Monday, July 31, 2017

Sushama Bokil बेसन पचानेमें हेवी समझा जाता है ?

Sushama Bokil बेसन पचानेमें हेवी समझा जाता है ?

असल में नारियल का बुरा प्रमुख है रोटी बनाने के लिए बेसन मिलाते हैं वैसे अन्य दालों जैसे उड़द ,फलों का रस और हरी पत्तियों के रस से भी काम चल जाता है  किन्तु गेंहू ,आलू ,चावल और शक्कर मधुमेह /मोटापे का मूल कारण है। जो आगे चल कर अनेक बीमारियों में बदल जाते है ऐसा मेरा निजी अनुभव है मेने मधुमेह के कारण दो हार्ट और एक पैरालेसिस के अटेक झेले हैं। मेरी पत्नी को भी मधुमेह था जिसके कारण उन्हें हार्टअटैक आया था मल्टीपल ब्लॉकेज पता चला था जो मात्र ३-४ माह में खुल गए है बी पी /शुगर नार्मल है।  मेटाफोर्मिन और इन्सुलिन इंजेक्शन विपरीत असर डालते है। हमने पिछले तीन ,चार माह से कोई भी कार्बो नहीं खाया है। ना  दवाई ली है। असल में आज कल सभी कार्बो यूरिया से पैदा किए जाते हैं। दालों  में नत्रजन खाद की जरूरत नहीं पड़ती है । हमने पाया है की हमारे शरीर को कार्बो युक्त आहार जरूरी नहीं है किन्तु कुदरती वसा जरूरी है।  

Thursday, July 27, 2017

गाजर घास के भूमि ढकाव में करें ऋषि खेती

गाजर घास के भूमि ढकाव में करें ऋषि खेती 

 गाजर घास जिसे पार्थेनियम कहा जाता है ,  यह बहुत बदनाम वनस्पति है इसके पीछे अनेक भ्रान्ति हैं। यह कहा जाता है की इस से अनेक प्रकार की बीमारियां होती हैं। इसलिए अनेक दवाइयां कम्पनिया बना रही हैं। 
 जबकि यह बिना जुताई की कुदरती खेती में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब खेतों में जुताई नहीं की जाती है तो गाजर घास जैसी वनस्पतियां खेतों को ढँक लेती हैं। क्योंकि धरती माँ असंख्य जीव जंतुओं ,कीड़े मकोड़ों का घर रहती है। इन जैव-विवधताओं को ऐसे ढकाव की जरूरत रहती है जिसमे वो आसानी से पनप सकें। ये जैव-विवधताएँ अपने जीवन चक्र के जरिये खेत में उन तमाम पोषक तत्वों की आपूर्ति कर देते हैं जिनकी हमारी फसलों को जरूरत रहती है। जिसके कारण किसी भी प्रकार की खाद की जरूरत नहीं रहती है।
दूसरा यह अपने नीचे से उन तमाम नींदों को भी साफ़ कर देती है जो हमारी फसलों में अवरोध उत्पन्न करते हैं।
तीसरा गाजर घास की जड़ें खेत की अच्छे से जुताई कर देती हैं इसमें इनका साथ केंचुए जैसे अनेक जीव जंतु देते हैं।
गाजर घास का यह भूमि ढकाव इनके साथरहने वाले पेड़ों को भी बहुत लाभ पहुंचती है उनकी  बढ़वार अच्छी होती है ,नमि का संरक्षण रहता है तथा बीमारियां नहीं लगती हैं।
इस ढकाव में फसलों को लेने के लिए सीधे या सीड बॉल बना कर बीज डाल  दिए जाते हैं तथा इसे काट कर वहीं बिछा  दिया जाता है।  दूसरा तरीका जो उत्तम है  इन्हे  पांव से चलने वाले
क्रिम्पर से सुला दिया जाता है। इसका  फायदा यह रहता है की गाजर घास एक दम मरती नहीं है जिस से अन्य नींदे नियंत्रित रहते हैं और सोयी हुई गाजर घास तेजी से नमि और पोषक तत्वों को खींचती है जो हमारी फसलों को मिलती है जिस से बंपर उत्पादन प्राप्त होता है।
 गाजर घास को कोई जानवर नहीं खाता है इसलिए इसके लिए फेंसिंग की जरूरत नहीं रहती है। इसके ढकाव में हर प्रकार की फसलें  आनाज ,सब्जियां  ,फल के पेड़ अच्छे पनपते हैं।
गाजर घास में गेंहूं बिना जुताई खाद दवाई की खेती
गाजर घास में गेंहूं की खेती 

