Thursday, February 21, 2013

KOBRA AND CAT कोबरा, बिल्ली और मैं !

कोबरा, बिल्ली और मैं !
  एक दिन की बात है मेरी भेंस जिसका नाम भूरी है हमारे सुबबूल के कुदरती खेतों में चरने के लिए गयी थी,  उसकी पड़िया ( भेंस की बच्ची) जिसका नाम सलमा है हमेशा की तरह घर मे अपनी माँ  का इंतजार कर रही थी. खेतों मे जानवरों को  लम्बी रस्सी से बांधना पड़ता है. उन्हें सुबबूल के पेड़ों से पत्तियों को काट काट कर  खिलाया जाता है. असावधानी के कारण उसकी टांग रस्सी मे उलझ गयी थी जिस से वह ऐसी गिरी की उस से उठते ही नहीं बना. इस कारण वो उस रात घर नहीं आ सकी.

 गो धूलि का समय था. सार (जानवरों को बांधने की जगह) में अँधेरा था. सलमा को दूध नहीं मिलने से वो बहुत रो रही थी, और मैं उसे उपरी दूध पिलाने की कोशिश कर रहा था. मैं उखरू बैठ कर कटोरे से उन्ग्लिओं के सहारे दूध पिलाने लगा. सलमा विचलित न हो जाये इस लिए मैने टोर्च को बुझाकर नीचे रख दिया था.
    इसी बीच मुझे सांप के फुफकारने की आवाज आई. मैने टोर्च को जला कर देखा तो सामने मुंडेर पर जंगली बिल्ली बैठी  थी. मैने सोचा एक और बिल्ली होगी और वे लड़ रही होंगी. उनकी आवाज भी सांप के फुफकारने जैसी रहती है. हमारे कुदरती खेतों में सांप, जंगली बिल्लियाँ, नेवले ,मोर आदि यहाँ वहां घूमते रहते हैं. इनके कारण अपने आप एक कुदरती संतुलन बना रहता है.
    अबकी बार ये फुफकारने की आवाज बिलकुल मेरे कान के पास सुनाई दी. मैने पुन: टॉर्च को जला दिया. और पलट कर देखने लगा. देखा तो बिलकुल मेरे कान के पास कोबरे का सिर था. जैसे ही मेरी आंख उस की आँखों से मिली तो मुझे महसूस हुआ की वो किसी चीज़ से डर कर मेरे पीछे छुपने की कोशिश कर रहा है. वो फुफकार कर मुझ से कहने की कोशिश कर रहा है की मुझे बचाओ. मैने सामने देखा वही जंगली बिल्ली थी मेरे कारण वो आगे नहीं बढ़ पा रही थी. मैने धीरे से "हट" "हट" करते हुए बिल्ली को भगाने की कोशिश की. वह दो कदम पीछे चली गयी. उसके पीछे हटने से कोबरा भी नीचे सिर कर जाने लगा. मैं हट हट करते रहा बिल्ली हटती गयी और कोबरा भी जाता रहा, वो मुड़ मुड कर  मुझे और बिल्ली को देखता जा रहा था. और देखते देखते वो आँखों से ओझल हो गया.
 उसके जाने के बाद मैने सोचा की आखिर मुझे डर क्यों नहीं लगा ? मुझे डर इस लिए नहीं लगा क्यों की यदि में डर कर ऐसी वैसी हरकत कर देता तो वो मुझे  डस सकता था . कुदरती खेती करने से पहले मैं साँपों को देख कर सीधे मारने की कोशिश करता था. कभी उनको अपना मित्र नहीं समझता था. किन्तु इस कोबरे ने मेरी आंख खोल दी. यदि वो भी मेरी तरह मुझे दुश्मन समझता तो में जिन्दा नहीं बच सकता था.
राजू टाइटस

Wednesday, February 20, 2013

ORGANIC NO -TILL FARMING बिना-जुताई की जैविक खेती

(A) ORGANIC NO TILL FARMING
बिना-जुताई की जैविक खेती


जब से गहरी जुताई और रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों की चर्चा होने लगी है तब से विकल्प के रूप में जैविक खेती और बिना जुताई की रासायनिक खेती की चर्चा जोरों पर है।
जैविक खेती 
(ORGANIC FARMING)
"जैविक खेती सामान्यत: उस खेती करने की पद्धति को कहते हैं जिसमे नींदों की हिंसा  जुताई से  सामान्य तरीके से की जाती है. किन्तु रसायनों का इस्तमाल नहीं होता है। "
आगे हरे भूमि ढकाव को सुलाने वाला क्रिमपर रोलर पीछे बिना-जुताई की बोने की मशीन 

   जैविक खेती में जुताई करने से बरसात का पानी जमीन में ना समाकर तेजी से बहता है जो अपने साथ जैविक खाद को भी बहाकर ले जाता है। इस से खेत लगातार कमजोर होते जाते है।
बिना-जुताई की रासायनिक खेती  
NO-TILL CONSERVATIVE FARMING
"बिना-जुताई की रासायनिक खेती उस खेती करने की पद्धति को कहते हैं जिस में जुताई नहीं की जाती है किन्तु नींदों की हिंसा जहरीले रसायनों से की जाती है  इस से रसायनों का प्रदुषण बना रहता है जिस से जैव-विविध्तायों की हिंसा होती है. जिस से खेत कमजोर हो जाते है.


बिना-जुताई की जैविक खेती 
                                                        NO-TILL NATURAL/ORGANIC FARMING

बिनाजुताई की जैविक खेती
हरे वीड कवर को सुला कर खेती
NO-TILL NATURAL/ORGANIC FARMING
GREEN COVER CRIMPING BY FOOT POWERED TOOL.
बिना-जुताई की जैविक खेती का रास्ता उपरोक्त दोनों आधुनिक खेती के दोषों को समाप्त कर देता है. इसमें जुताई , रसायनों की कोई जरुरत नहीं रहती है. नींदों को मारा नहीं वरन पाला जाता है.  जिस से एक और जहाँ भूमि और जल का छरण पूरी तरह रुक जाता है वहीँ रासायनिक प्रदुषण नहीं रहने से जमीन की जैव विविधतायों का बढ़ता क्रम बना रहता है. जिस से जमीन की ताकत हर मोसम बदती जाती है.

