Sunday, June 29, 2014

NEW NATURAL FARM NEAR PIPARIYA

नागेन्द्र नर्मदा नेचरल फॉर्म कुर्सी थापा गॉंव पिपरिया होशंगाबाद म. प्र.

ऋषि ऋषि खेती (असिंचित )
रामभरोस क्ले को बारीक़ कर  रहे  हैँ। 
 
बारीक गीली क्ले से बीज़  गोलियॉं बन रही हैं। 
ह नेचरल फार्म चांदनी बहन के  द्वारा  बनाया जा रहा  हैं जो कुलसी थापा नाम क़े  गॉँव में स्थित है जहाँ अभी महानगरीय और शहरी प्रदूषण नहीं पहूँचा है। यह स्थान विश्व विख्यात पचमढ़ी के टाइगर रिज़र्व के  पास है। जो पिपरिया से करीब 16 km की दूरी पर है।
गीली क्ले को गुंथ क़र उसमेँ तुअर ,धान और सुबबूल के बीज ड़ाले जा रहे हैं।  
 उनके परिवार में उनकी दो  बेटियां हैं। जो दिल्ली में पढ़ रही हैं। चांदनी बहन का कहना है कि वे महानगरीय रहन  सहन से ऊब चूँकि हैं इसलिए वे अब शाँती क़े  साथ कुदरत के करीब कुदरती खेती करते अपना जीवन गुजारना चाहतीं हैं।  उनकी इस इच्छा के साथ उनका परिवार भी  साथ है। इसी आशय से उन्होंने यहाँ जमीन  खरीद कर ये फार्म बनाया हैं।
गोलियों को छाया में सुखाया जा रहा हैं। 

खेत में फैन्स बनाने का काम हो रहा है। 
 वे चाहती तो पंजाब या मिनि पँजाब कहलाने  वाले तवा कमांड के छेत्र में जो विकसित छेत्र कहलाते हैं जमींन खरीद सकती थीं किन्तु वे जुताई ,रसायनों और सिंचाई के बिना खेती करना चाहती हैं उनका सोच जमीन क़ा शोषण  ओर ह्मारे पर्यावरण  को प्रदूषित कर  धन कमाना नही है गैर कुदरती खे
ती के कारण बंजर हो गयी जमीन को बचाते हुए आजीविका  का  उदाहरण  प्रस्तुत करना है जिससे पूरा गांव संपन्न हो जाये।

इसमें जुताई ,खाद और दवाई की कोई जरुरत नहीं है 

उत्तम देशी घर १ 
वो यह महसूस करती हैं की  रह्ने क़े लिऐ गॉंव की मकान बनाने की परंपरागत शैली ही सही है।  वे बिना बिजली के रहना पसंद करती हैं। इसलिए अभी अनेक दिनों से यहाँ रह रहीँ हैँ
२ 

३ 

४ 
उन्होंने यह निर्णय जापान के जग प्रसिद्ध कुदरती खेती के किसान स्व मस्नोबू फुकुओका के अनुभवों की किताब "दी वन स्ट्रॉ रिवोलुशन " से लिया है।
उन्होंने टाइटस ऋषि खेती फॉर्म के  आलावा अनेक बिना जुताई बिन रसायन  की खेती के फार्म का  अवलोकन किया है। उनके इस निर्णय के लिए हम उन्हें सलाम करते हैं और उनकी सफ़लता क़ी  कामना करते हैं।
५ 


चांदनी बहन के साथ 




16-10-2014
 रामभरोसजी की पुत्री सीताफल के पेड़ के साथ
रामभरोसजी का घर
रामभरोसजी की माताजी और उनके पुत्र
चांदनी बहन के खेत उसमे पैदा हुई फसल की की कटाई स्थानीय खेतिहरों के द्वारा की जा रही है।

जब हम बिना जुताई करे क्ले में बीजों को बंद कर खेत में छिड़क देते हैं तो उग आते हैं।  इस प्रकार इस खेत में काम किया गया था। जिसमे मूंग ,उड़द,ज्वार ,अरहर आदि के पौधे अच्छे आये हैं।बढ़ते जाता है

इसके साथ असंख्य वनस्पतियां जिन्हे बोया ही नहीं गया था वे पैदा हो गयीं है। जिनसे पूरा खेत हरियाली से भर गया है यह मात्र कुछ महीनो का कमाल है।
इस खेती को करने से शुरू में ही १० से १५ टन जैविक खाद/एकड़  को बहने से रोक दिया गया है।  जिसकी की कीमत का कोई आंकलन नहीं करता है। इसके आलावा जो जैविक खाद इस कचरे से बनेगी उसकी कीमत का  नहीं करता है। इसमें असंख्य जीव जंतु ,कीड़े मकोड़े ,केंचुए आदि उत्पन्न हो गए जो तेजी से जमीन को तंदरुस्त बना रहे हैं। जुताई नहीं करने से जमीन बरसात का पूरा पानी पी लेती है।  जो साल भर कुदरती सिंचाई कर फसलों को बचाने का काम करता है। इस प्रकार हर साल जमीन के भीतर का जल स्तर बढ़ते जाता है।





Tuesday, June 24, 2014

Misunderstanig about chemical fertilizers and compost.

