्रकार से लाभ देने वाला पेड़ है।  
राजू टाइटस 
9179738049 WA-7470402776
rajuktitus@gmail.com

Monday, August 7, 2017

गेंहूं की खेती के लिए जुताई अनावशयक है।

गेंहूं की खेती के लिए जुताई अनावशयक है। 

गेंहू रबी के मौसम में बोया जाता है। इस मौसम में नींदो की कोई समस्या नहीं रहती है इसलिए जुताई करने का कोई औचित्य नहीं है। गेंहूं को हम पिछले तीस साल से अधिक समय से सीधे फेंक कर ऊगा रहे हैं जिस से एक ओर  हमे उत्पादन सामान्य  मिलता है और जुताई ,खाद ,दवाओं का कोई खर्च नहीं लगता है। 

यदि गेंहू बिना जुताई किसी दलहन फसल के बाद बोया जाता है तो उसे कुदरती यूरिया  का अतिरिक्त लाभ मिलता है। नहीं तो सीधे गेंहू को फेंकते समय साथ में एक किलो प्रति एकड़ बरसीम के बीजों को मिला देने से कुदरती यूरिया की मांग की आपूर्ति हो जाती है। 
धान की फसल के बाद  की गयी गेंहूं की खेती (चित्र श्री बेरवा  फार्म मंडीदीप )
पैदावार दो टन प्रति एकड़ 

जुताई करना और रासायनिक यूरिया का उपयोग खेतों के लिए बहुत नुक्सान का है इस से एक ओर  जहां आर्थिक नुक्सान होता है वहीं खेत की आधी ताकत एक बार की जुताई से नस्ट हो जाती है दूसरा रासयनिक यूरिया भी गैस बन कर उड़ जाती है बची यूरिया गेंहूं को मुर्दार बना देती है। 

गेंहूं को यदि बरसाती फसल को काटने के पूर्व करीब दो सप्ताह पहले खड़ी  फसल में उगाया जाता है तो काफी समय की बचत हो जाती है। गेंहूं जब खड़ी फसल के अंदर उग जाता है और फसल को काटा जाता है तो गेंहूं के नन्हे पौधे पांव से दबते हैं किन्तु उन्हें कोई नुक्सान भी नहीं होता है। सामन्य मिलती है। 

इस प्रकार गेंहू की खेती करने में करीब 70 %खेती खर्च कम आता है और 50 % सिंचाई खर्च भी कम हो जाता है। जमीन की उर्वरकता का बढ़ने। फसल की गुणवत्ता से मिलने वाले लाभ अतिरिक्त है। यह गेंहूं कैंसर जैसी बीमारियों को भी ठीक करने की ताकत रखता है इसलिए ऊंची कीमतों पर माँगा जाता है। 

Sunday, August 6, 2017

लुप्त प्राय: सोयाबीन को पुनर्जीवित करे

लुप्त प्राय: सोयाबीन को पुनर्जीवित करे

ऋषि -खेती तकनीक अपनाये 

70 % कृषि खर्च और 50 % सिंचाई खर्च कम , फसल कीमत आठ गुना अधिक 
म होशंगाबाद के तवा कमांड के छेत्र में रहते हैं। यहां पर जब सोयाबीन की फसल की शुरुवाद हुई थी किसान तन  कर रहने लगा था। उसकी जेब में भरपूर पैसा रहता था।  सोयाबीन एक द्विदल की तिलहनी फसल है  इसमें प्रोटीन के साथ साथ पर्यात मात्रा में तेल भी रहता है। जब इसका तेल निकल लिया जाता है बचे खलचूरे में प्रोटीन की मात्रा बढ़ जाती है जो उत्तम पशुआहार के रूप में काम में आता है। तेल कम कोलेस्ट्रॉल युक्त लभप्रद होता है। सोयाबीन के खलचूरे को अनेक प्रकार के प्रोटीन युक्त व्यंजनों के लिए इस्तमाल किया जाता है। यह बच्चों और महिलाओं में कुपोषण को कम करने में बहुत उपयोगी है।
बिना जुताई की सोयाबीन (चित्र नेट से लिए है )

किन्तु दुर्भाग्य की बात है की सोयाबीन की फसल खेतों में होने वाले जुताई और यूरिया के इस्तमाल के कारण अब लुप्त प्राय : हो गई है इसके तेल के कारखाने बंद हो गए हैं। जिसके कारण अब किसान झुक कर चलने लगा है उसकी जेब खाली है ऊपर से वह  भारी कर्जे में फंस गया है। इसलिए  सोयाबीन की खेती को पुनर्जीवित करने का समय आ गया है। जिस से किसान फिर से अपना खोया सम्मान प्राप्त कर सके।

बिना जुताई गेंहूं की फसल (टाइटस फार्म )
हम पिछले तीस सालो से अधिक समय से बिना जुताई ,बिना खाद और रसायनो की खेती के अनुसंधान में लगे हैं  जिसे हम ऋषि कहते हैं।   हमने पाया है की जब खेत में बरसात में सोयाबीन को बिना जुताई करे बोया जाता है इसका बंपर उत्पादन मिलता है दूसरा यह इतना कुदरती यूरिया बना देती है जिस से अगली गेंहूं की फसल में यूरिया की कोई मांग नहीं रहती है। जुताई नहीं करने से और  कृषि के तमाम अवशेषों को जहां का तहाँ डाल  देने से  सिंचाई की मांग में 50 % की कमी आती है जुताई और खाद के बिना खेती करने से 70 % अतिरिक्त खर्च कम हो जाता है। तीसरा उत्पादन जुताई और मानव निर्मित खाद के बिना होने के कारण आसानी से कैंसर और कुपोषण जैसी बीमारियों को ठीक काने की छमता वाले बन जाते हैं जो बाजार बहुत ऊंची कीमतों पर मांगे जाते हैं। जिसे किसी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं रहती है।

गाजर घास का भूमि ढकाव (चित्र राजेश जैन जी ) 
बिना जुताई की सोयाबीन /गेंहूं के फसल चक्र में गाजर घास जैसे कुदरती भूमि ढकाव का बहुत बड़ा योगदान है हम पहले गाजर घास को बरसात में बढ़ने देते हैं जब यह घास करीब एक डेड़ फीट का हो जाता है इसमें सोयाबीन के बीजों को सीधा या सीड बाल बना कर खेतों में एक वर्ग मीटर में 10 बीजों के हिसाब से फेंक दिया जाता है जो गाजर घास के भूमि ढकाव में जम जाते हैं। सोयाबीन आराम से गाजरघास के ढकाव में बढ़ती जाती है तो दूसरी और गाजर घास सूखने लगती है एक समय जहां गाजर घास दिख रही थी वहां  सोयाबीन दिखने लगती है। गाजर घास को कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती है। वैसे तो अब हर खेत में गाजर घास होने लगी है जिस से अनावश्यक किसान डर रहे हैं किन्तु जहां नहीं होती है वहां उसके बीज छिड़के जा सकते हैं।  गाजर घास की खासियत यह की यह खेत को नीचे से बिलकुल साफ़ कर देती है जहां सोया बीन आसानी से जम जाती है। फसल में कीट नाशकों और नींदा  नाशको की भी जरूरत नहीं पड़ती है।

