Tuesday, August 8, 2017

टिकाऊ (स्थाई ) कृषि हेतु सुबबूल की भूमिका

 टिकाऊ (स्थाई ) कृषि हेतु सुबबूल की भूमिका 

भारत एक कृषि प्रधान देश है और रहेगा इस में कोई संदेह नहीं है।  विगत कुछ सालों से आयी आयातित गहरी जुताई ,रासायनिक उर्वरक ,भारी सिंचाई और मशीनों के कारण हमारे देश पर कृषि के अस्तित्व का भारी  संकट आ गया है। खेत मरुस्थल में तब्दील होते जा रहे हैं और किसान खेती छोड़ रहे हैं। खेती किसानी के संकट के कारण उद्योग धंदे भी मंदी  की चपेट में है। पर्यावरण नस्ट होते जा रहा है इस कारण महामारियां अपने चरम पर पहुँच रही है। 
 
हम सब जानते हैं की हमारी खेती किसानी हमारे पशुधन से जुडी है किन्तु अब पशुओं के लिए चारे का गंभीर संकट आ गया है इस कारण  पशुधन भी लुप्तप्राय होने लगा है। एक और हमारे पालनहार अनाज ,फल सब्जियां  प्रदूषित हो गए हैं वहीँ अच्छा दूध ,अंडे मांस भी अब उपलब्ध नहीं है।  इसलिए अब हम बड़े खाद्य संकट में फंस गए हैं। 
 
वैज्ञानिक खेती के कारण हमारा पालनहार कार्बो आहार इतना खराब हो गया है की हर दसवा इंसान मधुमेह , मोटापे और कैंसर जैसी घातक बीमारी के चंगुल में फंसते जा रहा है। दालें जिन्हे हमारे पूर्वज बच्चे पाल कहते थे लुप्त होती जा रही हैं। उनमे भी आवशयक पोषक तत्व नदारत हैं। समस्या यह आ गयी  है की आखिर हम क्या खाएं क्या नहीं खाये।
                                    youtube- Natural Farming : Wheat under Subabul trees Raju Titus
हम विगत तीस साल से अपने पारिवारिक खेतों में  टिकाऊ खेती को भारत में किसानो के करने लायक बनाने में कार्यरत है । जिसे हम ऋषि खेती (बिना जुताई की कुदरती खेती )कहते है। हमने यह पाया है की बिना जुताई करे दालों  को पैदा करने में तो कोई समस्या नहीं किन्तु कार्बो फसलें जैसे  गेंहूं , चावल ,मक्का ,ज्वार बाजार आदि में जबरदस्त यूरिया की मांग रहती है। जिसकी आपूर्ति हम दलहनी फसलों से कर लेते  है। हर दलहनी फसल का पौधा या पेड़ जितना जमीन से ऊपर रहता है अपनी छाया के छेत्र में यूरिया की मांग की आपूर्ति कर देता है। 
 
इसलिए हम अपने खेतों में सुबबूल के पेड़ लगाते है सुबबूल के पेड़ एक और जहां हमारी कार्बो फसलों के लिए पर्याप्त यूरिया की सप्लाई कर  देते हैं तथा  हमारे पशुओं के लिए चारा और जलाऊ लकड़ी का भी इंतज़ाम कर देते हैं। हमने यह पाया है की यदि हम एक एकड़ में कम से कम 100 पेड़ सुबबूल के रखते हैं तो हम इनके सहारे आसानी से कार्बो फसले ले  सकते हैं तथा पशु  पालन भी हम कर सकते हैं जिस से हमे दूध आदि सब मिल जाता है। 
 
सुबबूल की यह खासियत है की यह एक साल में बिजली के खम्बे के बराबर हो जाता है और बीज फेंकने लगता है इसके बीज जमीन पर सुरक्षित पड़े रहते हैं जो बारिश आने पर उग जाते हैं। इसकी लकड़ी पेपर बनाने के भी काम में आती है।  एक एकड़ से करीब 5 साल में एक किसान चार लाख रु की लकड़ी बेच सकता है इसलिए यह अनेक प्रकार से लाभ देने वाला पेड़ है।  
राजू टाइटस 
9179738049 WA-7470402776
rajuktitus@gmail.com

2 comments:

RS DP said...

आदरणीय, कृपया सूबबूल पेड़ के एवं उसकी पत्तियों की फोटो अपलोड कर दें. क्य यह बबूल से भिन्न है?

Maria Reese said...

भारत एक कृषि प्रधान देश है और रहेगा इस में कोई संदेह नहीं है। विगत कुछ सालों से आयी आयातित गहरी जुताई ,रासायनिक उर्वरक ,भारी सिंचाई और मशीनों के कारण हमारे देश पर कृषि के अस्तित्व का भारी संकट आ गया है। खेत मरुस्थल में तब्दील होते जा रहे हैं और किसान खेती छोड़ रहे हैं। खेती किसानी के संकट के कारण उद्योग धंदे भी मंदी की चपेट में है। पर्यावरण नस्ट होते जा रहा है इस कारण महामारियां अपने चरम पर पहुँच रही है। हम सब जानते हैं की हमारी खेती किसानी हमारे पशुधन से जुडी है किन्तु अब पशुओं के लिए चारे का गंभीर संकट आ गया है इस कारण पशुधन भी लुप्तप्राय होने लगा है। एक और हमारे पालनहार अनाज ,फल सब्जियां प्रदूषित हो गए हैं वहीँ अच्छा दूध ,अंडे मांस भी अब उपलब्ध नहीं है। इसलिए अब हम बड़े खाद्य संकट में फंस गए हैं। वैज्ञानिक खेती के कारण हमारा पालनहार कार्बो आहार इतना खराब हो गया है की हर दसवा इंसान मधुमेह , मोटापे और कैंसर जैसी घातक बीमारी के चंगुल में फंसते जा रहा है। दालें जिन्हे हमारे पूर्वज बच्चे पाल कहते थे लुप्त होती जा रही हैं। उनमे भी आवशयक पोषक तत्व नदारत हैं। समस्या यह आ गयी है की आखिर हम क्या खाएं क्या नहीं खाये।

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