जुताई ,खाद ,दवाई ,निदाई नहीं ! Zero tilage, No Chemicals , No weeding Shalini and Raju Titus. Hoshangabad. M.P. 461001.rajuktitus@gmail.com M-09179738049.
Friday, November 23, 2012
Thursday, October 4, 2012
FARMERS RULE किसान राज
किसान राज
(बिना जुताई की कुदरती खेती ने किया कमाल)
भारतीय प्राचीन खेती किसानी में किसान आत्म निर्भर और समाज में सर्वोपरी स्थान रखते थे. उस का कारण था वे लोगों को खाना खिलाते थे. उनके कहने से सब काम होते थे उन का राज था. किन्तु आज क़ल उल्टा हो गया है किसान समाज में सबसे नीचे के स्तर पर खड़ा है वह खुद अब खाने के लिए मोताज हो गया है. वह सरकार की ओर हर चीज के लिए मुंह ताक रहा है. इस का सबसे बड़ा कारण मशीनी करण ओर तेल की गुलामी है.
पहले किसान आसानी से बिना जुताई ,बिना सिचाई ,बिना खाद ओर दवाई के आसानी से आत्म निर्भर खेती करता था. उसके अनाजों के भंडार हमेशा भरे रहते थे. जब नयी फसल आती थी ओर उनका भंडार सीमा से अधिक हो जाता था वह वह उसे अन्य सेवाओं के बदले दे देता था वह गर्व से अन्नदाता कहलाता था. सब उसे सम्मान की निगाह से देखते थे.
इस देश को अंग्रेजों से आज़ादी उस समय मिली जब देश का किसान एक साथ गाँधी जी के साथ खड़ा हो गया. किन्तु अफ़सोस की बात है की हमारी खुद की सरकार ने उन किसानो को गुलाम बना दिया. उसके बेल नहीं रहे वे आयातित तेल से चलने वाले ट्रेक्टरों में बदल गए. कुदरती खाद के बदले उन्हें जहरीले आयातित तेल से बनी खाद थमा दी गयी. उसके अपने बचाए देशी बीज छीन कर उसे संकर /जी .एम् जैसे कमजोर बीज थमा दिए. जिन में आये दिन रोग लगते हैं जिस के लिए उसे जहरीले कीट ओर खरपतवार नाशक दे दिए गए. उसके भंडार खाली करवाकर अनाज को सरकारी गोदामों में भर दिया जो चोरी हो रहा है ,जिसे कीड़े खा रहे हैं,जो पानी से सड रहा है.
इस से किसान तो कर्जदार हुआ ही देश भी विदेशी कर्जे में फंस गया. जिस ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश को गुलाम बनाया था जिसे इन किसानो ने गाँधी,विनोबा, टेगोर ,नेहरु की मदद से भगाया था. उन्ही कंपनियों को अब देश में पुन: गुलाम बनाने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है. उन्हें देश को लूटने के लिए खुली छूट दे दी गयी है.
किसानो का देश अब विदेशी व्यापारियों का देश बन गया है.
हमारी माटी, रोटी ,हवा और पानी सब उनके हाथों में चला गया है हम फ़िर से गुलाम हो गए हैं.
किन्तु हम शुक्रगुजार हैं जापान के गाँधीवादी कुदरती खेती के किसान स्व. श्री मस्नोबू फुकुओका जी के जिन्होंने हमें ऐसी आत्म नर्भर खेती का पाठ पढ़ाया जिसे हम पिछले २७ सालों से कर रहे हैं. जिस से हमारे खेत इस गुलामी से पूरी तरह मुक्त हो गए हैं. ये सरकारी .अनुदान ,कर्ज,और मुआवजे की कोई जरुरत नहीं है. ये कुदरती खेती पूरी तरह आत्म निर्भर हैं.
अनेक वैज्ञानिक ,साधू संत,किसान, और नेतागण इसे देखने यहाँ आते हैं.वे इस विधा को केवल भारत में ही नहीं वरन पूरी दुनिया में फेलाने में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. अनेक बिना जुताई की कुदरती खेती खेती के किसान और फार्म बन गए हैं, अब वह समय दूर नहीं जब भारत का हर किसान बिना जुताई की कुदरती खेती कर आत्म निर्भर हो जायेगा उसे आयातित तेल और विदेशी पैसे की कोई जरुरत नहीं रहेगी.
किसान का राज चलेगा.
--
Raju Titus.Natural farm.Hoshangabad. M.P. 461001.
rajuktitus@gmail.com. +919179738049.
http://picasaweb.google.com/rajuktitus
http://groups.yahoo.com/group/fukuoka_farming/
http://rishikheti.blogspot.com/
(बिना जुताई की कुदरती खेती ने किया कमाल)
भारतीय प्राचीन खेती किसानी में किसान आत्म निर्भर और समाज में सर्वोपरी स्थान रखते थे. उस का कारण था वे लोगों को खाना खिलाते थे. उनके कहने से सब काम होते थे उन का राज था. किन्तु आज क़ल उल्टा हो गया है किसान समाज में सबसे नीचे के स्तर पर खड़ा है वह खुद अब खाने के लिए मोताज हो गया है. वह सरकार की ओर हर चीज के लिए मुंह ताक रहा है. इस का सबसे बड़ा कारण मशीनी करण ओर तेल की गुलामी है.
