Saturday, September 29, 2012

फलों की कुदरती खेती PROTECT FRUIT TREES IN DROUGHT

फलों की कुदरती खेती
भी कुछ सालों पहले तक महारास्ट्र में संतरों की खेती बहुत अच्छी होती थी किन्तु फल बागों में, खेती के वैज्ञानिकों की सलाह से किये जाने वाले गेर कुदरती कार्यों के कारण अब फल बाग़ बुरी तरह सूख रहे हैं. इस का मूल कारण फलों के बीच में जुताई कर की जाने वाली खेती है. ये समस्या पूरी दुनिया में की जा रही फलो की खेती के साथ है
     फुकुओका जी सब से  पहले किसान थे जो अपने फलों के बागानों में जुताई नहीं करते थे और बीच में होने वाली तमाम खरपतवारों को भी वे सहेजते थे यानि उनकी रक्षा करते थे. उनका मतलब ये है की हर पेड़ के अपने साथी होते हैं जो जो एक दूसरे के पूरक होते हैं. वे जब १९८८ में हमरे फार्म पर पधारे थे बता रहे थे की पेडों की छाया की गोलाई में जितनी भी हरयाली होती है उस में फल के पेडों के अनेक साथी निवास करते हैं. इस के अलावा फलों के पेडों पर लगने वाली बीमारी के कीड़ों के दुश्मन भी रहते हैं. इस कारण फलों के पेड़ एक और जहाँ बीमारी से सुरक्षित रहते हैं वहीँ वे हर साल बढ़ते क्रम में फल देते हैं .उनके फलों का रंग ,स्वाद,और जायका भी हर साल बढ़ता जाता है.
   दूसरी महत्वपूर्ण बात जो उन्होंने बताई है फलों के पेडों के आस पास गडडे बनाके जड़ों को कतरकर और उसमे अनेक प्रकार की खाद, दवा और गोबर / गो मूत्र आदि को डालने से तथा शाखाओं की छटाई करने से पेड कमजोर हो जाते है वे हर साल फलते नहीं है उत्पादन गिरजाता है वे बीमार होकर सूख जाते हैं.
   जब से महारास्ट्र में फुकुओका जी की इस विधि की जानकारी मिली है अनेक किसानो ने अपने बगीचे सूखने से बचा लिए हैं. अब वे हर साल बढ़ते क्रम में फलों का उत्पादन ले रहे हैं. फलों के स्वाद और खुशबू के कारण उनका मुनाफा बहुत बढ़ गया है.


PROTECT FRUIT TREES IN DROUGHT
     Fruit growers are in  crisis due drought. Their orchards are dying. Many orange orchards in Maharashtra  are dying. This is happening due to unnatural way of farming.
Farmers are tilling under the shade area of trees. Rain water is not going in is flowing and removing organics.
   Masnobu Fukuoka founder of Natural Farming was first  who stopped tilling and removing green cover of weeds from his orchards .Now all fruit growers of Japan following his method. Many orange growers in America are also in crisis due to drought.
  He visited my farm in 1988. He was saying that many small, insects and microbes lives the under green cover of weeds. This diversity supply nutrients, make soil perforated,rain water easily goes inside the soil. Many predators living in green weed cover control harmful insects,  trees remain healthy  gives every year fruits in increasing manner. Taste and flavor also improves.
   Second he told that digging around trees, cutting roots and filling cow dung, chemicals etc. and pruning is harmful in natural growth. Trees become sick and dye .
   Many farmers of  Maharashtra  near Nagpur are following  Fukuoka's method are safe in drought.


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Raju Titus.Natural farm.Hoshangabad. M.P. 461001.
       rajuktitus@gmail.com. +919179738049.
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http://groups.yahoo.com/group/fukuoka_farming/
http://rishikheti.blogspot.com/

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Thursday, September 27, 2012

Growing winter crops with the help of Rice straw. धान की पुआल से करें ठण्ड में गेंहूं की कुदरती खेती. Growing winter crops with the help of Rice straw.

