Thursday, April 21, 2016

सूखे के स्थाई समाधान हेतु करे बिना -जुताई खेती 

 बूँद बूँद पानी से अधिक से अधिक फसलों का उत्पादन : बिना जुताई की कुदरती खेती 


बिना-जुताई कपास की फसल (फोटो Farms Reach के सौजन्य से )
जैसा की हम जानते है आज कल सूखा एक बड़ी मुसीबत बन गया है।  जिसके कारण एक और जहाँ पानी  का गम्भीर संकट खड़ा हो गया है वहीं खेती किसानी के बंद होने  से खाने की समस्या भी उत्पन्न होने लगी है। खेतों में नमी की कमी के कारण तैयार फसलों में आग लगने की भी गम्भीर समस्या उत्पन्न हो गयी है।

इसी सदर्भ में माननीय प्रधान मंत्री जी ने भी सूखे  के स्थाई प्रबंधन और बिना सिंचाई की खेती पर बल दिया है। समस्या यह है कि यदि बरसात नहीं होती है तो सिँचाई के लिए पानी कहाँ से आएगा। इसी लिए माननीय प्रधानमंत्रीजी बार बार बूँद बूँद पानी से अधिक अधिक फसलों के उत्पादन की बात करते हैं।
असिंचित बिना -जुताई धान की खेती 

यह समस्या गैर -कुदरती खेती के कारण उत्पन्न हुई है। इसलिए इस समस्या का समाधान केवल कुदरती खेती से  ही संभव है। गैर -कुदरती खेती का मतलब है वो सब कृषि कार्य जो कुदरती नहीं को अमल में लाना जैसे ट्रेक्टेरों से की जाने वाली  जुताई , मानव निर्मित  रासायनिक  और गोबर /गोमूत्र से बनी खाद ,दवाई आदि।

फसलोत्पादन के लिए जब खेतों की बार बार जुताई की जाती है तो खेत सूख जाते हैं। हरियाली और उसके साथ जुडी जैव-विविधताएं नस्ट हो जाती हैं। खेत बंजर हो जाते हैं। किन्तु जब बिना जुताई  कर खेती की जाती है परिस्थिति में बदलाव आने लगता है। खेतों की नमी में इजाफा हो जाता है।

जुताई नहीं करने से एक और जहाँ बरसात का पानी सब जमीन में सोख लिया जाता है जिसके कारण खेतों की जैविक खाद का बहना रुक जाता है। इस कारण खेत उर्वरक और पानीदार हो जाते है।  ताकतवर खेतों में ताकतवर फसलें पैदा होती है उनमे बीमारियां नहीं लगती है।

असिंचित बिना जुताई गेंहूं की कुदरती खेती 
कृषि के सभी अवशेषों को जहाँ का तहां पड़ा रहने दिया जाता है जिस से खरपतवारों का पूरा नियंत्रण हो जाता है। नमी भी संरक्षित हो जाती है। सूखे का पूरा समाधान हो जाता हैं। किन्तु देखा यह गया है की किसान बार बार गहरी जुताई करते हैं ,मिटटी को बहुत बारीक बना  देते है।  फसलों को काटने के बाद पुआल और नरवाई को जला  देते हैं। इसलिए बरसात का पानी खेतों में नहीं सोखा जाता है। वह बहता है अपने साथ बारीक मिटटी को भी बहा कर ले जाता है।

हम अपने पारिवारिक खेतों में पिछले तीस सालो बिना जुताई की कुदरती खेती कर रहे हैं। जिसमे हम कोई भी रासायनिक या गोबर /गोमूत्र की खाद नहीं डालते हैं।  किन्तु सभी कृषि अवशेषों जैसे पुआल ,नरवाई ,गोबर ,गोंजन ,पत्तियां ,तिनके। आदि को जहाँ का तहां खेतों में वापस डाल  देते हैं।


Sunday, April 17, 2016

ट्रैकटर से की जाने वाली गहरी जुताई से की जाने वाली गेंहूं और चावल की खेती के कारण सूखा पड़ रहा है।



ट्रैकटर से की जाने वाली गहरी जुताई से की जाने वाली  गेंहूं और चावल की खेती के कारण सूखा पड़  रहा है। 