गाजर घास से भरा खेत इसमें गेंहू बोया है। 


Tuesday, July 25, 2017

सीड बॉल से मक्का /बरबटी की खेती

सीड बॉल से मक्का /बरबटी की खेती 

मक्का के सीड बॉल (राजू टाइटस )


आज हम मक्का के सीड बॉल बना रहे हैं ये मक्काकी सीड बॉल हैं। मक्का की यह खासियत यह है की यह खरपतवारो के बीच अच्छी पनपती है बड़ी होकर खरपतवारों से बाहर निकल आती है इसकी हार्वेस्टिंग भी सरल है दूसरा यह आगे की  फसलों के लिए पर्याप्त जैविक पदार्थ भी देती है। यदि हम दुधारू पशु पालते हैं तो मक्का का आधा चारा हम गायों के लिए रख सकते हैं और आधा  हम खेत को लोटा सकते हैं जिस से खेत भी संपन्न होते रहते हैं। आज कल गोशालाओं में रासयनिक खेतों से मिलने वाले सूखे चारे जैसे भूसा और पुआल का उपयोग किया जाता है जो उचित नहीं है है इस से दुधारू पशुओं का स्वास्थ बीडग जाता है और दूध भी पोस्टिक नहीं रहता है। मक्का काटने  से पूर्व खड़ी मक्का में बरबटी के बीजों की सीड बॉल डाल  दी जाती है।  बरबटी एक दलहनी फसल है जो मक्का के बाद उसके जैविक स्ट्रॉ में खूब पनपती है।  यह सब्जी ,दाल और चारे में काम आने वाली और जबरदस्त कुदरती यूरिया बनाने वाली फसल है। ऋषि खेती की सीड बॉल तकनीक में बिना जुताई/ खाद  का यह फसल चक्र बहुत लाभकारी सिद्ध हुआ हुआ है।  धन्यवाद 9179738049
 


 

उर्वरको का उल्टा असर होता है।

उर्वरको का उल्टा असर होता है। 

जुताई नही करने और वनस्पतयों के साथ तमाम जैव विवविवधतायों के पनपने से खेतों में पोषक तत्वों का संचार हो जाता है जैसा कुदरती वनो में होता है। जमीन की उर्वरकता बढ़ाने  वाले सूक्ष्म जीवाणु इसमें अहम् भूमिका निभाते है। जब हम क्ले मिट्टी से सीड बॉल बनाकर डालते हैं तो हम असंख्य जमीन को उर्वरता प्रदान करने वाले सूक्ष्म जीवाणु भी खेत  में डाल  देते हैं जो क्ले में रहते हैं।
असंख्य खेत को उर्वरकता प्रदान करने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं वाली क्ले से बनी सीड बाल 

जबकि  रासायनिक उर्वरक उल्टा काम करते हैं जैसे हमारे शरीर में कोई विष या विष्णु के आने से उलटी हो जाती है वैसा ही रासयनिक उर्वरक डालने से होता है जिस से खेत कमजोर हो जाते हैं। सभी रासायनिक उर्वरक जहरीले होते हैं जिन्हे खेत पसंद नहीं करते हैं इसलिए 'उल्टी ' की प्रक्रिया होती है। 9179738049 

Friday, July 21, 2017

बरसात में जब क्ले नहीं मिले तो क्या करें ?

बरसात में जब क्ले नहीं मिले तो क्या करें ?

मै हमेशा यह कहते आया हूँ की क्ले को गर्मियों में इकठा कर पाउडर बना कर उसके सीड बाल बना लेना चाहिए। किन्तु अनेक लोगों को क्ले मिलने और पहचानने में तकलीफ हो रही है इसलिए मेने सलाह दी है की खेत की मेड की मिट्टी जो अनेक सालो से जुताई से बची है जिसमे केंचुओं के घर रहते हैं  को बरसात में ले आएं और उनकी सीड बाल बनाकर बुआई कर ली जाये। किन्तु मेने पाया है की गीली खेत  की मिट्टी अनेक बार इतनी कड़क नहीं रहती जिसे चूहे ना खा सकें इसलिए मेने एक प्रयोग किया है। मेने खेत की मिट्टी में POP(प्लास्टर ऑफ़ पेरिस ) मिलाकर  सीड  बनाये है। POP से सीड बॉल खेत की मिट्टी से अच्छे कड़क बन जाते है और तुरंत सूख जाते हैं।इन्हे जब हम खेत में डालते हैं चूहे नहीं खा पाते हैं ठीक क्ले जैसी कड़क सीड बाल बनाने के लिए हम बरसात में POP का इस्तमाल कर सकते हैं   यह बहुत सस्ता बाजार में मिल जाता है।  यह डिग्रेडेबल पर्या मित्र पदार्थ है। जो क्ले ही है और क्ले की जगह इस्तमाल किया जाता है। जिसका नाम जिप्सम है। यह खाद के लिए भी इस्तमाल होता है।  इसे तीन भाग मिट्टी में एक भाग मिला कर सीड बॉल बनाया जा सकता है।  इसकी सीड बॉल तुरंत सूख कर कड़क हो जाती है जिस से बीज फूल कर खराब भी नहीं होते हैं। खेत में ये सीड बॉल पानी को सोख लेते हैं जिस से बीज फूलकर बॉल को फोड़ लेते हैं और अंकुरित हो जाते हैं।

