Thursday, September 17, 2015

संजीव त्रिपाठी जी का उदाहरण


ऋषि खेती 

संजीव त्रिपाठी जी का उदाहरण 

जब हम अपने खेतों को अपने हाल पर छोड़ देते हैं तो वे अपने आप "ऋषि खेतों "  में तब्दील हो जाते   हैं। ऐसा ही संजीव भाई के खेतों में हुआ है।  इन खेतों में परंपरागत खेती होती थी किन्तु जुताई के कारण खेत मरने लगे थे।  इसलिए यहां खेती बंद हो गयी थी।


Displaying IMG_20150913_083352.jpgभारतीय परंपरागत खेती  किसानी में जुताई के कारण मर रहे खेतों में किसान जुताई  बंद कर उन्हें कुदरत के भरोसे  छोड़  देते थे। ऐसा करने से खेत पुन : जीवित हो जाते थे उनमे फिर से फसलों का अच्छा उत्पादन होने लगता था।

जुताई करने से बरसात का पानी जमीन के द्वारा सोखा नहीं जाता  है वह तेजी से बहता है अपने साथ खाद को भी बहा कर  जाता है। इस कारण सूखे और गीले खेतों की समस्या निर्मित हो जाती है। संजीव भाई  के खेतों में कांस घास है जो इस  इस बात की पुस्टी करती   है।  कांस घास की जड़ बहुत गहराई तक जाती हैं (25 -30 फ़ीट ) तक।  हमारे पूर्वज बताते हैं  कांस खेतों में  फूलने लगे इसका मतलब है पानी बहुत नीचे चला गया है।

Displaying IMG_20150913_110549.jpgहमारे प्रदेश में ऋषि पंचमी के पर्व में कांस घास की पूजा  होती है। जिसमे फलहार रूप में बिना जुताई के कुदरती अनाजों के सेवन की सलाह दी जाती है।  इसका आशय यह है जुताई हानिकारक है। जताई नहीं करने से खेतों की जलधारण शक्ति वापस आ जाती है और कांस गायब होने लगती है।  ऐसा कुछ संजीवजी के खेतों को देख कर लग रहा है। कांस घास जा रही है और अच्छी वनस्पतियां आ रही हैं।

फुकूओकाजी अनेक बार अपनी कुदरती खेती को "कुछ मत करो " खेती कहते हैं।  उनका मतलब यह है जब हम कुदरत के भरोसे खेती को छोड़ देते हैं तो अपने आप खेती हो जाती है।

कुदरती खेती करने से पहले हमारे खेत भी कांस घास से भर गए थे जुताई बंद करने से वो अपने आप ताकतवर और पानीदार हो गए है।

कांस घास में खेती करना बहुत आसान है बीजों को सीधे या बीज गोलियां बना कर कांस घास के ढकाव में बिखरा दिया जाता है। उसे काट काटकर आड़ा तिरछा फेला दिया जाता  है।  फसलें उगकर कटे घास के ढकाव के ऊपर  आ कर सामान्य  उत्पादन देती हैं।  जैसा की नीचे चित्र में दिखाया गया है।
गेंहूँ की नरवाई के ढकाव से निकलते मूंग के नन्हे पौधे 
यह ढकाव खरपतवार नियंत्रण करता है ,फसलों के रोग को दूर करता है नमी को संरक्षित करता है और जैविक खाद बनता है। इस ढकाव के नीचे केंचुए सहित असंख्य लाभकारी जीव जंतु ,कीड़े मकोड़े रहते हैं जो फसलों के सभी पोषक तत्वों की  आपूर्ति कर देते है।   जब खेत अच्छे हो जाते हैं कांस गायब हो जाती है। हमारे खेतों में जहाँ कांस  सिवाय कुछ नजर नहीं आता था वहां अब कांस का एक तिनका भी नजर नहीं आता है। जब हम ऋषि खेती के  तीसरे साल में थे जापान के ऋषि खेती के प्रणेता फुकूओकाजी हमारे खेतों में पधारे थे  हमारी खेती  को उन्होंने  नम्बर वन का खिताब दया था। उनका कहना था मै अभी अमेरिका से  आ रहा हूँ। जमीन की जुताई  के कारण अमेरिका तीन चौथाई से अधिक मरुस्थल में तब्दील हो गया है। उसकी निशानी कांस घास है। उन्हें नहीं मालूम है  कांस घास में खेती कैसे करें पर आपने वह कर दिखाया है इसलिए हम आपको नंबर वन दे रहे हैं।