"हरित क्रांति " का आधार गैर -कुदरती गेंहूं और चावल की खेती है। यह खेती हरे-भरे पेड़ों को काट कर उनमे गहरी जुताई कर की जाती है।  इस खेती में पेड़ दुश्मन की तरह देखे जाते हैं। हर किसान अपने खेतों से अधिक से अधिक उत्पादन लेने की चाह में एक भी पेड़ अपने खेतों में क्या  मेड़ों पर भी नहीं रहने देता है।
  धान बरसात में लगाई जाती है जिसमे पहले किसान खेतों को खूब ट्रेक्टेरों से जोतता है फिर उसमे कीचड मचाता है वह कीचड़ इसलिए मचाता है जिस से बरसात का पानी खेतों में बिल्कुल सोखा ना जाये। खेतों में पानी इसलिए भरा जाता है जिस से खरपतवरें नहीं पनपे और केवल धान ही पनपे यह खरपतवार नियंत्रण का तरीका है। जो भूमिगत जल के स्तर को लगातार कम करता जाता है।

इसी प्रकार अधिकतर किसान ठण्ड में गेंहूं की खेती करते हैं पहले यह खेती बिना सिंचाई होती थी किन्तु अब यह सिंचाई के बिना नहीं होती है। इसमें बहुत अधिक मात्रा में पानी बर्बाद होता है।

बिना जुताई सुबबूल के पेड़ों के साथ गेंहूं की खेती। 
जुताई करने और कीचड बनाने से बरसात का पानी खेतों के अंदर नहीं सोखा जाता है इस कारण लगातार भूमिगत जल का स्तर गिरता जाता है। थोड़ी भी बरसात कम होने से सूखा पड़  जाता है। अब जबकि गेंहूं और चावल हमारे आहार का मुख्य अंग बन गए हैं हम गेंहूं और चावल के बिना नहीं रह सकते है।  इसलिए हमारे कृषि वैज्ञानिक गेंहूं और चावल की खेती पर ही अधिक जोर  दे रहे है। सरकार भी इस खेती को बढ़ावा देने के लिए अनेक प्रकार से प्रलोभन दे रही है। इसलिए सूखे की समस्या निर्मित हो रही है।  जो बढ़ती जाएगी कितनी भी बरसात हो जाये इस में कोई इजाफा होने की सम्भावना नहीं है।

यदि हमे सूखे से निजात पाना  है तो हमे दलहनी पेड़ों के साथ बिना जुताई की  गेंहूं और चावल की खेती करना ही पड़ेगा। पेड़ बरसात के पानी को बादल बना कर बरसात करवाने में  बहुत सहायक रहते हैं। ये बरसात के पानी को जमीन के भीतर ले जाने में भी सहयोगी है। यही कारण है भरी गर्मी में पहाड़ों से झरने चलते हैं जबकि मैदानी इलाके में पानी पानी का शोर मचा  रहता है।






Friday, April 15, 2016

अब चल पड़ी बाबाओं की दुकान

सावधान ! बोतल बंद ,डिब्बा बंद और प्लास्टिक पाउच में भी हो सकता है जहर। 

अब चल पड़ी बाबाओं की दुकान  

जो कुदरत बनाती है वह इंसान नहीं बना सकता है। -- स्व. मसनोबु फुकुओका  जापान (कुदरती खेती के किसान)









