Thursday, March 8, 2012

सामाजिक खेती (Community - supported agriculture CSA )


                                                      
                                              सामाजिक खेती


                      (Community - supported agriculture CSA )
     ज कल बाज़ार न तो किसानो के हक़ में रहा है नहीं वह ग्राहकों की चिंता करता है. इस लिए एक और जहाँ किसानो को बाज़ार के लिए नए नए तरीके से खेती करते परेशान होना पड़ रहा है वहीँ चाह  कर, अच्छी से अच्छी कीमत चुकाने पर भी ग्राहकों को मन पसंद आहार नहीं मिल रहा है.
   
सबसे बड़ी समस्या स्वादिष्ट,स्वास्थवर्धक, कुदरती आहार की है. ये लगातार ग्राहकों से दूर होते जा रहा है ऐसा खेती करने की गेर कुदरती तकनीकों के कारण  है. गहरी और बार बार मशीनो से की जाने वाली जुताई, अत्यधिक घातक खरपतवार और कीट नाशक जहरों , रासयनिक उर्वरक आदि के उपयोग से अब हमारे खाने की तमाम फसलें जहरीली होती जा रही हैं. जिस से केंसर जैसी जानलेवा बीमारियाँ अब हर दसवे घर में दस्तक देने लगी है. हाल ही के एक अंतररास्ट्रीय सर्वे ने बताया की तीन चोथाई महिलाओं में हीमोग्लोबिन का स्तर सामान्य से कम है. नवजात शिशुओं  की मौत  का भी आंकड़ा भी सामान्य से बहुत अधिक है. एक और जहाँ कुदरती चारे की कमी  के कारण कुदरती दूध भी अब ग्राहकों को  नहीं मिल रहा है वहीँ  दूध पिलाने वाली माताओं के दूध में अब फसलों में डाले जाने वाले जहरों के अवशेष मिलने लगे हैं. इस लिए डॉ. माताओं को अपना दूध देने से मना करने लगे हैं. उनका कहना है की यदि बच्चों को जहरीला दूध दिया गया तो उन्हें कम उम्र में  ही केंसर हो सकता है.
      
