Monday, December 8, 2014

जलवायु परिवर्तन थामने में मिसाल बना ऋषि खेती फार्म

जलवायु परिवर्तन थामने में मिसाल बना ऋषि खेती फार्म 

विगत दिनों पछमरी  होटल ग्लेन व्यू में एक "जैवविवधता संरक्षण और आजीविका " विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन (17 -19 नवम्बर 2014 ) " भारतीय वन्यजीव संस्थान और वन एवं पर्यावरण विभाग मध्यप्रदेश की ओर से किया गया था।  जिसमे सभी प्रांतों से करीब 80 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग  लिया था।

कार्यशाला का उदेश्य सतपुरा के संरक्षित छेत्रों में जैवविविधता संरक्षण  के माध्यम से ग्रामीण आजीविका को सुनिश्चित करना था। इसमें सभी संरक्षित छेत्रों से अधिकारी गण , स्वं सेवी संस्था के लोग और किसान पधारे थे। इसमें ऋषीखेती के श्री राजू टाइटस को  बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था। ऋषि खेती एक जलवायु परिवर्तन को थामने  वाली क्लाईमेट स्मार्ट खेती है।

जैसा की विदित है इन दिनों जहाँ विकास का बोलबाला है वहीं  हमारा पर्यावरण दिन प्रति दिन खराब होता जा है। एक और आम आदमी की रोटी का प्रश्न है तो दूसरी और जलवायु  को संरक्षित रखने का प्रश्न है। हम सब जानते हैं कि ग्रामीण आबादी की रोजी रोटी खेती पर आश्रित है। जिसमे अनाज की खेती सबसे महत्वपूर्ण है इसमें सर्वाधिक जमीन उपयोग में आ रही है।

अधिकतर हमारा अनाज जमीन की हरयाली को नस्ट कर पैदा किया जाता है।   जिस से सब से अधिक जैवविविधताओ की हिंसा  होती है जिस से जलवायु परिवर्तन की समस्या उत्पन्न हो रही है। सूखा ,बाढ़ ,ज्वार भाटों का आना ,बादलों का फटना आदि अनेक समस्याएं इस से उत्पन्न हो रही हैं। खेत बंजर हो रहे हैं ग्रामीणो की आजीविका का खतरा पैदा हो गया है।

 इसलिए हमे हरे भरे संरक्षित छेत्रों की जरुरत हैं जिसमे जैवविविधताएं पनपती रहें ये संरक्षित छेत्र एक ओर जहाँ जलवायु को नियंत्रित करते हैं वहीं ग्रीन हॉउस गैसों को सोखने का भी काम करते हैं। सतपुरा टाइगर प्रोजेक्ट इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। किन्तु प्रश्न फिर भी ग्रामीण आजीविका का बना हुआ है जिसे हल करने की जरुरत है। अधिकतर प्रतिभागियों ने जैवविविधताओं को संरक्षित करते हुए आजीविका को सुनिश्चित करने के अनेक उपाय बताये।
हरियाली के रक्षक (सतपुरा टाइगर रिज़र्व )

इसलिए अब समय आ गया है की हम खेती के उस रास्ते को बदल दें जिस से हरयाली नस्ट होती है हमे ऐसी खेती अपनाना पड़ेगा जो संरक्षित छेत्रों की तरह जलवायु को नियंत्रित करे और ग्रीन हॉउस  गैसों का अवशोषण भी करे।
ऋषि खेती में फसलो का उत्पादन खरपतवारों और वृक्षों के संरक्षण के माध्यम से किया जाता है जिस से साल भर खेत हरियाली से भरे रहते हैं। इस कारण ऋषि खेत जलवायु संरक्षण और ग्रीन हॉउस गैस के अवशोषण में महत्व पूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह जैवविविधताओं को संरक्षित करते हुए आजीविका चलाने का  सबसे अच्छा तरीका  सिद्ध हुआ है।  ऋषि खेती तकनीक विश्व में प्रथम स्थान पर आ गयी है।




इस कार्य शाला में संरक्षित छेत्रों के आलावा खेती किसानी से जुड़ा एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिला जो ऋषि खेती तकनीक का मुकाबला कर सके।  इसलिए आयोजकों ने इसे अनुकरणीय सर्वोत्तम मिसाल बता कर सम्मानित किया है।

कार्यशाला पूरे तीन दिन तक चली अंतिम दिन अनेक अधकारी गण ऋषि खेती फार्म को देखने पधारे जिन्होंने कहा की यह जलवायु थामने वाली बहुत उत्तम खेती है इसका विस्तार होना चाहिए।





2 comments:

Majumdar said...

Dear Rajuji,

Can we take rishi krishi to the next higher level? Where all our staples-grains, pulses, oilseeds, sweeteners- come not from annual crops planted under no till condition under trees but from trees themselves so that even the annual/ bi-annual ritual and effort of planting crops is done away with.

Crops like breadfruit and jackfruit cud satisfy need for carbs, dried acacia seeds cud replace pulses, long duration canes, mahua flowers and palm juices cud provide sweeteners, palms and oil bearing trees like mahua cud provide edible oils.

We will have to select/ breed trees which give right yield, also have manufacturing processes to take care of processing requirements.

Is this doable, sir?

Regards

Raju Titus said...

yes it is possible .already many things growing near and under trees. Fukuoka was saying there is friendly relation with under growth. Both trees and under growth help each other in many ways.