मुर्गा  जाली से सीड बॉल बनाने के लिए यहां क्लिक करें https://get.google.com/albumarchive/104446847230945407735/album/AF1QipNjehmb859gjXHJE6uqvGkx5WsETSdZH8UOD1cz
 

Thursday, July 20, 2017

ऋषि -खेती शुरू कैसे करें

ऋषि -खेती 

शुरू कैसे करें 

 

जब हम ऋषि खेती जो असल में नेचरल फार्मिंग है जिसे फुकुओका फार्मिंग भी कहा जाता है करते हैं तब हमारा उदेश्य मात्र पैसा कमाना नहीं रहता है। ऋषि खेती वाकई में एक भूमि सुधार योजना है। हम अपनी जमीन को जुताई आधारित खेती के कारण पनपते मरुस्थल से बचा लेते हैं। पहले साल में हमारे खेत हरियाली से भर जाते हैं उसमे कुदरती हवा ,पानी का संचार शुरू हो जाता है। बरसात का पानी जो हर साल बह कर हमारे खेत से निकल जाता था वह  रुक जाता है इस कारण खेत की जैविक खाद का बहना भी रुक जाता है। 

यह सब जानते हैं की फसलों का उत्पादन पूरी तरह खाद और पानी पर निर्भर रहता है  खाद पानी से हमारे खेत भर जाते हैं तो फसलों को तो होना ही है। इसमें हम सीधे बीजों को भी बिखेर सकते हैं। बीजों को सीड बॉल बना कर डालना सबसे सुरक्षित उपाय है।  अनेक फलदार पेड़ों के रोपे  भी लगाते जाते हैं  उदेश्य हमारा अपने खेत को हरयाली से भरना है।  जैसे ही हम जुताई छोड़ते हैं पहली बरसात में हमारे खेत हरयाली से भर जाते हैं ये वनस्पति जो आम भाषा में खरपतवार कहलाती है ऋषि खेती की जान होती है इसको बचाना ऋषि खेती की प्राथमिकता रहती है । इस वनस्पति को हम भूमि ढकाव की फसल कहते हैं जो अपने आप आती है। इसके नीचे असंख्य जीव जंतु , कीड़े मकोड़े ,केंचुए ,सूक्ष्म जीवाणु रहते हैं जो अपने खेत में खाद बना देते हैं। हमारी फसलों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। हम इस वनस्पतियों को सीड बॉल डालते हुए अपनी फसलों से बदल देते हैं जिस से ये लुप्त हो जाती हैं। इन्हे मारने से हमारी फसलें दुखी होकर बीमार हो जाती है । 

सीड बॉल की जानकारी केलिए http://rishikheti.blogspot.in/2016/06/blog-post_20.html क्लिक करें। 

राजू टाइटस 

     

 

Saturday, July 15, 2017

शर्करायुक्त (Carbohydrates) आहार से बीमारियां हो रही है !

शर्करायुक्त (Carbohydrates) आहार से बीमारियां हो रही है !