Saturday, September 12, 2015

Friday, September 4, 2015

तवा कमांड मरुस्थल में तब्दील हो रहा है !

 तवा कमांड मरुस्थल में तब्दील हो गया  है !

ऋषि खेती से ठीक करें। 

हरियाली है जहाँ खुशहाली है वहां 

The One Straw Revolution (एक तिनका क्रांति )
होशंगाबाद के तवा बांध के सिंचित खेत आम आदमी की नजर में बहुत विकसित नजर आते हैं,किन्तु हकीकत यह है की इन खेतों की उर्वरकता और जलधारण  छमता खत्म हो गयी है।  इनमे रासायनिक जहरों का बहुत अधिक प्रदूषण हो गया है। पोषक तत्व नस्ट हो गए हैं। 

ये खेत अब रसायनो और बाँध के पानी पर पूरी तरह आश्रित हो गए है।  एक समय था जब इन खेतों में ७ से लेकर १२ अनाजों की कुदरती खेती होती थीअब केवल गेंहू ही ऐसी फसल है जो  हो रही है जिसमे उत्पादन हर साल घट रहा है। ये वैज्ञानिक खेती का नमूना है।

ऐसा वैज्ञानिक खेती के कारण हुआ है। जिसमे पेड़ों को काटना , गहरी जुताई ,अंधाधुन्द रसायनो का उपयोग, भारी  सिंचाई, नरवाई पुआल आदि को जलाना प्रमुख है। 

जब खेतों को मशीनो से गहरा जोता  जाता है तब बरसात का पानी जमीन में नहीं सोखा जाता है वह तेजी से बहता है अपने साथ खेत की खाद को बहा  कर ले जाता है। इस से खेत मुरदार हो कर सूख जाते है वे मरुस्थल में तब्दील हो जाते हैं। ऐसा ही यहां हुआ है। 

हम पिछले तीस साल से बिना जुताई की कुदरती खेती कर रहे है जिसे हम ऋषि खेती कहते हैं।  इस खेती में जमीन की जुताई नहीं की जाती है इस कारण बरसात का पूरा पानी जमीन के द्वारा सोख लिए जाता है पानी के बह  कर बाहर नहीं जाने के कारण खेतों की खाद का बहना रुक जाता है। इस से अपने आप खेत खतोड़े  और पानीदार हो गए हैं। इस से खेतों में साल भर हरियाली रहती है जिसके कारण खेत असंख्य जैवविविधताओं से भर गए है जो खेतों में पोषक तत्वों की आपूर्ति कर देते हैं।  हमारे खेतों की मिट्टी में असंख्य नत्रजन तथा अन्य पोषक तत्वों को प्रदान करने वाले सूख्स्म जीवाणु हैं जो लगातार खेतों को खतोड़ा बना  रहे हैं। 

हम खरपतवारों को मारते  नहीं है तथा पुआल और नरवाई आदि को जहां का तहाँ पड़ा रहने देते हैं जिस से खेतों को अतिरिक्त खाद मिल जाती है। जिस से हमे फसलों में बहुत अच्छा उत्पादन मिलता है। चारे के पेड़ों की हरयाली और पशु पालन  इसमें चार चाँद लगा रहे हैं।  