इस खेती को करने के लिए किसी भी प्रकार के मानव निर्मित खाद और खरपतवार नाशक तथा कीटनाशक उपाय की जरुरत होती है. इस खेती में खड़ी खरपतवारों या फसलों के बीच बीजों को छिड़क दिया जाता है और खरपतवार को काट कर या क्रिम्पर यंत्र की सहायता से जहाँ का तहां सुला दिया जाता है. फसलो को काट  कर उसके अवशेषों को भी जहाँ का तहां फेला दिया जाता है .

कृषि अवशेषों के ढकाव से खेती
STRAW FARMING
खेतों में खड़ी हरी फसलों या  अन्य वनस्पतियों को 'हरा भूमि ढकाव ' कहा जाता है. इसके नीचे असंख्य जीव-जंतु कीड़े-मकोड़े निवास करते हैं जो जमीन को गहराई तक छिद्रित बना  देते है ,जमीन को नमी प्रदान करते है ,जैविक खाद बनाते है. जड़ों और छिद्रियता के कारण बरसात का या सिचाई का पानी जमीन में गहरायी तक समां जाता है. इस कारण जमीन में उन तमाम पोषक तत्वों की जरुरत की आपूर्ति हो जाती है जिनकी फसलों को जरुरत रहती है. फसलों के अवशेषों जैसे नरवाई ,पुआल आदि को जहाँ का तहां वापस कर देने से एक जहाँ जमीन की ताकत बढती जाती है वही फसलों का उत्पादन भी बढ़ता जाता है. ये खेती करने की तमाम टिकाऊ खेती की तकनीकों में सर्वोत्तम विधि है.
शालिनी एवं राजू टाइटस
ऋषि-खेती किसान
THERE IS EQUALITY IN NATURAL WAY OF FARMING AND NO-TILL ORGANIC WAY OF FARMING. THESE METHODS OF FARMINGS ON TOP IN THE LIST OF SUSTAINABILITY BECAUSE THESE METHODS SAVING WEEDS INSTEAD OF KILLING.
WHEREAS NO-TILL CONSERVATIVE WAY OF FARMING IS NOT SUSTAINABLE DUE TO KILLING OF WEEDS BY CHEMICAL POISON AND ORGANIC WAY OF FARMING IS ALSO NOT SUSTAINABLE DUE TO KILLING OF WEEDS BY TILLING.

*Raju Titus.Natural farm.Hoshangabad. M.P. 461001.*
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Friday, February 15, 2013

DROUGHT IN MAHARASHTRA बूँद बूँद को तरसता महारास्ट्र

DROUGHT IN MAHARASHTRA
ऋषि-खेती
बिना-जुताई की कुदरती खेती
बूँद बूँद को तरसता महारास्ट्र 

जैसे ही आज हमने  टीवी पर ये खबर देखी वैसे ही हम लिखने बैठ गए . एक ओर हमारे फल के बगीचे हैं जिनमे हमने गेंहू बोया है उनमे हम पानी की अधिकता से परेशान हैं। गेंहू की फसल अधिक बढ़ने के कारण गिरने लगी है वहीँ महारास्ट्र में संतरे के बगीचे जो फलते फलते पानी की कमी के कारण सूख रहे हैं।
सूखती फसल के आगे बेबस किसान
HELPLESS FARMER LOOKING HIS CROP DAMAGED BY DROUGHT 
                                                      
हमारे ये बाग़ बिना-जुताई की कुदरती खेती को करने के कारण पानी से भरपूर हैं। महारास्ट्र के संतरे के बाग़ जुताई वाली रासायनिक खेती करने के कारण  हो रही पानी की कमी के कारण मर रहे हैं। ये समस्या केवल संतरों के बागानों तक सीमित नहीं पूरा महारास्ट्र फसलोत्पादन के लिए की जा रही जमीन की गहरी जुताई के कारण बूँद बूँद के लिए तरसने लगा है।

महारास्ट्र ही क्यों? हर वह प्रदेश या देश फसलोत्पादन के लिए जमीन को गहराई तक खोदेगा /जोतेगा वह भी भविष्य में बूँद बूँद के लिए तरसेगा।
हजारों बाग़ सूख गए
THOUSANDS OF ORCHARD DIED
जब भी फसलोत्पादन के लिए जमीन को जोता या बखरा जाता है बखरी बारीक मिट्टी कीचड में तब्दील हो जाती है जो बरसात के पानी को जमीन के भीतर जाने नहीं देती है। इस के आलावा जमीन पर जितनी वनस्पतियाँ ,कीड़े मकोड़े आदि रहते हैं उनके घर बरसात के पानी को जमीन के अंदर ले जाने का काम करते हैं।
जमीन की जुताई के कारण ये घर मिट जाते हैं। खबर में बताया गया है की ये समस्या देश के कृषि मंत्रीजी के छेत्र में भी है कृषि वैज्ञानिको के पास इस का कोई उपाय नहीं है. 