धान की पुआल से करें ठण्ड में गेंहूं की कुदरती खेती.
ज क़ल अनेक किसान धान की कटाई हार्वेस्टर से करते हैं इस लिए गेंहूं की अंतर फसल  संभव नहीं रहती है और वे पुआल को अपने खेतों पर वापस डाल भी नहीं पाते हैं. उसे वे जला देते हैं ये बहत गलत है.गेंहूं की खेती के लिए जुताई,खाद,दवाई और दवाई  तथा सिंचाई काफी महंगी पड़ती है. ऐसे में आप धान की कटाई और गहायी के उपरांत भी बिना जुँताई करे आसानी से गेंहूं की बोनी कर सकते है. उसके लिए आप को खेतों में गेंहूं के बीजों को  ४० किलो. प्रति एकड़ के हिसाब छिटक दीजिये और उस के ऊपर मशीन से काटे पुआल को आडा तिरछा इस प्रकार से फेंक दीजिये की सूर्य की रोशनी आपके खेतों में नीचे तक पहुँच जाये. फ़िर सिंचाई कर दीजिये.
    आप देखेंगे की पुआल के भीतर से सब गेंहूं उग कर बाहर निकाल आता है. इस में समय समय से जुताई करते रहें. इस प्रकार आप चने आदि को भी बो सकते हैं.  इस तरीके से आसानी से १/२ टन से एक टन/ चोथाई एकड़  तक फसल मिल जाती है जो हर साल बढती रहती है इस से जमीन भी की ताकत भी बढती रहती है.

 Growing winter crops with the help of Rice straw.
Many Rice grower are doing harvesting with machine (Harvester). Therefor they can not do inter cropping of winter grain.They burn precious straws. If farmer use rice straw they can save cost of tilling ,cost of composting ,cost of chemical fertilizers,cost on killing of weeds and insects,
cost of Tonic and cost of making bio fertilizer from cow' dung and urine.
     Simply scatter winter gains directly on the field and cover field by Rice straws  uniformly in a manner in which  sun light properly penetrate up to ground, so seedlings easily come out through straws. In the absence of moisture irrigation can be done it saves about 50% water also. Winter grain gives normal yield it will not low even in first year. The production increase every year with because zero soil ,water and bio diversity erosion.

--Raju Titus.Natural farm.Hoshangabad. M.P. 461001.
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Wednesday, September 26, 2012

गाजर घास से करें बिना जुताई ,बिना खाद ,बिना दवाई 'गेंहूं की खेती'

गाजर घास से करें बिना जुताई ,बिना खाद ,बिना दवाई 'गेंहूं की खेती'
ज क़ल जहाँ देखो वहां खेतों में गाजर घास दिखाई देती है. आम किसानो के लिए ये एक बड़ी दुःखदाई खरपतवार है. किन्तु बिना जुताई खाद और दवाई के होने वाली कुदरती खेती में ये वरदान है. इस के सहारे बरसात में सोयबीन,धान आदि की खेती आसानी से हो जाती है. ठण्ड में इस के सहारे गेंहूं की खेती बिना किसी खर्च के आसानी से हो जाती है. इसे करने  के लिए जमीन जुताई बिलकुल जरुरी नहीं है नहीं इस में किसी भी प्रकार के मानव निर्मित खाद की जरुरत है. कीट और खरपतवार नाशक उपाय इस में गेर जरुरी हैं. कोई भी टोनिक या गाय के गोबर और गो मूत्र की इस में जरुरत नहीं है.
    बस चाहिए तो बस गाजर घास का अच्छा भूमि ढकाव जिस को पैदा करने के लिए कुछ करना नहीं होता वरन उसे हटाने के प्रयासों को रोकना पड़ता है. तक जब तक गेंहूं बोने का समय नहीं हो जाता गाजर घास को बचाने की जरुरत है जब गेंहूं बोने का समय हो जाये इसके ढकाव में ४० किलो प्रति एकड़ के हिसाब से गेंहूं के बीजो का छिडकाव कर दीजिये. बीज अच्छी नस्ल के अच्छे होने चाहिए. जैसे बीज होंगे वैसी फसल मिलेगी . इस के बाद हासिये, तलवार या घास काटने की मशीन से गाजर घास को काट कर  जहाँ का तहां फेला दीजिये.पर्याप्त  नमी नहीं होने की स्थिति में सिचाई कर दीजिये. सब गेंहूं उग कर काटे हुए गाजर घास से ऊपर आ जायेगा. आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहिये. ऐसा करने से पहले साल में ही  आधा टन से लेकर एक टन गेंहूं की पैदावार प्रति छठी एकड़ मिल जायेगी जो आस पास के सब से अच्छे खेतों की पदावर से किसी भी हालत में कम नहीं रहती है. इस खेती से किसानो एक और जहाँ ८०% लागत कम आती है वही ५०% प्रतिशत पानी कम लगता है. ये अनाज कुदरती अनाज कहलाता है जिस की बाजार में कीमत रासायनिक गेंहू की तुलना में कई गुना अधिक है.
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Tuesday, September 25, 2012

ओरगनिक और आयुर्वेदिक का भ्रम

         