पहले किसान आसानी से बिना जुताई ,बिना सिचाई ,बिना खाद ओर दवाई के आसानी से आत्म निर्भर खेती करता था. उसके अनाजों के भंडार हमेशा भरे रहते थे. जब नयी फसल आती थी ओर उनका भंडार सीमा से अधिक हो जाता था वह वह उसे अन्य सेवाओं के बदले दे देता था वह गर्व से अन्नदाता कहलाता था. सब उसे सम्मान की निगाह से देखते थे.
इस देश को अंग्रेजों से आज़ादी उस समय मिली जब देश का किसान एक साथ गाँधी जी के साथ खड़ा हो गया. किन्तु अफ़सोस की बात है की हमारी खुद की सरकार ने उन किसानो को गुलाम बना दिया. उसके बेल नहीं रहे वे आयातित तेल से चलने वाले ट्रेक्टरों में बदल गए. कुदरती खाद के बदले उन्हें जहरीले आयातित तेल से बनी खाद थमा दी गयी. उसके अपने बचाए देशी बीज छीन कर उसे संकर /जी .एम् जैसे कमजोर बीज थमा दिए. जिन में आये दिन रोग लगते हैं जिस के लिए उसे जहरीले कीट ओर खरपतवार नाशक दे दिए गए. उसके भंडार खाली करवाकर अनाज को सरकारी गोदामों में भर दिया जो चोरी हो रहा है ,जिसे कीड़े खा रहे हैं,जो पानी से सड रहा है.
इस से किसान तो कर्जदार हुआ ही देश भी विदेशी कर्जे में फंस गया. जिस ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश को गुलाम बनाया था जिसे इन किसानो ने गाँधी,विनोबा, टेगोर ,नेहरु की मदद से भगाया था. उन्ही कंपनियों को अब देश में पुन: गुलाम बनाने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है. उन्हें देश को लूटने के लिए खुली छूट दे दी गयी है.
किसानो का देश अब विदेशी व्यापारियों का देश बन गया है.
हमारी माटी, रोटी ,हवा और पानी सब उनके हाथों में चला गया है हम फ़िर से गुलाम हो गए हैं.
किन्तु हम शुक्रगुजार हैं जापान के गाँधीवादी कुदरती खेती के किसान स्व. श्री मस्नोबू फुकुओका जी के जिन्होंने हमें ऐसी आत्म नर्भर खेती का पाठ पढ़ाया जिसे हम पिछले २७ सालों से कर रहे हैं. जिस से हमारे खेत इस गुलामी से पूरी तरह मुक्त हो गए हैं. ये सरकारी .अनुदान ,कर्ज,और मुआवजे की कोई जरुरत नहीं है. ये कुदरती खेती पूरी तरह आत्म निर्भर हैं.
अनेक वैज्ञानिक ,साधू संत,किसान, और नेतागण इसे देखने यहाँ आते हैं.वे इस विधा को केवल भारत में ही नहीं वरन पूरी दुनिया में फेलाने में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. अनेक बिना जुताई की कुदरती खेती खेती के किसान और फार्म बन गए हैं, अब वह समय दूर नहीं जब भारत का हर किसान बिना जुताई की कुदरती खेती कर आत्म निर्भर हो जायेगा उसे आयातित तेल और विदेशी पैसे की कोई जरुरत नहीं रहेगी.
किसान का राज चलेगा.
--
Raju Titus.Natural farm.Hoshangabad. M.P. 461001.
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Wednesday, October 3, 2012
FOOD SECURITY खाद्य सुरक्षा , अनुदान और विदेशी निवेश
खाद्य सुरक्षा , अनुदान और विदेशी निवेश
आज अचानक टीवी खोला तो देवेन्द्र शर्मा जी को देख वार्तालाप सुनने लगा विषय था खाद्य सुरक्षा ,अनुदान और विदेशी निवेश. सुन कर बहुत बुरा लगा की एक और जहाँ अनाज(जहरीला) गोदामों में सड रहा है, लोग भूखों मर रहे हैं,किसान आत्म हत्या कर रहे हैं, अनुदान, कर्ज माफी और मुआवजों के कारण सरकार अब कंगाल होने लगी है.
. एक और किसान "और दो और दो" चिल्ला रहे है तो वहीँ
सरकारें भी विदेशों का मुंह ताक रही हैं.
देश में खाद्य सुरक्षा पूरी तरह ध्वस्त हो गयी है.
किसी को भी देश की आत्म निर्भरता की चिंता नहीं है. हमारी खाद्य सुरक्षा आयातित तेल की गुलाम हो गयी है.