  

बरसात असमान से नहीं जमीन से आती है जमीन में पानी होगा तो पानी बरसेगा। जिस रास्ते से जमीन में पानी अंदर जाता है उसी रास्ते से पानी वास्प बन कर बादल बन बरसता है।
बिना -जुताई की कुदरती खेती
NO-TILL NATURAL FARMING



बिना-जुताई की कुदरती  खेती का अविष्कार श्री मस्नोबू फुकुओकाजी ने किया है। उनका कहना है की पानी उपर से नहीं वरन जमीन के भीतर से आता है बशर्त पानी को जमीन में जाने से नहीं रोक जाये। हमें बिना-जुताई की खेती को करते 27 साल हो गए हैं। इस से पूर्व हम भी जुताई आधारित खेती करते थे इस से हमारे कुए सूखने लगे थे किन्तु जब से हमने बिना-जुताई की खेती को करना शुरू किया है तब से हमारे देशी उथले कुओं का जल स्तर लगातार बढ़ रहा है।
कुदरती खेती जापान
GREEN COVER IN THE SHADE AREA OF FRUIT TREES
                

महारास्ट्र में सूखे से निबटने के लिए पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। जबकि बिना-जुताई की कुदरती खेती करने से 80% लागत कम हो जाती है। फसलोत्पादन के आलावा पानी की फसल अतिरिक्त प्राप्त होती है।




शालिनी एवं राजू टाइटस
27 सालों से बिना-जुताई की कुदरती खेती के किसान

THERE IS SEVERE DROUGHTS IN MAHARASTRA INDIA THIS YEAR. THOUSANDS OF ORANGE ORCHARDS ARE DYING DUE THIS. MANY VILLAGERS ARE NOT GETTING DRINKING WATER FOR PEOPLE AND DOMESTIC ANIMALS.

AS PER MR FUKUOKA WATER IS NOT COMING FROM SKY IT IS COMING FROM GROUND. IF GROUND IS PROPERLY RECHARGED WATER VAPORS COVERTS IN CLOUDS WHICH BRINGS RAIN. TILLING OF LAND AND KILLING OF SOIL BIODIVERSITY NOT ALLOWED RAIN WATER TO ABSORBED BY SOIL IS MAIN CAUSE OF DROUGHTS.

FARMERS ARE TILLING IN ORCHARDS AND KILLING ALL GREEN  COVER OF GROUND DO NOT ALLOW RAIN WATER TO GO IN THE SOIL. IF FARMERS ALLOW GREEN COVER IN THEIR ORCHARD STOP TILLING THEY WILL GET SUFFICIENT RECHARGING.

FUKUOKA WAY OF FARMING IS BEST WATER SHADE METHOD AND BEST WATER MANAGEMENT. COST OF THIS METHOD IS 80% LESS.


कुपोषण: समस्या और समाधान


कुपोषण: समस्या और समाधान 


पिछले कुछ सालों से भारत में कुपोषण के बढ़ते चरण की बहुत चर्चा है। कहा जा रहा है की करीब आधी आबादी इसकी चपेट में है। 70% महिलाएं एनिमियां यानि खून की कमी का शिकार हैं ,नवजात बच्चों की मौत और अपंगता ने आज तक के सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं। केंसर जैसे असाध्य रोग आम होने लगे हैं। मधुमेह और दिल की बीमारी अब हर किसी को हो रही है। समय से पहले बालों का पकना और झड़ना  , आँखों से कम दिखाई देना, दांतों का टूटना, बार बार सर्दी जुखाम और बुखार आना आदि सब कुपोषण के निशान हैं। 

आखिर क्या है ये कुपोषण ?

हमारा शरीर एक कुदरती जैविक अंश है। इसे जीवित रहने और पनपने के लिए कुदरती खान ,पान और हवा की जरुरत रहती है  जब ये  नहीं या कम मिलता है तो  इस दशा को कुपोषण कहते हैं। ये एक प्रकार की भुखमरी है।
ये समस्या किसी को भी अपनी गिरफ्त में ले सकती है चाहे वह गरीब हो या अमीर हो ,मोटा हो पतला हो,छोटा हो या बड़ा हो।

हमारा शरीर  कुदरती तंत्र का  हिस्सेदार हैं जो अनेक  जैव-विवधताओं को आहार के रूप में इस्तमाल करता है। जब ये जैव-विविधताये गेर कुदरती हो जाती हैं तो शरीर इसे स्वीकार नहीं करता है वह गेर-कुदरती खान-पान के कारण भूका रहते हुए कुपोषण का शिकार हो जाता है।

इस समस्या का जन्म  मात्र कुछ सालों से  अधिक दिखाई दे रहा है। इस समस्या का  सम्बन्ध गेर-कुदरती आहार से है। ये गेर-कुदरती आहार  गेर-कुदरती खेती में पैदा होता है ,जिसका चलन मात्र कुछ सालों से शुरू हुआ है। जिसमे फसलोत्पादन के लिए की जा रही मशीनी जमीन की जुताई और रसायनों का उपयोग प्रमुख है।
कुदरती चावल की फसल 

कुदरती गेंहू की फसल 
मशीनी जमीन की जुताई से खेतो की कुदरती खाद और पानी का बड़े पैमाने पर छरण होता है जिस से जमीन जो स्वं एक कुदरती तंत्र कुपोषण का शिकार हो जाती है इस लिए इस में पनपने वाली तमाम जैव-विविधताये भी कुपोषित हो जाती हैं। जिनके कुपोषण का असर हम पर और हमारे मवेशियों पर पड़ता है। खाने के अनाज,सब्जियां, दूध,मांस आदि सब गेर-कुदरती तरीके से पैदा होने के कारण कुपोषित और प्रदूषित रहते हैं। इनमे कुदरती स्वाद,खुशबु और जायके की भारी  कमी रहती है।

इस के विपरीत  जंगल में मिलने वाली तमाम कुदरती खाने वाली जैव-विवधताओं हैं ये सब कुदरती स्वाद, जायके और खुशबु से परिपूर्ण ,स्वास्थवर्धक रहती हैं। इनको खाने से कुपोषण नहीं होता है यदि हो जाये तो वह ठीक भी हो जाता है।
कुदरती फलों की फसल 


बिना-जुताई की कुदरती खेती अनाज ,सब्जी,फल,दूध,अंडे आदि पैदा करने की ऐसी तकनीक है जिसमे जमीन की जुताई और कृषि-रसायनों का उपयोग बिलकुल नहीं किया जाता है। सभी खाद्य विविधताएँ  जंगल में पैदा होने वाली विवधताओं की तरह स्वादिस्ट,खुशबु और जायके वाली होती हैं। इनको खाने से कुपोषण की समस्या नहीं रहती है।




Sunday, January 20, 2013

भारतीय संस्कृति का श्रोत है ऋषि खेती



          

 

                

  भारतीय संस्कृति का श्रोत है ऋषि खेती 

धरती माँ की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं है ! 
 