खाद और उर्वरक के बारे में भ्रान्ति 

क्ले बाल  का दर्शन और विज्ञान 


मारे देश में आज भी अनेक आदिवासी अंचलों में किसान बिना किसी खाद और कम्पोस्ट के खेती कर रहे हैं। अनेक ऐसे स्थान हैं जहाँ पर बरसात का पानी इकठा होता है या बह  कर जाता है वहां आसपास जहाँ कपा (Clay ) इकठा हो जाता है वहां बहुत अधिक पैदावार होती है। किसान वहां बिना जुताई करे केवल बीजों को सीधा छिड़क देते हैं यहाँ की  पैदावार आज के आधुनिकतम सबसे उर्वरक इलाकों में होने वाली पैदावार से कई गुना अधिक रहती है। ऐसा कपे  वाली मिट्टी के कारण होता है। इस मिट्टी के एक कण का  यदि हम सूक्ष्मदर्शी यंत्र की सहायता से अध्यन करें तो पाएंगे की इस मिट्टी में कोई भी रासायनिक पदार्थ या कम्पोस्ट नहीं दिखाई देगा यह मिट्टी में अजैविक तत्व भी बिलकुल नहीं रहते है यह मिट्टी स्वम् असंख्य सूक्ष्म जीवाणुओ का समूह रहता है। ये जीवाणु ही जमीन को उर्वरक बनाते हैं। इन्ही जीवाणुओं   के कारण फसलों को पूरा पोषण मिलता है।
क्ले से बनी बीज गोलियां 
रायगडा की आदिवासी महिलाये सीड बाल बना रही हैं। 

आज भी अनेक आदिवासी अंचलों में झूम खेती देखी जा सकती है इस खेती में किसान जंगल में बदल बदल कर स्थानो पर खेती करते हैं वे पहले वहां हरियाली को पनपने देते हैं फिर उसे साफ़ कर वहां फसलें लेते रहते हैं वे भी जुताई ,खाद, सिंचाई  आदि का बिलकुल उपयोग  नहीं करते हैं।

इसी प्रकार प्राचीन देशी खेती किसानी में भी जहाँ खेत बेलों से जोते जाते हैं वहां किसान कमजोर होते खेत को चरोखरों में तब्दील कर देते हैं और चरोखरों को खेत बना लेते हैं वे भी इस प्रकार बदल बदल कर खेती करते हैं। जिस से हजारों साल खेत ताकतवर और पानी दार बने रहते हैं।

जापान के मस्नोबू फुकुओका जी अब तो वे नहीं रहे वे कई दशकों तक गेंहूँ ,चांवल ,सरसों की सबसे अधिक उत्पादकता और गुणवत्ता वाली खेती बिना जुताई और खाद के करते रहे हैं हम अपने होशंगाबाद स्थित  पारिवारिक फार्म में पिछले २७ सालो  से भी अधिक समय से बिना जुताई और खाद के खेती कर रहे हैं।
सूखा क्ले 

इसलिए हम दावे के साथ कह सकते हैं की खेतीके लिए खाद ,उर्वरक और दवाओं की कोई जरुरत नहीं है इनका उपयोग भ्रान्ति है। असल में खाद और मिट्टी में कोई फर्क नहीं रहता है। इसका निर्माण जमीन पर रहने तमाम जीव जंतु ,कीड़े मकोड़े ,सूक्ष्म जीवाणु ,जानवर और वनस्पतियां से होता है।

गीला क्ले  
असल में किसान जमीन की जुताई कर इस कुदरती खाद को बहा देता है फिर खाद के नाम पर न जाने क्या क्या जमीन में डालता रहता है कोई कहता है गोबर की खाद अच्छी होती है कोई कहता है केंचुओं की खाद अच्छी होती है तो कोई रसायनो की सलाह देता है कोई सूख्स्म जीवाणु से खाद बनाता  है तो कोई गुड और जड़ो बूटियों से खाद बनाने की सलाह देता है कोई झाड़ा फूंकी करवाता है तो कोई हवन करवाता है ये सब मनगढ़ंत टोटके हैं। यदि हम अपने खेतों में स्वं बन रही खाद को नहीं बहाएं तो हमे खाद की कोई जरुरत नहीं है।
सीड बाल से पनपता पौधा 

फसलोत्पादन के लिए की जा रही जमीन की जुताई के कारण खेत खाद मांगते हैं जुताई  करने से बरसात का पानी जमीन में नहीं जाता वह तेजी से बहता है जो खेत की खाद (क्ले ) को बहा कर ले जाता ह। इस कारण खेत भूखे और प्यासे हो होते जा रहे हैं। खाद की मांग के कारण सरकारें कंगाल हो रही हैं।  हमे बहते पानी रोकने की बजाय बहती मिट्टी को रोकने पर ध्यान देने की जरुरत है। बहती मिट्टी रुकेगी तो पानी भी आ जायेगा। 



क्ले जिसे हम कपा कहते हैं जो हरियाली से भरे वनो ,चरोखरों आदि से बह  कर नदी के किनारो ,तालाब की तलहटी आदि में प्राय आसानी से मिल जाता  है जिस से मिट्टी के बर्तन बनते हैं में असंख्य मिट्टी को खटोडा बनाने वाले  जीव जंतु ,सूख्स्म जीवाणुओं के बीज रहते हैं। इस मिट्टी से बीजों को सुरक्षित कर खेतों में फेंकने से न केवल खेती हो जाती है वरन क्ले के जामन (rennet ) से हमारे कमजोर खेत भी अपने आप खटोडे हो जाते हैं। इन सीड बॉल को हम करीब एक फ़ीट के अंतर पर फेंकते है यह  अपने एक फ़ीट के दायरे में नत्रजन आदि किसी भी प्रकार की खाद की कमी नहीं होने देती है।

Saturday, June 21, 2014

HOLIDAY FARMING

 जमीन को मरुस्थल बनने से बचाएं
 और अपने शरीर को रोगी बनने से बचाये


"कुछ मत करो "

"Do nothing "


जितना हो सके जमीन पर बीज बिखरायें बीजों की सुरक्षा के लिए क्ले सीड बॉल्स (कपे  वाली मिट्टी की बीज गोलियां बनाकर बिखरायें और कुछ नहीं करें यानी जुताई ,खाद ,दवाई ,निंदाई आदि की कोई जरुरत नहीं है।
ये  तमाम काम जमीन को मरुस्थल बना रहे हैं और इनकी फसलें हमारे शरीर को रोगी बना रहे है।