जुताई आधारित हरित क्रांति के कारण बीमारियां हो रही हैं । यह  अनाजों ,आलू और गन्ने जैसे कार्बो के लिए तो  कारगर है जबकि दालों के उत्पादन में फेल है। शर्करायुक्त फसलों में जबरदस्त यूरिया की मांग रहती है जबकि दलहनी फसले कुदरती यूरिया बनाती है। जुताई करने से खेत बीमार हो जाते हैं जिनमे बीमार फसले पैदा होती हैं जो मधुमेह ,मोटापे और कैंसर जैसी बीमारी का मूल कारण हैं।  

 
 

मेने और मेरी पत्नी ने जब से शर्करायुक्त  आहार छोड़ा है तब से हम दोनों स्वस्थ रहने लगे हैं।  मै इन दिनों 71 + और मेरी पत्नी 67 + में है। सब से पहले मुझे मधुमेह  का पता तब चला जब मुझे पहला हार्ट अटैक आया था। डाक्टरों ने बताया  की यह अटैक मधुमेह के कारण है तब ब्लड शुगर 320  था  मुझे स्टंट उपचार निर्देशानुसार करना पड़ा। किन्तु मात्र तीन माह  में मुझे जबरदस्त हार्ट अटैक आया जिसने  मेरा  हार्ट डाक्टरों के अनुसार आधा ख़राब कर दिया जैसा डाक्टरों ने बताया था। यह घटना मेरे परिवार के लिए बहुत बड़े सदमे की थी जिसके कारण मेरी पत्नी को भी शुगर की बीमारी लग गयी इसका पता लगने से हम दोनों मेटफोर्मिन और इन्सुलिन लेने लगे इसके बावजूद मेरी पत्नी को हार्ट अटैक और मुझे पैरालिटिक अटैक आ गया था। 
शर्करायुक्त (Carbohydret)  बंद करने से इस समस्या को रोका जा सकता है यह जानलेवा है। 

फिर  क्या था हम पूरी तरह डाक्टरी इलाज में फंस गए मेरी पत्नी को मल्टी ब्लॉक बताये थे उन्हें बाय पास सर्जरी  सलाह दी गई थी। जो बहुत खतरनाक है हम घबड़ा गए थे। हमारे सामने आगे पहाड़ पीछे खाई वाली स्थिति थी  इस दौरान  निर्णय लिया की हमे बाय पास नहीं करवाना है।  हम दोनों का करीब एक सा रासायनिक इलाज चल रहा था। हम यह जान गए थे हम दोनों को यह बीमारी मूलत: मधुमेह के कारण है। चूंकि मेरी माताजी  +पिताजी + बड़े भाई का निधन समय पूर्व मधुमेह से हुआ था इसलिए चिंतित होना लाज़मी था। 

 किन्तु पिछले अनेक सालो से बिना रसायनो  और बिना जुताई  की ऋषि खेती करने के  कारण  हमे भरोसा था कि  हम कोई न कोई कुदरती इलाज का तरीका खोज लेंगे। इस खोज में हमारे फेसबुक फ्रेंड श्री विपिन गुप्ताजी जो अनेक सालो से बिना दवाई मधुमेह ,मोटापे और थाइरोइड का इलाज कर रहे हैं   ने हमे बताया था की मधुमेह  गेंहू की रोटी छोड़ने से ठीक हो जाती है उन्होंने हमे गेंहू की रोटी छोड़ कर कच्चा और हरा खाने की सलाह दी थी हमने एक माह ऐसा किया था।  जिस से हमने ब्लड शुगर को कम होते देखा था इसलिए हमे भरोसा था की  शुगर हम दोनों की ठीक हो सकती है। चूंकि हमने अपना इलाज जैसा विपिन गुप्ताजी  ने बताया था को जारी नहीं रख सके थे इसलिए हमे यह मुसीबत झेलनी पड़ी थी। 

 इस दौरान हमारी खोज जारी रही हमने पाया की अधिकतर लोग मधुमेह  और मोटापे के लिए शर्करायुक्त आहार को छोड़ने कि सलाह देते हैं। हमने तुरंत अनाजों का सेवन बंद कर दिया  आलू ,शकर शहद भी त्याग दिया। इसके बदले हमने दालों का सेवन जारी रखा साथ में हमने नारियल के आटे ( बूरे )  और चने का आटा ( बेसन ) को मिला कर रोटी बनाकर खाना  शुरू कर दिया।  असल में हम गेंहू की रोटी के आदि हैं इसलिए रोटी जैसा जब तक न मिले तसल्ली नहीं होती है। हमने में वसा युक्त आहार के लिए दही का सेवन जारी रखा साथ में अंकुरित दालों  सेवन  जारी रखा। घर में जो सब्जियां सामन्यत: बनती हैं वो भी चलती रहीं।