 
 आज भी हमारे देश में ऋषि पंचमी का पर्व मनाया जाता है जिसमे कांस घास की पूजा होती है और ऋषि अनाजों को फलाहार के रूप में सेवन किया जाता है। कांस घास को देवता माना जाता है खेतों जब कांस फूलने लगता है किसान उस में हल चलाना बंद कर देते हैं उनका मानना है की हल चलाने  से धरती माँ घायल ही जाती हैं उनका लहू बहने ने लगता है।  

 टाईटस नेचरल फार्म पिछले 27 सालों से अपने खेतों में ऋषि -खेती  के माध्यम से घायल धरती मां की सेवा में सलग्न है। ऋषि खेती नाम गाँधी खेती के लिए स्व .विनोबाजी के द्वारा दिया गया था।  भारतीय अहिंसात्मक स्वंत्रता संग्राम के उपरांत जब गांधीजी नहीं रहे थे। विनोबाजी ने सत्य और अहिंसा के अनुसार जिस प्रकार देश को आज़ादी मिली थी विकास को आगे ले जाने के लिए ऋषि खेती को हथियार बनाया था। उन्होंने मशीनो और रसायनों से होने वाली खेती और पशु बल से होने वाली खेती के बदले हाथों से होने वाली खेती के प्रयोग कर उसे देश के स्थाई विकास के लिए सर्वोत्तम उपाय बताया था। उनका सर्वोदय भूदान आन्दोलन ऋषि खेती पर आधारित था। इसका मुख्य उदेश्य यह था की हर इन्सान अपना खाना स्वं पैदा करते हुए किसानो का और धरती मां का शोषण बंद करे। ये जानकारी हमें जग प्रसिद्ध गाँधीवादी क्वेकर ,देशिकोत्तम से सम्मानित स्व .मार्जरी बहन के द्वारा रचित किताब " मूव्ड बाई लव " से मिली है।


मार्जरी बहन जब  23 साल की थी वे इंग्लॅण्ड में ऑक्स्फ़र्ड यूनिवर्सिटी में क्वेकर स्टडी कर रही थीं उसी समय भारत में गांधीजी का अहिंसात्मक स्वंत्रता आन्दोलन चल रहा था वे इस से प्रभावित होकर आन्दोलन को सहयोग देने के लिए भारत आ गयीं थी। जिस प्रकार भारत में गाँधीवाद सत्य और अहिंसा पर आधारित है उसी प्रकार इंग्लेंड में क्वेकर विचार धारा भी सत्य और अहिंसा पर आधारित है। जाती,धर्म ,भाषा ,रंग और छेत्रिय भेदभाव से ये कोसों दूर है। मार्जरी बहन अपने प्रारंभिक काल में शांति निकेतन में गुरुदेव  रवीन्द्रनाथ  ठाकुर के साथ रही। वे उन दिनों काफी बीमार थे ,चल फिर नहीं सकते थे किन्तु वे गांधीजी के आन्दोलन को सहयोग कर रहे थे, उन्होंने मार्जरी बहन के माध्यम से अपने नाटको का अंग्रेजी अनुवाद इंग्लॅण्ड पहुचाया जिसे वहां के क्वेकर लोगों ने बहुत तेजी से प्रचारित किया जिस से अंग्रेजी हुकूमत पर भारत को आजाद करने का दवाब बना और गांधीजी के आन्दोलन को बहुत सहायता हासिल हुई। गुरिदेवजी  के  नहीं रहने के बाद मार्जरी बहन गांधीजी के साथ काम करने लगीं थीं गांधीजी ने उन्हें सत्य और अहिंसा पर आधारित शिक्षा का काम सोंपा था वे गाँधी आश्रम में नयी तालीम के नाम से इस योजना को चलाती रहीं। गाँधी जी के नहीं रहने के उपरांत उन्होंने गांधीजी के सब से अच्छे चेले आचार्य विनोबाजी के साथ काम किया वे भूदान आन्दोलन से भी जुड़ीं रहीं।

उन दिनों भारत में मशीनो से की जाने वाली गहरी जुताई और रसायनों पर आधारित "हरित क्रांति" का जोर चल रहा था। जो गांधीवाद और क्वेकर विचार धारा के विपरीत था। उन दिनों होशंगाबाद स्थित क्वेकर संस्था में क्वेकर पीस सर्विस इंग्लॅण्ड की आर्थिक सहायता से हरित क्रांति का ग्राम विकास माडल बनाया गया था जो गहरी जुताई और जहरीले रसायनों के उपयोगों के कारण ध्वस्त हो चुका  था। 

 संस्था भारी आर्थिक, सामाजिक,और पर्यावरणीय संकट में फंस गयी थी। इसे इस संकट से उबारने के लिए गाँधीवादी क्वेकर श्री परताप भाई ने बीड़ा उठाया था। परताप भाई इस से पूर्व मशीनो और रसायनों से होने वाली खेती और भारतीय परंपरागत खेती किसानी का ठीक से अध्यन कर चुके थे। उन्होंने अमेरिका की प्रोफेसर की नोकरी को त्याग कर कई माह होशंगाबाद के गाँव में रहकर तवा नदी के  बांध से सिंचित होने वाले छेत्र की रासायनिक खेती और उस से होने वाले नुकसान का अच्छे से अध्यन किया और  रसायनों और मशीनो के बिना खेती का एक माडल बना कर किसानो को जाग्रत करने का  निर्णय लिया। इस के लिए उन्हें रसूलिया होशंगाबाद की क्वेकर संस्था ने आमंत्रित कर काम करने की पूरी आज़ादी दी। परताप्जी ने  इस कार्य हेतु मार्जरी बहन को  अपने साथ जोड़ लिया। काम बहुत कठिन था पर दोनों ने मिलकर 70-80 के दशक में इस संस्था की जमीन पर ऋषि खेती योजना लागु कर दी। इस योजना में मशीनो की जुताई और रसायनों का त्याग सब से प्रमुख था। गोशाला में संकर नस्लों की गायो के बदले देशी गायों को पाला जाने लगा। गोबर गेस से उर्जा और गोबर की खाद से खेती की जाने लगी। जुताई के बगेर सीधे दलहनी बीजों को फेककर उगाया जाने लगा जिस से खेतों को भरपूर नाइट्रोजन , गायों को चारा और बीजो से पैसा प्राप्त मिल  जाता था।  ऋषि खेती योजना एक ओर  गाँधी और क्वेकर सिधान्तो के अनुरूप थी वहीँ ये पूरी तरह आत्म निर्भर थी। ऋषि खेती योजना के इस माडल ने हरित क्रांति के माडल को स्थाई विकास के लिए बिलकुल बेकार सिद्ध कर दिया। 

