Friday, May 12, 2017

यूरिया और गोबर /गोमूत्र से बनी दवाई गैर जरूरी हैं।


यूरिया और गोबर /गोमूत्र से बनी दवाइयां गैर जरूरी हैं। 

 जुताई नहीं करने और कृषि अवशेषों को जहां का तहां वापस कर देने से पोषक तत्वों की आपूर्ति हो जाती है। 

तालाब  की मिटटी (क्ले ) सर्वोत्तम खाद है इस से बीज गोलियां बनाकर  करे बिना जुताई खेती 


भारत में परम्परगत देशी खेती किसानी का सबसे बड़ा इतिहास है।  हजारों साल तक यह खेती "टिकाऊ "रही है।  किसान हलकी या  बिलकुल जुताई के बिना खेती करते थे।  वो जुताई से होने वाले जल और भूमि के छरण  से जागरूक थे इसलिए  जब खेत जुताई से कमजोर हो जाते थे वो खेतों की जुताई बंद कर देते  थे। बिना जुताई के खेतों में पशु चराए जाते थे इस से खेत पुन : ताकतवर हो जाते हैं। ऋषि -पंचमी में आज भी कान्स घास की पूजा की जाती है और बिना -जुताई के कुदरती अनाजों को फलाहार की तरह सेवन करने की सलाह दी जाती है।
परम्परागत देशी खेती किसानी में गोबर ,गोमूत्र  से बनी खाद और दवाई का कोई उपयोग नहीं किया जाता था। गर्मियों  में किसान सभी कृषि अवशेषों जैसे गोबर ,गोंजन ,नरवाई ,पुआल आदि को खेतों  में वापस डाल देते थे।
बिना जुताई करे खेती करने के लिए तालाब की मिटटी
जिसे क्ले कहते हैं से बीज गोलियां बनाकर अच्छी बरसात हो जाने
पर खेतों में डाल देते हैं क्ले सर्वोत्तम खाद है। 
आधुनिक वैज्ञानिक खेती ने अनावश्यक रासायनिक खाद और दवाइयों को  बढ़ावा दिया है। जो हानिकारक सिद्ध हो गए हैं।  इनसे पर्यवरण प्रदूषण होरहा है रोटी में जहर घुलने लगा है। यूरिया आदि के  विकल्प में गोबर और गो मूत्र की खाद  दवाइयां बनाई जा रही हैं।  ये मानव निर्मित गैर कुदरती होने के कारण नुक्सान देय सिद्ध हो रही है। असल में कृत्रिम नत्रजन जमीन को मान्य नहीं होती है इसलिए गैर  कुदरती नत्रजन को जमीन गैस बनाकर उड़ा देती है इसे Denitrification कहा जाता है। इस प्रक्रिया में जमीन में जमा कुदरती नत्रजन भी उड़ जाती है,  किसान को इस से बहुत अधिक आर्थिक नुक्सान होता है।

असल में कृषि के सभी अवशेषों जैसे पुआल ,नरवाई ,पत्तियों ,टहनियों आदि में फसलों के लिए आवश्यक तत्व रहते है। जिन्हे अधिकतर किसान जला देते है या खेतों से बाहर फेंक देते हैं और खेतों को जोत  बखर देते हैं। जब बरसात होती तब जुताई के कारण  खेतों की बारीक मिटटी कीचड़ बन जाती है जिसके कारण बरसात का पानी जमीन में नहीं सोखा जाता है वह तेजी से बहता  है अपने साथ सभी पोषक तत्वों को बहाकर ले जाता है।
 जुताई नहीं करने और  नरवाई ,पुआल आदि को जहां का तहां डाल  देने   एक ओर जहाँ पोषक तत्वों की आपूर्ति हो जाती है हैं वहीं ये नमी भी संरक्षित हो जाती है ,खरपतवार  नियंत्रित हो जाते  हैं और फसलों का  कीड़ों से  बचाव हो जाता  है। इस ढकाव के नीचे असंख्य केंचुए , दीमक ,चींटे /चींटीं जैसे अनेक कीड़े मकोड़े ,सूख्स्म जीवाणु रहने लगते हैं। जिनसे नमी और पोषकतत्व मिलते रहते हैं।  इसलिए किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद दवाई और  गोबर /गोमूत्र से बनी दवाइयों की जरूरत नहीं रहती है।

किसान जुताई कर पहले अपने खेत की जैविक खाद को बहा या गैस बनाकर उड़ा  देते हैं फिर गोबर /गोमूत्र ,रासायनिक खाद दवाओं को डालने के लिए आवश्यक श्रम /खर्च करते हैं।
गेंहूं की नरवाई से बीज गोलियों से अंकुरित होकर झांकते
धान के नन्हे पौधे 

रासायनिक और गोबर गोमूत्र से बनाई गयी गैर कुदरती दवाइयां डालने से खेतों की  नत्रजन गैस बन कर उड़ जाती है   जिस से किसान का बहुत पैसा और महनत  बेकार चली जाती है। किसान को घाटा होने लगता है।
 घाटे के  कारण किसान आत्म -हत्या जैसे कठोर कदम भी उठा लेते हैं।

लाखों किसान जुताई ,खाद और दवाइयों के चक्कर में फंस कर आत्म -हत्या कर चुके हैं। इस से खेत भी मरुस्थल में तब्दील हो रहे हैं। पानी का संकट उत्पन्न हो गया है।  जुताई करने से बारीक मिट्टी बरसात के पानी के साथ मिल कर कीचड में तब्दील हो जाती है  बरसात का पानी जमीन में नहीं सोखा जाता है। वह बहता है अपने साथ जैविक खाद को भी बहा  कर ले जाता है।
इसलिए हमारा कहना है कि रासायनिक या गोबर/गोमूत्र से खाद खरीदना या बनाना मूर्खता पूर्ण काम है। 

1 comment:

RS DP said...

आपके विचार बहुत ही उत्तम हैं.