Sunday, May 1, 2016

खेत का पानी खेत में





 खेत का पानी खेत में 

  बहती मिटटी(जैविक खाद ) को रोकें पानी अपने आप रुक जायेगा 

बिना -जुताई की खेती अपनाए 



सूखे की समस्या से निपटने के  लिए छोटे बड़े बांधों ,तालाबों आदि कि  चर्चा होती है। जब भी हम सतही पानी को जमीन के ऊपर रोकते हैं तो जल भूमि के अंदर  नहीं जाता है।
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भूमिगत झरने /तालाब 
जुताई  के कारण नदी में बहती जैविक खाद (मिट्टी )







जुताई करने से बरसात का पानी जमीन में नहीं सोखा जाता है वह तेजी से बहता है अपने साथ मिट्टी (जैविक खाद ) को भी बहा ले जाता है। एक बार जुताई करने से खेत की आधी जैविक खाद इस प्रकार बह जाती है। यह जैविक खाद हरियाली का मुख्य आहार सहारा है।  इसके नहीं रहने से हरी भरी जमीने मरुस्थल में तब्दील हो जाती है।

हरियाली बरसात के पानी को जमीन के अंदर ले जाने का काम करती है। हरियाली के साथ असंख्य जैव -विविधताएं रहती हैं जो  जमीन को बहुत गहराई तक छिद्रित कर देती है। जिनसे  पानी जमीन के अंदर सोख लिया जाता है जो झरनों  के रूप में बहता है।

ठीक ऐसे  झरने जमीन के अंदर  से चलते हैं। जो आसपास के कुओं ,बावड़ियों ,नदियों  नालों को पानी सप्लाई करते है।

किन्तु बड़े अफ़सोस के साथ  कहना पड़ रहा की हमने धरती के ऊपर की हरियाली को इस हद तक नस्ट कर दिया है, कि  अब हमारी खेती किसानी खतरे में पड़ गयी है। करीब ३० % इलाकों में सूखा  है पीने का  पानी नसीब नहीं है।

हरियाली  को सबसे  अधिक नस्ट फसलोत्पादन में की जाने वाली जुताई ने किया है।  गेंहू और चावल  जैसे अनाजों में यह काम सबसे अधिक हुआ है। इन अनाजों  किसानो ने कुदरती वनों ,बाग़ बगीचे ,स्थाई चरोखरों आदि सब को नस्ट कर दिया है और करते जा रहे हैं।इन अनाजों के उत्पादन  के लिए किसान पेड़ों की छाया से इस कदर नफरत करता है की वह दूर दूर के पेड़ों को काट देता है।

एक बार जुताई करने से खेत की आधी जैविक खाद बह जाती है। पानी का नुकसान अलग है।



इस समस्या का स्थाई हल बिना -जुताई की खेती है जो पेड़ों के साथ सम्भव है। चारे के पेड़ों के साथ साथ गेंहूं और चावल की  कुदरती खेती करने से पशु पालन भी किया जा सकता है। इसलिए हमारा मानना है की पानी के संकट को खत्म करना कोई बहुत बड़ा विज्ञान नहीं है। जंगलों में रहने वाले  बात  बखूबी समझते हैं। इसलिए वे पेड़ों के साथ खेती करते हैं।