एक और सरकार मशीनो और रसायनों के उपयोग के लिए किसानो को प्रोत्साहित कर रही थी वहीँ ये संस्था गोसंवर्धन ,गोबर की खाद ,बेलों से होने वाली हलकी जुताई ,नत्रजन देने वाली बरसीम फसल के मध्यम से खेती करने के लिए प्रोत्साहित कर रही थी। इस के लिए उन दिनों की सरकार ने संस्था पर विधान सभा में सवाल उठा कर काफी विरोध किया। आज ये ही सरकार मशीनो और रसायनों से होने वाले
नुकसान की भरपाई हेतु  गोसंवर्धन कर जैविक खेती को प्रोत्साहित करने की बात करने लगी है। ये गाँधीवादी -क्वेकर पर्यामित्र ऋषि खेती की बड़ी जीत है।

  
किन्तु हमें अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है की रसूलिया  से  मार्जरी बहन और परताप भाई के जाने के बाद गाँधीवादी और क्वेकर मूल्यों पर आधारित ऋषि खेती का अहिसात्मक आत्म निर्भर ग्राम विकास का माडल आयातित तेल और जहरीले रसायनों पर आधारित हिंसात्मक माडल के आगे हार गया। ऋषि खेती के बंद हो जाने से वहां आनेवाले तमाम देशी विदेशी महमान बंद हो गए, जमीने बंजर हो गयीं है। विनाशकारी गहरी जुताई और जहरीले रसायनों के बिना अब वहां कुछ भी पैदा नहीं होता है। जहाँ कुदरती आहार खरीदने वालों की भीड़ लगी रहती थी अब वहां कोई आता नहीं है आर्थिक घाटा इतना हो गया है की उस की आपूर्ति के लिए जमीने बिकने लगी हैं। असल में लोग गाँधी और क्वेकर मूल्यों को आज पुराना और बेकार वाद मानते हैं। वे आधुनिकता चमक में गुम जाते है।

मार्जरी बहन और परताप्जी जानते थे की उनके जाने के बाद रिशिखेती योजना को बचाना कठिन होगा  इस लिए आप दोनों चाहते थे की ये योजना ऐसे किसी निजी फार्म में स्थान्तरित हो जाये जिस से ये बच जाये इस लिए हमारी मां क्वेकर गाँधीवादी महिला शिक्षाविद स्व .पालिना टाइटस और हमने मिलकर इस योजना को हमारे फार्म पर लागु कर दिया जो 27 सालों से निर्विवाद सफलता की ऊंचाई को छु रहा है। वे तमाम मेहमान जो रसूलिया फार्म पर ऋषि खेती देखने जाते थे हमारे फार्म पर आने लगे इस प्रकार ऋषि खेती का प्रचार प्रसार होने लगा। रासायनिक खेती पर किसानो की आत्म हत्या,पर्यावरण विनाश,और थाली में जहर उंडेलने का दोष लग गया। खेती में जुताई और जहरीले रसायनों के उपयोग के कारण धरती मां के साथ रहने वाली तमाम जैव एवं वानस्पतिक विविधताओ की हत्या चरम सीमा पर है।
हमारे फार्म पर आने के बाद ऋषि खेती पूरी तरह बिना जुताई की कुदरती खेती बन गयी। बिना-जुताई की कुदरती खेती का अविष्कार जापान के जाने माने गाँधीवादी ,देशोक्प्त्तम और मेगासे अवार्ड प्राप्त क्रषि वैज्ञानिक तथा कुदरती खेती के किसान स्व .मस्नोबू फुकुओका जी ने किया था।पिछले अनेक सालों में इसे हमने इसे भारत के हर प्रान्त में करने योग्य बनाने में बड़ी सफलता अर्जित की है। गेंहूं,दाल ,चवाल ,सब्जी,फलों की खेती के साथ साथ चारे और ईंधन के पेड़ों की खेती,पशु पालन यहाँ अब सब ऋषि खेती तकनीक से होता है। अधिकतर लोग ये सोचते हैं की जुताई और रसायनों के बिना खेती असंभव है या अधिक उत्पादन करने में असमर्थ है। ये भ्रान्ति है। जरा कुदरती जंगलों को देखें वहां कोन जुताई करता है कोन रासयनिक उर्वरक या कीट नाशकों का उपयोग करता है  भी हर प्रकार की वनस्पति

हमारा ऋषि खेती फार्म अब दुनिया भर में नेचरल फार्मिंग की जानकारी हेतु प्रथम स्थान रखता है। ये गाँधी -क्वेकर पर्या मित्र जानकारी का रिसोर्स सेंटर बन गया है। दूर दूर से लोग यहाँ आते हैं।