हम २७ सालों से आत्म निर्भर कुदरती खेती कर रहे हैं. इस खेती में ८०% खर्च की कमी हो जाती है खाद्य स्वादिस्ट ,स्वास्थवर्धक, पैदा होते हैं. इस में अनुदान ,कर्ज,और मुआवजों की जरुरत नहीं रहती है. उत्पादकता सर्वोपरि है. आत्म निर्भर खेती से ही देश आत्म निर्भर हो सकता है.
शर्मा जी ने सही कहा की एक गाँव तो आप आत्म निर्भर बना के बताएं.
आज अचानक टीवी खोला तो देवेन्द्र शर्मा जी को देख वार्तालाप सुनने लगा विषय था खाद्य सुरक्षा ,अनुदान और विदेशी निवेश. सुन कर बहुत बुरा लगा की एक और जहाँ अनाज(जहरीला) गोदामों में सड रहा है, लोग भूखों मर रहे हैं,किसान आत्म हत्या कर रहे हैं, अनुदान, कर्ज माफी और मुआवजों के कारण सरकार अब कंगाल होने लगी है.
. एक और किसान "और दो और दो" चिल्ला रहे है तो वहीँ
सरकारें भी विदेशों का मुंह ताक रही हैं.
देश में खाद्य सुरक्षा पूरी तरह ध्वस्त हो गयी है.
किसी को भी देश की आत्म निर्भरता की चिंता नहीं है. हमारी खाद्य सुरक्षा आयातित तेल की गुलाम हो गयी है.
हम २७ सालों से आत्म निर्भर कुदरती खेती कर रहे हैं. इस खेती में ८०% खर्च की कमी हो जाती है खाद्य स्वादिस्ट ,स्वास्थवर्धक, पैदा होते हैं. इस में अनुदान ,कर्ज,और मुआवजों की जरुरत नहीं रहती है. उत्पादकता सर्वोपरि है. आत्म निर्भर खेती से ही देश आत्म निर्भर हो सकता है.
शर्मा जी ने सही कहा की एक गाँव तो आप आत्म निर्भर बना के बताएं.
F.D.I. विदेशी निवेश और आत्म निर्भर खेती
विदेशी निवेश और आत्म निर्भर खेती
मै ऐसा सोचता हूँ की हमारा देश हमारे शरीर के माफिक है.
यदि हमारा शरीर ताकतवर है तो वह हमारे शरीर में बाहरी बीमारियों को नहीं आने देगा और हम स्वास्थ रहेंगे. यद हम स्वं अपने खान पान और रहन सहन से अपने शरीर को कमजोर करते हैं तो वह बाहरी बीमारी से नहीं बच सकता है.
विदेशी निवेश एक बीमारी है जो हमारे देश में हमारी कमजोरी के कारण आ रही है. आपने अमूल का उदाहरण दिया है एक जमाना था अमूल के किसान सरकार से कहते थे हमें आप के पैसे और नेता की जरुरत नहीं है.
हमारी खेती किसानी हजारों साल आत्म निर्भर रही वह बिना बिजली और बिना आयातित तेल के अनेक कुदरती आपदाओं के रहते सुरक्षित रही. उस में जान थी. किसान सम्मान से जीता था. किन्तु आयातित तेल से की जाने वाली "हरितक्रांति" ने हमारी खेती किसानी को इतना निर्बल बना दिया है की हम विदेशी तेल के बिना कुछ नहीं कर सकते हैं.
खाद्य सुरक्षा और खेती किसानी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.
इस का उद्धार विदेशी निवेश से नहीं वरन आत्म निर्भर खेती से ही संभव है. जिस में सरकारी निवेश की भी कोई जरुरत नहीं है. ये भी बहुत बड़ा धोका है.
--
Raju Titus.Natural farm.Hoshangabad. M.P. 461001.
rajuktitus@gmail.com. +919179738049.
http://picasaweb.google.com/ rajuktitus
http://groups.yahoo.com/group/ fukuoka_farming/
http://rishikheti.blogspot. com/
मै ऐसा सोचता हूँ की हमारा देश हमारे शरीर के माफिक है.
यदि हमारा शरीर ताकतवर है तो वह हमारे शरीर में बाहरी बीमारियों को नहीं आने देगा और हम स्वास्थ रहेंगे. यद हम स्वं अपने खान पान और रहन सहन से अपने शरीर को कमजोर करते हैं तो वह बाहरी बीमारी से नहीं बच सकता है.
विदेशी निवेश एक बीमारी है जो हमारे देश में हमारी कमजोरी के कारण आ रही है. आपने अमूल का उदाहरण दिया है एक जमाना था अमूल के किसान सरकार से कहते थे हमें आप के पैसे और नेता की जरुरत नहीं है.
हमारी खेती किसानी हजारों साल आत्म निर्भर रही वह बिना बिजली और बिना आयातित तेल के अनेक कुदरती आपदाओं के रहते सुरक्षित रही. उस में जान थी. किसान सम्मान से जीता था. किन्तु आयातित तेल से की जाने वाली "हरितक्रांति" ने हमारी खेती किसानी को इतना निर्बल बना दिया है की हम विदेशी तेल के बिना कुछ नहीं कर सकते हैं.