कपे वाली मिट्टी (Clay) तालाब या नदी नालों के किनारों पर मिलती है इसकी बनी  सीड बॉल्स बहुत मजबूत होती है जो चूहों/चिड़ियों आदि से बची रहती हैं।  अनुकूल वातावरण मिलने पर उग आती हैं। ये मिट्टी असंख्य जमीन को ताकतवर बनाने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं ,केंचुओं के अण्डों आदि से परिपूर्ण  रहती है जो जमीन को ताकतवर और उर्वरक बनाती है। 

 गोलियों को रोज नियमित बनाते रहने से अच्छी मानसिक और शारीरिक कसरत हो जाती है इन्हे छाया में सुखा  कर रखने से ये अनेक महीनो तक सुरक्षित रहती हैं। बच्चों को क्ले  से बीज गोलियां बनाना बहुत अच्छा लगता है वे इन्हे बनाकर पूरी उत्तम टिकाऊ खेती करना सीख जाते हैं।


बच्चों को स्कूलों में बीज गोलियां बनाना सीखना चाहिए जिस से वे अपना खाना स्वं पैदा करना सीख जाते हैं।
सबको अपना खाना स्वं उगाना चाहिए चूंकि हम अपना खाना स्वम् नहीं पैदा करते हैं इस लिए खेत और किसान मर रहे हैं।
बीज गोलियों को बनाने के लिए हमे प्रतिदिन अपनी रसोई से बीज इकट्ठे करते रहना चाहिए  परिवार के सभी सदस्यों को रोज काम से कम थोड़ा समय एक साथ मिलकर बीज गोलियां बनाना  चाहिए और छुट्टी के दिन खेत में जाकर इन्हे छिड़क देना चाहिए। यह हॉलिडे फार्मिंग हैं।
 गोलियों को आराम से टीवी देखते देखते और बांते करते करते बना कर सकते हैं।
आजकल खेती आयातित तेल और जहरीले रसायनो की गुलाम हो गयी है इस लिए हमारा देश कंगाली और भुखमरी की ओर  तेजी से  बढ़ रहा है।
फसलोत्पादन के लिए हो रही जमीन की जुताई से रेगिस्तान पनप रहे हैं भूमिगत जल का स्तर घट रहा है। जुताई की खेती में किसान पेड़ों और झाड़ियों को नस्ट कर देते हैं वो सोचते हैं की इनसे हमारी फसलों का खाना और पानी चोरी हो जायेगा यह भ्रान्ती है जबकि ये हरियाली जमीन में पानी और खाना बनती हैं। इन्हे मारने से इनके साथ रहने वाले तमाम सहायक जीव जंतु ,कीड़े मकोड़े ,केंचुए आदि भी मर जाते है। यह बहुत बड़ी हिंसा है। हम जिस डाल पर बैठे हैं उसे ही काट रहे हैं।
जुताई करने से बरसात का पानी कीचड के कारण जमीन में नहीं समाता है वह तेजी से बहता है अपने साथ जैविक खाद को भी बहा कर ले जाता है। क्ले से बानी बीज गोलियां बिखराने  से ये बरसात आने पर  उग जाती हैं तथा नींदों खरपतवार की तरह बढ़ कर हमे फसल दे देती है। जब खेत में अनेक पौधे एक साथ पनपते हैं तो कोई रोग नहीं लगता है खेत की जैविक खाद के नहीं बहने से खेत ताकतवर हो जाते है इनमे ताकतवर  फसलें पनपती है किसी भी प्रकार  के जहर की जरुरत नहीं रहती है।

बीज गोली से की जाने वाली खेती का आविष्कार जापान के विश्व विख्यात कृषि वैज्ञानिक स्व मस्नोबू फुकूओकाजी ने किया है यह कुदरती खेती है जिसे हम ऋषि खेती कहते हैं ऋषि खेती नाम गांधी खेती के लिए विनोबाजी ने दिया था। यह खेती हमारे पर्यावरण संरक्षण और हर हाथ को काम के लिए महत्वपूर्ण है।
आज कल हम लोग अपनी रोटी के खातिर हमारे पर्यावरण और किसानो का बहुत शोषण कर रहे है इसलिए किसान खेती छोड़ने लगे हैं वो आत्म ह्त्या भी करने लगे हैं इसलिए हमे अब अपनी रोटी स्वं पैदा करना जरूरी हो गया है जिस से ये पाप जो हम पर लग रहा है उस से हमे मुक्ति मिले। बीज गोली बनाकर खेती करना एक यज्ञ है जिसमे हर इंसान से आहुति की उम्मीद है।


हॉलिडे फार्मिंग कर हम अपने पूरे  परिवार का कुदरती खाना पैदा कर सकते हैं और समाज में सम्मान भी प्राप्त कर सकते है। कुदरती खाने से शरीर स्वस्थ रहता है कैंसर जैसी बीमारी भी ठीक हो जाती है। आज कल लोग बेतहाशा पैसे के पीछे भाग रहे हैं पैसे से कुदरती खान ,पान और प्राण वायु नहीं खरीदी जा सकती है न हम सम्मान खरीद सकते है। ऋषि खेती करने से हम ये सब प्राप्त करते हुए समाज में एक ईमानदार इंसान की छवि के साथ जीवन व्यतीत करते हैं। यह खेती ईमानदार इंसान भी बनाने का जरिया है।  दुनिया में लूट मार का कारण शोषण है।

असली शांति की कुंजी धरती के पास है। 

Tuesday, June 17, 2014

माननीय उमा भारती जी जलसंसाधन मंत्री को पत्र

माननीय उमा भारती जी जलसंसाधन मंत्री को पत्र

विषय :- हिमालय के घाव भरने और गंगा मैया के उद्गम को संरक्षित करने की योजना !