सोयाबीन की फसल काटने से करीब दो सप्ताह पहले गेंहूं के बीजों को सोयाबीन की खड़ी फसल में छिड़क दिया जाता है जब गेंहू जम जाता है सोयाबीन की फसल को काट लिया जाता है। सोयाबीन की गहाई  के उपरान्त सोयाबीन के भूसे को भी वापस खेतों पर जहां का तहाँ फेंक दिया जाता है। इसी प्रकार गेंहूं की नरवाई भी खेतो में  ही रहने दिया जाता है। कृषि अवशेषों को लगातार वापस डालते रहने से उत्पादन भी लगातार बढ़ते जाता है। खेत ताकतवर होते जाते हैं।








Monday, July 31, 2017

Sushama Bokil बेसन पचानेमें हेवी समझा जाता है ?

Sushama Bokil बेसन पचानेमें हेवी समझा जाता है ?

असल में नारियल का बुरा प्रमुख है रोटी बनाने के लिए बेसन मिलाते हैं वैसे अन्य दालों जैसे उड़द ,फलों का रस और हरी पत्तियों के रस से भी काम चल जाता है  किन्तु गेंहू ,आलू ,चावल और शक्कर मधुमेह /मोटापे का मूल कारण है। जो आगे चल कर अनेक बीमारियों में बदल जाते है ऐसा मेरा निजी अनुभव है मेने मधुमेह के कारण दो हार्ट और एक पैरालेसिस के अटेक झेले हैं। मेरी पत्नी को भी मधुमेह था जिसके कारण उन्हें हार्टअटैक आया था मल्टीपल ब्लॉकेज पता चला था जो मात्र ३-४ माह में खुल गए है बी पी /शुगर नार्मल है।  मेटाफोर्मिन और इन्सुलिन इंजेक्शन विपरीत असर डालते है। हमने पिछले तीन ,चार माह से कोई भी कार्बो नहीं खाया है। ना  दवाई ली है। असल में आज कल सभी कार्बो यूरिया से पैदा किए जाते हैं। दालों  में नत्रजन खाद की जरूरत नहीं पड़ती है । हमने पाया है की हमारे शरीर को कार्बो युक्त आहार जरूरी नहीं है किन्तु कुदरती वसा जरूरी है।  

Thursday, July 27, 2017

गाजर घास के भूमि ढकाव में करें ऋषि खेती

गाजर घास के भूमि ढकाव में करें ऋषि खेती 

 गाजर घास जिसे पार्थेनियम कहा जाता है ,  यह बहुत बदनाम वनस्पति है इसके पीछे अनेक भ्रान्ति हैं। यह कहा जाता है की इस से अनेक प्रकार की बीमारियां होती हैं। इसलिए अनेक दवाइयां कम्पनिया बना रही हैं। 
 जबकि यह बिना जुताई की कुदरती खेती में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब खेतों में जुताई नहीं की जाती है तो गाजर घास जैसी वनस्पतियां खेतों को ढँक लेती हैं। क्योंकि धरती माँ असंख्य जीव जंतुओं ,कीड़े मकोड़ों का घर रहती है। इन जैव-विवधताओं को ऐसे ढकाव की जरूरत रहती है जिसमे वो आसानी से पनप सकें। ये जैव-विवधताएँ अपने जीवन चक्र के जरिये खेत में उन तमाम पोषक तत्वों की आपूर्ति कर देते हैं जिनकी हमारी फसलों को जरूरत रहती है। जिसके कारण किसी भी प्रकार की खाद की जरूरत नहीं रहती है।
दूसरा यह अपने नीचे से उन तमाम नींदों को भी साफ़ कर देती है जो हमारी फसलों में अवरोध उत्पन्न करते हैं।
तीसरा गाजर घास की जड़ें खेत की अच्छे से जुताई कर देती हैं इसमें इनका साथ केंचुए जैसे अनेक जीव जंतु देते हैं।
गाजर घास का यह भूमि ढकाव इनके साथरहने वाले पेड़ों को भी बहुत लाभ पहुंचती है उनकी  बढ़वार अच्छी होती है ,नमि का संरक्षण रहता है तथा बीमारियां नहीं लगती हैं।
इस ढकाव में फसलों को लेने के लिए सीधे या सीड बॉल बना कर बीज डाल  दिए जाते हैं तथा इसे काट कर वहीं बिछा  दिया जाता है।  दूसरा तरीका जो उत्तम है  इन्हे  पांव से चलने वाले
क्रिम्पर से सुला दिया जाता है। इसका  फायदा यह रहता है की गाजर घास एक दम मरती नहीं है जिस से अन्य नींदे नियंत्रित रहते हैं और सोयी हुई गाजर घास तेजी से नमि और पोषक तत्वों को खींचती है जो हमारी फसलों को मिलती है जिस से बंपर उत्पादन प्राप्त होता है।
 गाजर घास को कोई जानवर नहीं खाता है इसलिए इसके लिए फेंसिंग की जरूरत नहीं रहती है। इसके ढकाव में हर प्रकार की फसलें  आनाज ,सब्जियां  ,फल के पेड़ अच्छे पनपते हैं।
गाजर घास में गेंहूं बिना जुताई खाद दवाई की खेती
गाजर घास में गेंहूं की खेती 

गाजर घास से भरा खेत इसमें गेंहू बोया है। 


Tuesday, July 25, 2017

सीड बॉल से मक्का /बरबटी की खेती

सीड बॉल से मक्का /बरबटी की खेती 

मक्का के सीड बॉल (राजू टाइटस )