हरित क्रान्ति सही मायने में पूरी तरह आयातित तेल की गुलाम रेगिस्तानी मरू खेती है। कहने को तो यह कहा जाता है की इस हरित क्रांति  ने देश की खाद्य सुरक्षा में महत्व पूर्ण भूमिका निभाई है किन्तु सच्चाई इस के विपरीत है। अनेक कुदरती अनाज जैसे कोदों ,कुटकी ,मूंग,अरहर,ज्वार ,बाजरा आदि समाप्ति के कगार पर हैं। गेहूं ,सोयाबीन,और धान की खेती ही बची है जिस में सोयाबीन और चावल का उत्पादन मात्र 5% ही रह गया है।
ये सब अनाज डीज़ल ,रासायनिक उर्वरकों,और जहरीले कीट नाशकों पर आधारित हैं। जिनसे पर्यावरण प्रदूषण सीमा लाँघ चुका है। इन अनाजों की रासायनिक खेती  के कारण एक और जहाँ रोटी में जहर घुल रहा है वहीँ हरे भरे जंगल ,बाग़ बगीचे ,और स्थाई चरोखारों का सफाया हो गया है। दुधारू पशुओं का पालना दूभर हो गया है।
केंसर,महिलाओं में एनीमिया,नवजात बच्चों की मौत और अपंगता तेजी से बढ़ रहा है। मोसम परिवर्तन और गरमाती धरती ,बाढ़ सूखा आम हो गया है।

हमारे देश में आज भी भारी मशीनो  और रसायनों पर आधारित खेती बलवती है। किन्तु अब धीरे धीरे परिवर्तन आ रहा है। बंजर होती जमीने, खेती किसानी छोड़ते किसान, पर्यावरणीय प्रदुषण ,जहरीला होता भोजन, किसानो की आत्म हत्या आदि समस्याओं के कारण योजनाकार बिना जुताई की जैविक खेती की ओर मुड़ने लगे हैं।  
  
हमारे प्रदेश की सरकार अब हमें कृषि योजना को बनाते समय आमंत्रित करती है। सरकार ने जीरो टिलेज और जैविक खेती को बढ़ावा देने हेतु कार्य करना शुरू कर दिया है। अनेक किसान जुताई के बिना बीजों को छिटक कर खेती करने लगे हैं।

हमारा मानना है की घरती मां जो हमारी पालनहार है उसकी सेवा करने में गाँधी-क्वेकर जैसे सोच की जरुरत है। जाती ,धर्म ,संप्रदाय , राजनीतिक  आदि विघटनकारी विचार धाराओं से हम धरती मां की सेवा नहीं कर सकते हैं।
शांति की कुंजी धरती मां के पास है उसकी सेवा करें सब शुभ होगा .

शालिनी एवं राजू टाइटस
Titus Natural farm.Hoshangabad. M.P. 461001.
       rajuktitus@gmail.com. +919179738049.
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Wednesday, January 16, 2013

POISON ON PLATE थाली में जहर

 ऋषि खेती

 नेचरल फार्मिंग

पर्या -मित्र स्थाई ग्राम विकास योजना

थाली में जहर   

मारे इन ऋषि खेतों पर निगाह डालें। हरे भरे सुबबूल के पेडों के  साथ साथ गेंहूं की फसल पक रही है। इन खेतों को पिछले 27 सालों से जोता नहीं गया है ना ही इस में कोई भी मानव निर्मित खाद और दवा का उपयोग किया गया है। इन खेतों से हमारे इलाके के सब से अधिक आधुनिक खेती के उत्पादक खेतों के बराबर उत्पादन मिलता है, जहाँ अनेक बार खेतों को ट्रेक्टर से जोता और बखरा जाता है, अनेक प्रकार की खाद और दवा का उपयोग किया जाता है।

 सुबबूल के पेड़ एक ओर जहाँ गेंहू की फसल के लिए भरपूर नत्रजन देने का काम करते हैं, वहीं ये दुधारू पशु के लिए उत्तम चारा और जलाऊ लकड़ी देने का काम करते हैं। गोबर से बायो गेस ओर जैविक खाद मिलती है। सुबबूल के पेड़ों के साथ साथ अनेक फलों के पेड़ जैसे आम, अमरुद ,नीबू ,सीताफल ,कबीट ,इमली,बेल आदि भी यहाँ खूब पनप रहे हैं। अनेक प्रकार की सब्जियां जैसे आलू, टमाटर,बेंगन ,हरी भाजियां,मिर्च आदि भी यहाँ से मिल जाती है। अनेक प्रकार के जंगली जानवर जैसे मोर,बाज,उल्लू, सांप यहाँ दोस्तों की तरह रहते हैं। इनके रहने से हमारी फसलों पर कीड़ों ,चूहों आदि का कोई प्रकोप नहीं रहता है।

ऋषि खेत एक ओर जहाँ भरपूर कुदरती आहार, ईंधन,आमदनी का स्रोत है ये बरसात के पानी को बहने नहीं देते हैं उसे जहाँ का तहां सोख लेते हैं जिस से हमारे कुए साल भर लबा लब रहते हैं। ऐसा खेतों में रहने वाली अनेक जैव-विविधताओं जैसे केंचुए,चूहों आदि के घरों के कारण होता है जबकि जुताई वाले खेतों में इसके विपरीत पानी को सोखने वाले मुहाने बारीक बखरी मिट्टी से बंद हो जाते हैं बरसात का पानी जमीन में ना जाकर तेजी से बहता है वह अपने साथ  जैविक खाद को भी बहा कर ले जाता है खेत भूके और प्यासे रहते हैं उनकी खाद और पानी की मांग बढती जाती है उत्पादन ओर गुणवत्ता घटते क्रम में रहता है।

ऋषि खेती से मिलने वाला आहार, हवा और पानी दवाई का काम करता बड़ी से बड़ी बीमारी इस से ठीक हो जाती है। इस लिए ऋषि खेती उत्पाद ऊँची कीमतों पर मांगे जाते हैं। जबकि इस के विपरीत  जुताई ,खाद ओर दवाओं के बल पर  बेस्वाद और जहरीले उत्पाद मिलते हैं जिस से बीमारियाँ पनप रही हैं जिनकी कीमत लागत की तुलना में बहुत कम होने से किसानो को घाटा होता है।