आदरणीय उमाजी ,
नमस्कार
हम पिछले २७ सालो  से ऋषि खेती का अभ्यास कर रहे है यह खेती जुताई ,खाद, दवाइयों और निंदाई के बगैर की जाती है।  इसको करने के लिए हम कपे  वाली चिकनी मिट्टी (CLAY) की बीज गोली बनाते है और उन्हें यहाँ वहां फेंकते जाते हैं।

हमारा मानना है की आज हिमालय पर्वत इतना घायल हो गया है की जब तक हम इसकी तुरंत मरहम पट्टी नहीं करेंगे वह अब बच नहीं सकता है इसके लिए हमारी सलाह है की हिमालय की उन तमाम वनस्पतियों के बीजों को इकठा किया जाये जो हिमालय को बचाने  में सहयोग कर रहे हैं।  इन बीजों की कपे वाली मिट्टी  की गोलियां बनाई जाएँ और उन्हें हेलीकॉप्टर की मदद से उन घावों पर बिखराया जाये जहाँ से भू स्खलन हो गया है।

गोलियों को ग्रामीण जनो से मनरेगा योजना के तहत पूरे भारत में बनवाने का काम किया जा सकता है इस से हमे इतनी बीजगोलियां मिल जाएँगी की हम एक साल में हिमालय के घावों को भरने में कामयाब हो जायेंगे।  गोलियां जहाँ भी गिरती हैं वहां अंकुरित होकर जड़ जमा लेती हैं वह मिट्टी को बहने नहीं देती है। इस योजना में लागत  नहीं के बराबर है।
अधिक जानकारी के लिए -http://rishikheti.blogspot.in/

इस से एक तीर से कई शिकार की सम्भावना है।
१- हिमालय की सुरक्षा
२- गंगा मैया की सुरक्षा
३ - गरीब ग्रामीणो का संरक्षण
४ - जुताई और रसायनो से पनपते रेगिस्तानों का संरक्षण

धन्यवाद
राजू टाइटस
ऋषि खेती किसान
होशंगाबाद मप. 

पर्यावरण मंत्री माननीय जावडेकरजी को पत्र

पर्यावरण मंत्री माननीय जावडेकरजी को पत्र

विषय : हमारा पर्यावरण

आदरणीय महोदय ,
नमस्कार

विनर्म निवेदन है की हमारा पर्यावरण मौजूदा गहरी जुताई और रसायनो के कारण दूषित हो रहा है तथा हरा भरा भूभाग यानि कुदरती वन ,बागबगीचे और चारागाह आदि अनाज के खेतों में और खेत मरुस्थल में तब्दील हो रहे हैं। इस से एक और हमारी खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़  गयी है वहीँ किसान खेती छोड़ने लगे हैं वो आत्महत्या भी करने लगे हैं। सबसे बड़ी समस्या हमारी रोटी की हो गयी है वह जहरीली होने लगी है इस कारण हमारे खून में  जहर घुलने लगा है और कैंसर की बीमारी आम हो गयी है।

हम पिछले २७ सालो से भी अधिक समय से बिना जुताई की कुदरती खेती ऋषि खेती का अभ्यास कर रहे हैं तथा इसके प्रचार और प्रसार पर निजी स्तर पर सलग्न है। यह खेती पर्यामित्र खेती है इसको करने से हमारे खेत जो "हरित क्रांति " के कारण मरुस्थल में तब्दील हो गए थे अब हरियाली से ढँक गए हैं हमारे उथले देशी कुए जो सूख गए थे अब भरी गर्मी में भी लबालब रहने लगे हैं।  हमे कुदरती आहार और चारे की कोई कमी नहीं है जलाऊ लकड़ी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है जिसे हम गरीब परिवारों को बहुत कम कीमत में उपलब्ध करा रहे हैं।
क्ले की बीज गोलियां बनाये  और बिखराये 

हमारा आग्रह है की गहरी जुताई और जहरीले रसायनो पर प्रतिबन्ध लगाया जाये इन्हे जो सरकारी अनुदान दिया जाता है उसे बंद कर इन पर "पर्यावरणीय टैक्स " लगाया जाये और ऋषि खेती करने वाले किसानो ,टिकाऊ बाग़ बगीचे वाले किसान और टिकाऊ चारागाह आदि के किसानो को प्रोत्साहित करने के लिए अनुदान दिया जाये।

धन्यवाद
राजू टाइटस
ऋषि खेती किसान
होशंगाबाद। मप। rajuktitus@gmail.com

Friday, June 13, 2014

प्रधान मंत्रीजी को पत्र

प्रधान मंत्रीजी को पत्र


प्रति ,
माननीय प्रधान मंत्रीजी

द्वारा ;- राजू टाइटस ऋषि खेती किसान ,होशंगाबाद ,म. प्र.


विषय :- ऋषि खेती (बिना जुताई की कुदरती खेती ) सही जैविक खेती का परिचय।

आदरणीय महोदय ,
नमस्कार
हम आपको अभूतपूर्व  जीत के लिए दिल से बधाई देते हैं उम्मेीद करते हैं की अब ऋषि खेती के दिन आ  गए हैं।
हम पिछले २७ सालो से अपने पारिवारिक फार्म में ऋषि खेती का अभ्यास कर रहे हैं और निजी स्तर पर इसके प्रचार प्रसार में संलग्न है। बिना जुताई की कुदरती खेती का आविष्कार जापान के जग प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक श्री मस्नोबू फुकूओकाजी ने किया था। इसे हम ऋषि खेती के नाम से प्रचारित कर कर रहे हैं ऋषि खेती शब्द आचार्य विनोबाजी के द्वारा गांधी खेती के लिए दिया गया है।

यह एक पर्यावरणीय खेती है जिसमे जुताई ,उर्वरक ,खाद  दवाइयों की जरुरत नहीं है सिंचाई और मशीने भी इस खेती में जरूरी नहीं हैं। इस  खेती के निम्न लाभ हैं।