ज हम मक्का के सीड बॉल बना रहे हैं ये मक्काकी सीड बॉल हैं। मक्का की यह खासियत यह है की यह खरपतवारो के बीच अच्छी पनपती है बड़ी होकर खरपतवारों से बाहर निकल आती है इसकी हार्वेस्टिंग भी सरल है दूसरा यह आगे की  फसलों के लिए पर्याप्त जैविक पदार्थ भी देती है। यदि हम दुधारू पशु पालते हैं तो मक्का का आधा चारा हम गायों के लिए रख सकते हैं और आधा  हम खेत को लोटा सकते हैं जिस से खेत भी संपन्न होते रहते हैं। आज कल गोशालाओं में रासयनिक खेतों से मिलने वाले सूखे चारे जैसे भूसा और पुआल का उपयोग किया जाता है जो उचित नहीं है है इस से दुधारू पशुओं का स्वास्थ बीडग जाता है और दूध भी पोस्टिक नहीं रहता है। मक्का काटने  से पूर्व खड़ी मक्का में बरबटी के बीजों की सीड बॉल डाल  दी जाती है।  बरबटी एक दलहनी फसल है जो मक्का के बाद उसके जैविक स्ट्रॉ में खूब पनपती है।  यह सब्जी ,दाल और चारे में काम आने वाली और जबरदस्त कुदरती यूरिया बनाने वाली फसल है। ऋषि खेती की सीड बॉल तकनीक में बिना जुताई/ खाद  का यह फसल चक्र बहुत लाभकारी सिद्ध हुआ हुआ है।  धन्यवाद 9179738049
 


 

उर्वरको का उल्टा असर होता है।

उर्वरको का उल्टा असर होता है। 

जुताई नही करने और वनस्पतयों के साथ तमाम जैव विवविवधतायों के पनपने से खेतों में पोषक तत्वों का संचार हो जाता है जैसा कुदरती वनो में होता है। जमीन की उर्वरकता बढ़ाने  वाले सूक्ष्म जीवाणु इसमें अहम् भूमिका निभाते है। जब हम क्ले मिट्टी से सीड बॉल बनाकर डालते हैं तो हम असंख्य जमीन को उर्वरता प्रदान करने वाले सूक्ष्म जीवाणु भी खेत  में डाल  देते हैं जो क्ले में रहते हैं।
असंख्य खेत को उर्वरकता प्रदान करने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं वाली क्ले से बनी सीड बाल 

जबकि  रासायनिक उर्वरक उल्टा काम करते हैं जैसे हमारे शरीर में कोई विष या विष्णु के आने से उलटी हो जाती है वैसा ही रासयनिक उर्वरक डालने से होता है जिस से खेत कमजोर हो जाते हैं। सभी रासायनिक उर्वरक जहरीले होते हैं जिन्हे खेत पसंद नहीं करते हैं इसलिए 'उल्टी ' की प्रक्रिया होती है। 9179738049 

Friday, July 21, 2017

बरसात में जब क्ले नहीं मिले तो क्या करें ?

बरसात में जब क्ले नहीं मिले तो क्या करें ?

मै हमेशा यह कहते आया हूँ की क्ले को गर्मियों में इकठा कर पाउडर बना कर उसके सीड बाल बना लेना चाहिए। किन्तु अनेक लोगों को क्ले मिलने और पहचानने में तकलीफ हो रही है इसलिए मेने सलाह दी है की खेत की मेड की मिट्टी जो अनेक सालो से जुताई से बची है जिसमे केंचुओं के घर रहते हैं  को बरसात में ले आएं और उनकी सीड बाल बनाकर बुआई कर ली जाये। किन्तु मेने पाया है की गीली खेत  की मिट्टी अनेक बार इतनी कड़क नहीं रहती जिसे चूहे ना खा सकें इसलिए मेने एक प्रयोग किया है। मेने खेत की मिट्टी में POP(प्लास्टर ऑफ़ पेरिस ) मिलाकर  सीड  बनाये है। POP से सीड बॉल खेत की मिट्टी से अच्छे कड़क बन जाते है और तुरंत सूख जाते हैं।इन्हे जब हम खेत में डालते हैं चूहे नहीं खा पाते हैं ठीक क्ले जैसी कड़क सीड बाल बनाने के लिए हम बरसात में POP का इस्तमाल कर सकते हैं   यह बहुत सस्ता बाजार में मिल जाता है।  यह डिग्रेडेबल पर्या मित्र पदार्थ है। जो क्ले ही है और क्ले की जगह इस्तमाल किया जाता है। जिसका नाम जिप्सम है। यह खाद के लिए भी इस्तमाल होता है।  इसे तीन भाग मिट्टी में एक भाग मिला कर सीड बॉल बनाया जा सकता है।  इसकी सीड बॉल तुरंत सूख कर कड़क हो जाती है जिस से बीज फूल कर खराब भी नहीं होते हैं। खेत में ये सीड बॉल पानी को सोख लेते हैं जिस से बीज फूलकर बॉल को फोड़ लेते हैं और अंकुरित हो जाते हैं।

मुर्गा  जाली से सीड बॉल बनाने के लिए यहां क्लिक करें https://get.google.com/albumarchive/104446847230945407735/album/AF1QipNjehmb859gjXHJE6uqvGkx5WsETSdZH8UOD1cz
 

Thursday, July 20, 2017

ऋषि -खेती शुरू कैसे करें

ऋषि -खेती 

शुरू कैसे करें 

 

ब हम ऋषि खेती जो असल में नेचरल फार्मिंग है जिसे फुकुओका फार्मिंग भी कहा जाता है करते हैं तब हमारा उदेश्य मात्र पैसा कमाना नहीं रहता है। ऋषि खेती वाकई में एक भूमि सुधार योजना है। हम अपनी जमीन को जुताई आधारित खेती के कारण पनपते मरुस्थल से बचा लेते हैं। पहले साल में हमारे खेत हरियाली से भर जाते हैं उसमे कुदरती हवा ,पानी का संचार शुरू हो जाता है। बरसात का पानी जो हर साल बह कर हमारे खेत से निकल जाता था वह  रुक जाता है इस कारण खेत की जैविक खाद का बहना भी रुक जाता है। 

यह सब जानते हैं की फसलों का उत्पादन पूरी तरह खाद और पानी पर निर्भर रहता है  खाद पानी से हमारे खेत भर जाते हैं तो फसलों को तो होना ही है। इसमें हम सीधे बीजों को भी बिखेर सकते हैं। बीजों को सीड बॉल बना कर डालना सबसे सुरक्षित उपाय है।  अनेक फलदार पेड़ों के रोपे  भी लगाते जाते हैं  उदेश्य हमारा अपने खेत को हरयाली से भरना है।  जैसे ही हम जुताई छोड़ते हैं पहली बरसात में हमारे खेत हरयाली से भर जाते हैं ये वनस्पति जो आम भाषा में खरपतवार कहलाती है ऋषि खेती की जान होती है इसको बचाना ऋषि खेती की प्राथमिकता रहती है । इस वनस्पति को हम भूमि ढकाव की फसल कहते हैं जो अपने आप आती है। इसके नीचे असंख्य जीव जंतु , कीड़े मकोड़े ,केंचुए ,सूक्ष्म जीवाणु रहते हैं जो अपने खेत में खाद बना देते हैं। हमारी फसलों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। हम इस वनस्पतियों को सीड बॉल डालते हुए अपनी फसलों से बदल देते हैं जिस से ये लुप्त हो जाती हैं। इन्हे मारने से हमारी फसलें दुखी होकर बीमार हो जाती है । 

सीड बॉल की जानकारी केलिए http://rishikheti.blogspot.in/2016/06/blog-post_20.html क्लिक करें। 

राजू टाइटस 

     

 

Saturday, July 15, 2017

शर्करायुक्त (Carbohydrates) आहार से बीमारियां हो रही है !