खाद्य सुरक्षा और खेती किसानी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.
इस का उद्धार विदेशी निवेश से नहीं वरन आत्म निर्भर खेती से ही संभव है. जिस में सरकारी निवेश की भी कोई जरुरत नहीं है. ये भी बहुत बड़ा धोका है.
--
Raju Titus.Natural farm.Hoshangabad. M.P. 461001.
rajuktitus@gmail.com. +919179738049.
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Monday, October 1, 2012
. Non-Violent Way of Agriculture. Natural way of farming
.
Non-Violent Way of Agriculture.
Natural way of farming
Globally
Human beings are facing many environmental problems such as Global warming,
disturbed weather conditions, Drought, Flood, Earthquakes and Tidal etc. We
the human beings have forced our Earth towards environmental destruction. The
main reason for this destruction is violence based development and the violent
agricultural practices have played a major role in it.
Since thousands of year
tilling of land has been practiced and considered as a holy work in agriculture
but it is the biggest violent torture towards biodiversity. What I want to
emphasize here that this is the biggest violence globally and hence causing
desertification. Tilling practices does not allow rain water to reach ground
water level and the fertile top soil is flooded. This converts the organic
manure into green house gas. The layer of this gas in the atmosphere causes
global warming and also the reason for disturbed weather conditions. The first
step in agriculture which is plowing makes the land diseased and hence creates
a need of treatment. The worst beginning starts a long course of chemical use
and wrong practices. Which includes chemical fertilizers, insectisides,
weedisides and harmones etc? Availability of chemically grown food everywhere
has become most hazardous part to the health of human beings. Cancer and many
diseases have become common by eating chemically grown food. In the context of Indian scenario this
chemical based farming has made agriculture a practice of losing terms of input
and returns. To meet the expenses, farmers depends on loans which makes
agro-produce costly. Farmers are committing suicide. In the last 15 years 3
lacs farmers have committed suicide in India.
In our family farm we have been practicing Natural Way of Farming without tilling,
weeding and manure since 27 years. This farming system has been innovated by a
Japanese Microbiologist and Natural farmer Masnobu Fukuoka. Now it has the highest productivity
and highest nutritive value. This farming system is totally dependent upon
"Natural truth and Nonviolence" practicing this way of farming leads
to grow different types of vegetation even in deserts. And even by eating
natural produces, Cancer can be treated. There is a lowest need of petroleum
and electricity in this farming practice hence it is a low cost farming system
and the agro-produce are much cheaper than other. It is the best system to
revive water holding capacity of the land which can even fight with the
problems like drought, flood, global warming and carbon emission problems.
Now a day many
alternative agricultural practices have been practiced by farmers all over the
world but No farming system makes a cordial relationship with Nature. Searching
alternative organic methods of killing insects, using pheromone traps etc.
which does not involves chemical but disturbs the ecological balance of our
farm hence far from sustainability and involves Violence.
Our system of Natural farming proves
the "Natural Truth" which is "Live And Let Live" philosophy
cordially with a balanced ecology. In a farm the farmer and his family gets
Natural food, fresh air and naturally treated soothing mineral water which
enhances a feeling of Simplicity and peaceful living. Nature Itself mobilizes
an individual to become a peaceful good Human being and it can be a way back to
the Nature. Nature and God is like a coin with two different faces both
sides.
During these 27 years
we found that the "Quaker way of life" and Natural farming is based
on "Do Nothing" concept. We have been promoting this system in our
farm and the approach is "Practice and Learn". We conduct Trainings
for interested people and farmers in our farm and even go to their farm for trainings
and Model setup. We have mobilized
farmers and established Natural farming system all over India. Marginal
and small farmers in rural areas have been benefited by our trainings. Quarter Acre of land is sufficient for 4 to 6 members of a
family. Per day one hour working is sufficient by each member in this system;
the rest of the time can be given to Humanity by the members. We found the key
of “peace" is near to Nature N.F. is the way.
We
promise to contribute to the Quakers "Global Change Consultation” by
promoting peaceful system of farming and living. You can invite us for
trainings in your farm or nearby areas to benefit community. We invite
interested volunteers to our farm to practice and learn. If you feel our
contribution is valuable towards Humanity then you can also assist in terms of
Donation for training program because the Destiny of our Planet is now depends
upon Human Hands.
GLOBAL CHANGE वैश्विक परिवर्तन अहिंसात्मक खेती का आन्दोलन
वैश्विक परिवर्तन
अहिंसात्मक खेती का आन्दोलन
हम लोग इन दिनों अनेक पर्यावरणीय संकट जैसे ग्लोबल वार्मिंग, मोसम परिवर्तन, सूखा और बाढ़, भूकंप , ज्वार भाटों आदि से जूझ रहे हैं. इन तमाम मुसीबतों के पीछे पर्यावरण विनाश, कुदरती कम वरन मानव निर्मित अधिक हैं. इस का मूल कारण हिंसात्मक विकास है. जिस में हिंसात्मक खेती का सब से बड़ा हाथ है.