१-भूमि ,जल और जैव विविधताओं का छरण नहीं होता है। इसलिए जमीन ताकतवर और पानीदार हो जाती है।
२-इस खेती में खरपतवार समस्या नहीं रहती हैं वरन उनकी सहायता से खेती का काम संपन्न होता है। इसलिए खरपत नाशकों की कोई जरुरत नहीं रहती है।
३- यह खेती जमीन में रहने वाली तमाम जैवविविधताओं की सहायता से संपन्न होती है इस लिए जमीन बहुत जल्दी ताकतवर हो जाती है ताकतवर जमीन में ताकतवर फसले  पनपती हैं इसलिए बीमारियों का प्रकोप नहीं रहता है कीट नाशकों की कोई जरुरत नहीं रहती है।
४- एक और जहाँ मौजूदा हरित क्रांति हरयाली नस्ट कर रही है ये खेती हरियाली के साथ संपन्न होती है।
५-सूखे से लड़ने में सर्वोपरि है।
६- यह वर्षा के जल को संवर्धित करती है।
७-यह छोटे बड़े सभी खेतों में एक सी विधि से संपन्न की जाती है।
८-  इस से मिलने वाला आहार कुदरती होने के कारण गुणवान रहता है जो कैंसर को भी ठीक कर देता है।
९ - यह खेती सीधे बीजों को फेंक कर या  मिटटी की बीज गोली बनाकर की जाती है।
१० -इस खेती के कारण बरसात का पानी सीधे जमीन द्वारा  सोख लिया  जाता है जिस से भूमिगत जल का स्तर बढ़ता जाता है. यह खेती सही जल प्रबंधन का उपाय है।
११ - इस खेती को करने से खेती लागत  में ६०% से ८० % की बचत होती है।
१२ - असिंचित इलाकों के लिए यह  वरदान है वहां सिंचाई की जरुरत ही नहीं पड़ती है।
१३- इस खेती से हर  हाथ को काम मिल सकता है बेरोजगारी का जड़ से उन्मूलन  संभव है।
१४ - यह खेती की सबसे अधिक उत्पादकता और गुणवत्ता वाली तकनीक है।

धन्यवाद
राजू टाइटस


Tuesday, June 10, 2014

खेती का सरलतम उपाय


खेती का सरलतम उपाय 

मिटटी की बीज गोलियां बनाकर बुआई करें। 


video
खेती हमारे जीवन से जुड़ा काम है किन्तु हमने इसे किसानो के हवाले कर दिया है।  किसान खेती करेंगे और हम आराम से बैठ कर खाएंगे। ये शोषण है।  इसके कारण खेत और किसान दोनों अब मरने लगे हैं।  कृषि वैज्ञानिकों और हमारी सरकार के पास इस समस्या से निपटने का कोई उपाय नहीं बचा है। आधुनिकरण ने खेती को और अधिक जटिल ,खर्चीला और मेहनती बना दिया है। अनेक गैर कुदरती  अनावशयक काम खेती में किये जाने लगे हैं जैसे जंगलों को साफ़ करना ,जमीन को समतल बनाना ,खूब जुताई करना ,रासायनिक और जैविक खादों को बनाना और डालना ,कीटनाशकों और खरपतवार नाशकों का उपयोग करना, संकर बीज बनाना ,जीन में छेड़  छाड़ कर बीजों बनाना। 
मस्नोबू फुकूओकाजी भी एक जग प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक थे उन्होंने अपनी खोज के दौरान ये पाया की खेती में बहुत बड़ी हिंसा हो रही है इस कारण हम कितनी भी मेहनत करें कितना भी खाद दवाई का इस्तमाल करे हम जंगलों में अपने आप पैदा होने वाले खाद्य के मुकाबले फसलें नहीं ले पा  रहे है जो भी फसलें हमको मिलरही है वे कमजोर और प्रदूषित रहती हैं जिनको  खाने से हम बीमार हो रहे हैं। इस  खोजने के बाद उन्होंने अहिंसा पर आधारित खेती को खोज डाला उसका नाम उन्होंने रखा नेचरल फार्मिंग जिसे हम ऋषि खेती कहते हैं।
बीज गोलियों से धान की फसल 
 
उन्होंने ऋषि खेती को खोजने  में "अकर्म ध्यात्मिक दर्शन और वैज्ञानिक सत्यता  का उपयोग किया।  धीरे धीरे  उन सभी गैर कुदरती कार्यों को छोड़ते हुए खेती करना शुरू किया जिनसे कुदरत की हिंसा होती है।  उन्होंने सबसे पहले जुताई को छोड़ा ,फिर रसायनो  का त्याग किया। फिर कम्पोस्ट बनाना बंद किया ,खरपतवारों  कीड़ों को मारना बंद कर दिया।  इस प्रकार उन्होंने खेती में कुछ करने की वजाय  नहीं करने पर  ध्यान दिया।  वे सीधे बीजों को बिखरकर खेती करने लगे जिस प्रकार जंगलों में अपने आप बीज पेड़ से गिरते हैं उग आते हैं और पेड़ बन जाते हैं। वहां अनेक प्रकार अन्य वनस्पतियां भी होती हैं किन्तु वे कुछ नुक्सान नहीं करती वरन फायदा पहुंचती  है।  