शर्करायुक्त (Carbohydrates) आहार से बीमारियां हो रही है !

जुताई आधारित हरित क्रांति के कारण बीमारियां हो रही हैं । यह  अनाजों ,आलू और गन्ने जैसे कार्बो के लिए तो  कारगर है जबकि दालों के उत्पादन में फेल है। शर्करायुक्त फसलों में जबरदस्त यूरिया की मांग रहती है जबकि दलहनी फसले कुदरती यूरिया बनाती है। जुताई करने से खेत बीमार हो जाते हैं जिनमे बीमार फसले पैदा होती हैं जो मधुमेह ,मोटापे और कैंसर जैसी बीमारी का मूल कारण हैं।  

 
 

मेने और मेरी पत्नी ने जब से शर्करायुक्त  आहार छोड़ा है तब से हम दोनों स्वस्थ रहने लगे हैं।  मै इन दिनों 71 + और मेरी पत्नी 67 + में है। सब से पहले मुझे मधुमेह  का पता तब चला जब मुझे पहला हार्ट अटैक आया था। डाक्टरों ने बताया  की यह अटैक मधुमेह के कारण है तब ब्लड शुगर 320  था  मुझे स्टंट उपचार निर्देशानुसार करना पड़ा। किन्तु मात्र तीन माह  में मुझे जबरदस्त हार्ट अटैक आया जिसने  मेरा  हार्ट डाक्टरों के अनुसार आधा ख़राब कर दिया जैसा डाक्टरों ने बताया था। यह घटना मेरे परिवार के लिए बहुत बड़े सदमे की थी जिसके कारण मेरी पत्नी को भी शुगर की बीमारी लग गयी इसका पता लगने से हम दोनों मेटफोर्मिन और इन्सुलिन लेने लगे इसके बावजूद मेरी पत्नी को हार्ट अटैक और मुझे पैरालिटिक अटैक आ गया था। 
शर्करायुक्त (Carbohydret)  बंद करने से इस समस्या को रोका जा सकता है यह जानलेवा है। 

फिर  क्या था हम पूरी तरह डाक्टरी इलाज में फंस गए मेरी पत्नी को मल्टी ब्लॉक बताये थे उन्हें बाय पास सर्जरी  सलाह दी गई थी। जो बहुत खतरनाक है हम घबड़ा गए थे। हमारे सामने आगे पहाड़ पीछे खाई वाली स्थिति थी  इस दौरान  निर्णय लिया की हमे बाय पास नहीं करवाना है।  हम दोनों का करीब एक सा रासायनिक इलाज चल रहा था। हम यह जान गए थे हम दोनों को यह बीमारी मूलत: मधुमेह के कारण है। चूंकि मेरी माताजी  +पिताजी + बड़े भाई का निधन समय पूर्व मधुमेह से हुआ था इसलिए चिंतित होना लाज़मी था। 

 किन्तु पिछले अनेक सालो से बिना रसायनो  और बिना जुताई  की ऋषि खेती करने के  कारण  हमे भरोसा था कि  हम कोई न कोई कुदरती इलाज का तरीका खोज लेंगे। इस खोज में हमारे फेसबुक फ्रेंड श्री विपिन गुप्ताजी जो अनेक सालो से बिना दवाई मधुमेह ,मोटापे और थाइरोइड का इलाज कर रहे हैं   ने हमे बताया था की मधुमेह  गेंहू की रोटी छोड़ने से ठीक हो जाती है उन्होंने हमे गेंहू की रोटी छोड़ कर कच्चा और हरा खाने की सलाह दी थी हमने एक माह ऐसा किया था।  जिस से हमने ब्लड शुगर को कम होते देखा था इसलिए हमे भरोसा था की  शुगर हम दोनों की ठीक हो सकती है। चूंकि हमने अपना इलाज जैसा विपिन गुप्ताजी  ने बताया था को जारी नहीं रख सके थे इसलिए हमे यह मुसीबत झेलनी पड़ी थी। 

 इस दौरान हमारी खोज जारी रही हमने पाया की अधिकतर लोग मधुमेह  और मोटापे के लिए शर्करायुक्त आहार को छोड़ने कि सलाह देते हैं। हमने तुरंत अनाजों का सेवन बंद कर दिया  आलू ,शकर शहद भी त्याग दिया। इसके बदले हमने दालों का सेवन जारी रखा साथ में हमने नारियल के आटे ( बूरे )  और चने का आटा ( बेसन ) को मिला कर रोटी बनाकर खाना  शुरू कर दिया।  असल में हम गेंहू की रोटी के आदि हैं इसलिए रोटी जैसा जब तक न मिले तसल्ली नहीं होती है। हमने में वसा युक्त आहार के लिए दही का सेवन जारी रखा साथ में अंकुरित दालों  सेवन  जारी रखा। घर में जो सब्जियां सामन्यत: बनती हैं वो भी चलती रहीं।

हमने पाया की जिस दिन से हमने अपने आहार में बदलाव लाया था उस दिन से ब्लड शुगर बढ़ना बंद हो गई और वह  घटने लगी इस दौरान हमने मेटफोर्मिन और इन्सुलिन जो मधुमेह की आम दवाइयां हैं को भी बंद कर दिया क्योंकि हमारी शुगर लगातार घट रही थी इसलिए हमे शुगर कम हो जाने का खतरा हो गया था।  अटैक के बाद जितनी दवाइयां दी जा रही थीं सब हमने छोड़ दी। 

शर्करायुक्त आहार छोड़ने का एक अतिरिक्त लाभ मेने पाया की मेरा वजन भी घटने लगा जो 90 + करीब एक माह में 73 हो गया और मेरी मेरी पत्नी का वजन जहां का तहाँ रहा पर उनका बी पी भी बिना दवाई के सामान्य  हो गया। हमने ऊपर वाले का बहुत धन्यवाद किया की उसने हमे एक जान लेवा बीमारी से बचा लिया। 

