Sunday, April 17, 2016

ट्रैकटर से की जाने वाली गहरी जुताई से की जाने वाली गेंहूं और चावल की खेती के कारण सूखा पड़ रहा है।



ट्रैकटर से की जाने वाली गहरी जुताई से की जाने वाली  गेंहूं और चावल की खेती के कारण सूखा पड़  रहा है। 




"हरित क्रांति " का आधार गैर -कुदरती गेंहूं और चावल की खेती है। यह खेती हरे-भरे पेड़ों को काट कर उनमे गहरी जुताई कर की जाती है।  इस खेती में पेड़ दुश्मन की तरह देखे जाते हैं। हर किसान अपने खेतों से अधिक से अधिक उत्पादन लेने की चाह में एक भी पेड़ अपने खेतों में क्या  मेड़ों पर भी नहीं रहने देता है।
  धान बरसात में लगाई जाती है जिसमे पहले किसान खेतों को खूब ट्रेक्टेरों से जोतता है फिर उसमे कीचड मचाता है वह कीचड़ इसलिए मचाता है जिस से बरसात का पानी खेतों में बिल्कुल सोखा ना जाये। खेतों में पानी इसलिए भरा जाता है जिस से खरपतवरें नहीं पनपे और केवल धान ही पनपे यह खरपतवार नियंत्रण का तरीका है। जो भूमिगत जल के स्तर को लगातार कम करता जाता है।

इसी प्रकार अधिकतर किसान ठण्ड में गेंहूं की खेती करते हैं पहले यह खेती बिना सिंचाई होती थी किन्तु अब यह सिंचाई के बिना नहीं होती है। इसमें बहुत अधिक मात्रा में पानी बर्बाद होता है।

बिना जुताई सुबबूल के पेड़ों के साथ गेंहूं की खेती। 
जुताई करने और कीचड बनाने से बरसात का पानी खेतों के अंदर नहीं सोखा जाता है इस कारण लगातार भूमिगत जल का स्तर गिरता जाता है। थोड़ी भी बरसात कम होने से सूखा पड़  जाता है। अब जबकि गेंहूं और चावल हमारे आहार का मुख्य अंग बन गए हैं हम गेंहूं और चावल के बिना नहीं रह सकते है।  इसलिए हमारे कृषि वैज्ञानिक गेंहूं और चावल की खेती पर ही अधिक जोर  दे रहे है। सरकार भी इस खेती को बढ़ावा देने के लिए अनेक प्रकार से प्रलोभन दे रही है। इसलिए सूखे की समस्या निर्मित हो रही है।  जो बढ़ती जाएगी कितनी भी बरसात हो जाये इस में कोई इजाफा होने की सम्भावना नहीं है।

यदि हमे सूखे से निजात पाना  है तो हमे दलहनी पेड़ों के साथ बिना जुताई की  गेंहूं और चावल की खेती करना ही पड़ेगा। पेड़ बरसात के पानी को बादल बना कर बरसात करवाने में  बहुत सहायक रहते हैं। ये बरसात के पानी को जमीन के भीतर ले जाने में भी सहयोगी है। यही कारण है भरी गर्मी में पहाड़ों से झरने चलते हैं जबकि मैदानी इलाके में पानी पानी का शोर मचा  रहता है।