बीज गोलियों बनाया गया सब्जियों का जंगल 
उन्होंने इस खेती से वर्षों दीर्घकालीन हर प्रकार की  फसलों को पैदा करके यह पाया की खेती सही मायने में बहुत आसान काम है जिसे सब कर सकते हैं।  हर हाथ को काम मिले ,हमारा पर्यावरण सुरक्षित रहे ,हमे कुदरती खाना, पानी मिले ये उनका ध्येय था। उन्होंने इस विषय पर अनेक किताब लिखी ,अनेक लेख मेग्ज़ीनो में दिए ,बहुत लोगों को ट्रेनिंग दी किन्तु उन्होंने यह पाया की "कुछ नहीं " करने की विधि को समझना बहुत कठिन है इसलिए उन्होंने इसे सरल बनाने के लिए खेती को खेल में परिवर्तित कर दिया और कहा की जिसने जो कुछ भी पढ़ा है उसे" भूल जाओ " और" कुछ" मत करो "   केवल  वो बीज इकठा करो जिन्हे हम रोजमर्रा के जीवन में खाने के लिए उपयोग में लाते  है।  उनकी बीज गोलियां बनाओ और उन्हें समय पर उपयुक्त स्थानो पर यहाँ वहां छिड़कते जाओ। 
गेंहूँ की सीधी बुआई 

वो भारत में पहली बार सं १९८८ में आये  थे जब वे हमारे फार्म पर भी पधारे थे  हम ऋषि खेती  के मात्र तीसरे साल में थे खेती तो कर रहे  थे किन्तु अनेक सवाल थे जिनका  हल नहीं  था  दूसरी बार हमारी मुलाकात वर्धा के गांधी आश्रम में हुई उस समय वे केवल बीज गोलियों बनाना सिखा रहे थे. यह विडिओ भी उसी समय का है।  देखें और कुछ प्रश्न बनते हैं तो 9179738049 पर संपर्क करें। 

वो कह रहे थे की अमेरिका और जापान आधुनिक विज्ञान के कारण अब बर्बादी के कगार पर खड़ा है।  भारत और चीन भी  अगर उनकी नक़ल करेगा तो वह भी मिट जायेगा ।  किन्तु भारत की संस्कृती और गांधीजी के चरखे ने जैसे  देश बचाने  में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है वैसे ही ये मिटटी की बीज गोलियां है इन्हे बनाकर और इनसे खेती करते हुए न केवल हम अपने देश को बचा सकते हैं किन्तु इसमें विश्व को भी बचाने की ताकत छुपी  है। 
राजू टाइटस 
ऋषि खेती किसान 
होशंगाबाद। मप। 

Monday, June 9, 2014

ऋषि खेती और क्लायीमेट चेंज

ऋषि खेती और क्लायीमेट  चेंज 


माननीय जावडेकरजी पर्यावरण मंत्रीजी को पत्र 


आदरणीय महोदय ,
नमस्कार

हम पिछले २७ सालो से अपने पारिवारिक फार्म पर जापान के जाने माने  कृषि वैज्ञानिक स्व. मस्नोबू फुकूओकाजी के द्वारा अविष्कारिक कुदरती खेती (ऋषि खेती ) का अभ्यास कर रहे हैं और इसके प्रचार प्रसार में लगे हैं। यह खेती बिना जुताई और रसायनो से की जाती है। इसमें सिंचाई और मशीने  भी जरूरी नहीं है।  इसको करने से आधुनिक खेती की तुलना में ८०% खर्च कम हो जाता है, फसलों की गुणवत्ता और उत्पादकता सबसे अधिक रहती है। यह खेती जमीन पर रहने वाले तमाम जीव जंतु ,कीड़े मकोड़े , पेड़ पौधों ,सूक्ष्म जीवाणुओं की सुरक्षा कर की जाती है।

इस खेती को करने से पूर्व हम आधुनिक खेती का अभ्यास करते थे जिस से हमारे खेत मरुस्थल में तब्दील हो गए थे और हम आत्महत्या करने की स्थिती में पहुँच गए थे किन्तु फुकूओकाजी के अनुभवों की किताब "दी वन स्ट्रा रिवोलुशन " ने हमारी ऑंखें खोल दी और हमने तुरंत कुदरती खेती को अपना लिया जिस से हमारे खेत हरे भरे ,पानीदार और ताकतवर बन गए हैं।
ऋषि खेती के जनक स्व. फुकूओकाजी  और उनकी किताब 

महोदय खेती करने के लिए की जा रही जमीन की जुताई  हजारो सालो से एक पवित्र काम के रूप
जानी जाती है।  किन्तु यह हमारे पर्यावरण के लिए सबसे अधिक हानिकर उपाय सिद्ध हुई है। इस से एक और जहाँ हमारे वन ,स्थाई चरोखर और बाग़ बगीचे खत्म होते जा रहे हैं वहीँ क्लीमेंट चेंज ,ग्लोबल वार्मिंग ,और ग्रीन हॉउस गैस के उत्सर्जन की समस्या गहराती जा रही है।

जबकि ऋषि खेती करने से मरुस्थल हरियाली में तब्दील हो जाते हैं जिस से बरसात का पानी जमीन में समां जाता है और बरसात नियंत्रित हो जाती है। अधिकतर लोग सोचते हैं की बरसात आसमान से या धरती के नीचे से आती है यह गलत धरना है बरसात केवल और केवल हरियाली की देन है यदि हरियाली है तो बरसात है अन्यथा बरसात नहीं है जैसा हम अनेक स्थानो पर देख रहे अनेक सालो से वहां पानी गिरा ही नही है।

ऋषि खेती मरुस्थलों को हरियाली में तब्दील करने की योजना है।

हमारा आप से निवेदन है जब तक खेती में जमीन की जुताई बड़े पैमाने पर होती रहेगी हमारे वन ,स्थाई चरोखर और बाग़ बगीचे रोटी के खातिर मरुस्थल में तब्दील होते रहेंगे। इसलिए यदि सरकार बिना जुताई की खेती को बढ़ावा देती है तो ही हमारे पर्यावरण की सुरक्षा संभव है।

हमे आप से बहुत उम्मीद है इसलिए आपको यह पत्र लिख रहे हैं।
धन्यवाद                                             rajuktitus@gmail.com
राजू टाइटस
ऋषि खेती किसान
होशंगाबाद। म. प्र.
४६१००१  