असल में हमारे देश में पर्यावरण और खेती की योजना एक दुसरे के विपरीत है। इस लिए गांवों का विकास नहीं हो रहा है। पर्यावरण विभाग पेड़ लगाने की सलाह देता है तो कृषि विभाग उन्हें कटवा देता है। ऐसा छाया के डर के कारण होता है। किन्तु ऋषि खेती में ठीक इस के विपरीत पेड़ों की हलकी छाया में फसलें अच्छी पनपती हैं।
जुताई करने से खेत कमजोर हो जाते हैं। उनमे कमजोर फसल पनपती है। थोड़ी भी रोशनी कम होने से फसल पैदा  नहीं होती है।

असल में खेती के वैज्ञानिक केवल जमीन के ऊपर ऊपर ही देखते हैं जबकि फसलों की खाद और पानी की आपूर्ति जमीन के नीचे से होती है। जितनी अधिक जमीन में गहराई तक और घना जड़ों का जाल होगा जमीन उतनी अधिक उपजाऊ और पानीदार होगी उसमे उतना अधिक उत्पादन मिलता है।

ऋषि खेती में खरपतवारों का विशेष महत्व रहता है। हम इन्हें भूमि घकाव की फसल कहते हैं। हरे भूमि ढकाव के कारण असंख्य जमीन में रहने वाले जीव जंतु,कीड़े मकोड़े और सूख्स्म जीवाणु तेजी से पनपते हैं जिनके जीवन चक्र और मल मूत्र से खेतों में पोषक तत्वों और नमी का संचार होता है। हर पेड़ की छाया के छेत्र में रहने वाली वानस्पतिक और जैव-विवधताओं का बहुत महत्त्व रहता है ये पेड़ की हर प्रकार से सहायता करती हैं। खाद,पानी ,बीमारियों की रोकथाम सब कुछ इनसे मिलता है। गेर कुदरती खेती में यह धारणा रहती है की मूल फसल या पेड़ के पास जितने अन्य पौधे रहते है वे खाना चुरा लेते हैं इस लिए इन्हें खरपतवार या नींदा कहा जाता है और मारा या निकाला जाता है।ये धारणा गलत है । जेवविविध्ताओं की कमी और पर्यावरण विनाश के पीछे गेर-कुदरती खेती का बहुत बड़ा हाथ है।

ऋषि खेती सब से पहले दिमाग से शुरू होती जब भी कोई ऋषि खेती करना चाहता है उसे सब से पहले ये समझने की जरुरत रहती है की तमाम खेती-किसानी में किये जा रहे गेर कुदरती काम जमीन के लिए हानि कारक है। उन्हें छोड़ भर देने से जमीन का सुधार होने लगता है। कुदरत कभी भी अपनी जमीन को खाली नहीं रहने देती है। उसे वह हरियाली से ढँक देती है जिसमे में असंख्य जीवजन्तु कीड़े मकोड़े काम करने लगते हैं इस से फसलोत्पादन के लिए जमीन तयार हो जाती है। इस ढकाव में फसलों के बीजों को छिड़ककर हरे ढकाव को जहाँ का तहां सुला दिया जाता है जिस से बीज सुरक्षित हो जाते हैं वे अंकुरित हो जाते हैं जड़ें जमीन में चली जाती हैं और पत्तियां ढकाव से ऊपर निकल आती है। जैसा जंगलों में होता है।

जुताई नहीं करने से भूमि,जल और जैव-विविधताओं का छरन रुकने से खेत ताकतवर हो जाते हैं। उनमे ताकतवर फसलें पैदा होती हैं। जिनमे रोगों का कोई प्रकोप नहीं रहता है। कुदरती आहार को खाने से बड़े से बड़े रोग जैसे केंसर भी ठीक हो जाते है। जबकि जुताई और रसायनों से की जाने वाली खेती के कारण खेत हर मोसम कमजोर होते जाते हैं। कमजोर खेतों में कमजोर फसलें पैदा होती हैं जिनमे कीड़े लगते हैं जिन्हें मारने के लिए अनेक प्रकार के जहर डाले जाते हैं। जिन से फसलें जहरीली हो जाती हैं जिन्हें  खाने से बीमारियाँ पनपती हैं। महिलाओं में खून की कमी, नवजात बच्चों की मौत ,केंसर आदि बीमारियों का यही मूल कारण है।

एक कहावत है "हरियाली है जहा खुशहाली है वहां " गेर-कुदरती खेती में कोई भी किसान हरयाली के देवता पेड़ों को अपने खेतो में होने नहीं देते है। इस लिए धरती मां नग्न हो गयी हैं। सभी हरे भरे वन ,बाग़-बगीचे ,चारागाह अब जुताई और रसायनों के खेतों में तब्दील हो रहे हैं इस लिए मोसम परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग जैसी गंभीर  समस्याएँ पनप रही हैं।

एक और कहावत है की "जैसा खाएं अन्न वैसा होय मन  जुताई और रसायनों के कारण कमजोर और जहरीली फसलें अब हमारी थाली में दिन प्रति दिन बढती जा रही हैं। जिस से हमारे खून में जहर घुलने लगा है। सब से बड़ी समस्या दूध पिलाने वाली माताओं की है उनके दूध से जहर बच्चों में पहुँचने लगा है। इस कारण नवजात बच्चों में केंसर और अपंगता पनप रही है। जहरीला भोजन ,हवा और पानी के कारन अनेक प्रकार के समाज में दुष्कर्म देखें जा रहे है। समाज में हिंसा चरम सीमा पर है। सबसे गंभीर समस्या जाती ,धर्म, छेत्रियता के कारण पनप रही लडाइयों की है। परिवारों में आपसी प्रेम घटने लगा है।

असली भारत गांवों में बसता है पर्यावरणीय  ,आत्म निर्भर खेती-किसानी उनकी आजीविका का साधन है। किन्तु जमीन की जुताई और रसायनों से होने वाली गेर कुदरती खेती के कारण अब आत्म निर्भरता ख़तम हो रही है। इस लिए गांवों का विकास रुक गया है। इस कारण गांवों से शहरों की ओर पलायन और तेज हो गया है। शहरों  का भी विकास थम गया है। इस लिए जब तक खेती-किसानी आत्म निर्भर नहीं होती न तो गांवों का कोई विकास होगा और न ही शहरों के उधोगों का , लगातार वर्षों से चल रही आर्थिक मंदी इस बात का गवाह है।