किन्तु हमारी खोज जारी रही की आखिर शर्करायुक्त आहार में ऐसा क्या है जिस से मधुमेह और ब्लड प्रेशर और मोटापा  बीमारियां आम होने लगी हैं । मेरी छोटी बहन भी मोटापे की मरीज थी जिसे थाइरोड बताया गया था वह भी शर्करायुक्त  आहार को छोड़ने से ठीक हो गई है उसका करीब एक माह में 10  किलो वजन कम हो गया है। 

 हमने पाया की  यह खेती के कारण हो रहा है जब खेतों में जुताई की जाती है तो उसकी नत्रजन (कुदरती यूरिया ) गैस बन कर उड़ जाती  है यह नत्रजन असल में शर्करायुक्त फसलों की जान होती है इसलिए जब वह नहीं रहती है तो कृत्रिम रासायनिक नत्रजन (यूरिया ) डाली जाती है। इस से  फसले  पैदा तो  हो जाती है किन्तु उनमे कुदरती ताकत नहीं रहती है।  इसलिए जहां एक रोटी की जरूरत रहती है वहां अनेक रोटी से भी पेट नहीं भरता है। बिना ताकत के आहार से ये बीमारियां होती हैं। किन्तु दालों में अपेक्षाकृत मामला उल्टा है जहां शर्करायुक्त फसले यूरिया मांगती हैं दालें इसके विपरीत कुदरती यूरिया बनाने का काम करती है। 

यह अनुभव  हमे बिना जुताई ,बिना खाद और बिना दवाई की खेती करने से मिला है हम अपने खेतों में पिछले अनेक सालो से दलहनी फसलों और शर्करायुक्त फसलों जिन्हे  सामन्य भाषा में अनाज कहा  जाता है के समन्वय से खेती कर रहे हैं। जिसकी खोज जापान के जाने माने स्व मस्नोबू फुकुओकाजी ने की है। 

हमारे देश में यह समस्या हरित क्रांति के आने के बाद से आयी है। यह क्रांति मूलत: गेंहू ,चावल,आलू  और गन्ने की खेती में ही अधिक सफल रही है दालों की फसलों  में यह इस कारण पीछे है। इसके लिए हम रासयनिक यूरिया से कहीं अधिक दोष खेतों की जुताई को देते हैं। जुताई करने से खेत की एक बार में आधी ताकत नस्ट हो जाती है हर बार यह  नुक्सान होता रहता है। इस कारण खेत बीमार हो जाते हैं। जिस से हम भी बीमार हो जाते हैं। 

हमने यह भी पाया है  कि हमारे शरीर को शर्करायुक्त आहार की कोई जरूरत नहीं है। किन्तु दालों और वसायुक्त  आहार की जरूरत है। किन्तु यदि हम बिना जुताई की कुदरती खेती करते हैं तो हम सब खा सकते हैं। हमने यह भी पाया है की जब तक हम मधुमेह ,मोटापे और अन्य बीमारियों की गिरफ्त में हैं हमे शर्करायुक्त आहार के परहेज की जरूरत है बाद में कम से कम 6 माह के उपरांत हम कुदरती शर्करायुक्त आहार बे खौफ खा सकते हैं। 

इन दिनों ऑर्गनिक की एक और बीमारी तेजी से पनप रही है कहा  यह जा रहा है सब बीमारियां कृषि रसायनो  से हो रही हैं यह गलत है।  असल में खेतों में बीमारियां जुताई के कारण हैं और बीमार  खेतों में बीमार फसलें  होती हैं इसलिए हम बीमार हो रहे हैं।

राजू टाइटस 

कुदरती खेती के किसान 

 

Monday, July 10, 2017

ऋषि खेती से संबधित प्रथापन जी के सवाल और राजू टाइटस के द्वारा जवाब

ऋषि खेती से संबधित प्रथापन  जी के सवाल और राजू टाइटस के द्वारा जवाब 

१-नेचरल फार्मिंग के निम्न सिद्धांत हैं 

१-जुताई नहीं २-खाद नहीं ३-निंदाई नहीं ४- कीटनाशक नहीं ५-फलदार पेड़ों की शाखाओं की छटाईं नहीं
 

२-नेचरल फार्मिंग से पहले 

 कांस घास 
नेचरल फार्मिंग से पहले हम गहरी जुताई से रसायनो और मशीनों से खेती करते थे इसलिए वो मरुस्थल में तब्दील हो गए थे ,कुए सूख गए थे  पेड़ नहीं था  घास हर जगह हो गई थी जिस के कारण खेती करने न मुमकिन हो गया था। 
 
नेचरल फार्मिंग से पहले खेत ऐसे दीखते थे। 
 घास खेतों की जुताई में बाधक रहती है इसकी जड़ें 30 फ़ीट नीचे तक चली जाती है। यह जुताई करने के कारण हो रहे भूमि छरण को रोकने  का कुदरती उपाय है। 
पेड़ो से ढके हमारे खेत 
पहले हमारे खेत सामन्यत: जुताई वाले खेतों की तरह पेड़ों के बिना नजर आते थे।  अब हमारे खेत पूरीतरह पेड़ों से ढक गए हैं।

३-पडोसी खेतों से तुलना 

एक और जहां हमारे खेत पेड़ों से ढके हैं वहीँ हमारे पड़ोसियों के खेत जैसा चित्र में दिख रहा है हरयाली विहीन मरुस्थलों में तब्दील हो गए है। हमारे कुओं में पानी लगातार बढ़ रहा है वहीँ हमारे पड़ोसियों के कुए सूख रहे हैं। 
हमारे खेत रोग निरोग शक्ति वाली फसलों ,फलों ,दूध का उत्पादन कर रहे हैं वहीं पड़ोसियों के खेत जहरीले उतपाद पैदा  कर रहे हैं जिनसे अनेक बीमारियां  हो रही हैं।  

४-मसनेबु फुकुओकाजी  के अनुभवों से मिली सीख 

क्ले से बनी सीड बाल 
 ३० साल पहले हम जब वैज्ञानिक खेती कर रहे थे जुताई खाद दवाइयों और मशीनों के कारण हमारे खेत मरुस्थल बन गए थे। हमें लगातार  आर्थिक ,पर्यावरणीय ,सामाजिक और आध्यात्मिक नुक़्सानो रहा था। हम खेती जिसे शांति का मार्ग समझ रहे थे यह अशांति का कारण बन गई थी। हमे से छोड़ने के बदले कोई मार्ग नहीं बचा था  तब हमे फुकुओकाजी के अनुभवों की किताब "The one straw revolution " पढ़ने को मिली जिसने हमारे सोच को बदल दिया। फुकुओकाजी पहले हिंसात्मक वैज्ञानिक खेती के डाक्टर थे जो बदल कर अहिंसात्मक कुदरती खेती के प्रणेता बन गए थे। उन्होंने  पाया की दुनिया में सबसे बड़ी हिंसा हमारे पर्यावरण की हो रही है जिसमे गैर कुदरती खेती का सबसे बड़ा हाथ है। इसलिए उन्होंने कुदरती खेती का विकास किया जिसमे उनको करीब 30 साल लगे जिसे वे करीब 70 -80 साल तक करते रहे। उन्होंने इस दौरान अनेक किताबे लिखी और अनेक माधयमो से दुनिया को समझाने की कोशिश की इसी दौरान वो हमारे खेतों को देखने भी पधारे थे उन्होंने हमे दुनिया में उनके द्वारा देखे कार्यों में प्रथम स्थान दिया था। 
 