Wednesday, June 4, 2014

महानगरीय व्यवस्था और ऋषि खेती

महानगरीय व्यवस्था और ऋषि खेती


विगत दिनों मुझे एक जाने माने N.G.O. ने बेंगलुरु में जो एक महानगर है में ऋषि खेती पर व्याख्यान हेतु आमंत्रित किया था।  वहां मैने उन्हें बताया की हम पिछले अनेक वर्षों से अपने फार्म में बने फार्म हॉउस में रहते हैं और कुदरती खेती करते हुए अनाज,सब्जी,दूध ,अंडे पानी ,हवा ,ईंधन आदि को बिना कुछ किए आसानी से प्राप्त कर लेते हैं। हमने अपने फार्म में एक सुबबूल का जंगल भी लगाया है जिस से हमे साल भर पशुओ के लिए चारा और जलाऊ लकड़ी भारी  तादात में मिल जाती है जिसे हम गरीब परिवारों को बाजार भाव से आधी  कीमत में बेच देते हैं। अधिकतर ये वो परिवार हैं  जो रोजगार  के लिए गांवों से पलायन कर यहाँ आकर बसें हैं। ये आसपास खाली पड़ी जमीनो पर झुग्गियां बनाकर रहते हैं इन्हे खाने के लिए तो सब कुछ मिल जाता है किन्तु पकाने के लिए ईंधन नहीं मिलता है। इन्हे ईंधन इकठा करने के लिए सप्ताह में कम  से कम दो दिन की छुट्टी लेनी पड़ती है फिर भी उनका ईंधन पूरा नहीं हो पाता है।

नगर छोटे हों या बड़े या महानगर सभी जगह आजकल पेट्रोलियम और बिजली आधारित जीवन पद्धति चल रही है। वहां सबसे बड़ी समस्या कुदरती रोटी ,जल ,हवा और ईंधन की है। पैसा होते हुए भी आम आदमी को ये चीजें उपलब्ध नहीं है।  बेंगलुरु में लोगों ने मुझ से पुछा की आप तो किस्मत वाले हैं खेत में रहते हैं हमारे पास तो खेत  नहीं है हम तो चौथी मंजिल पर रहते हैं हम क्या करें ?  मेने कहा गांव में एक चौथाई एकड़ जमीन में रहकर हम अपने जीवन लायक सब कुछ प्राप्त कर सकते है। जिस मकान में आप रहते हैं उस से तो कई एकड़ जमीन आप ले सकते हैं। फिर उन्होंने कहा  है हम  अपने बच्चों को कहाँ पढ़ाएंगे गांव में तो अच्छे स्कूल हैं ही नहीं मेने कहा की जब हम जमीन और कुदरत की संगति  में रहने लगते हैं तो हमारा पर्यावरण ही स्वं: स्कूल बन जाता है महानगरों में बहुत बड़े बड़े स्कूल है क्या वे हमे कुदरत के साथ आत्मनिर्भरता के साथ रहना सिखा रहे हैं यदि ऐसा  होता तो यहाँ आत्म निर्भरता होती जो कहीं भी दिखाई नहीं दे रही है।

दूसरा सवाल उन्होंने बताया की महानगरों में बड़े बड़े अस्पताल हैं गांव में यदि बीमार पड़  जायेंगे तो इलाज कैसे होगा ? मैने  कहा कुदरती आवो हवा और भोजन स्वम् एक अस्पताल है जिसमे महानगरीय  बड़े से बड़ा रोगी भी बिना पैसे के ठीक हो जाता है जबकि महानगर के अस्पताल अब मौत के सौदागर हो गए हैं उनकी फीस को देख कर ही लोग बीमार हो जाते है। इन अस्पतालों में महंगी दवाये और मशीनरी तो रहती है किन्तु कुदरती आवो हवा और भोजन नहीं मिलता है जो हम लोगों के लिए निहायत जरूरी है।

असल में ऋषि खेती कुदरत के  मिलकर जीने की ऐसी पद्धति है जिसमे कुदरती आवो हवा और भोजन के साथ साथ हमे सच्चाई और ईमानदारी के साथ जीने का अवसर भी प्राप्त होता है हम एक अच्छे इंसान की जिंदगी जी सकते हैं किन्तु महानगरों में जितना भी पैसा खर्च करो वहां  कुदरती आवो हवा और भोजन नसीब नहीं है।सच्चाई और ईमानदारी का वहां भारी अभाव है झूठ और फरेब के बिना लोगों का काम ही नहीं चलता है।

उसी समय एक सज्जन ने कहा की महानगरों में अब कुदरती /जैविक भोजन मिलने लगा है किन्तु वह महंगा है।  मैने  कहा की कुदरती या जैविक खाना पैदा करने में  लागत नहीं के बराबर आती है वह महंगा क्यों है ?
यदि महंगा है तो जानिए असली नहीं है ये एक बहुत बड़ा गोरख धंधा है।

यही कारण है की आजकल अनेक लोग महनगरों को छोड़कर गांवों में जमीन के साथ मिलकर रहने लगे हैं।
एक चौथाई एकड़ में आराम से ५-६ सदस्यों के परिवार का भरण पोषण आसानी  से हो जाता है एक सदस्य को एक घंटे से अधिक काम करने की जरुरत नही है। इस खेती में कुछ करना नहीं पड़ता है मात्र मिट्टी की बीज गोलियों को बनाकर यहाँ वहां फेकने मात्र से खेती हो जाती है।

यदि हम आराम से और शांति से जीवन व्यतीत करने चाहते है तो हमे  महानगरों को छोड़कर गांवों की तरफ लोटना ही होगा। 