खेती करने के लिए की जा रही जमीन की जुताई (Plowing) भले हजारों सालों से एक पवित्र काम समझा जाता रहा है किन्तु इस से होने वाली जैव-विवधताओं की हिंसा विश्व की किसी भी हिंसा से बड़ी है. इस से एक और जहाँ हरे भरे वन, कुदरती बाग़ बगीचे, और चारागाह रेगिस्थान में तब्दील हो रहे हैं वही बारिश का पानी जमीन में ना जाकर तेजी से बहता है वह अपने साथ उपजाऊ मिट्टी को भी बहा कर ले जाता है.और जुताई करने से जैविक खाद, ग्रीन हॉउस गेस में तब्दील हो जाती है जो आकाश में एक आवरण बना लेती है जिस से ग्लोबल वार्मिंग और मोसम परिवर्तन की समस्या निर्मित हो रही है.
इस से खेत कमजोर हो जाते हैं जिनमे फसलों को पैदा करने के लिए रासयनिक उर्वरक,कीट नाशकों,खरपतवार नाशकों, हारमोन आदि डाले जाते हैं. जिस से मिट्टी,पानी और फ़सलें जहरीली हो जाती हैं. हमारी थाली में जहर घुल जाता है. जिसको खाने से केंसर, खून की कमी, नव जात बच्चों की मौत, अपंगता आदि अनेक समस्याएँ आम हो गयी हैं. जुताई और रसायनों के उपयोग के कारण खेती की लागत बहुत बढ़ जाती है. इस खर्च को पूरा करने के लिए किसान कर्जों पर आश्रित हो जाते हैं. इस से एक और जहाँ खेती के उत्पाद महंगे हो जाते हैं वहीँ खेती घाटे का सौदा बन रही है किसान आत्म हत्या कर रहे हैं . भारत में पिछले १५ सालों में करीब ३ लाख किसान आत्म हत्या कर चुके हैं.
हम पिछले २७ सालों से अपने पारिवारिक फार्म पर जुताई ,दवाई और खाद के बिना की जाने वाली कुदरती खेती का अभ्यास कर रहे हैं जिसे दुनिया भर में लोग "नेचरल फार्मिंग " के नाम से जानते हैं. इस का अविष्कार जापान के जाने माने कुदरती किसान मस्नोबू फुकुओका जी ने किया है. इस खेती की उत्पादकता और गुणवत्ता सब से अधिक है. ये खेती पूरी तरह "कुदरती सत्य और अहिंसा" पर आधारित है. इसको करने से एक और जहाँ रेगिस्थान हरयाली में तब्दील हो जाते हैं वहीँ इनके उत्पादों को खाने से केंसर जैसी बड़ी से बड़ी बीमारी अच्छी हो जाती है. खेती में लागत नहीं के बराबर रहने से उत्पाद बहुत सस्ते होते हैं और किसानो को घाटा नहीं होता है. इस में पेट्रोलियम और बिजली की मांग नहीं के बराबर रहती है, बरसात का पानी जमीन में समां कर स्टोर हो जाता है. जिस से सूखा और बाढ़ की समस्या नहीं रहती है.
CO2 का उत्सर्जन रुक जाता है जिस से ग्लोबल वार्मिंग और मोसम परिवर्तन जैसी विकट समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है.
कुदरती खेती " जिओ और जीनो" पर आधारित है. इस में जमीन में पैदा होने वाली तमाम वनस्पतियों,कीड़े मकोड़ो,जीव जंतुओं ,सूक्ष्म जीवाणु को सुरक्षा प्रदान की जाती है जिनके के सहारे हम अपना भोजन उगाते हैं.
कुदरती खेती में परम्परागत खेती की तुलना में उत्पादकता और गुणवत्ता अधिक रहती है. हरियाली पनपती है और भूमिगत जल का स्तर बढ़ता है. कुदरती खान,पान और हवा के सेवन से जीवन में सादगी और शांति से रहने की इच्छा जाग्रत हो जाती है. ये केवल खेती नहीं है वरन अच्छे इन्सान बनने का जरिया है.
इन दिनों हमें राजनीतिक और धार्मिक भेदभाव के कारण हो रही लड़ाइयों का संकट सता रहा है. आतंकवाद और नक्सलवाद इस की देन है. इस के पीछे हिंसात्मक खेती के कारण हो रहे विनाश का सीधा सबंध है. कुदरती खेती क़ुदरत की और वापसी का मार्ग है ये हमें बचा सकती है. क़ुदरत और ईश्वर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.