सीड बनाते हम लोग 
दूसरी बार मेरी उनसे मुलाकात गाँधी आश्रम में हुई थी। उस समय वो केवल "सीड बाल "बनाकर बता रहे थे और कह रहे थे सब भूल जाओ पूरी दुनिया गैर कुदरती खेती के कारण मरुस्थल में तब्दील हो रही है हमे इसे बचाने के लिए अब युद्धस्तर पर काम करना पड़ेगा। पनप रहे मरुस्थलों को बचाने के लिए हम क्ले  सीड बाल बनाये और उसे बिखरायें उन्होंने बताया कि  तंजानिया के एक बहुत बड़े गैरकुदरती खेती के कारण बने मरुस्थल को वहां की जन जाती ने सीड बाल से हरियाली में बदल दिया है यदि हम सीड बाल के  विज्ञान और उसके  दर्शन को समझ लेते हैं तो हम आज भी दुनिया में अमन शांति कायम कर सकते हैं। 
 
आज गांधीजी होते तो वो चरखे की तरह सीड बाल बनाने पर जोर देते किन्तु अफ़सोस की बात अब गांधीजी का देश स्वम गैर कुदरती खेती के कारण मरस्थल में तब्दील हो रहा है हमे इसमें ब्रेक लगाने की जरूरत है। 
 

5 -विज़िटर्स ,कार्यशालों और सेमिनार के बारे में 

हम पिछले 30 सालो  से जब से हमने नेचरल फार्मिंग को समझा है और इसे भारत में गैरकुदरती खेती के कारण पनप रहे मरुस्थलों  बचाने के लिए प्राय कर रहे हैं। इस दौरान हमने अनेको लोगों को इसके बारे में बतया है। अनेक लोग हमारे फार्म पर आते हैं जो देशी और विदेशी सभी रहते हैं। अनेक लोग समूहों में आते हैं उन्हें हम कार्यशाला के माध्यम से समझने का काम करते हैं। जो लोग अकेले आते हैं उन्हें हम समझाने के लिए पूरा प्रयास कर रहे हैं। हम इस कार्य को सामजिक और आधात्मिक समझ कर करते हैं जिसका कोई भी शुल्क नहीं लेते हैं।
ऑस्ट्रेलिया  से आये फ्रेंड्स 
 
हमे अनेक लोग भिन्न भिन्न प्रांतों में भी बुलाते है  वहां भी कार्य शाला के माध्यम से नैचरलफ़ार्मिंग करना सिखाने का काम करते हैं।  चूंकि हमारा फार्म भारत में पहले फार्म है हमे लोग रिसोर्स के रूप  आमंत्रित करते हैं हमारे रहने खाने के खर्च भी वो लोग वहां करते हैं।  अनेक ऐसे फार्म है जहां हमने किसानो को खेती करना सिखाया है। जिसके अच्छे परिणाम भी देखने को मिले हैं।
अमेरिका से नौकरी छोड़ कर सीड बाल बनाना सीख रहे हैं देवजी 
फिर भी हम यह कह सकते हैं की अभी यह ऊँट के मुंह में जीरे के सामान है। 
अब जबकि हमारे देश में बल्कि हमारे प्रदेश में असंख्य किसान खेती के कर्जों के कारण परेशान होकर आत्म हत्या करने लगे हैं ऐसी हालत में हमारी सरकारों ने और हमारे न्यायालयों ने हाथ खड़े कर दिए हैं। ऐसे में नेचरल फार्मिंग की पूछ परख बहुत बढ़ गई है।
"सीड बाल " बनाना अब क्रांति का रूप ले रही है अनेक स्वम सेवी संस्थाएं इसके महत्व को समझ कर आगे आने लगी हैं। 
 

6 -सरकार और NGO हमारे फार्म पर कार्यशालाएं आयोजित कर रहे हैं।   


वन विभाग के साथ 
चूंकि हमे अपनी बात समझाने के लिए मॉडल की जरूरत रहती है इसलिए  अधिकतर सरकारी और NGO के लोगों को हम अपने यहां आमंत्रित करते हैं  आकर नेचरल फार्मिंग की जानकारी लेते है। इसी तारतम्य में वन विभाग और आदिवासी विभाग की कुछ कार्यशालाएं यहां आयोजित हुई हैं। ग्रामीण विकास से जुडी अनेक कार्य कार्यशालाएं यहां आयोजित हुई हैं। 


हिमाचल प्रदेश में सीड बॉल बनाते लोग 



 
भारत के करीब हर प्रदेश में हम सेमीनार हेतु बुलाये गए है और बुलाये जा रहे है अनेक लोगों से इसे अपनाया है और अपनाये जा रहे हैं। 
यमुना नगर में स्कूल के बच्चों के साथ बात चीत 
आज कल हमे नेचरल फार्मिंग को नेचर क्योर से जोड़ कर बात करने लगे हैं।  हमारा मानना है कि हमारा पर्यावरण सीधे हमारे स्वास्थ से जुड़ा है और पर्यावरण हमारी खेती से जुड़ा है। हवा  पानी और हमारा भोजन  ठीक रहेगा तो  स्वस्थ रहेंगे। हम स्वस्थ रहेंगे तो हमारा परिवार भी स्वस्थ रहेगा ,समाज और देश स्वस्थ रहेगा।

फ़्रांस से नेचरल फार्मिंग सीखने पधारे मित्र 
 
इसलिए हमारा  मानना है की असली  "शांति की कुंजी हमारे खेतों के पास है "
 
 
 
 
 
 
 
 

7 -विज़िटर्स के द्वारा उठाये गए सवाल 

1 -क्या कारण है नेचरल फार्मिंग के विस्तार नहीं होने का ?
2 -यील्ड में क्या अंतर आता है ?
3 -पड़ोसी किसान क्यों नहीं अपना रहे हैं ?
4 -जापान में क्यों इस विधि को नहीं अपनाया है ? 
5 -भारत में कहीं इस से खाना कम तो नहीं पड़ जायेगा?
ये वो सामान्य प्रश्न है जो हमसे पूछे जाते हैं जिनका अधिकतर का हमारे पास कोई जवाब नहीं है। हम सिर्फ इतना जानते हैं की NF नहीं करने की वजह से आज का किसान बहुत बड़ी मुसीबत में है वो कर्जदार हो गया है। यील्ड कम होती जा रही है। खाने का प्रदूषण बढ़ते क्रम में है। अमेरिका हो या जापान सब खेती किसानी के संकट में फंसे है जिस से बहार निकलने का अब कोई और मार्ग  उन्हें दिखाई  रहा है। कुदरती खाने का अकाल पड़ रहा है। 
 