               जो कुदरत बनाती है इंसान नहीं बना सकता है। 

जैसे जैसे लोगों को पता चल रहा है की रासायनिक खाद और दवाओं से नुकसान होता है लोग कुदरती खान ,पान दवाओं की और आकर्षित हो रहे हैं. इस  का लाभ वैकल्पिक खान,पान और दवा बनाने वाले खूब उठा रहे हैं. अनेक लोग आयुर्वेदिक, ऑर्गनिक आदि की खेती करने लगे और दुकान चलाने लगे हैं. इस में कोई बुरी बात नहीं है किन्तु फसलो के उत्पादन के लिए जुताई करने से कोई भी फसल आयुर्वेदिक या ओरगनिक नहीं रहती है. जुताई करने से बड़ी मात्रा में भूमि ( ओरगनिक खाद ) का  छरण होता है. लोग इस छरण की आपूर्ति के लिए रसायनों का इस्तमाल करते हैं इस से ये उत्पाद जहरीले हो जाते है.
    अनेक लोग इस तथ्य को स्वीकारते  हैं और वे खेती में गेर रासायनिक खाद और दवाओं का उपयोग कर रहे हैं. किन्तु ये कोई नहीं जनता है की हर बार जमीन की जुताई करने से खेत की आधी कुदरती  शक्ति नस्ट हो जाती है. खेत कमजोर होते जाते हैं. कमजोर खेतों में कमजोर फसले पैदा होती है. इनमे रोग लगते हैं. जो रोग पैदा करती हैं. अनेक लोग आज क़ल रासयनिक खादों के विकल्प में गोबर और गोमूत्र से बनी खाद डालने की सलाह देते हैं. गोबर और गो मूत्र में नत्रजन होता है. इसका हल्का लाभ यूरिया की तरह दीखता है पीली कमजोर फसल हरी दिखने लगती है. किन्तु इस से खेतों की कमजोरी जहाँ की तहां ही रहती है. इस से निकलने वाली फ़सलें भी कमजोर रहती है. उनमे भी रोग लग जाते हैं.
   जंगलों में मिलने वाले कुदरती आंवले और खेतों में पैदा किए जा रहे आंवले में यही फर्क रहता है वे ताकतवर रहती है उनमे  रोग नहीं लगते हैं. उनके सेवन से रोग भाग जाते हैं. यही फर्क तुलसी और एलोवीरा में होता है. यही बिना जुताई की कुदरती खेती और जुताई वाली ओरगेनिक खेती से मिलने वाले खाद्यों में होता है. इसी प्रकार शहद है यदि मधुमखियों को पालने में रासयनिक या  किसी गेर रासयनिक दवा का इस्तमाल  होता है तो भी वह शहद अपनी तासीर खो देता है. जहाँ तक मिलावट की बात है वह अलग है.
       जुताई नहीं करने से जमीन पर अनेक प्रकार की जैव विवधताओं के पनपने से और फसलों  के अवशेषों ,गोबर ,गोंजन ,पत्तियों आदि को जहाँ का तहां खेतों में लोटा देने से खेतों की ताकत बढती जाती है. फसलों की ताकत भी बढती जाती है. फ़सलें निरोगी पैदा होती हैं. इनका स्वाद और जायका अलग होता है. वे सही में स्वस्थ्वर्धक होती हैं.
  सवाल ये पैदा होता है की आम लोग सही ओरगनिक ,जैविक,कुदरती आयुर्वेदिक की पहचान कैसे करें ? हर कुदरती  खाद्य और दवाई का एक कुदरती स्वाद होता है इसकी पहचान करने के लिए स्वाद को पहचानना  जरूरी है. मिर्ची में झाल होना चाहिए,करेले में कड़वाहट होनी चाहिए सब का अपना अपना  स्वाद जायका होता है.
आंवले से बनी  दवाई में जंगली आंवले का जायका हर कोई पहचान सकता है. इसी प्रकार शहद है.
  गाय का दूध भी गाय के खाने पर निर्भर रहता है. एक गाय को खूंटे पर बांध कर अनाज खिलाया जाता है. उसे अनेक प्रकार की दवाई पिलाई जाती है वो अधिक दूध देने लगती है पर उस का दूध स्वाद  और खुशबू खो देता है.
एक गाय खुले कुदरती चारागाह में अपने मन से चर कर जब घर आती है उस की आत्मा प्रसन्न हो जाती है. उस के दूध और घी  में जो स्वाद होता है. वह खूंटे पर बंधी गाय से कभी प्राप्त नहीं हो सकता है.
   अनेक लोग हम से कहते हैं की हम शहरों में रहते है हमें असली कुदरती खान पान की चीजे कैसे मिले हम उन से कहते है की जब हम कुछ खरीदते हैं तब हम स्वाद का ध्यान रखें और उस किसान को प्रोत्साहित करें जो हमें अच्छा स्वदिस्ट कुदरती आहार लाकर देता है. विज्ञापन और सर्टिफिकेट की कोई गेरेंटी नहीं है.
     पहले हम सभी किसान थे अब किसान और उपभोगता  अलग हो गए हैं.  बिना जुताई की कुदरती खेती बहुत आसान है इस बच्चे  भी आसानी से कर सकते है इस लिए इस के लिए थोड़ी सी जमीन चाहिए और बस कुछ मिनट प्रति दिन देने से हम अपना कुदरती खाना स्वं उगा सकते हैं. बिना जुताई की कुदरती  खेती का आधार कुछ मत करो है. यानि जुताई ,खाद और दवाओं की कोई जरुरत नहीं है.
आयुर्वेद कुदरती जीवन पद्धती है वह कोई डाक्टरी नहीं है उसी प्रकार जमीन की जुताई जैविक पद्धती नहीं है.
     हम सब  छुट्टियों में भी आराम से  कुदरती खेती को कर के अपना आहार को स्वं पैदा कर सकते हैं.

