Thursday, June 29, 2017

जुताई के कारण छाया का असर

जुताई के कारण छाया का असर 

दो छोटे छोटे पेड़ों के कारण फसल नहीं हो रही है। 
पेड़ की छाया में बिना जुताई की  गेंहूं की फसल। 

अधिकतर  जुताई करने के दो तरीके हैं एक ट्रेक्टर दूसरा बेलों से जो  खेत में चलाये जाते हैं इसलिए  जितने खेत में पेड़ रहते हैं काट दिए जाते हैं इनके रहते ट्रेक्टर और बैल नहीं चल पाते हैं। दूसरा जब खेत बार बार जाते जाते हैं खेत की जैविक खाद (मिट्टी) बरसात के पानी के साथ बह जाती है इस प्रकार खेत की आधी खाद एक बार की जुताई में बह जाती है। खेत कमजोर हो जाते हैं। कमजोर खेतों में पेड़ की छाया का असर होता है इसलिए किसान दूर दूर तक के पेड़ों को काट देता है। किन्तु हम जो पिछले 30 सालो से बिना जुताई की खेती कर रहे हैं की फसलों पर छाया का असर  नहीं होता है। कृषि वैज्ञानिक भी यही कहते हैं की पेड़ की छाया में फसल नहीं होती है किन्तु वे नहीं जानते हैं की यह जुताई का असर है। 

 
 

Tuesday, June 27, 2017

गौ आधारित खेती

  गौ आधारित खेती

हम गौ आधारित खेती का बहुत सम्मान करते हैं हमारा देश गौ आधारित  खेती के कारण हजारों साल बचा रहा है।  पहले किसान जुताई की  हानि के प्रति सतर्क रहते थे जुताई से कमजोर होते खेतों में जुताई बंद कर उन्हें पड़ती कर उसमे पशु चराते थे जिस से खेत ठीक हो जाया करते थे। साल के आखिर में सभी कृषी अवशेषों को वापस खेतों में डाल  दिया करते थे। खाद और दवाइयों  का कोई इस्तमाल नहीं था। 

जीरो बजट खेती भी  गाय आधारित खेती है किन्तु जुताई है जो गलत है जुताई  करने से खेत की जैविक खाद बरसात के पानी के कारण बह जाती है उसकी कुदरती यूरिया भी  गैस बन कर उड़ जाती है इसलिए हमारी सलाह है की गौ आधारित खेती में भी जुताई नहीं होना चाहिए और गायों के लिए सुबबूल जैसे चारे के पेड़ होना  जरूरी है। 
  जब हम बिना जुताई करे दलहन फसलों के साथ अनाज की खेती करते हैं उसमे अपने आप कुदरती यूरिया का संचार हो जाता है क्योंकि  दलहन जाती का पौधा या पेड़ अपनी छाया के छेत्र में कुदरती यूरिया देने का काम करता है।  हमने  पाया है की बिना जुताई की खेती में खेत में कुदरती यूरिया की मांग नहीं रहती है और यदि उसमे कृत्रिम यूरिया दिया जाये तो उलटी हो जाती है यानि सब बाहर निकल जाता है। जिस से खेत और अधिक कमजोर हो जाते हैं। 
 
धन्यवाद 
राजू टाइटस 
917973 8049 
 
 

देशी बबूल

देशी बबूल 

देशी बबूल एक द्विदल कांटे वाला पेड़ है ऋषि खेती में इसका विशेष महत्व है। यह जमीन से जितना ऊपर होता है अपनी छाया  के छेत्र में लगातार कुदरती यूरिया सप्लाई करने का काम करता है। यदि इस पेड़ को एक चौथाई एकड़ में १० पेड़ों के हिसाब से स्थान मिल जाये तो खेत को कभी भी गैर कुदरती यूरिया की जरूरत नहीं पड़ेगी। बिना जुताई की कुदरती खेती में यह बहुत महत्व का पेड़ है।  यह अपने आप खेतों में पनपता रहता है किन्तु जुताई करने वाले किसान इसे काटते और मारते रहते हैं। उन्हें छाया  का डर रहता है।  यह पेड़ जब एक बार ऊग  जाता है आसानी से मरता नहीं है इसमें कांटे रहते हैं। इस कारण यह मवेशियों से बचे रहते हैं। 

 

हम इस पेड़ की सीड बाल बनाकर यहां वहां फैलाते जा रहे हैं जो किसान बिना जुताई की कुदरती खेती करना चाहते हैं वे इन पेड़ों से दुश्मनी छोड़ कर इन्हे अपना लें  यह हमारे मवेशियों और हमारे खाने पीने की समस्या को हल कर देंगे। इनके साथ गेंहूं चावल की खेती आसानी से हो जाती है। 