हमारे अनुभव हमको बताते हैं की आज नहीं तो कल इस खेती के आलावा और कोई मार्ग नहीं है। बिना जुताई और बिना रसायनो की खेती ही भविष्य में रहेगी बाकि सब लुप्त हो जाएंगी। इसके बाद ही अमन और शांति का हमारा सपना पूरा हो सकेगा। 
 

8 -फेमली बैक ग्राउंड ,भरोसा और सिद्धांत 

हमारे परिवार के इन खेतों को हमारे माता पिता और दादाजी ने मिलकर खरीदा था। जो एक क्वेकर परिवार के सदस्य थे। जिसने अपना पूरा जीवन घायल कुदरत  पीड़ित मानवता की सवा में अर्पित कर दिया था।  जिसमे केवल में ही ऐसा बिगड़ा बेटा  निकला जिसने ने इसे दिल से अपनाया है। दुर्भाग्य से हमारे दादाजी माता पिता और बड़े भाई इस दुनिया में नहीं है। किन्तु मेरे परिवार को छोड़ कर सभी बच्चे भाई बहनो के परिवार के  बाहर हैं। मेरी पत्नी और बच्चे इस विधा से बहुत संतुस्ट हैं वो कुदरती खान पान और उस से हमारे शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों को समझ गए हैं। जो इस से दूर नहीं जाना चाहते हैं।  में आशा करता हूँ की एक दिन आएगा जब बाकि हमारे परिवार के सभी बच्चे इस विधा का महत्व समझ कर कर वापस आएंगे जैसे अनेक लोग जो  बड़ी बड़ी नौकरी छोड़कर अपने गाँव वापस लोट रहे हैं। असल में पैसा कमाना सब चाहते है कमा भी लेते हैं पर कुदरत को कमाना असली कमाई है इसका आभास तब होता है जब हमे बीमारियां घेरने लगती हैं और महानगरों के बड़े बड़े डाक्टर हमे नहीं बचा पाते हैं। केवल कुदरत ही हमको बचा सकती है। 
 
हम सब उस ऊपर वाले पर बहुत भरोसा करते हैं दिन रात  अपने और अपने परिवार की अच्छाई के लिए दुआ मांगते रहते हैं किन्तु ऊपर वाला भी उनकी मदद करता है जो उसके दिए इस शरीर का और पर्यावरण की मदद करता है। जो इस दुनिया में आता है उसे एक दिन जाना ही होता है हम भी अब बूढ़े हो गए हैं कल रहे या नहीं रहें किन्तु कुदरत हमेशा जीवित रहती है हमे वही करना चाहिए जो कल हमारे बच्चो के काम आये । ऊपर वाले का दिया यह शरीर भले नहीं रहेगा पर हमारे बच्चों के बच्चे रहेंगे वैसे हमारे खेत उसमे लगे पेड़ हरियाली बच्चे रहेंगे हमे उनकी सेवा कर ऊपर वाले का कर्ज अदा करना है। 
 

9-अन्य जरूरी जानकारी 

ऋषि खेती की फाउंडर सदस्य 
यहां मै एक बात बताना चाहता हूँ की नेचरल फार्मिंग की शुरुवात फ्रेंड्स रूरल सेंटर रसूलिआ होशंगाबाद के क्वेकर सेंटर से हुई है जिसे गांधीवादी क्वेकर स्व मार्जरी साइक्स और गाँधीवादी क्वेकर परताप अग्रवालजी ने  "ऋषि खेती " के नाम से ग्रामीण विकास के लिए शुरू किया था। किन्तु बड़े खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि अब इस सोच का वहां कोई नहीं रहा है इसलिए यह विधा वहां लुप्त हो गई है।  "ऋषि खेती " नाम स्व आचार्य विनोबा भावेजी ने गाँधी खेती के लिए दिया था।  जो गांधीजी के "सत्य और अहिंसा " के सिद्धांतों पर आधारित है।  जब मार्जरी साइक्स जी बीमार हो गई थीं उन्हें इंग्लॅण्ड वापस जाना था उन्होंने बड़े प्रेम से कहा था की  मुझे कोई चिंता नहीं है क्योंकि तुमने इसे अपना लिया है। इसलिए हम आज बहुत प्रसन्न हैं गांधीजी की ऋषि खेती हमारे फार्म पर जीवित है और क़ुदरत की सेवा में  सलग्न है। रसूलिअ सेंटर में "ऋषि खेती "का जन्म मौजूदा हरित क्रांति के विकल्प में हुई थी जो अब मरणासन्न अवस्था में लाखों खेत और किसान भी हरित क्रांति के कारण मरने लगे हैं। देशी कुए ,नलकूप नदी नाले सूखने लगे हैं। बरसात भी अब नहीं हो रही है। इसलिए सब "ऋषि खेती " की और देखने  लगे हैं। 
 
 
यह लेख मेरे दामादजी श्री परम्यू प्रथापन  जी को समर्पित है जो एक सच्चे गाँधीवादी क्वेकर हैं। लिखने में कोई त्रुटि हो तो छमा करेंगे। मेरी बेटी रानू से विनती है की इस लेख को पढ़ कर प्र्थापन जी सुना दें जिस से वो इसका जहां चाहें उपयोग सकें। 
धन्यवाद 
राजू टाइटस 
10-jul-2017
Titus natural farm hoshangabad.M.P.
461001
 

Thursday, June 29, 2017

जुताई के कारण छाया का असर

जुताई के कारण छाया का असर 

दो छोटे छोटे पेड़ों के कारण फसल नहीं हो रही है। 
पेड़ की छाया में बिना जुताई की  गेंहूं की फसल। 