हमने २७ सालों में कुदरती खेती के अभ्यास से सीखा है की क्वेकर जीवन पद्धति और कुदरती खेती "कुछ मत करो" के नेतिक मूल्यों पर आधारित है. हम इस के प्रचार और प्रसार में कार्यरत हैं. अपने फार्म पर" करो और सीखो " के माध्यम से प्रशिक्षण देते हैं. और दूसरों के फार्म पर जाकर उनको" करके सिखाते हैं". ये हमारे "विश्वाश का व्यव्हार" है. अब तक हम भारत के अनेक प्रान्तों में अनेक फार्म बनवा चुके हैं. हम इस योजना का लाभ गाँव में रहने वाले गरीबों में सबसे गरीब भूमिहीन,छोटे और मंझोले किसान परिवारों को उपलब्ध करा रहे हैं. मशीनों से की जाने वाली जुताई और रसायनों के उपयोग के कारण इन परवारो को रोटी.कपडा और मकान नसीब नहीं हो रहा है. बेरोजगारी बढ़ रही है. ये खेती हाथों से की जाती है महिलाएं या बच्चे भी इसे आसानी कर लेते हैं. एक चोथाई एकड़ जमीन ५-६- सदस्यों वाले परिवार के लिए पर्याप्त है इस में परिवार के एक सदस्य को एक घंटे से अधिक काम करने की जरुरत नहीं है. बाकि समय वे समाज की सेवा में लगा सकते हैं.
हम सब जानते हैं की हमारी खेती और हमारे खान पान और हमारे पर्यावरण का सीधा सबंध है. यदि हम अहिंसात्मक कुदरती खेती का अभ्यास करते हैं तो हम शांति से रह सकते हैं हिंसात्मक खेती से हिंसा पनपती है. विश्व शांति की कुंजी और कही नहीं वह धरती के पास है.
हमारा सभी मित्रो से अनुरोध है की इस पुनीत कार्य में सहयोग प्रदान कर क्वेकर की "वैश्विक परिवर्तन " योजना में सहयोग करें , आप अपने छेत्र में इस का अभ्यास और प्रचार प्रसार का काम कर सकते हैं. हम इस में हर प्रकार से सहयोग करने का वादा करते हैं. आप प्रशिक्षण के लिए हमारे यहाँ स्वं सेवक भेज सकते हैं. आप हमारे फार्म की प्रशिक्षण सेवा के लिए दान भी दे सकते हैं.
धन्यवाद
--Shalini and Raju Titus.
Quaker Family Farm.
vil. Khojanpur
Hoshangabad. M.P.
461001.
rajuktitus@gmail.com. +919179738049.
http://picasaweb.google.com/ rajuktitus
fukuoka_farming yahoogroup
http://rishikheti.blogspot. com/
अहिंसात्मक खेती का आन्दोलन
हम लोग इन दिनों अनेक पर्यावरणीय संकट जैसे ग्लोबल वार्मिंग, मोसम परिवर्तन, सूखा और बाढ़, भूकंप , ज्वार भाटों आदि से जूझ रहे हैं. इन तमाम मुसीबतों के पीछे पर्यावरण विनाश, कुदरती कम वरन मानव निर्मित अधिक हैं. इस का मूल कारण हिंसात्मक विकास है. जिस में हिंसात्मक खेती का सब से बड़ा हाथ है.
खेती करने के लिए की जा रही जमीन की जुताई (Plowing) भले हजारों सालों से एक पवित्र काम समझा जाता रहा है किन्तु इस से होने वाली जैव-विवधताओं की हिंसा विश्व की किसी भी हिंसा से बड़ी है. इस से एक और जहाँ हरे भरे वन, कुदरती बाग़ बगीचे, और चारागाह रेगिस्थान में तब्दील हो रहे हैं वही बारिश का पानी जमीन में ना जाकर तेजी से बहता है वह अपने साथ उपजाऊ मिट्टी को भी बहा कर ले जाता है.और जुताई करने से जैविक खाद, ग्रीन हॉउस गेस में तब्दील हो जाती है जो आकाश में एक आवरण बना लेती है जिस से ग्लोबल वार्मिंग और मोसम परिवर्तन की समस्या निर्मित हो रही है.
इस से खेत कमजोर हो जाते हैं जिनमे फसलों को पैदा करने के लिए रासयनिक उर्वरक,कीट नाशकों,खरपतवार नाशकों, हारमोन आदि डाले जाते हैं. जिस से मिट्टी,पानी और फ़सलें जहरीली हो जाती हैं. हमारी थाली में जहर घुल जाता है. जिसको खाने से केंसर, खून की कमी, नव जात बच्चों की मौत, अपंगता आदि अनेक समस्याएँ आम हो गयी हैं. जुताई और रसायनों के उपयोग के कारण खेती की लागत बहुत बढ़ जाती है. इस खर्च को पूरा करने के लिए किसान कर्जों पर आश्रित हो जाते हैं. इस से एक और जहाँ खेती के उत्पाद महंगे हो जाते हैं वहीँ खेती घाटे का सौदा बन रही है किसान आत्म हत्या कर रहे हैं . भारत में पिछले १५ सालों में करीब ३ लाख किसान आत्म हत्या कर चुके हैं.