धन्यवाद 

राजू  टाइटस 

917973 8049 

NATURAL FARMING IN BANKHDI HOSHANGABAD

भाई मानसिंह गुर्जर बनखेड़ी होशंगाबाद ने किया कमाल गेंहूं के बाद उपजाया बिना जुताई के कुदरती मूंग और वे अब बरसात की फसल भी बिना जुताई से कर रहे हैं वे पिछले  तीन साल से बदलाव के रास्ते पर हैं। उन्होंने तीन साल पहले रसायनो  का त्याग कर दिया है और इस गर्मी की मुंग के बाद वे  जुताई की खेती में आ गए हैं हम उनके जज़्बे को सलाम करते हैं। उन्होंने रबी में भी बिना रसायन की चने की फसल प्राप्त की है। जो कोई बिना रासयन की फसल खरीदना चाहते हैं उनसे संपर्क कर सकते हैं। उनका मोबाइल न 9752324676 है। 

 
 
 

Monday, June 26, 2017

प्रहलाद सिओल चौधरी राजस्थान के सवाल और जवाब

 

प्रहलाद सिओल  चौधरी राजस्थान के सवाल और जवाब 

 
 
 
Prahlad Seoul Choudhary प श्रीमान जी किन किन फसलों का सीड बॉल बनाया जा सकता है हम बारिश के मौसम में बाजरा सर्दियों के मौसम में उनके गेहूं फिर गर्मियों के मौसम में बाजरा साथ में मूंग मोठ और तिल सबसे अधिक फसल लेते हैं इस विषय विधि में इन फसलों को कब-कब कैसे-कैसे में सिंचाई के रूप में मैं ड्रिप और स्प्रिंकलर पद्धति काम में लेता हूं मैं इस विधि को मेरे खेत में शुरू करना चाहता हूं काफी अध्ययन के बाद में भी शुरू कहां से करूं अभी पूरा समझ नहीं पाया हूं कृपया और मार्गदर्शन करने का कष्ट करावे
Prahlad Seoul Choudhary मैं मेरे खेत एक भाग में अनार का बगीचा और सब्जी की खेती करना चाहता हूं अनार व सब्जी दोनों एक साथ में कैसे हो सकती है मैं पालेकर जी का 5 स्तरीय मॉडल भी अध्ययन कर रहा हूं मुझे इस कुदरती विधि में सब्जी व अनार साथ में कैसे हो उनके लिए पोषण की व्यवस्था कैसे हो इसकी जानकारी भी देने का कष्ट करावे
अनार के पौधे कुदरती रूप से कहां से मिल सकते हैं अनार कटाई और सफाई किस प्रकार से हो या नहीं करनी हो अगर कोई किसान भाई सब्जी व अनार के साथ में कोई खेती कर रहा हो तो उनका फॉर्म भी देखना चाहूंगा
Reply
 
 
 

NATURAL FARMING IN RAJASTHAN SANTOSHSINGH RATHORE

Image may contain: tree, sky, plant, outdoor and natureSantoshsingh Rathore पानी न तो आसमान से आता है न ही यह धरती से आता है पानी तो केवल हरियाली से आता है। जुताई  वाली खेती की सभी विधियां हरियाली की दुश्मन है। इसलिए सुखपद रहा है। 
 
राजस्थान के नागौर के रहने वाले भाई संतोष सिंह जी को हम सलाम करते हैं की उन्होंने बिना जुताई की कुदरती खेती को अमल में लाने का निर्णय ले लिया है।  
ऋषि खेती होशंगाबाद एक उदाहरण है जिसने ३० साल में एक बार भी जुताई नहीं की है कुए जो सूख गए थेअब भरे रहते हैं जबकि हमारे पड़ोसियों के नलकूप भी सूख रहे हैं। संतोष भाई आपके खेत दिखा रहे हैं उसमे अभी भी अनेक पेड़ हैं इनके बीज इकठ्ठा कर सीड बॉल बनाकर बिखराते जाएँ।  शुरू में जहां तक संभव हो दलहन फसलों के साथ साथ ,पेड़ सब्जियां भी लगाते जाइये। 
अब आपको किसीभी प्रकार की खाद और दवाई की जरूरत नहीं पड़ेगी। अपने साथी किसानो भी आप प्रेरणा के स्रोत रहेंगे। आप का निर्णय आपके गाँव के लिए वरदान सिद्ध होगा।  हम आपकी मदद का वायदा करते हैं। ऋषि खेती तकनीक "कुछ मत करो "  सिद्धांत पर चलती है। 
धन्यवाद 
राजू टाइटस                        
917973 8049  

Sunday, June 25, 2017

सवाल और जवाब Ankush Madanwad

सवाल और जवाब

Ankush Madanwad में भी किसान को ऋषी खेती के बारे मे बताता हूं
और खेत मे सबबूल लगाकर आप सम्रुध्दी ला सकते हो पर यहां के किसान सबबूल को शाप मानते हे जितने भी सबबूल के पेड काट देते है। 


असल मे किसान जब खेतों की जुताई करते हैं तो उन्हें छाया में अच्छी फसल नहीं मिलती है जुताई करने से खेत कमजोर हो जाते हैं कमजोर खेतों में थोड़ी भी छाया आ जाये तो फसलें  नहीं होती है इसलिए किसान डर के मारे पेड़ों को काटते रहते हैं। जबकि सुबबूल अपनी छाया के छेत्र  में लगातार यूरिया बनाने का काम करता है।  यह भ्रान्ति खेती के डाक्टरों के द्वारा फैलाई गयी है।