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खड़ी धान में गेंहूं की बुआई

खड़ी धान में गेंहूं की बुआई
बिना जुताई की कुदरती खेती में धान की खड़ी फसल के भीतर ही फसलों को ऊगाने की प्रथा काफी पुरानी है. सामन्त : किसान  धान  को काटने से करीब दो सप्ताह पहले खड़ी धान  की फसल में ठण्ड में बोने वाली फसलों को फेंक देते हैं जिस से पर्याप्त नमी होने के कारण फ़सलें जम जाती हैं. धान को हाथ से काटा जाता है कटाई करने वालों के पांव के नीचे आगामी फसल के नन्हे पौधे दबने से उनका कोई नुक्सान नहीं होता है. धान को काटने तथा उसे झाड़ने के बाद बचा सब पुआल जहाँ खेतों से लिया जाता है उसे वही वापस उगती हुई फसल के उपर आडा तिरछा डाल दिया जाता है. जो खरपतवार नियंत्रण ,नमी संरक्षण,फसलों को रोग से बचाने ,और सड़ कर जैविक खाद देने में सहायक तो होता है साथ में इस के नीचे असंख्य केंचुए तथा उनके साथी चीटे चीटी दीमक आदि खेत को गहराई तक बखर देते हैं. ये बखरई मशीनों से की जाने वाली बखरई से भी अच्छी होती है. ठण्ड की फसल में किसी भी प्रकार की खाद ,दवाई की जरुरत नहीं रहती है. फसल की पैदावार ५००से १००० ग्राम /एक वर्ग मीटर  तक मिल जाती है जो आसपास के अच्छे से अच्छे खेतों से कम नही रहती है.
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Monday, September 24, 2012

कुदरत के आगे विज्ञान फेल है।


कुदरत के आगे विज्ञान फेल है।
महोदय,
जब से म.प्र. के माननीय मुख्यमन्त्री महोदय ने आयातित लाल गेहूं की गुणवत्ता पर प्रष्न चिन्ह लगाया है। खाद्य पदाथों को परखने वाले वैज्ञानिकों मे खलबली मची है। वे इसे प्रदूषित नहीं मान रहे हैं। उनका यह कहना कि यह खाने योग्य है, बिलकुल हास्यासप्रद है।
असल मे वैज्ञानिकों के पास कुदरति जिस्नों को परखने का कोई प्रबन्ध है ही नही, होता तो बरसों से हरित क्रान्ति के द्वारा परोसा जाने वाला प्रदूषित अनाज कब का बन्द हो गया होता। विज्ञान कुदरति स्वाद और ज़ायके की पहचान करने मे पूरी तरह फेल है। यही कारण है अंसख्य लागों के कहने पर इस गेहूं की रोटी कड़वी,बेस्वाद और रबर जैसी खाने येाग्य नही है कोई मान नही रहा है। मामला कोर्ट से भी बेरंग वापस आने वाला है। यदि जज या हमारे मुख्य मन्त्री महोदय भी यह कहें कि यह बेस्ुवाद है तो भी इसे प्रूफ करने के लिये किसी डाक्टर के सर्टीफिकेट की आवष्यकता होगी जिसके लिये वैज्ञानिक जांच की जरुरत होगी और वैज्ञानिक इसे विज्ञान की अंधी आंख से प्रेाटीन और विटामिनो के तुलनात्मक प्रमाणों के आधार पर खाने येाग्य बताकर अपना पल्लू झाड़ एक तरफ हो जायेंगे।
जबसे हरित क्रान्ति बनाम आधुनिक वैज्ञानिक खेती का अनाज आना शुरु हुआ है तबसे कुदरति स्वाद और जायका हम भूल ही गये हैं। गरीब मज़दूर वर्ग कब से यह कहते कहते थक गया कि जहां दो रोटी से पेट भर जाता था वहां अब आठ रोटी से भी पेट नहीं भरता है। छोटे बच्चे कुदरति स्वाद जायके को खूब पहचानते हैं क्योंकि वे प्रोटीन और विटामिन की भाषा से अनभिज्ञ रहते हैं।
कुदरति स्वाद और जायके का हमारे स्वास्थ्य से सीधा सम्बन्ध है। कुदरति हवा पानी और भोजन बड़ी से बड़ी बीमारी को ठीक कर देते हैं। हमारा निवेदन है कि सरकार को अनाज और सब्जियों की कुदरति गुणवत्ता जांचने के लिये वैकल्पिक उपाय पर जोर देना चाहिये।
शालिनी एवं राजू टाईटस
बिना-जुताई की कुदरति खेती के किसान
खोजनपुर,होशंगाबाद ,म.प्र. ४६१००१ फोन .07574.२८००८ मोब.9179738049