Wednesday, April 13, 2016

सन और गेंहूं की कुदरती खेती

सन और गेंहूं  की कुदरती खेती 

जुताई , गोबर  और रसायनों  की जरूरत नहीं 

 देशी खेती किसानी में अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिसमे किसान खेतों की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए सन को लगाते  रहे हैं।  सन एक दलहन जाती नत्रजन सप्लाई करने वाला पौधा है जो समान्यत: रस्सी बनाने के काम में आता है इस से गनी बैग्स भी बनाए जाते हैं।  इसकी फसल सामान्यत: बरसात में ली जाती है।
जैविक खेती करने के लिए किसान सन की हरी फसल को जमीन में जुताई  कर मिला देते है। किन्तु कुदरती खेती में सन की फसल ले ली जाती है। जब सन की फसल पक  जाती है इसे ऊपर से काट लिआ जाता है और गहाई  कर इसके बीज निकाल लिए जाते है। 
इसके बाद बचे  भाग के बीच गेंहूं के बीज छिड़क दिए जाते हैं और सन  के बचे भाग को काटकर खेत में  जहां का तहां गिरा दिया जाता है जिस से गेंहूं के बीजों पर ढकावन बन जाती है बीज सुरक्षित ही जाते हैं। 
  तदुपरांत सिंचाई कर दी जाती है। जिस से गेंहूं के बीज अंकुरित होकर ऊपर छा जाते हैं। जिस से बिना जुताई , बिना यूरिया ,बिना गोबर की खाद दिए बंपर फसल उतरती है। 

जबसे हमारे देश में "हरित क्रांति " का आगमन हुआ है तब से किसान मशीनों और रसायनों का बहुत उपयोग करने लगे है।  जिस के कारण खेत मरुस्थल में तब्दील हो रहे है। 
खेती किसानी घाटे का सौदा बन गयी है।  अनेक किसान खेती किसानी छोड़ रहे है। लागत  अधिक हो जाने के कारण और पर्याप्त लाभ नहीं मिलने के कारण कर्जों  के कारण किसान आत्म हत्या भी कर रहे हैं। 
 असल में किसानो  पता नहीं है की जुताई करना कितना हानि कारक है।  जुताई करने से बरसात का पानी जमीन में नहीं सोखा जाता है वह तेजी से बहता है अपने साथ खेतों की जैविक खाद को भी बहा कर ले जाता है। 
जुताई नहीं करने और नरवाइयों  (Straw) को  जहां  का तहां आड़ा तिरछा डाल देने से खेतों में पर्याप्त जैविक खाद जमा हो जाती है जिसके कारण रासायनिक और गोबर की खाद की बिलकुल जरूरत नहीं रहती है। इस विधि से साइल हेल्थ अच्छी  हो जाती है इस कारण फसलों में बीमारियों और खरपतवारों की समस्या नहीं रहती है।  इसलिए किसी भी प्रकार की जैविक या अजैविक दवाई की जरूरत  नहीं रहती है। 

आजकल अनेक लोग किसानों को रासायनिक खादों के बदले गोबर और गोमूत्र से बनी दवाइयां डालने की सलाह दे रहे हैं किन्तु वे जुताई को हानि कारक नहीं बताते हैं।  जबकि एक बार जुताई करने से खेत की आधी जैविक खाद बह  जाती है और  गैस बन कर  उड़ जाती है।  जुताई करके अपने खेत की जैविक खाद को नस्ट कर ,रासायनिक खाद ,जैविक खाद ,बायो फ़र्टिलाइज़र , अमृत पानी /मिटटी का उपयोग एक मूर्खता पूर्ण कार्य है। 
बरसात का पानी जमीन में नहीं जाने कारण भूमिगत जल की हानि अलग है। 

हमने अपने खेतों में पिछले तीस सालो  से जुताई  नहीं की है न ही कोई भी रसायन या जैविक खाद का उपयोग किया है। हमारे खेत पूरी तरह कर्ज ,अनुदान और मुआवजे से मुक्त हैं। साइल हेल्थ हर साल बढ़ रही है भूमिगत जल में भी इजाफा हो रहा है। बरसात का पूरा पानी खेतों के द्वारा सोख लिए जाता है। 
  




Wednesday, April 6, 2016

जहरीले खाने से कैसे बचें ?