पंजाब भारत  का  खेती किसानी का विकसित प्रदेश  कहलाता है. वहां भी अब आम आदमी  के खून में फसलों में डाला जाने वाला जहर घुलने लगा है. केंसर महामारी  के रूप में जड़ जमा रहा है. वहां से एक ट्रेन  मुबई जाती है जो  केंसर के मरीजो को भर कर ले जाती है इस  ट्रेन का नाम ही केंसर ट्रेन रख दिया गया है.
     अधिकतर लोग समझते हैं की रासयनिक दवाओं,टानिकों, आदि से कमजोर होते खेतों की कमजोर फसलें ताकतवर हो जाती हैं ये भ्रान्ति है. बल्कि इन फसलों में रासयनिक जहर घुलने से ये और भी प्रदूषित हो जाती है. स्वाद किसी भी फसल के गुण को दर्शाता है हर स्वादिष्ट आहार गुणकारी भी होता है. यदि स्वाद नहीं है तो आहार भी गुणकरी नहीं रहेगा. इस लिए आज कल आम आदमी ये कहते पाया जाता है की जो स्वाद पहले मिलता था अब नहीं मिलता है. बच्चे भी स्वाद की कमी के कारन खाना ठीक से नहीं खाते हैं इस लिए उनका सही विकास नहीं हो रहा है. मोटापा मधुमेह जैसी बीमारियाँ अनियंत्रित हो रही हैं.
      इन समस्याओं के कारण आज कल अनेक खेती करने की वैकल्पिक विधियों का विकास हो गया है. जो इस बात का दावा करती हैं की उनके उत्पाद पूरी तरह कुदरती और स्वास्थवर्धक हैं. इसी आधार पर बाज़ार में इन की अलग से दुकाने भी खुलने लगी हैं.जो सामान्य से अधिक कीमत में उत्पादों को बेच रही हैं. इन उत्पादों की प्रमाणिकता के लिए अनेक प्रमाण पत्र देने वाली कम्पनियां भी खुल गयी है. ये दुकाने सामान्यत: जैविक या ओर्गानिक के नाम से चल रही हैं. किन्तु इस से भी आम ग्राहकों की समस्या का अंत नहीं हुआ है. क्यों  की इन में तमाम नकली फसलों, दवाओं.खाद, का बोल बाला है. ग्राहक फिर भी ठगा की ठगा ही रहता है.
     इस समस्या के निवारण में केनेडा,अमेरिका सहित अनेक विकसित राष्ट्रों में ग्राहकों ने एक अभिनव प्रयोग किया है उन्होंने ग्राहक मित्र खेती को करने का बीड़ा उठाया है. ये सामाजिक खेती ( Community -supported agriculture CSA) के नाम से जानी जाती है. वे ग्राहकों के समूह बनाकर कुछ फार्मों को जो उन्हें असली कुदरती आहार प्रदान कर सकते हैं को गोद ले लेते हैं, और उन्हें वे सब सुविधाएँ प्रदान करते हैं जिस से वे असली कुदरती आहार पैदा कर सकें और वे फिर उन उत्पादों को स्वं अपने सदस्यों के मध्य वितरित करते हैं इस में वे फार्मों के उचित प्रबंधन में पूरी तरह  सहयोगी बन जाते हैं. फार्म के घाटे और लाभ में वे पूरी तरह सहयोगी रहते हैं. ये शोषण रहित खेती है. इस में ग्राहकों की मंडलियाँ और किसानो की मंडलियाँ मिलजुल कर कुदरती खेती करते हैं. अनेक बार  वे इस कारण सभाए आयोजित करते हैं.किसानो का सम्मान करते है और उन्हें पुरस्कृत भी करते हैं.
    बाजारू खेती के कारण किसान और हमारे पर्यावरण का बहुत शोषण हो रहा है.बिचोलिये दोनों ग्राहकों और किसानो का शोषण करते हैं. जमीने  ख़राब हो रही हैं, पर्यावरण नस्ट हो रहा है.किसान आत्म हत्या करने लगे हैं.
      सामाजिक खेती का चलन पिछले कुछ सालों में ही  शुरू हुआ है किन्तु कुदरती आहार की मांग के कारण ये बहुत तेजी से पनप रहा है. इस से एक और जहाँ ग्राहक इस लिए संतुस्ट रहते हैं की उन्हें एक और जहाँ कुदरती आहार मिलता है वहीँ वे भी किसान(अन्न दाता ) बन जाते हैं एक जमाना  था की हम सब किसान थे और समाज  में हमारा बहुत सम्मान होता था. गेर कुदरती खेती के कारण किसान अब अपना सम्मान खो रहे हैं.
    सामाजिक  खेती करने से किसान और ग्राहकों के मध्य एक ऐसा सम्बन्ध बन जाता है जिस से दोनों लाभान्वित रहते है, तथा समाज में जल, जंगल ,जमीन के संरक्षक कहलाते हैं. वे सच्चे सम्मान के हक़दार हो जाते हैं. खान,पान आर्थिक लाभ अतिरिक्त रहता है.