हमने पाया की जिस दिन से हमने अपने आहार में बदलाव लाया था उस दिन से ब्लड शुगर बढ़ना बंद हो गई और वह  घटने लगी इस दौरान हमने मेटफोर्मिन और इन्सुलिन जो मधुमेह की आम दवाइयां हैं को भी बंद कर दिया क्योंकि हमारी शुगर लगातार घट रही थी इसलिए हमे शुगर कम हो जाने का खतरा हो गया था।  अटैक के बाद जितनी दवाइयां दी जा रही थीं सब हमने छोड़ दी। 

शर्करायुक्त आहार छोड़ने का एक अतिरिक्त लाभ मेने पाया की मेरा वजन भी घटने लगा जो 90 + करीब एक माह में 73 हो गया और मेरी मेरी पत्नी का वजन जहां का तहाँ रहा पर उनका बी पी भी बिना दवाई के सामान्य  हो गया। हमने ऊपर वाले का बहुत धन्यवाद किया की उसने हमे एक जान लेवा बीमारी से बचा लिया। 

किन्तु हमारी खोज जारी रही की आखिर शर्करायुक्त आहार में ऐसा क्या है जिस से मधुमेह और ब्लड प्रेशर और मोटापा  बीमारियां आम होने लगी हैं । मेरी छोटी बहन भी मोटापे की मरीज थी जिसे थाइरोड बताया गया था वह भी शर्करायुक्त  आहार को छोड़ने से ठीक हो गई है उसका करीब एक माह में 10  किलो वजन कम हो गया है। 

 हमने पाया की  यह खेती के कारण हो रहा है जब खेतों में जुताई की जाती है तो उसकी नत्रजन (कुदरती यूरिया ) गैस बन कर उड़ जाती  है यह नत्रजन असल में शर्करायुक्त फसलों की जान होती है इसलिए जब वह नहीं रहती है तो कृत्रिम रासायनिक नत्रजन (यूरिया ) डाली जाती है। इस से  फसले  पैदा तो  हो जाती है किन्तु उनमे कुदरती ताकत नहीं रहती है।  इसलिए जहां एक रोटी की जरूरत रहती है वहां अनेक रोटी से भी पेट नहीं भरता है। बिना ताकत के आहार से ये बीमारियां होती हैं। किन्तु दालों में अपेक्षाकृत मामला उल्टा है जहां शर्करायुक्त फसले यूरिया मांगती हैं दालें इसके विपरीत कुदरती यूरिया बनाने का काम करती है। 

यह अनुभव  हमे बिना जुताई ,बिना खाद और बिना दवाई की खेती करने से मिला है हम अपने खेतों में पिछले अनेक सालो से दलहनी फसलों और शर्करायुक्त फसलों जिन्हे  सामन्य भाषा में अनाज कहा  जाता है के समन्वय से खेती कर रहे हैं। जिसकी खोज जापान के जाने माने स्व मस्नोबू फुकुओकाजी ने की है। 

हमारे देश में यह समस्या हरित क्रांति के आने के बाद से आयी है। यह क्रांति मूलत: गेंहू ,चावल,आलू  और गन्ने की खेती में ही अधिक सफल रही है दालों की फसलों  में यह इस कारण पीछे है। इसके लिए हम रासयनिक यूरिया से कहीं अधिक दोष खेतों की जुताई को देते हैं। जुताई करने से खेत की एक बार में आधी ताकत नस्ट हो जाती है हर बार यह  नुक्सान होता रहता है। इस कारण खेत बीमार हो जाते हैं। जिस से हम भी बीमार हो जाते हैं। 

हमने यह भी पाया है  कि हमारे शरीर को शर्करायुक्त आहार की कोई जरूरत नहीं है। किन्तु दालों और वसायुक्त  आहार की जरूरत है। किन्तु यदि हम बिना जुताई की कुदरती खेती करते हैं तो हम सब खा सकते हैं। हमने यह भी पाया है की जब तक हम मधुमेह ,मोटापे और अन्य बीमारियों की गिरफ्त में हैं हमे शर्करायुक्त आहार के परहेज की जरूरत है बाद में कम से कम 6 माह के उपरांत हम कुदरती शर्करायुक्त आहार बे खौफ खा सकते हैं। 

इन दिनों ऑर्गनिक की एक और बीमारी तेजी से पनप रही है कहा  यह जा रहा है सब बीमारियां कृषि रसायनो  से हो रही हैं यह गलत है।  असल में खेतों में बीमारियां जुताई के कारण हैं और बीमार  खेतों में बीमार फसलें  होती हैं इसलिए हम बीमार हो रहे हैं।

राजू टाइटस 

कुदरती खेती के किसान