स्वाद ,खुशबू और जायके  से पहचाने कुदरती आहार। 

खेतों में की जाने वाली जुताई  और जहरीले रसायनों का सबसे बड़ा दोष है। 
भारत में अधिकतर गेंहूं और चावल को मुख्य आहार के रूप में इस्तमाल किया जाता है। ये ही वो  मुख्य अनाज है जिन्हे हमारे कृषि वैज्ञानिकों ने हरित क्रांति के माध्यम से प्रोत्साहित किया है। इन अनाजों की खेती करने के लिए सरकार किसानों को पूरी सहायता उपलब्ध कराती है। इन फसलों की खेती में काम आने वाले बीज , रसायन ,मशीनों और सिंचाई के लिए पूरी सहायता सरकार से मिलती है।  जो कम्पनियाँ इन उत्पादों का धन्दा करती हैं वे भी सरकार से अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त कर रही हैं। इन उत्पादों की बिक्री भी सरकार के माध्यम से सम्पन्न होती है। इसलिए यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं है है की इन मोटे  अनाजों की खेती पूरी  कि पूरी सरकारी है। 

जहरीले खाने से कैसे बचें ?





किन्तु अब इस सरकारी खेती पर ग्रहण लगने लगे हैं। खेत मरुस्थल में तब्दील हो रहे हैं उनमे उर्वरकों ,जुताई  , रसायनों और सिंचाई  की लागत बढ़ती जा रही है।  खेतों के मरुस्थलीकरण के कारण फसलों में खरपतवारों और बीमारियां भी तेजी से बढ़ रही हैं इसलिए कीट नाशकों और खरपतवार नाशक जहरों का अतिरिक्त खर्च बढ़ते क्रम में आ रहा है।  जिसका फायदा इन कीट नाशक  को बनाने  वाली कम्पनियां उठा रही हैं।

इन रासायनिक जहरो  से एक और जहाँ हमारी रोटी में जहर घुल रहा है वहीं किसान के लिए इनकी लागत एक मुसीबत बनते जा रही है। यदि किसान जहर नहीं डालते  हैं तो उनकी फसलों के बर्बाद होने का खतरा रहता है। इस लिए ना चाहते हुए भी किसान  इन जहरों को खरीदकर डाल  रहा है।

जिसके कारण फसले के साथ साथ हवा ,पानी और मिट्टी भी जहरीली होती जा रहे है। जिसके कारण अब फसलों का उत्पादन बहुत तेजी से गिरने लगा है। लागत अधिक होने और आमदनी के कम हो जाने के कारण खेती किसानी  घाटे का सौदा बन गयी है। घाटे  के कारण अब बड़े किसान भी आत्म  हत्या करने और खेती किसानी छोड़ने लगे हैं।
जहरीली मिट्टी में जहरीली फसल पनपती है।   

गेंहूं और चावल आजकल सबसे अधिक जहरीले अनाजों में गिने जाते है। जब किसान अपने खेत में गेंहूं की सरकारी खेती करता है वह अनेक प्रकार रासायनिक तत्वों को डालता है जिन्हे NPK  कहा जाता है। ये तत्व अधिकतर पेट्रोलियम पदार्थों से बनते हैं। असल में जब किसान गेंहूं और चावल बोते हैं वे अपने खेतों के सभी नरवाई आदि को जला देते हैं फिर खेत को ट्रेक्टेरों की सहायता से गहराई तक खोदते और जोतते हैं। जिसके कारण बरसात का पानी जमीन में नहीं सोखा जाता है वह तेजी से बहता है अपने साथ खेतों की जैविक खाद को भी बहा कर ले जाता है। इसलिए खेत मरू होते हैं मरू खेतों में NPK , अनेक किस्म के सूख्स्म तत्व और टॉनिक  ,कीटनाशक और खरपतवार नाशक आदि खेत में डालते हैं। ये सभी गैर -कुदरती रासयनिक तत्व खेत की मिटटी जो जीवित है को पसंद नहीं आते हैं। इसलिए यह मिट्टी इन तत्वों को उड़ा  देती है जिस के कारण कुदरती तत्व भी उड़ जाते हैं और मिट्टी बेजान और जहरीली हो जाती है। इसमें पैदा होने फसलें भी जहरीली होने लगती हैं।

जहरीले आहार  से हमारे शरीर को क्या  नुक्सान है ?