हम पिछले २७ सालों से अपने पारिवारिक फार्म पर जुताई ,दवाई और खाद के बिना की जाने वाली कुदरती खेती का अभ्यास कर रहे हैं जिसे दुनिया भर में लोग "नेचरल फार्मिंग " के नाम से जानते हैं. इस का अविष्कार जापान के जाने माने कुदरती किसान मस्नोबू फुकुओका जी ने किया है. इस खेती की उत्पादकता और गुणवत्ता सब से अधिक है. ये खेती पूरी तरह "कुदरती सत्य और अहिंसा" पर आधारित है. इसको करने से एक और जहाँ रेगिस्थान हरयाली में तब्दील हो जाते हैं वहीँ इनके उत्पादों को खाने से केंसर जैसी बड़ी से बड़ी बीमारी अच्छी हो जाती है. खेती में लागत नहीं के बराबर रहने से उत्पाद बहुत सस्ते होते हैं और किसानो को घाटा नहीं होता है. इस में पेट्रोलियम और बिजली की मांग नहीं के बराबर रहती है, बरसात का पानी जमीन में समां कर स्टोर हो जाता है. जिस से सूखा और बाढ़ की समस्या नहीं रहती है.
CO2 का उत्सर्जन रुक जाता है जिस से ग्लोबल वार्मिंग और मोसम परिवर्तन जैसी विकट समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है.
कुदरती खेती " जिओ और जीनो" पर आधारित है. इस में जमीन में पैदा होने वाली तमाम वनस्पतियों,कीड़े मकोड़ो,जीव जंतुओं ,सूक्ष्म जीवाणु को सुरक्षा प्रदान की जाती है जिनके के सहारे हम अपना भोजन उगाते हैं.
कुदरती खेती में परम्परागत खेती की तुलना में उत्पादकता और गुणवत्ता अधिक रहती है. हरियाली पनपती है और भूमिगत जल का स्तर बढ़ता है. कुदरती खान,पान और हवा के सेवन से जीवन में सादगी और शांति से रहने की इच्छा जाग्रत हो जाती है. ये केवल खेती नहीं है वरन अच्छे इन्सान बनने का जरिया है.
इन दिनों हमें राजनीतिक और धार्मिक भेदभाव के कारण हो रही लड़ाइयों का संकट सता रहा है. आतंकवाद और नक्सलवाद इस की देन है. इस के पीछे हिंसात्मक खेती के कारण हो रहे विनाश का सीधा सबंध है. कुदरती खेती क़ुदरत की और वापसी का मार्ग है ये हमें बचा सकती है. क़ुदरत और ईश्वर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.
हमने २७ सालों में कुदरती खेती के अभ्यास से सीखा है की क्वेकर जीवन पद्धति और कुदरती खेती "कुछ मत करो" के नेतिक मूल्यों पर आधारित है. हम इस के प्रचार और प्रसार में कार्यरत हैं. अपने फार्म पर" करो और सीखो " के माध्यम से प्रशिक्षण देते हैं. और दूसरों के फार्म पर जाकर उनको" करके सिखाते हैं". ये हमारे "विश्वाश का व्यव्हार" है. अब तक हम भारत के अनेक प्रान्तों में अनेक फार्म बनवा चुके हैं. हम इस योजना का लाभ गाँव में रहने वाले गरीबों में सबसे गरीब भूमिहीन,छोटे और मंझोले किसान परिवारों को उपलब्ध करा रहे हैं. मशीनों से की जाने वाली जुताई और रसायनों के उपयोग के कारण इन परवारो को रोटी.कपडा और मकान नसीब नहीं हो रहा है. बेरोजगारी बढ़ रही है. ये खेती हाथों से की जाती है महिलाएं या बच्चे भी इसे आसानी कर लेते हैं. एक चोथाई एकड़ जमीन ५-६- सदस्यों वाले परिवार के लिए पर्याप्त है इस में परिवार के एक सदस्य को एक घंटे से अधिक काम करने की जरुरत नहीं है. बाकि समय वे समाज की सेवा में लगा सकते हैं.
हम सब जानते हैं की हमारी खेती और हमारे खान पान और हमारे पर्यावरण का सीधा सबंध है. यदि हम अहिंसात्मक कुदरती खेती का अभ्यास करते हैं तो हम शांति से रह सकते हैं हिंसात्मक खेती से हिंसा पनपती है. विश्व शांति की कुंजी और कही नहीं वह धरती के पास है.
हमारा सभी मित्रो से अनुरोध है की इस पुनीत कार्य में सहयोग प्रदान कर क्वेकर की "वैश्विक परिवर्तन " योजना में सहयोग करें , आप अपने छेत्र में इस का अभ्यास और प्रचार प्रसार का काम कर सकते हैं. हम इस में हर प्रकार से सहयोग करने का वादा करते हैं. आप प्रशिक्षण के लिए हमारे यहाँ स्वं सेवक भेज सकते हैं. आप हमारे फार्म की प्रशिक्षण सेवा के लिए दान भी दे सकते हैं.