Sunday, June 1, 2014

ग्लोबल वार्मिंग और सूखती नदियां




ग्लोबल वार्मिंग और सूखती नदियां 

रती पर बढ़ रही गर्मी और सूख रही नदियों का  मूल कारण जुताई आधारित खेती है।

जुताई के कारण हरियाली नस्ट हो रही है। 
हरियाली एक और जहाँ हमे प्राण वायु देती है वहीँ यह दूषित वायु को सोखने का भी काम करती है।  दूषित वायु अनेक प्रकार की गैसों का समूह है जिसे सामन्य भाषा में ग्रीन हॉउस गैस कहा जाता है। इसे हम सी ओ टू  सकते हैं।  यह सी ओ टू  हरियाली के माध्यम से कार्बन में तब्दील हो जाती है जिसे हम जैविक खाद कहते हैं।
जैविक खाद हरियाली का भोजन है

आज कल जो खेती चल रही है उसमे जुताई को एक पवित्र और  जरुरी प्रक्रिया माना  जाता है जिस के कारण जमीन में जमा जैविक खाद (कार्बन ) सी ओ टू में तब्दील हो जाता है जो ग्रीन हॉउस गैस के रूप में आसमान पर छा कर  एक कम्बल जैसा आवरण बना लेता है। जिस  से सूर्य की गर्मी धरती पर प्रवेश तो कर लेती है किन्तु वह वापस नही जा पाती है जिस से धरती पर की गर्मी बढ़ती जाती है।  दूसरा जुताई  का सबसे बड़ा दोष यह है की यह हरयाली को नस्ट करने का काम करती है जिस के कारण धरती से उत्सर्जित सी ओ टू का अवशोषण नहीं हो पाता है वह ग्रीन हॉउस गैस के साथ मिलकर धरती को गर्म करने का काम करती है।

यह गर्मी एक और जहाँ हमारे ग्लेशियर को पिघलाने  का काम कर रही  है वहीँ इस से समुन्द्र का जल स्तर निरंतर बढ़ते जा रहा है जिस से समुन्द्र के किनारे बसे शहरों के डूबने का खतरा बढ़ गया है।  ये कोई नयी बात नहीं है बरसों से वैज्ञानिक इस समस्या से निपटने के अनेक उपाय ढूंढ रहे हैं।  विगत दिनों जब वैज्ञानिक किसी भी सार्थक उपाय से संतुस्ट नहीं हुए तो वे जापान के ऋषि खेती के जनक माननीय मस्नोबू फुकूओका जी से मिलने उनके ऋषि  फार्म पर पहुंचे और उनसे कहा की बताएं की  हम क्या  करें ?
बहुत अचंभित हो गए की इतने बड़े२  वैज्ञानिक मेरे जैसे बूढ़े किसान के  पास आकर पूछ रहे हैं की बताएं हम की क्या करें ?
बिना -जुताई की कुदरती खेती की किताब 

इस से यह पता चलता है की अब वैज्ञानिक सोच का समय चला गया है उनके पास धरती पर बढ़ती गर्मी को रोकने का कोई उपाय नहीं बचा है। जितने भी हरियाली को बचाने के लिए जंगल लगाये जा रहे हैं वे आम आदमी की भूख मिटाने  के लिए खेतों में तब्दील हो रहे है जो जुताई के कारण मरुस्थल में तब्दील होते जा रहे हैं। इस कारण रोटी और हरियाली में जंग छिड़ गयी है।

फुकूओकाजी का कहना है की हमे ऐसी खेती  अपनाना होगा जिस से धरती पर एक स्थाई हरियाली का कवर बन जाये।  ऋषि खेती (बिना जुताई की कुदरती खेती ) एक ऐसी खेती है जो हरयाली के समन्वय से  की जाती है। जबकि मौजूदा अजैविक और जैविक खेती हरियाली  को नस्ट कर के की  जाती है।

फकूओकाजी का कहना है की धरती पर की हरियाली को नस्ट करने में जुताई आधारित खेती का बहुत बड़ा योगदान है जितने मरुस्थल आज हम देख रहे हैं सब खेती करने की गलत तकनीक के कारण पनपे हैं।
जब पिछली बार मेरी उनसे मुलकात सेवाग्राम वर्धा में हुई तो उन्होंने बताया की वे विगत दिनों तंजानिया  के ऐसे गांव में गए थे जहाँ पांच साल पहले हरियाली का नामो निशान नहीं था बरसात होना बंद हो गयी थी ,पशुओं का चारा और फसलें कुछ भी नहीं हो रहा था फुकूओकाजी ने वहां मिट्टी की बीज गोलिओं को बिखराने  की सलाह दी थी जिसे उन्होंने बखूबी अपना लिए था।  बच्चा बच्चा मिट्टी की बीज गोलिओं को बना कर बिखराने  का काम कर रहा था।  बच्चे गुलेल  की सहायता से दूर दूर तक बीज गोलिओं को फेंकने  का काम कर रहे थे।  उसके परिणाम स्वरूप वहां फिर से हरियाली पनप गयी ,बरसात होने लगी और पशुओं का चारा  और खाने की तमाम फसलें मिलने लगीं हैं।
खुशहाली का मंत्र है ऋषि खेती 

फुकूओकाजी का कहना है की हम अपनी खुद की बुद्धि  के कारण गुमराह हो रहे हैं कोई कहता है की" ऐसा नहीं वैसा करो" मै कहता हूँ"कुछ मत करो " कुदरत को अपना काम करने दो सब शुभ होगा। ऋषि खेती "कुछ नहीं करो" के सिद्धांत पर आधारित है इस में गैर कुदरती कार्यों को धीरे २ छोड़ते जाने से उत्तम खेती हो जाती है जिसमे हरियाली ,तमाम जीव जंतु कीड़े मकोड़े ,जानवर और हम लोग सब मिलजुलकर रहते हैं।

ऋषि खेती  सबसे उत्तम ग्लोबल वार्मिंग  को थामने और नदियों को पुनर्जीवित करने  का उपाय है।