अधिकतर लोग समझते हैं की केवल जहरीले रसायनों के कारण ही फसलें जहरीली होती है यदि जहरीले रसायन नहीं डाले  जायेंगे तो फसलें  जहरीली नहीं होंगी यह भ्रान्ति है। इसमें जमीन की जुताई  का सबसे बड़ा दोष है एक बार की जुताई से खेत की अधि ताकत नस्ट हो जाती है हर बार जुताई करने से यह ताकत लगातार घटती जाती है।  जिसके कारण   खेतों में फसलों को पैदा करने की ताकत नस्ट हो जाती है। फसले कमजोर और बीमार पैदा होती है जिसमे जहरीले रसायन आग में घी डालने का काम करते हैं।
जहरीली फसलों में  पोषक तत्वों की भारी कमी रहती है इसको खाने से शरीर को जिन  तत्वों की जरूरत रहती है वे नहीं मिलते हैं इस कारण जितना भी हम कहते है है वह शरीर को नहीं लगता है।  इसके कारण कुपोषण की बी मरी हो जाती है। कुपोषित शरीर में अन्य बीमारियां भी अपना  घर बना लेती है। यह तो हम सब जानते हैं।

किन्तु सवाल यह है की हम अब इस समस्या से कैसे  से कैसे बचें।

रासायनिक गेंहूं और चावल का त्याग करें छोटे अनाज जैसे ज्वार ,मक्का ,बाजरा ,राजगीर कोदों ,कुटकी समां आदि का सेवन करें। सब्जियों में कठहल ,मुनगा आदि का सेवन किया जा सकता है।  सफडफरम की मुगी के बदले देशी मुर्गी और उनके अण्डों का सेवन करें।  दूध के लिए पैकेट के दूध का सेवन  न करे हो सके तो बकरी के दूध का सेवन करें।

उपभोक्ताओं को चाहिए अपने आसपास के किसानो को जुताई  आधारित रासायनिक खेती को छोड़ने और कुदरती खेती करने के लिए प्रेरित करें ,कुदरती आगनबाड़ी और ऑर्गनिक रूफ गार्डनिंग करे और  प्रसार प्रचार करें।  जागरूकता कमी सबसे बड़ी बाधक है सब मिलकर प्रयास करने की जरूरत है।

Friday, April 1, 2016

आयुर्वेद दुकान नहीं है !


आयुर्वेद दुकान  नहीं है !

आयुर्वेद कुदरत के साथ जीवन जीने की कला है उसे दुकान न बनाये। 

हमारे ऋषि जन जंगलों में रहते थे और आज भी रह रहे हैं। वो आजकल के बाबाओं की तरह शहरों में ना रहते थे ना हवाई जहाजों घूमते थे।
उनके ज्ञान से हम आज तक सुरक्षित हैं। परम्परागत देशी खेती किसानी में अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिसमे जंगलों से अनेक प्रकार फल ,सब्जियां ,अनाज बिना उगाये सालो  साल मिलते रहते थे। जिसमे मूल बात इन वनस्पतियों को बचाने के आलावा कुछ नहीं रहता था। फल सब्जियों को खाकर उनके बीज जहाँ वापस जमीन पर फेंक देते थे। मल  विसर्जन भी अन्य जानवरों की तरह होता था जिस से बीजों का विसर्जन भी हो जाता था। इस प्रक्रिया में कुदरत का बिलकुल नुक्सान नहीं होता था। हरियाली पूरी तरह सुरक्षित रहने से कुदरत जिन्दा रहती थी। इसीलिए हम लोग आज तक धरती माता ,नदी ,पर्वत ,पेड़ पौधों को पवित्र मानकर पूजते हैं।
भारतीय देशी खेती किसानी जिसमे खेतों ,जंगलों और पशु पालन ,चरागाहों के समन्वय से अनाज ,फल सब्जियों की खेती की जाती थी। जिसमे ऐसे कोई भी काम नहीं किए जाते थे जिस से कुदरत माता को नुक्सान होता हो। यही कारण है हमारी देशी खेती किसानी हजारों साल टिकाऊ रही और आज भी है।  हमारे ऋषि जन इस में पूरा सहयोग करते थे।

किन्तु इस कुदरती खेती किसानी को वव्यापारिक  रासायनिक खेती के आलावा व्यापारिक  नीम हकीमो ने बहुत नुक्सान पहुँचाया है। उनके कारण खेती आज रसायनो , मशीनो और अनेक टोने टोटकों का शिकार हो गयी है।
जिसके कारण एक और हमारा हरा भरा पर्यावरण रेगिस्तान में तब्दील हो गया है और   खेती किसानी घाटे  का सौदा बन गयी है।

