Tuesday, May 20, 2014

हमारा पर्यावरण और ऋषि खेती

हमारा पर्यावरण और ऋषि खेती 

सुबबूल और बकरी पालन


रियाली की कमी के कारण दिन प्रतिदिन हमारा पर्यावरण नस्ट होता जा रहा है। जैसा की हम जानते हैं की हमे प्राण वायु हरियाली से मिलती है और जो हवा हम  छोड़ते हैं वह हरियाली के द्वारा सोख ली जाती है जो जैविक खाद में तब्दील हो जाती है।

एन्जिल बकरी के बच्चे को दुलारते हुए। 
  जब से हमारा देश आज़ाद हुआ है जितनी भी सरकारें हमारे देश में रही हैं सब विकास  की बात करती रही हैं जिसके  परिणाम स्वरूप  दिन प्रतिदिन हरियाली कम होती जा रही है।

हरे भरे वन ,स्थाई बाग़ बगीचे और चारागाह सब के सब  अनाज के खेतों में तब्दील होते जा रहे है जो गहरी जुताई और जहरीले रसायनो के कारण मरुस्थलों में तब्दील होते जा रहे हैं।

परम्परागत देशी खेती किसानी में  पशुपालन का बड़ा महत्व है किन्तु जब से अंगरेजी खेती का चलन शुरू हुआ है तबसे बेलों की जगह ट्रेक्टरों ने ले ली है और गायों  की जगह भैंसे पाली जाने लगी है।  जिन्हे अधिकतर अनाज और सूखा भूसा खिलाया जाता है। भेंसों के बच्चे मार दिए जाते हैं दूध इंजेक्शन के बल पर निकाला जाता है। यह  इंजेक्शन  जहाँ पशु को बीमार करता है वही. यह दूध के माध्यम से हमे भी बीमार करता है। इन पशुओं को अधिक से अधिक दूध देने के लिए अनेक प्रकार की रासयनिक दवाइयाँ दी जाती है।
सुबबूल के पेड़ों के साथ गेंहूँ की खेती 

जो अनाज दुधारू पशुओं को खिलाया जाता है वह भी अनेक जहरीली दवाओं के बल पर  पैदा किया  जाने लगा है जिस से जो दूध हमारे घरों में आ रहा है वह इस्तमाल के लायक नहीं रहा है यह जहरीला हो गया है। जिसके सेवन से हर दसवे घर में कैंसर दस्तक दे रहा है।

हम चार पांच दशकों से खेती के साथ साथ पशु पालन करते आ रहे हैं  देशी गाय और भेंस पालते थे फिर हमने जर्सी गायें पालीं फिर पुन : भेंस पाल कर देखा किन्तु हरे चारे की  समस्या के कारण हम फेल होते गए। हरे चारे की समस्या से निपटने के लिए हमने सुबबूल का प्लांटेशन करीब १२ एकड़ में कर डाला जिस से हमे  साल भर हरा चारा मिलने लगा और हमे काफी हद तक सन्तुस्टी रही। किन्तु अतिरिक्त जहरीले अनाज और भूसे से हमे पूरी तरह मुक्ति नहीं मिली इसलिए जो दूध हमे मिल रहा था वह पूरी तरह कुदरती नहीं था और हमारे शरीर पर विपरीत असर डाल रहा था।

ऋषि खेती एक जहर मुक्त खेती करने का अभियान है कुदरती आहार बाजार में नहीं मिलता है मिलता है इसे हमे खुद ही पैदा करने पडेगा इस लिए हमने इस अभियान में नयी कड़ी जोड़ते हुए बकरी पालन का काम शुरू कर दिया  हमारे बेटे मधु के सहयोग से शुरू किया गया है। मधु जो स्वं सामजिक कार्यों  के जानकार है उन्होंने सामजिक शास्त्र में स्नाकोत्तर डिग्री हासिल की है।  कोई भी समाज सेवा का काम जब तक सफल नहीं होता जब तक वह स्वं से शुरू नहीं होता है।

सुबबूल एक दलहन जाती का पेड़ है वह अपनी छाया के छेत्र में लगातार नत्रजन पैदा करता रहता है वह नत्रजन की खान है। इन पेड़ों से मिलने वाली नत्रजन का उपयोग हम अनाजों की फसल में लेते हैं जिनसे हम गैर कुदरती नत्रजन के मुकाबले कहीं अधिक अनाज पैदा कर लेते हैं। इन पेड़ों की पत्तियों में प्रोटीन की जबरदस्त मात्रा है और यह बकरियों को बहुत पसंद है इन को खाकर वे साल भर तंदरुस्त रहती हैं उनसे मिलने वाला दूध पूरी तरह कुदरती ,स्वादिस्ट और गुण वाला रहता है।

बकरी पालन एक बहुत ही सरल काम है जिसे बच्चे ,बूढ़े और महिलाएं आसानी से कर लेते है  उन्हें एक सीमित जमीन के टुकड़े में आसानी से सुबबूल के साथ पाला जा सकता है। सुबबूल की लकड़ियाँ ईंधन के रूप में बिक जाती हैं जिनसे एक ओर हमारे घर का चूल्हा जलता है वहीं अतिरिक्त आमदनी भी हो जाती है।

सुबबूल का पेड़ बहुत ही तेजी से बढ़ने वाला पेड़ है।  यह हरियाली पैदा करने के लिए बहुत ही उत्तम है इसका बीज जमीन पर गिरता है सुरक्षित रहता है बरसात आने पर उग कर पेड़ बन जाता है। यह एक ओर  जहाँ बादलों को आकर्षित कर बरसात करवाने में सहायक है वही ये बरसात के जल को सोख कर भूमिगत जल का स्तर लगातार बढ़ाता रहता है।  इसकी पत्तिया प्राण वायु देने और दूषित वायु को सोखने में बहुत सक्षम है।
इस पेड़ से जैविक खाद इतनी बन जाती है की किसी भी फसल के लिए खाद की जरुरत नहीं रहती है।  बकरियों के पालने  से इन पेड़ों की बढ़वार पर कोई असर नहीं रहता है वरन वे तेजी से पनपते है।
सुबबूल का जंगल 

सुबबूल के पेड़ों के साथ अनाज ,सब्जी ,फलों और बकरी पालन की ऋषि खेती एक पर्यावरणीय कार्य है जिस से ग्लोबल वार्मिंग,क्लाईमेट चेंज जैसी समस्या का समाधान संभव है भूमिगत जल का संवर्धन किया जा सकता है।   पेड़ विहीन आधुनिक वैज्ञानिक खेती पर्यावरण के लिए प्रतिकूल काम है जिस से पर्यावरण प्रदूषण फेल रहा है कैंसर जैसी बीमारियां जन्म ले रही है सूखे की समस्या बढ़ती जा रही है। ये विकास नहीं विनाश है।






2 comments:

Dr.S.K. Gour said...

प्रिय राजू, आपका सूबबूल वला आर्टिकल पढा - जमीन को उर्वरक बनाने, पशुओं के चारे तथा पर्यावरण की द्रष्टि से इन ब्रक्षों को लगाना बहुत न्याय संगत है - मैं क्रषि से जुडा हुआ तो नहीं हूं पर फिर भी कोशिश करूंगा कि जितना हो सके इस बात का प्रचार हो सके । कभी भोपाल आना हो तो मिलिएगा ।

Raju Titus said...

प्रिय गौर साहब ,
नमस्कार कॉमेंट लिखने के लिए धन्यवाद आप से मिलने जरूर आएंगे।
धन्यवाद
राजू