Sunday, September 23, 2012

आयातित तेल की गुलामी और खाने में जहर से कैसे बचें ?

आयातित तेल की  गुलामी और खाने में जहर से कैसे बचें ?
ब मैने ये सुना की हम इन दिनों अपनी जरुरत का ८०% तेल आयात कर रहे हैं  तो बहुत जोर का झटका लगा. आज़ादी के इतने साल के बाद  जहाँ हम विकास और विकास को सुनते थकते नहीं थे वहीँ ये विकास हमें मिला है की हम तेल के गुलाम हो गए हैं.ये गुलामी अंग्रेजों की गुलामी से कहीं बहुत बड़ी गुलामी है.
दूसरे जहाँ हमारे नेता ये कहते थकते नहीं हैं की हमने खेती में इतना विकास कर लिया है की पहले हम खाना बाहर से बुलाते थे और अब विदेशों को भेज रहे हैं.हमारे पास रखने को जगह नहीं है. किन्तु जब हमने अमीर खान का शो ( थाली में जहर) देखा जो उन्होंने सत्यमेव जयते के माध्यम से दिखाया था तो हमें ये जान कर बहुत दुःख हुआ इस अनाज से जिस के लिए हम गर्व कर रहे हैं वह पूरा का पूरा रासायनिक जहरों से भरा है जिस से केंसर जैसी अनेक बीमारियाँ पनप रही हैं. इस अनाज को हमारी सरकार छोटे छोटे बच्चों के पोषण हेतु खिला रही है.
ये बहुत ही गंभीर समस्या है जिस पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है. पर्या-मित्र विकास की तो बात सब करते हैं किन्तु कोई भी इस पर अमल नहीं कर रहा है.
  इस से तो हम बहुत खुश हैं की हम अपने कुदरती खेतों में रहते हैं बिना आयातित तेल की मशीनों का उपयोग करे ,बिना रसायनों का उपयोग करे ,बिना कीट और खरपत नाशक दवाओं का उपयोग करे. आत्म निर्भर कुदरती खेती कर आराम से जीवन व्यतीत कर रहे हैं. हमारे पडोसी किसान अभी हवा में उड़ रहे हैं वे आयातित तेल की गुलाम आधुनिक वैज्ञानिक खेती कर रहे हैं. और गेस ,डीज़ल के बढे दामो से परेशान हैं.
बिना जुताई की कुदरती खेती बहुत आसान है इसकी गुणवत्ता और उत्पादकता भी आधुनिक वैज्ञानिक खेती के मुकाबले बहुत अधिक है.
हम पेडों पर पैसे उगाते हैं. हमने अपनी जमीन में अधिकतर भू भाग में सुबबूल नाम के पेड़ लगायें हैं. ये पेड़ बड़ा ही चमत्कारी  है इस के बीज जमीन पर गिरते हैं वे वहाँ अपने आप सुरक्षित पड़े रहते हैं बरसात आने पर उग आते हैं और एक साल में पेड़ बन जाते हैं. इनसे हमारे पशुओं को चारा मिलता है जिस से हमें दूध और जलाऊ लकड़ी मिलती जिसे बेचकर हमें पर्याप्त पैसा मिल जाता है. इस के अलावा गोबर से गोबर गेस और जैविक खाद पर्याप्त है.
आज क़ल सब जगह कुदरती जल की बहुत कमी है सत्यमेव जयते के पानी वाले एपिसोड में बताया गया है दिल्ली में लोग अपने टॉयलेट के पानी को साफ कर बार बार काम में ला रहे हैं. बिना जुताई की कुदरती खेती करने से हमारे  उथले कुए साल भर कुदरती जल से भरे रहते हैं एक विदेशी मेहमान हमारे कुओं के जल को पी कर कह रहे थे आप टोकियो और अमेरिका के अच्छे से अच्छे तरीके से साफ़ किए पानी को नहीं पी सकते क्यों की आप इन कुदरती कुओं का पानी पीते हैं.
आयातित तेल की गुलामी और हमारे खाने में मिल रहे रासायनिक जहरों से मुक्ति बहुत आसान है यदि हम बिना जुताई की कुदरती खेती का अभ्यास करें. इस से ८०% खर्च में कटोती हो जाती है. अन्य लाभ अतिरिक्त हैं.
rajuktitus@gmail.com.