रासायनिक यूरिया में नीम मिलाया जाने लगा है। मेलाथियोन के साथ गोबर और गोमूत्र का उपयोग होने लगा है। इस कारण अब किसान ऋषिजनो के ज्ञान को भूल गए हैं। ऋषि खेती के बदले 'जैविक खेती 'की बात की जाने लगी है।  हर किस्म की डाक्टरी चल बैठी है जिसमे रासयनिक दवाओं की तर्ज पर आयुर्वेदिक दवाओं का भी बोल बाला  हो गया है।

असल में बहुत कम लोग इस बात में विश्वाश करते हैं की जो  कुदरत बनाती है वह इंसान  नहीं बना सकता है।
ऋषिजन जंगलों में रहते थे वे न तो खेत जोतते थे ना बीज  बोते थे  ना वे किसी भी प्रकार के कीट या खरपतवारों को मारने  का काम करते थे न ही वे सिचाई करते थे।  फिर भी उन्हें साल भर खाने के लिए कुदरती आहार ,साँस लेने के लिए कुदरती हवा पीने के लिए कुदरती बरसात नियमानुसार उपलब्ध रहती थी।

हम पिछले तीस साल से अपने पारिवारिक खेतों में ऋषि खेती का अभ्यास कर रहे हैं जिसमे जमीन की जुताई ,किसी भी रासायनिक या आयुर्वेदिक दवा की जरूरत नहीं रहती है। खेती कुदरती खेती कहलाती है। कुदरत हमे सब कुछ देती है हमे कुछ भी बाजार से लाने की जरूरत नहीं रहती है।

कुदरत का नियम है की बीज जमीन पर गिरता है अपने मौसम में उग कर पेड़ बन जाता है जो फिर असंख्य फल बढ़ते क्रम में देता है। किन्तु यह जब गुस्सा हो जाता है जब हम उसके जीवन चक्र में रासायनिक या आयुर्वेदिक डाक्टरी की दखलंदाजी करने लगते हैं।

अब समय आ गया है की हम असत्य वैज्ञानिक और असत्य धार्मिक ज्ञान से हट कर कुदरत के सत्य और अहिंसातमक ज्ञान  को समझें और अपने जीवन में अमल में लाएं।  इसके लिए कुदरत से अच्छा कोई गुरु नहीं है। जो हमारे बिलकुल करीब है। जिसे देखने के लिए हमे केवल आँखे खोलने की जरूरत है।



Monday, March 28, 2016

पेड़ों के साथ कुदरती खेती कर अपना करियर बनाए !

पेड़ों के साथ कुदरती खेती कर अपना करियर बनाए !

आज कल पढ़े लिखे युवक और युवतियों के रोजगार की गम्भीर समस्या उत्पन्न हो गयी। अधिकतर हमारे ये युवा साथी महानगरों की चका चौंध में गुम हो रहे हैं। उन्हें अपनी आजीविका के लिए नौकरियां नहीं मिल रही है।  महानगरों में खुद का रोजगार करने के लिए भी कॉम्पिटीशन बहुत अधिक बढ़ गया है। 
महुए के फूलों से  गुड और बीजों से तेल  मिलता है। 

दूसरी ओर परम्परागत खेती किसानी में घाटे के कारण अनेक किसान खेती छोड़ रहे है गांव और देहात में विपरीत हालत पैदा  हो गए हैं काम के लिए लोग नहीं मिल रहे हैं।  अनेक खेत खाली पड़े हैं। पेड़ों को काटकर खेतों को मशीनों से खोद कर की जाने वाली खेती के कारण उपजाऊ खेत अब मरुस्थल में तब्दील हो रहे हैं। इस कारण गाँव और खेत खाली होने लगे हैं। 