    फुकुओका फार्मिंग जो दुनिया भर में नेचरल फार्मिंग के नाम से जानी जाती है. जिस में जमीन की जुताई , मानव निर्मित खाद और दवाओं का बिलकुल उपयोग नहीं होता है. ये खेती खाद बनाने वाली वनस्पतियों, जीव जंतुओं,सूख्स्म जीवाणु के सहारे की जाती है इस लिए पूरी तरह अहिंसात्मक है. जबकि जुताई आधारित सभी खेती करने की विधियाँ हिंसात्मक रहती हैं. खेतों की ताकत का सीधा सम्बन्ध उस में जीवित रहने वाली जैव विविधताओं पर निर्भर रहती है. यदि हम मिट्टी के एक कण को सूख्स्म दर्शी यंत्र से देखें तो उस में अजैविक कुछ भी नजर नहीं आयेगा. ये असंख्य सूक्ष्म जीवाणु का समूह रहता है. इनके कारण ही खेतों में ताकत बनी रहती है. इस ताकत को भूमि के उपर रहने वाली जैव-विविधताएँ ताकत प्रदान करती हैं. फुकुओका फार्मिंग इन तमाम जैव-विविधताओं को बचाते हुए उनके सहारे होती है. जबकि सभी जुताई आधारित खेती की विधियाँ  चाहे वो जैविक ही क्यों न कहालती हों जैव-विवधताओं की हत्या कर की जाती हैं.
     रसायन रहित कम्पोस्ट से की जाने वाली खेती की विधियाँ भी हिंसा पर आधारित रहती हैं इस लिए उन्हें भी हम स्वास्थवर्धक और पर्यावरण  के अनुकूल नहीं मान सकते हैं.
  बिना जुताई की जैविक खेती या बिना जुताई की नेचरल खेती, भूमि ढकाव की फसल जिसे आम आदमी खरपतवार कहता है, के सहारे की जाती है. भूमि ढकाव में अनेक जीव-जंतु  ,कीड़े मकोड़े और सूख्स्म जीवाणु निवास करते हैं. जो लगातार खेतों को उर्वरकता और नमी प्रदान करते है, जिनसे मूल फसलों की खाद और पानी की मांग की आपूर्ति हो जाती है.
       फुकुओका फार्मिंग(नेचरल फार्मिंग) सब से सरल तथा सबसे कम लागत से की जाने वाली खेती है. इस में हरयाली से भरे भूमि ढकाव (कवर क्राप) में सीधे बीजों को बिखराकर या मिट्टी की गोली में बंद कर डाल देने और भूमि ढकाव को जमीन पर सुला भर देने से खेती की बुआई संपन्न हो जाती है.  ये मशीनो के उपयोग के बिना भी सम्भव है. इस को करने से आम खेती की करने की विधियों की तुलना में ९०% खर्च कम आता है इस लिए घाटे की कोई सम्भावना नहीं रहती है. जुताई और खाद के बल पर की जाने वाली खेती में यदि मात्र १५% फसल कम उतरती है तो खेती घाटे का सौदा बन जाती है. कुदरती खेती में गुणवत्ता और  उत्पादन बढ़ते क्रम में मिलता है जबकि गेर कुदरती खेती की विधियों में उत्पादन और गुणवत्ता हर मोसम कम होता है.
     हम पिछले २५ सालों से अधिक समय से नेचरल फार्मिंग के अभ्यास और उसके प्रचार प्रसार में सलग्न हैं. हम सामाजिक खेती के पक्षधर हैं किन्तु हम समाज को किसानी और गेर किसानी  आबादी के रूप में बंटे हुए देखना नहीं चाहते हैं. जब से किसानो का शोषण गेर किसानी आबादी ने करना शुरू किया है. तब से ही खेती किसानी से जुडी समस्या बढती रही हैं जो आज कल चरम सीमा पर हैं. भारत जैसे विकाशशील देश में खेत रेगिस्थान में तब्दील हो रहे हैं और किसान आत्म हत्या करने लगे हैं.
     हम सामाजिक खेती से बहुत उम्मीद रखते हैं  यदि ये  बिना जुताई की जैविक या कुदरती खेती  जैसी खेती करने की विधियों से अनुबंधित होती हैं. अन्यथा ये भी ओर्गानिक के गोरखधंदे जैसी ही साबित होंगी.


 

राजू टाइटस





1 comment:

Amit Sharma said...

Hi Mr Raju,

I am a farmer from Gadarawa M.P.
I want to visit your place and learn zero budget natural farming.
Could you please help in doing the same.