ऋषि खेती करने से पहले हम भी वैज्ञानिक खेती करते थे जिस से हमारे खेत मरू हो गए थे जो अब सुधर गए हैं। हमारे देश में खेती किसानी में घट रही आमदनी का मूल कारण जमीन की जमीन की जुताई है इसे बंद कर हम खेतों की खोयी ताकत बिना लागत के  से वापस ला सकते हैं। 






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Monday, August 10, 2015

ऋषि खेती और नदियों का जिए अभियान

"ऋषि खेती" नदियों को पुनर्जीवित करने का अभियान

हमारे देश में हजारों सालो से नदियों को पवित्र  मान कर पूजा हो रही है असंख्य लोग हरवर्ष नदियों में   स्नान कर उनकी पूजा करते हैं और जल को अपने घरों में रखते हैं  उनका विश्वाश है इस से एक और जहाँ हमे भगवान मिलते हैं वहीं हमारा स्वास्थ भी ठीक रहता है।

किन्तु अब इस विश्वाश को ठेस लगने लगी है इसका कारण  यह है कि हमारी पवित्र नदियों का अस्तित्व खतरे में पड़  गया है वो मरने लगी हैं। सबसे खराब हालत यमुनाजी की दिल्ली में है वहां ऐसा प्रतीत होता है की नदी है ही नहीं। वह  एक गंदे नाले  में परिवर्तित हो गयी है।
पवित्र नदियां अब मरने लगी हैं। 

असल में हम यह सोचते हैं की बरसात आसमान से आती है किन्तु यह सोच गलत है बरसात हरियाली की देन है हरियाली रहेगी तो बरसात होगी अन्यथा नहीं होगी , किन्तु जबसे औधोगिक खेती का चलन शुरू हुआ है तबसे बहुत तेजी से हरियाली नस्ट हुई है और हो रही है।   इस कारण  मौसम बदल गया है बरसात अनियंत्रित हो गयी है दूसरा कारण यह है की खेती में की जारही जमीन की जुताई के कारण बरसात का पानी जमीन में नहीं जाता है वह तेजी से बहता है अपने साथ खेत की खाद मिट्टी को भी बहा  कर लेजाता है जिसका सीधा असर  हरियाली पर पड़  रहा है और बरसात का पानी जमीन में ना जाकर तेजी से बह जाता है जिस से नदियों को पानी मिलना बंद हो जाता है।
नदियों के मरने का मूल कारण मशीनी जुताई है। 

हम पिछले तीन  दशकों से बिना जुताई की कुदरती खेती कर रहे हैं जिसे हम ऋषि खेती कहते हैं ।  हमारे खेत हरियाली से भर गए हैं। बरसात का पूरा जल जमीन में समां जाता है। जो साल भर भूमिगत झरनो से नदी ,नालो और कुओं को मिलता रहता है।

अपने ऋषि खेती के दीर्घकालीन  अनुभवों के आधार पर हमारा मानना है की यदि हमे अपनी पवित्र नदियों को पुनर्जीवित करना है तो हमे हर हाल में बिना जुताई की खेती को करना होगा। यह सबसे उत्तम जलप्रबंधन की योजना है जिसमे लगत शून्य है।
टाइटस ऋषि खेती फार्म में "यमुना जिए अभियान" दिल्ली  की कार्यशाला

हरियाली से हमे केवल पानी ही नहीं मिलता है वह हमे सांस लेने लायक शुद्ध हवा भी प्रदान करती है।यह दूषित  हवा को सोख कर जैविक खाद बनाती है जिस से हमे जहरीले रसायनो से पूरी तरह मुक्ति मिल जाती है।
हमे कुदरती शुद्ध खाना मिलता है जिस से हम तेजी से पनप रही कैंसर जैसी बीमारियों पर विजय पा सकते हैं।

हमारे पर्यावरण की रक्षा करने की जिम्मवारी हम सरकार पर छोड़ कर सो नहीं सकते हैं इसमें हम सबको मिल कर काम करने की जरूरत है।  नदियों की पूजा का यही मतलब है।