Saturday, September 22, 2012

बिना जुताई की कुदरति खेती के मसीहा मसनेबु फुकुओका !


बिना जुताई की कुदरति खेती के मसीहा मसनेबु
फुकुओका !
जापान मे जन्मे ,पढ़े और बढ़े तथा एक कृषि वैज्ञानिक
के रुप मे ख्याति अर्जित करने के बाद एक कुदरति किसान के रुप मे खूब नाम कमा
कर अब 95 वर्ष की उर्म मे मसनेबु फुकुओका ने अपना जीवन त्याग दिया।
फुकुओकाजी एक ऐसे कृषि वैज्ञानिक थे जिन्होने न सिर्फ आधुनिक वैज्ञानिक
खेती को वरन् तमाम जुताई पर आधारित खेती करने के तरीकों को हमारे
पर्यावरण ,स्वास्थ ,और खाद्य सुरक्षा के प्रतिकूल निरुपित कर दिया।
उन्होने बिना जुताई ,बिना खाद ,बिना निन्दाई ,बिना दवाइयों से दुनिया भर
मे सबसे अधिक उत्पादकता एवं गुणवत्ता वाली खेती की न सिर्फ खेाज की वरन् उसे
लगातार पचास सालों तक स्वयं कर मौज़ूदा वैज्ञानिक खेती को कटघरे मे खड़ा
कर दिया।उन्होने जापान मे उंची पहाडि़यों पर संतरों का कुदरति बगीचा बनाया
जिसमे अनेक फलों के साथ साथ अनेक प्रकार की सब्जियां बिना कुछ किये मौसमी
खरपतवारों की तरह पैदा होती हैं। पहाडि़यों के नीचे वे धान के खेतो मे
बिना जुताई ,बिना खाद ,बिना रोपा लगाये ,बिना पानी भरे एक चैथाई एकड़
से एक टन चांवल आसानी से 50 सालों तक लेते रहे, इतना नहीं धान की खड़ी
फसलों मे गेहूं के बीजों को छिटककर वे इतना गेहूं भी लेते रहे। उनके
कुदरति अनाजों मे इतनी ताकत है कि इनके सेवन मात्र से केंसर भी ठीक हो जाता
है।
वे सच्चे अहिंसावादी थे। जिस समय वे एक सूक्ष्मजीव वैज्ञानिक के रुप मे
सूक्ष्मदर्शी यंत्रो का उपयोग कर धान के पौधों मे लगने वाली बीमारियों
का अध्ययन कर रहे थे तो उन्ंहे यह पता चला कि आज का विज्ञान बीमारियों की
रोकथाम के लिये सूक्ष्मजीवाणुओं को दोषी मानकर उनकी अनावश्यक हत्या
करता है। जबकि ये सूक्ष्मजीवाणु ही असली निर्माता हैं।उनकी बिना जुताई की
कुंदरति खेती का यही आधार है।उन्होने मिटटी के एक कण को बहुत बड़ा
कर देखकर यह पाया कि मिटटी अनेक सूक्ष्मजीवाणुओं का समूह है। इसे जोतने ,
हांकने बखरने या इसमे रासायनिक खादों को डालने ,खरपतवार नाशकों को
डालने ,कीटनाशकों को छिड़कने या कीचड़ आदी मचाने से आंखों से
दिखाई न देने वाले अंसख्य सूक्ष्मजीवों की हत्या होती है।यह सबसे बड़ी हिंसा
है।
सन 1988 जनवरी जब वे हमारे खेतों मे पधारे थे तब उन्होने बताया था कि
जमीन को बखरने से बखरी हुई बारीक उपरी सतह की मिटटी थोड़ी बरसात होने
पर कीचड़ मे तब्दील हेा जाती है जो बरसात के पानी के पानी को भीतर नहीं
जाने देती बरसात का पानी तेजी से बहने लगता है साथ मे बहुमूल्य उपरी सतह की
मिटटी(खाद) को भी बहा ले जाता है।कृषि वैज्ञानिकों का यह कहना कि
फसलें खाद खाती हैं अैार पानी पी जाती हैं यह भ्रान्ति है। जुताई के कारण
होने वाले भू एवं जल क्षरण के कारण ही खेत खाद और पानी मांगते हैं।
फुकुओकी जी के 25 सालों के अनुभव की किताब दि वन स्ट्रा रिवोलूशन
दुनिया भर मे बहुत पसदं की गई इस किताब को अनेक भाषाओं मे छापा जा रहा
है। स्ट्रासे उनका तात्पर्य मूलतः नरवाई या धान के पुआल से है। दुनिया
