Friday, June 10, 2016

जंगल और खेती की लड़ाई को ऋषि खेती से दूर करें !

जंगल और खेती की लड़ाई को ऋषि खेती से दूर करें !


मे आज़ाद हुए अनेक वर्ष हो गए हैं और हमे यह समझ में नहीं आ रहा की हम किधर जाएँ जंगलों की ओर  जाएँ या जंगलों को नस्ट कर खेती करें। जब से मेनका जी ने अपनी  खुद की सरकार के पर्यावरण मंत्रालय पर प्रश्न सिंह लगा दिया है यह  विषय वाकई में सोचने लायक बन गया है की हम कहां जाये ?
बिहार में करीब 250 नील गायों को मार दिया गया है। 

हमने गैर पर्यावरण खेती करके अपने पर्यावरण को इस हद तक बर्बाद कर दिया है किअब खेती   करने के लिए न तो मौसम साथ दे रहा है न ही सिंचाई के लिए पानी बचा है। खेती किसानी घाटे का  सौदा बन गयी है  किसान खेती छोड़ रहे हैं अनेक किसान आत्म - हत्या करने लगे हैं।

यही कारण है कि भारत सरकार ने अब अपने पर्यावरण मंत्रालय के माध्यम से हर प्रदेश में टाइगर प्रोजेक्ट के आधीन पर्यावरण को बचाने की मुहिम चलायी है। इस प्रोजेक्ट में शेरों के साथ साथ अनेक विलुप्त हो रहे जंगली जानवरों ,पेड़ पौधे ,वनस्पतियों आदि को बचाया जा रहा है।  जिसमे पर्यावरण मंत्रालय और वर्ल्ड बैंक करोड़ों रूपये खर्च कर रहा है।

इसी संरक्षण की योजना के  तहत अनेक जंगली जानवर जैसे हाथी ,शेर ,हिरण , नील गाय आदि को जब जंगलों में आहार ,पानी नहीं मिलता है तो ये जंगलों को छोड़कर खेतों में आ जाते हैं।  जिसके कारण किसानो की फसल का नुक्सान होता है।

 इस समस्या से निपटने के लिए जब राज्य सरकारें पर्यावरण मंत्रालय से शिकायत करती हैं तो पर्यावरण मंत्रालय जानवरों को मारने की अनुमति दे देता है।    इसके कारण असंख्य बेजान जंगली जानवर मौत के घाट  उतार दिए जा रहे हैं। यह गलत है। क्योंकि भारत सरकार का पर्यावरण मंत्रालय "जिओ और जीनो दो पर आधारित है "
ऋषि खेती का "आल इन वन " फार्म 

इस समस्या में सारा दोष गैर पर्यावरणीय कृषि का है। जिसे हरित क्रांति के नाम से जाना जाता है।  आज दुनिया भर में जितना  भी पर्यावरण का नुक्सान  हुआ है उसमे जंगलों को काटकर ,खेतों को खूब जोतकर ,उसमे अनेको रासायनिक जहर डाल  कर खेती करने वाले किसानो का हाथ है।

हरित क्रांति आने से  पहले भारतीय खेती किसानी में प्राय हर किसान अपने खेतों में स्थाई  जंगल और चरोखर रखते थे।  किन्तु हरित क्रांति के बाद निजी जंगल और चरोखर सब मोटे अनाजों के खेत में तब्दील हो गए।  जंगल सरकारी हो गए चरोखर खेत बन गए इसलिए खेती और जंगल में लड़ाई छिड़ गयी है।

यदि हमे इस समस्या से निजात पाना  है तो हमे अपने खेतों को ही जंगल जैसा बनाने की जरूरत है।  वह तब संभव है जब हम बिना जुताई ,रसायनों ,मशीनों से की जाने वाली ऋषि खेती का अभ्यास करें। जैसा हम पिछले तीस सालो से अपने पारिवारिक खेतों में कर रहे हैं। हमारे खेत वर्षा वनों की तरह काम कर रहे हैं।

ऋषि खेतों में जंगल और अनाज के खेत अलग नहीं रहते हैं। हरे भरे पेड़ोंके साथ फल , अनाज ,सब्जिओं की खेती होती है। हमारे ऋषि खेतों को हम "आल इन वन " कहते हैं  यानि अनाज ,पशुपालन ,जंगल सब एक साथ। यदि हर कोई ऐसी खेती करता है तो अलग से सरकार को जंगल और जंगली जानवरों को बचाने की जरूरत नहीं रहेगी।
                                  Natural Farming "All in One Garden " Video youtube
सब लोग अपनी पसंद से अपनी फसलों और पशु पालन का चुनाव कर अपने पर्यावरण का संरक्षण कर सकते हैं। अपने अच्छे पर्यावरण में हम हाथी ,नील गाय ,शेर आदि जो भी हो हमारी इच्छा के अनुसार पाल सकते हैं।
ऐसे अनेक किसान है जो अपनी जमीन में जंगल बना और बचा रहे हैं हम उनको सलाम करते हैं। जब तक किसान अपनी खेती किसानी को बचाने के लिए अपने पर्यावरण को नहीं बचाता है वह भी नहीं बच पयेगा।

मेनका जी का कहना सही है की जब हमने जंगलों और जैव-विवधताओं के संरक्षण के लिए जंगलों से गैर पर्यावरणीय खेती करने वालों को हटाया है तब हम क्यों उन जानवरों को मरवा रहे हैं। पर्यावरण मंत्रालय को चाहिए की वो जंगलों में रहने वाले और जंगलों से सटे गांवों में रहने वाले किसानो को ऋषि खेती करने के लिए बाध्य करें जब जाकर जंगल और खेती की लड़ाई खत्म होगी।

2 comments:

Anonymous said...

hello sir
My name is Jatin. I own a small farm land at lucknow and doing kheti first time last 2 yrs.But neel gai destroys everything we cannot grow any pulses except rice and wheat.By rishi kheti how neel gai would not destroy any crop.

Raju Titus said...

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