एक और जहाँ आधुनिक वैज्ञानिक खेती फेल हो रही है तो दूसरी और कुदरती खेती करने की चाह बढ़ रही है।  लोगों को कुदरती उत्पादों की कमी खल रही है। कुदरती अनाज ,दालों ,फल ,दूध ,मुर्गी अंडे मांस की मांग बढ़ रही है।  सबसे अधिक मांग अब जलाऊ लकड़ी की हो रही है। इस कारण अब एक नया मार्ग हमारे पढ़े लिखे नवजवानों के लिए खुल रहा है।  

सुबबूल से उत्तम चारा ,जलाऊ लकड़ी और नत्रजन
आदि बहुत फायदे हैं। 
 अब इंजीनियर ,डाक़्टर, एम बी ए के रास्ते बंद  होने लगे हैं। इसका मूल कारण टिकाऊ पर्यवर्णीय कंपनियों का नहीं होना है। लोग करोड़ों हाथ में लेकर कर कुछ नहीं कर पा रहे हैं। अब सारा खेल इसकी टोपी उसके सर बैठाने का चल रहा है।  किसी को अपने नीचे से धरती के खिसकने का अहसास नहीं है।  इन परिस्थितियों का असर हमारे पढ़े लिखे  नवजवानों पर पड़ रहा है।  जो जितना अधिक पढ़ा है वह उतना अधिक अपने भविष्य के खातिर चिंता में है।  लोग विदेशों से और महानगरों से लौट  कर अपने गाँव की ओर आ रहे हैं। जो कुदरती खेती करने लगे हैं।  

मोरिंगा जिसे मुनगा भी कहा जाता है जिस की फलियां ,पत्तियां
 ,फूल सभी दवाई हैं। 
हम पिछले तीस साल से अपने पारिवारिक खेतों में कुदरती खेती कर रहे है। इसलिए हजारों ऐसे लोगों है जो इन इन तीस सालो में हमारे यहां आये हैं और आ रहे हैं।  वो यह जानना चाहते हैं की कुदरती खेती कैसे की जाती है। वो सभी लोग लोग  चूंकि पढ़े लिखे और समझदार हैं इसलिए उनके प्रश्न भी बहुत सार्थक रहते हैं इसलिए हमे उनको सन्तुस्ट करना पड़ता है। इसमें रॉकेट साइंस जैसी धुप्पल बाजी नहीं है। 

अधिकतर लोग हमसे पूछते हैं की जुताई के बिना कैसे खेती संभव है तब हम उन्हें कहते हैं की जरा  अपने आस पास के जंगलों को देखिए जहां सब कुछ अच्छा हो रहा है वह कैसे हो रहा है ? कुदरती खेती एक जंगली खेती है। 
जंगल में महुए के पेड़ को कोई बोता नहीं है ,न ही उसमे कोई खाद डालता है ना ही उसमे कोई पानी सींचता है फिर भी वह जितना देता है शायद ही खेतों में लगने वाला कोई पेड़ देता हो। ऐसे असंख्य कुदरती पेड़ हैं जिन्हे लगाकर हम अपनी आजीविका आत्मनिर्भता के साथ पूरी कर सकते हैं। 

बिना जुताई पेड़ों वाली खेती में एक और जहां लागत  बहुत कम है वहीं महनत  भी नहीं के बराबर है।  इन जंगली अर्ध जंगली पेड़ों के साथ के  हम आसानी से अनाज ,सब्जियों की खेती भी कर सकते  हैं ,जंगली मुर्गियां और बकरियों को पाल कर हम अपनी आमदनी को भी बढ़ा सकते हैं।  ये पेड़ जमीन को बहुत नीचे गहराई तक अपनी जड़ों के जाल के माध्यम से ताकतवर और पानीदार बना देते है। 

कुदरती पेड़ों की खेती करने से हम आसानी से अपनी जमीन में जल का प्रबंधन कर लेते है जिस से मौसम परिवर्तन और गर्माती धरती पर रोक लग जाती है।  जंगली खेती करके हमारे पढ़े लिखे नवजवान न केवल समाज में सम्मान पाते  हैं वरन आर्थिक लाभ भी अर्जित कर लेते है जो कल तक बेरोजगार थे वो अनेक लोगों को रोजगार उपलब्ध करा  रहे हैं।