भर मे अधिकतर किसान इसे जला देते हैं या खेतों से हटा देते हैं। उनका कहना
है कि यदि इसे जलाने कि अपेक्षा किसान इसे खेतों मे जहां कि तहां फैला दें
तो इसके अनेक लाभ हैं। पहला नरवाई के ढकाव के नीचे असंख्य केचुए आदी
जमा हो जाते हैं जो बहुत गहराई तक भूमी को पोला कर देते हैं आज तक
कोई भी ऐसी मशीन नहीं बनी है जो इस काम को कर सकती है।इसके दो फायदे
हैं एक तो बरसात का पानी बह कर खेतों से बाहर नहीे निकलता है दूसरे फसलों की
जड़ों को पसरने मे आसानी हाती है।दूसरा यह ढकाव सड़ कर खेतों को उत्तम
जरुरी जैविक अशं दे देता है। तीसरा इसमे फसलों की बीमारियों के कीड़ों के
दुश्मन रहते हैं जिससे फसलें बीमार नहीं पड़ती। चैथा ढकाव की छाया के कारण
खरपतवारों के बीज अंकुरित नहीं होते जिससे खरपतवारों की कोई समस्या नहीे
रहती है।निन्दाई गैर जरुरी हो जाती है।
जब वे हमारे खेतों पर पधारे थे उस समय हम नेचरल फार्मिंग के मात्र तीसरे बर्ष
मे थे. और अब तक ’’दि.व.स्ट्रा.रि’’. के अलावा हमारा कोई गाइड नहीं था।
वह तो बरसात के दिनों मे एक अनायास प्रयोग हमसे हो गया ।हमने सोयाबीन के कुछ
दानों को जमीन पर छिटकर उस पर प्याल की मल्चिगं कर दी ,मात्र 4 दिनो बाद हमने
देखा कि सोयाबीन बिलकुल बखरे खेतों के माफिक उग कर प्याल के उपर निकल आई
है। बस हम खुशी से फूले नहीे समाये हमे बिना जुताई कुदरति खेती करने का
तरीका मिल गया था। बिना जुताई की कुदरति खेती करने से पूर्व हम अपने खेतों
मे गहरी जुताई ,भारी सिंचाई ,कृषि रसायनों पर आधारित खेती का अभ्यास करते
थे, जिससे हमारे खेत मरुस्थल मे और हम कंगाली की कगार तक पहुंच गये थे।
हमारे खेत कांस घांस से भर गये थे,कांस घांस एक ऐसी घास है जिसकी जड़ें 25
फीट से 30 फीट तक की गहराई तक फैल जाती हैं जिस के कारण कोई भी खेती
करना मुश्किल रहता है।
हमने पहले बरसात मे कांस घास को बढ़ने दिया फिर ठण्ड के मौसम मे खडी घांस
मे दलहन जाती के बीजों जैसे चना ,मसूर ,मटर ,तिवड़ा ,बरसीम आदी के बीजों
को छिटकर ,घास को काटकर जहां का तहां आड़ा तिरछा फैला दिया और स्प्रिंकलर
से सिंचाई कर दी। ठीक हमारे प्रयोग की तरह पूरा खेत फसलों से लहलहा उठा।
हालाकि हम फुकुओका विधी से अभी काफी दूर थे इसलिये उनके आगमन से काफी
डरे हुए थे। किन्तु जब उन्होंने हमारे खेत मे इस विधी से खेती करते देखा तो
उन्होने कहा कि मै अभी अमेरिका से आ रहा हूं ,वहां की करीब तीन चैथाई
भूमी मे यह घास छा गई है ,जिसमे अब खेती नहीं की जाती है क्योंकि उन्हें
नहीं मालूम है कि क्या करें? यह घास जुताई के कारण पनपते रेगीस्तानों की
निशानी है। चूंकि आप यहां इस घास मे कुदरति खेती कर रहे हैं इसलिये हम
आपको हमारे द्वारा दुनिया भर मे चल रहे प्रयोगों मे न. वन देते हैं, किन्तु
अभी आपको केवल 60 प्रतिशत ही नम्बर मिलेंगे क्योंकि अभी आपको बहुत कुछ
सीखने की जरुरत है। पर यदि आप ठीक ऐसा ही करते रहे तो आप आराम से बिना कुछ
किये जीवन बिता सकते हैं।
और आज हमे अपने गुरु के वे शब्द याद आते हैं हमारे खेत पूरे हरे भरे घने