धन्यवाद
--Shalini and Raju Titus.
Quaker Family Farm.
vil. Khojanpur
Hoshangabad. M.P.
461001.
rajuktitus@gmail.com. +919179738049.
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fukuoka_farming yahoogroup
http://rishikheti.blogspot.
Saturday, September 29, 2012
फलों की कुदरती खेती PROTECT FRUIT TREES IN DROUGHT
फलों की कुदरती खेती
दूसरी महत्वपूर्ण बात जो उन्होंने बताई है फलों के पेडों के आस पास गडडे बनाके जड़ों को कतरकर और उसमे अनेक प्रकार की खाद, दवा और गोबर / गो मूत्र आदि को डालने से तथा शाखाओं की छटाई करने से पेड कमजोर हो जाते है वे हर साल फलते नहीं है उत्पादन गिरजाता है वे बीमार होकर सूख जाते हैं.
जब से महारास्ट्र में फुकुओका जी की इस विधि की जानकारी मिली है अनेक किसानो ने अपने बगीचे सूखने से बचा लिए हैं. अब वे हर साल बढ़ते क्रम में फलों का उत्पादन ले रहे हैं. फलों के स्वाद और खुशबू के कारण उनका मुनाफा बहुत बढ़ गया है.
--
Raju Titus.Natural farm.Hoshangabad. M.P. 461001.
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अभी कुछ सालों पहले तक महारास्ट्र
में संतरों की खेती बहुत अच्छी होती थी किन्तु फल बागों में, खेती के
वैज्ञानिकों की सलाह से किये जाने वाले गेर कुदरती कार्यों के कारण अब फल
बाग़ बुरी तरह सूख रहे हैं. इस का मूल कारण फलों के बीच में जुताई कर की
जाने वाली खेती है. ये समस्या पूरी दुनिया में की जा रही फलो की खेती के साथ है
फुकुओका जी सब से पहले किसान थे जो अपने फलों के बागानों में जुताई नहीं करते थे और बीच में होने वाली तमाम खरपतवारों को भी वे सहेजते
थे यानि उनकी रक्षा करते थे. उनका मतलब ये है की हर पेड़ के अपने साथी
होते हैं जो जो एक दूसरे के पूरक होते हैं. वे जब १९८८ में हमरे फार्म पर
पधारे थे बता रहे थे की पेडों की छाया की गोलाई में जितनी भी हरयाली होती
है उस में फल के पेडों के अनेक साथी निवास करते हैं. इस के अलावा फलों के
पेडों पर लगने वाली बीमारी के कीड़ों के दुश्मन भी रहते हैं. इस कारण फलों
के पेड़ एक और जहाँ बीमारी से सुरक्षित रहते हैं वहीँ वे हर साल बढ़ते क्रम
में फल देते हैं .उनके फलों का रंग ,स्वाद,और जायका भी हर साल बढ़ता जाता है.दूसरी महत्वपूर्ण बात जो उन्होंने बताई है फलों के पेडों के आस पास गडडे बनाके जड़ों को कतरकर और उसमे अनेक प्रकार की खाद, दवा और गोबर / गो मूत्र आदि को डालने से तथा शाखाओं की छटाई करने से पेड कमजोर हो जाते है वे हर साल फलते नहीं है उत्पादन गिरजाता है वे बीमार होकर सूख जाते हैं.
जब से महारास्ट्र में फुकुओका जी की इस विधि की जानकारी मिली है अनेक किसानो ने अपने बगीचे सूखने से बचा लिए हैं. अब वे हर साल बढ़ते क्रम में फलों का उत्पादन ले रहे हैं. फलों के स्वाद और खुशबू के कारण उनका मुनाफा बहुत बढ़ गया है.
PROTECT FRUIT TREES IN DROUGHT
Fruit growers are
in crisis due drought. Their orchards are dying. Many orange orchards in Maharashtra are dying. This is happening due to unnatural way of farming.
Farmers are tilling under the shade area of
trees. Rain water is not going in is flowing and removing
organics.
Masnobu Fukuoka
founder of Natural Farming was first who stopped tilling and removing green
cover of weeds from his orchards .Now all fruit growers of Japan
following his method. Many orange growers in America
are also in crisis due to drought.
He visited my farm in 1988. He was saying
that many small, insects and microbes lives the under green cover of weeds.
This diversity supply nutrients, make soil perforated,rain water
easily goes inside the soil. Many predators living in green weed cover control
harmful insects, trees remain healthy gives every year fruits
in increasing manner. Taste and flavor also improves.
Second he told that
digging around trees, cutting roots and filling cow dung, chemicals etc. and
pruning is harmful in natural growth. Trees become sick and dye .
Many farmers of Maharashtra near Nagpur
are following Fukuoka's method are safe in drought.
--
Raju Titus.Natural farm.Hoshangabad. M.P. 461001.
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