अधिकतर  जुताई करने के दो तरीके हैं एक ट्रेक्टर दूसरा बेलों से जो  खेत में चलाये जाते हैं इसलिए  जितने खेत में पेड़ रहते हैं काट दिए जाते हैं इनके रहते ट्रेक्टर और बैल नहीं चल पाते हैं। दूसरा जब खेत बार बार जाते जाते हैं खेत की जैविक खाद (मिट्टी) बरसात के पानी के साथ बह जाती है इस प्रकार खेत की आधी खाद एक बार की जुताई में बह जाती है। खेत कमजोर हो जाते हैं। कमजोर खेतों में पेड़ की छाया का असर होता है इसलिए किसान दूर दूर तक के पेड़ों को काट देता है। किन्तु हम जो पिछले 30 सालो से बिना जुताई की खेती कर रहे हैं की फसलों पर छाया का असर  नहीं होता है। कृषि वैज्ञानिक भी यही कहते हैं की पेड़ की छाया में फसल नहीं होती है किन्तु वे नहीं जानते हैं की यह जुताई का असर है। 

 
 

Tuesday, June 27, 2017

गौ आधारित खेती

  गौ आधारित खेती

हम गौ आधारित खेती का बहुत सम्मान करते हैं हमारा देश गौ आधारित  खेती के कारण हजारों साल बचा रहा है।  पहले किसान जुताई की  हानि के प्रति सतर्क रहते थे जुताई से कमजोर होते खेतों में जुताई बंद कर उन्हें पड़ती कर उसमे पशु चराते थे जिस से खेत ठीक हो जाया करते थे। साल के आखिर में सभी कृषी अवशेषों को वापस खेतों में डाल  दिया करते थे। खाद और दवाइयों  का कोई इस्तमाल नहीं था। 

जीरो बजट खेती भी  गाय आधारित खेती है किन्तु जुताई है जो गलत है जुताई  करने से खेत की जैविक खाद बरसात के पानी के कारण बह जाती है उसकी कुदरती यूरिया भी  गैस बन कर उड़ जाती है इसलिए हमारी सलाह है की गौ आधारित खेती में भी जुताई नहीं होना चाहिए और गायों के लिए सुबबूल जैसे चारे के पेड़ होना  जरूरी है। 
  जब हम बिना जुताई करे दलहन फसलों के साथ अनाज की खेती करते हैं उसमे अपने आप कुदरती यूरिया का संचार हो जाता है क्योंकि  दलहन जाती का पौधा या पेड़ अपनी छाया के छेत्र में कुदरती यूरिया देने का काम करता है।  हमने  पाया है की बिना जुताई की खेती में खेत में कुदरती यूरिया की मांग नहीं रहती है और यदि उसमे कृत्रिम यूरिया दिया जाये तो उलटी हो जाती है यानि सब बाहर निकल जाता है। जिस से खेत और अधिक कमजोर हो जाते हैं। 
 
धन्यवाद 
राजू टाइटस 
917973 8049 
 
 

देशी बबूल

देशी बबूल 

देशी बबूल एक द्विदल कांटे वाला पेड़ है ऋषि खेती में इसका विशेष महत्व है। यह जमीन से जितना ऊपर होता है अपनी छाया  के छेत्र में लगातार कुदरती यूरिया सप्लाई करने का काम करता है। यदि इस पेड़ को एक चौथाई एकड़ में १० पेड़ों के हिसाब से स्थान मिल जाये तो खेत को कभी भी गैर कुदरती यूरिया की जरूरत नहीं पड़ेगी। बिना जुताई की कुदरती खेती में यह बहुत महत्व का पेड़ है।  यह अपने आप खेतों में पनपता रहता है किन्तु जुताई करने वाले किसान इसे काटते और मारते रहते हैं। उन्हें छाया  का डर रहता है।  यह पेड़ जब एक बार ऊग  जाता है आसानी से मरता नहीं है इसमें कांटे रहते हैं। इस कारण यह मवेशियों से बचे रहते हैं। 

 

हम इस पेड़ की सीड बाल बनाकर यहां वहां फैलाते जा रहे हैं जो किसान बिना जुताई की कुदरती खेती करना चाहते हैं वे इन पेड़ों से दुश्मनी छोड़ कर इन्हे अपना लें  यह हमारे मवेशियों और हमारे खाने पीने की समस्या को हल कर देंगे। इनके साथ गेंहूं चावल की खेती आसानी से हो जाती है। 

धन्यवाद 

राजू  टाइटस 

917973 8049 

NATURAL FARMING IN BANKHDI HOSHANGABAD

भाई मानसिंह गुर्जर बनखेड़ी होशंगाबाद ने किया कमाल गेंहूं के बाद उपजाया बिना जुताई के कुदरती मूंग और वे अब बरसात की फसल भी बिना जुताई से कर रहे हैं वे पिछले  तीन साल से बदलाव के रास्ते पर हैं। उन्होंने तीन साल पहले रसायनो  का त्याग कर दिया है और इस गर्मी की मुंग के बाद वे  जुताई की खेती में आ गए हैं हम उनके जज़्बे को सलाम करते हैं। उन्होंने रबी में भी बिना रसायन की चने की फसल प्राप्त की है। जो कोई बिना रासयन की फसल खरीदना चाहते हैं उनसे संपर्क कर सकते हैं। उनका मोबाइल न 9752324676 है। 

 
 
 

Monday, June 26, 2017

प्रहलाद सिओल चौधरी राजस्थान के सवाल और जवाब

 

प्रहलाद सिओल  चौधरी राजस्थान के सवाल और जवाब 

 
 
 
Prahlad Seoul Choudhary प श्रीमान जी किन किन फसलों का सीड बॉल बनाया जा सकता है हम बारिश के मौसम में बाजरा सर्दियों के मौसम में उनके गेहूं फिर गर्मियों के मौसम में बाजरा साथ में मूंग मोठ और तिल सबसे अधिक फसल लेते हैं इस विषय विधि में इन फसलों को कब-कब कैसे-कैसे में सिंचाई के रूप में मैं ड्रिप और स्प्रिंकलर पद्धति काम में लेता हूं मैं इस विधि को मेरे खेत में शुरू करना चाहता हूं काफी अध्ययन के बाद में भी शुरू कहां से करूं अभी पूरा समझ नहीं पाया हूं कृपया और मार्गदर्शन करने का कष्ट करावे
Prahlad Seoul Choudhary मैं मेरे खेत एक भाग में अनार का बगीचा और सब्जी की खेती करना चाहता हूं अनार व सब्जी दोनों एक साथ में कैसे हो सकती है मैं पालेकर जी का 5 स्तरीय मॉडल भी अध्ययन कर रहा हूं मुझे इस कुदरती विधि में सब्जी व अनार साथ में कैसे हो उनके लिए पोषण की व्यवस्था कैसे हो इसकी जानकारी भी देने का कष्ट करावे
अनार के पौधे कुदरती रूप से कहां से मिल सकते हैं अनार कटाई और सफाई किस प्रकार से हो या नहीं करनी हो अगर कोई किसान भाई सब्जी व अनार के साथ में कोई खेती कर रहा हो तो उनका फॉर्म भी देखना चाहूंगा
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