पेड़ों से भर गये हैं। ये खेत नहीं रहे वरन वर्षा वन बन गये हैं।इससे हमे
वह सब मिल रहा है जो जरुरी है।जैसे कुदरति हवा ,जल ,ईंधन ,आहार और आराम।
आज की दुनिया मे हम भारी कुदरति कमि मे जीवन यापन कर रहे हैं। सूखा और
बाढ़ आम हो गया है। केंसर जैसी अनेक लाइलाज बीमारियां बढ़ती जा रहीे हैं।
धरती पर बढ़ती गर्मी और मौसम की बेरुखी से पूरी दुनिया परेशान है। गरीबी ,
बेरोजगारी मुसीबत बन गये हैं। भारत मे हजारेंा किसान आत्म हत्या करने लगे हैं
लोग खेती किसानी को छोड़ भाग रहे हैं। इन सब समस्याओं के पीछे खेती
मे हो रही जमीन की जुताई का प्राथमिक दोष है। जुताई के कारण हरे भरे
वन ,चारागाह ,बाग बगीचे सब अनाज के खेतों मे तब्दील हो रहे हैं ,तथा खेत
मरुस्थल मे तब्दील हो रहे हैं। हरियाली गायब होती जा रही है। गरीबों को
जलाने का ईधन और पीने का पानी नसीब नहीं हो रहा है।
ऐसे मे बिना जुताई की कुदरति खेती के अलावा हमारे पास और कोई उपाय नहीे
है। अमेरिका मे अब बिना जुताई की कनज़र्वेटिव खेती और बिना जुताई की
आरगेनिकखेती जड़ जमाने लगी है। 37 प्रतिशत से अधिक किसान इस खेती को
करके खेती किसानी के व्यवसाय को बचाने मे अच्छा योगदान कर रहे हैं। यह सब
फुकुओका की देन है। हमारे देश मे पशुपालन आधारित खेती हजारों साल
स्थाई रही किन्तु जुताई के अनावश्यक कार्य के कारण बेलों की जगह ट्रेक्टरों
ने ले ली इस कारण पालतू पशु और चारा लुप्त हो रहे हैं। किसान गेहूं की
नरवाई और कीमती धान के पुआल को जला देते हैं। आधुनिक बिना जुताई
की खेती पिछली फसल से बची खड़ी नरवाई मे सीधे बिना जुताई की सीड ड्रिल
का उपयोग कर की जाती है। बिना जुताई की आरगेनिक खेतीकरने के लिये किसान
खड़ी नरवाई या हरे मल्च को रोलर ड्रम की सहायता से मोड़ देते हैं।फिर
उसमे बिना जुताई की सीड ड्रिल से बुआई कर देते हैं। ऐसा करने से जहां 80
प्रतिशत खर्च मे कमि आती है वहीं उत्पादन और गुणवत्ता मे भी लाभ होता
है। आजकल बिना जुताई की खेती करने वाले किसानों को कार्बन के्रडिट के
माध्यम से अनुदान भी मुहैया कराया जाने लगा है।
फुकुओका जी से हमारी आखिरी मुलाकात सन 1999 मंे सेवाग्राम मे हुई थी
वे वहां वे अपने सहयोगियों की सहायता से सीड बालबनाकर बताते हुए अपनी बात
कहते जा रहे थे उन्होने बताया कि तनज़ानिया के रेगिस्तानों को हरा भरा
बनाने मे ये मिटटी की गोलियां बहुत उपयोगी सिघ्द हुईं हैं। आज यदि गांध्
ाी जी होते तो वे जरुर चरखे के साथ मिटटी की बीज गोलियों से खेती करते। एक
ई-ेमंेल से पता चला है कि उनके अतिंम संस्कार के समय उनके पोते ने कहा कि
उनके दादा ने लोगो के मनो मे सीड बालबोने का काम कर दिया है बस उनके
अंकुरित होने का इन्तजार है।
दुनिया भर मे आज हो रही हिसां के पीछे हमारी सभ्यताआंे का बहुत बड़ा हाथ
है फुुकुओका जी का कहना है कि शांति का मार्ग ’’हरियाली ’’ के पास है। वे
कुदरत को ही भगवान मानते थे। वे अकर्म’ (डू नथिंग) के अनुयाई थे।
शालिनी एवं राजू टाईटस
बिना जुताई की कुदरति खेती के किसान
ग्राम-खोजनपुर  ,होशंगाबाद ,म.प्र. 461001