Thursday, May 29, 2014

खेती किसानी की बदहाली के समाधान हेतु सुझाव

खेती किसानी की बदहाली के  समाधान हेतु सुझाव 

हने को तो हमारा देश कृषि प्रधान देश  कहलाता है जिसकी आधी से अधिक आबादी गांवों में रहती है किन्तु सबसे अधिक गरीबी और भुख मरी अब इसी आबादी को झेलना पड़  रहा है यह एक चिंता का विषय है। एक समय था जब हमारे अन्नदाता आत्मनिर्भर थे उनकी खेती किसानी टिकाऊ रहती थी हजारों साल हमने इस टिकाऊ खेती किसानी के सहारे खूब विकास का ढिढोरा पीटा किन्तु मात्र हरित क्रांति के कुछ सालों ने   खेती किसानी को चौपट  दिया है।  खेत मरुस्थल में तब्दील हो रहे हैं और किसान पलायन कर रहे हैं। किसानो की आत्महत्या का दौर है की रुकने का नाम नही ले रहा है।

क्या इसमें हरित क्रांति का दोष है ?

जब हम अंग्रेजों के गुलाम थे हमने ' सत्य और अहिंसा '  के मूल सिद्धांतों के माध्यम से आज़ादी प्राप्त करने में सफलता हासिल की थी किन्तु विकास के लिए हमने  सिद्धांतों के विपरीत काम कर के  पुन : देश को आयातित तेल का गुलाम बना डाला और यह सब हमने पश्चिमी संस्कृति की नक़ल करके किया जिसका आधार' हिंसा ' है। जमीन की यांत्रिक जुताई ,कृषि रसायनो का उपयोग ,संकर और GM बीजों का उपयोग ,बड़े बांधों पर आधारित भारी सिंचाई आदि सब काम कुदरत की हिंसा पर आधारित हैं। असल  हमने विकास के नाम पर उस मुर्गी का पेट फाड़ डाला जो हमे हर रोज सोने का अंडा दे रही थी।

आज़ादी के तुरंत बाद जब गांधीजी नहीं रहे थे विनोबाजी जी ने सत्य और अहिंसा के आधार पर देश के टिकाऊ विकास के लिए ऋषि खेती माध्यम से देश के विकास का नारा बुलंद किया था जिसे उस समय की सरकार ने पूरी तरह नकार कर  आधुनिक वैज्ञानिक खेती "हरित क्रांति " को करवाने का काम किया जिसके दुष्परिणाम आज हम भुगत रहे हैं। उस समय से आज तक "हरित क्रांति " को विकास माना जा रहा है।  भ्रान्ति है।
कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा की सरकार हो काम तो इन्हे आधुनिक खेती  वैज्ञानिकों  कहे अनुसार करना पड़ेगा।

खेती  डाक्टर आज खेती किसानी की बिगड़ती हालत लिए किसान  को ही दोष देते हैं वो कहते है की किसान मिट्टी की जाँच नहीं करवाते हैं उनकी सलाह के अनुसार काम नहीं करते है। इसलिए इस हालत के लिए वे ही जिम्मेवार हैं। असल में वैज्ञानिक लोग जो सलाह देते हैं वो सब पश्चिमी देशों की फ्लॉप तकनीकों के आधार पर हैं। जबकि हमारी खेती किसानी की संस्कृति हर हाल में उस से अच्छी और टिकाऊ है यही कारण था हम हजारों साल सुरक्षित रहे हैं।
ऋषि खेती की जग प्रसिद्ध किताब

ऋषि खेती एक  भारतीय संस्कृती पर आधारित खेती है जो पूरी तरह सत्य और अहिंसा  पर आधारित है जिसमे मशीनी जुताई ,जहरीले रसायनो , बिगाड़े गए बीजों , भारी सिंचाई, मानव निर्मित खाद  दवाओं का उपयोग वर्जित है। ये सब हिंसक उपाय हैं इनसे खेत और किसान दोनों मर रहे है।

क्या ? ऋषि खेती से खेती किसानी की हालत को सुधारा जा सकता है।

सच्चाई यह है की जो कुदरत बनाती है वह इंसान नहीं बना सकता है। जुताई नहीं करने से कुदरत खेती करने लगती है जैसा हम कुदरती वनो में  देखते हैं। ऋषि खेती भी इसी कुदरती सत्य पर आधारित  खेती है।  प्रकार वनो में कुदरती संतुलन कायम रहता है जहाँ शेर और हिरन, मेंढक और  सांप , उल्लू और चूहे रहते हैं। वैसे ही ऋषि खेती में अहिंसात्मक तरीके से फैसले  के कीड़े भी रहते है इनके बीच एक कुदरती संतुलन रहता है कोई भी
बीमारी का प्रकोप नहीं होता है। इसलिए हमारा सुझाव है की बिगड़ती खेती किसानी ऋषि खेती के बिना संभव नहीं है।



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