ऋषि-खेती शत-प्रतिशत आत्म निर्भर खेती है सभी साधू संतों ,मोलवी , पादरियों ,शिक्षाविदों ,वैज्ञानिको, पूँजी-पतियों और राज नेताओं को इस पर ध्यान देने की जरुरत है। विकास की सम्पूर्ण अवधारणा को धरती से जोड़ने की जरुरत है। जब ही हम अपनी थाली से जहर हटा  सकते हैं और असली स्थाई विकास को प्राप्त कर सकते है।

शालिनी एवं राजू टाइटस



Raju Titus.Natural farm.Hoshangabad. M.P. 461001.
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Wednesday, December 12, 2012

CARIER IN NATURAL FARMING बिना-जुताई की कुदरती खेती कर अपना भविष्य सुरक्षित करें।

बिना-जुताई की कुदरती खेती कर अपना भविष्य सुरक्षित करें।

    आज-कल जब से आधुनिक वैज्ञानिक खेती का चलन शुरू हुआ है खेती-किसानी की हालत बहुत ख़राब हो गयी है। ऐसा खेतों में जुताई करने और रसायनों के इस्तमाल से हुआ है।

वैसे तो बरसों से फसलों को पैदा करने के लिए की जा रही जमीन की जुताई एक पवित्र काम माना जाता रहा है। किन्तु इस से होने वाले नुकसान को नजर-अंदाज करने के कारण जमीने बहुत कमजोर हो जाती हैं,वे मरुस्थल (केंसर के रोगी की तरह ) में परणित हो जाती हैं। मरुस्थल में फसलों को पैदा करने के लिए खाद दवाओं का इस्तमाल बढ़ते क्रम में रहता है,और उत्पादन तथा गुणवत्ता घटते क्रम में रहती है इस कारण किसान को लगातार घाटा होता रहता है।
                                                              कुदरती चावल की फसल 
यही कारण है की किसान खेती छोड़ रहे हैं, कर्जे में डूब रहे हैं,आत्म -हत्या करने लगे हैं। किन्तु जब से बिना-जुताई की खेती का चलन शुरू हुआ है, इस में ब्रेक लगा है। अनेक किसान इस से लाभ कमा रहे है। बिना-जुताई और बिना रसायनों से खेती करने से जमीने पुन: ताकतवर हो जाती हैं। उनमे ताकतवर फसलें पैदा होती हैं किसी भी प्रकार की दवा की जरुरत नहीं रहती है। इस लिए फसलें कुदरती गुणों से भरपूर रहती हैं। इन फसलों को खाने से केंसर जैसा रोग भी ठीक हो जाता है।

कुदरती खेतों में कुदरती खेती करने से एक और लागत 80% घट जाती है  वहीँ उत्पादन हर मोसम बढ़ता जाता है उसकी गुणवत्ता भी बढती जाती है। इस लिए कुदरती उत्पाद बहुत महंगे बिकते हैं। आज -कल हमारे पढ़े-लिखे युवक-युवतियों के आगे रोजगार की गंभीर समस्या है। मंदी के कारण पिछले अनेक सालों से उधोग धंदे पनप नहीं पा रहे हैं। इस लिए बेरोजगारी की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गयी है। बड़े से बड़े किसान का बेटा  या बड़ी से बड़ी डिग्री वाला आज चपरासी की नोकरी के लिए तरस रहा है।
किन्तु हम जो पिछले 27 सालों से बिना-जुताई की कुदरती खेती कर रहे हैं का ये दावा है की कोई भी आज आसानी से एक चोथाई एकड़ में इस पद्धति से खेती कर आत्म निर्भर बन सकता है। इस खेती का अविष्कार जापान के कृषि वैज्ञानिक श्री मस्नोबू फुकुओकाजी ने किया है। जब जमीन की जुताई की जाती है तो बारीक बखरी मिट्टी बरसात के पानी के साथ मिलकर कीचड में तब्दील हो जाती है जो बरसात के पानी को जमीन में नहीं जाने देती है। जुताई के कारण चूहों ,चीटे -चीटि ,केंचुओं आदि के घर जो बरसात के पानी को जमीन के भीतर ले जाने का काम करते हैं मिट जाते हैं,जिस से भी बरसात का पानी जमीन में नहीं जाता है।

ऊपरी सतह की मिट्टी असली कुदरती खाद होती है करीब 10 टन प्रति एकड़ कुदरती खाद  हर साल इस प्रकार बह जाती है। खेत भूके और प्यासे रहते हैं। किन्तु जुताई नहीं करने से इस के विपरीत खेत ताकतवर हो जाते हैं। उनमे ताकतवर फसलें पैदा होती हैं। ताकतवर फसलों में बीमारी का कोई प्रकोप नहीं रहता है।

हम मोसम अनुसार फसलों के बीजों का छिडकाव कर देते हैं जरुरत पड़ने पर पानी दे देते हैं। फसलें पकने के बाद उनको काट कर गहाई करने के बाद बचे अवशेषों को वापस खेतों में जहां का तहां वापस डाल देते हैं। बिना-जुताई की कुदरती खेती जिसे बिना-जुताई की जैविक खेती भी कहा जाता है के उत्पाद केंसर जैसी गंभीर बीमारी को ठीक करने के काम आते हैं जो बहुत कम उपलब्ध हैं इस लिए बहुत महंगे बिकते हैं।

                                                          कुदरती गेंहूं की फसल
 इस खेती को करके कोई भी कुदरती आहार पैदा कर उन्हें खाकर ,बेच कर अपना भविष्य सुरक्षित कर सकता है। अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें। ये खेती सामाजिक,पर्यवार्नीय, धार्मिक और वैज्ञानिक सत्य पर आधारित है।
राजू टाइटस
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*Raju Titus.Natural farm.Hoshangabad. M.P. 461001.*
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